कइयों को फेसबुक से गायब रहने की शर्त पर स्थायी नौकरी या प्रोमोशन या दूसरे तरह के लाभ मिले हैं!

Vineet Kumar : फेसबुक पर लिखना सिर्फ टाइपिंग स्पीड अच्छी होने का मामला नहीं है… फेसबुक पर लिखकर क्रांतिकारी होने और गाली के अंदाज में सिक्यूलर कहकर आप जो चलता करने के मूड में रहते हैं. सच बात तो ये है कि फेसबुक पर भी असहमति दर्ज करना, बेबाक अपनी बात रखना कोई आसान काम नहीं है. आए दिन चौतरफा दवाब,गाली,उपहास और धमकियां झेलने में अच्छे-अच्छे की बत्ती लग जाती है. आपको जो स्टेटस दिखाई देते हैं, उसके कारण काफी-कुछ असल जिंदगी में चल रहा होता है.

यकीन न हो तो उन लोगों से बात कीजिए, उनके मन को टटोलिए जिन्हें फेसबुक से गायब रहने की शर्त पर स्थायी नौकरी, प्रोमोशन और दूसरे तरह के प्रलोभन दिए जाते हैं और वो सिरे से गायब भी हो जाते हैं..हनीमून पीरियड में वापस लौटते हैं. सोचिए, फेसबुक पर की जानेवाली टिप्पणियों का भुरभुरे समुदाय के बीच कितना भय है !

असल में हमारी दिक्कत ये है कि हमने क्रांति, बदलाव, आंदोलन जैसे शब्दों को इस हद तक रिड्यूस कर दिया कि एक तो ये सामाजिक बुराई समझा जाने लगा है. दूसरा कि इसका मतलब सिर्फ सड़कों पर उतरकर, बैनर टांगकर जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाने तक समझा जाता है. आप मुझे बताइए कि जब इस देश में कई वर्ग हैं, सबकी अपनी स्थतियां हैं तो विरोध करने का सिर्फ एक तरीका सड़क पर उतरना कैसे हो सकता है? विरोध और असहमति के लिए वो रातोंरात अपनी क्लास तो नहीं बदल लेगा..इसका मतलब है कि उसके अपनी बात रखने का हक नहीं है ? आप जब शॉपिंग से लेकर सेक्स समस्या ऑनलाइन और ऐप्स से हल करने की ओर प्रस्थान कर रहे हैं तो विरोध के स्वर का ऑनलाइन होना क्यों नहीं पचा पा रहे ?

फेसबुक पर लिखना इतना ही आसान होता तो फोन करके, स्पेशल मिलकर अपडेट करने की अपील करते..वो खुद न कर लें..नहीं, उन्हें पता है कि जहां ऐसा किया, सेटिंग गड़बड़ा जाएगी. आपको देश में व्याप्त संकट की चिंता है, उन्हें घर, गाड़ी, प्लॉट की इएमआइ चुकाने की चिंता जान खाए जा रही है.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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