बिहार चुनाव के परिणाम के बाद अब मोदी और उनकी पार्टी को समझना होगा कि बातों का जलपान बहुत दिनों तक जनता नहीं करती। देश, गुजरात नहीं है। गुजरात से ही देश नहीं बनता। गुजरात की सोच देश में, हर सांसों में हो, जनता के मन में हो, यह जरूरी नहीं है। गुजरात की राजनीति और देश की राजनीति अलग अलग है। बिहारी नही चाहते कि बिहार गुजरात बने। बिहार को बिहार ही बने रहने दें वो भी नीतिश के नजरिए से। इसी में बिहार के लोग खुश हैं।
–रमेश कुमार ‘रिपु’-
कल तक भाजपा वाले सियासत का सिंकदर मोदी को कह रहे थे। अमित शाह को मोदी का तुरूप का पत्ता बताया जा रहा था। दोनों दावे फुस्स हो गए। दिल्ली और अब बिहार की हार से स्पष्ट है कि अच्छे दिन अब भाजपा और मोदी के हाथ से फिसलने शुरू हो गए हैं। उनका खुमार अब उतर गया है। बिहार में उनका डीएनए फेल हो गया। बदजुमानी उन्हें ले डूबी। दादरी कांड भाजपा के गले की फांस बन गया। देश में बढ़ रही असहिष्णुता ने भाजपा की बढ़ी लोकप्रियता के लिए ऐसा ब्रेकर बना कि उसे पार नहीं कर सकी पार्टी। बिहार में भाजपा हारी तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे,ऐसी बातों को बिहार ने पूरी तरह दरकिनार किया।
बिहार को मोदी जीत क्यों नहीं पाए इसके कई कारण बताए जाएंगे। लेकिन एक बड़ा सवाल यह भी है कि जिन मुद्दों को लेकर भाजपा या कहें मोदी लोकसभा चुनाव जीते थे, वहीं मुद्दे दिल्ली के बाद बिहार में क्यों नहीं चला। बिहार में भाजपा तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गई। मेरा मानना है कि इस हार के असली खलनायक मोदी ही रहे। बदजुबानी और बिहार के सदंर्भ में सही जानकारी नहीं होना ही उनके लिए घातक साबित हुआ। मोदी की आम सभा समस्तीपुर, बेगुसराय, नालंदा, दरभंगा आदि स्थानों में हुई, लेकिन वे कहते हैं बिजली आई क्या। बिजली चाहिए तो भाजपा की सरकार लाएं। जबकि उनकी जहां जहां सभा की गई, वहां बिजली 18 से 20 घंटे रहती है। जाहिर है उन्होंने ऐसा कहकर नीतिश का नहीं, खुद का मजाक बनाया। जनता समझ गई कि मोदी वोट के लिए जबरिया नीतिश की बुराई कर रहे हैं।
इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि बिहार वालों को बिहार मांडल ही पसंद आया। नतिश का काम काज भाया। यह अलग बात है कि सीट के मामले में नीतिश से लालू आगे निकल गए हैं। जबकि मोदी उन्हें जंगल राज का हीरो बता रहे थे। लालू कमंडल पार्ट टू कहते रहे। दरअसल बिहार चुनाव के परिणाम के बाद अब मोदी और उनकी पार्टी को समझना होगा कि बातों का जलपान बहुत दिनों तक जनता नहीं करती। देश, गुजरात नहंी है। गुजरात से ही देश नहीं बनता। गुजरात की सोच देश में, हर सांसों में हो, जनता के मन में हो, यह जरूरी नहीं है। गुजरात की राजनीति और देश की राजनीति अलग अलग है। बिहारी नहीं चाहते कि बिहार गुजरात बने। बिहार को बिहार ही बने रहने दें वो भी नीतिश के नजरिए से। इसी में बिहार के लोग खुश हैं।
नीतिश और मोदी के बीच बिहार में सीधी सियासी जंग थी। दिल्ली में केजरीवाल और मोदी के बीच सीधी सियासी जंग थी। दोनों जगह मोदी और उनके नेता मुंह की खाए। आडवाणी की बात सच साबित हो रही है कि देश में अशोषित आपात लागू है। यही सच है। जनता ने मोदी के अघोषित आपात का ही जवाब दिल्ली और अब बिहार में दिया है। आने वाले समय में यूपी और पश्चिम बंगाल में चुनाव होने हैं। जाहिर है यहां भी मोदी की सियासत एक बार फिर दांव पर लगेगी। बहरहाल मोदी की सियासी आभा का चीरहरहण चुनाव दर चुनाव में हो रहा है। मोदी बिहार को समझ नहीं सके। जमीन की सियासत को जिस तरह मोदी कई महीने तक उलझाए रहे यदि राहुल गांधी जमीन अधिग्रहण के मामले को जोरदार तरीके से न उठाते तो मोदी किसानों से उनकी जमीन छीनने की जो राजनीति की थी उससे देश का किसान संशय में था।
मोदी कुछ उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाना चाह रहे थे। इससे अच्छे दिन सबके हिस्से में नहीं आएगा,यह बात बिहार की साढ़े छह करोड़ की जनता ने महसूस किया और केसरिया झंडे के तले में जाना उचित नहीं समझा। महंगाई की ताप भी बिहार चुनाव में अपना असर दिखाई। देश में अचानक अरहर दाल के भाव बढ़ना, प्याज तो पहले से ही रूला रहा था। आम आदमी की थाली से दाल गायब करने की सियासत से अच्छे दिन नहीं आएंगे, यह मोदी को समझना होगा। केवल विदेश घूमने से अच्छे दिन नही आएंगे। बुलेट ट्रेन से पहले जीवन जिससे चल सके, उसकी जरूरत अधिक है। लोकतंत्र, तांत्रिक बातों से नहीं चलता। न ही बातों से। मोदी को देश के लिए और उनकी पार्टी की जहां जहां सरकार है, वहां के लिए कुछ करें नहीं तो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ भी उनके हाथ से फिसल सकता है। इसलिए कि इन राज्यों में अच्छे दिन के लिए लोग इंतजार कर रहे है। लेकिन अच्छे दिन दिख नहीं रहे हैं। अच्छे दिन खटाई में कब तक रहेंगे यह तो रिपु को भी पता नहीं, लेकिन अच्छे दिन की तारीख जानने का हक सबको है वजीरे आजम।
वरिष्ठ पत्रकार रमेश कुमार ‘रिपु’ से संपर्क 08109949394 के जरिए किया जा सकता है.


