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बिहार हार के मायने

बिहार में हुई भाजपा की हार ने देश में एक बार फिर से नई बहस छेड दी है। महागठबंधन की जीत से ज्यादा भाजपा की हार के चर्चे रहे। मीडिया भी लालू- नीतिश की रणनीति पर बात करने की बजाय मोदी-शाह की जोड़ी पर चर्चा कर रही है। भाजपा की हार पर कई नेता मोदी – शाह को जिम्मेदार मान रहे हैं तो कई संघ प्रमुख मोहन भागवत को। हालांकि पार्टी में एक धडा ऐसा भी है जो इस हार की सामूहिक जिम्मेदारी ले रहा है, जो कि मोदी -शाह और भागवत को मन मारकर ही सही लेकिन इस हार से बचाने का कथित प्रयास कर रहा है। विवादित बयान, गौरक्षा का मुद्दा, आरक्षण, पार्टी के नेताओं के बागी तेवर जैसे कई कारण रहे , जिससे भाजपा को बिहार में नुकसान या बहुत बुरा नुकसान पहुंचाया। भाजपा को कई ऐसे बदलाव करने चाहिए जिससे पार्टी और नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता बरकरार रहे।

बिहार में हुई भाजपा की हार ने देश में एक बार फिर से नई बहस छेड दी है। महागठबंधन की जीत से ज्यादा भाजपा की हार के चर्चे रहे। मीडिया भी लालू- नीतिश की रणनीति पर बात करने की बजाय मोदी-शाह की जोड़ी पर चर्चा कर रही है। भाजपा की हार पर कई नेता मोदी – शाह को जिम्मेदार मान रहे हैं तो कई संघ प्रमुख मोहन भागवत को। हालांकि पार्टी में एक धडा ऐसा भी है जो इस हार की सामूहिक जिम्मेदारी ले रहा है, जो कि मोदी -शाह और भागवत को मन मारकर ही सही लेकिन इस हार से बचाने का कथित प्रयास कर रहा है। विवादित बयान, गौरक्षा का मुद्दा, आरक्षण, पार्टी के नेताओं के बागी तेवर जैसे कई कारण रहे , जिससे भाजपा को बिहार में नुकसान या बहुत बुरा नुकसान पहुंचाया। भाजपा को कई ऐसे बदलाव करने चाहिए जिससे पार्टी और नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता बरकरार रहे।

सबसे पहले भाजपा की जो “एक व्यक्ति केन्द्रित पार्टी” वाली छवि है,उसको बदलने की आवश्यकता है। भाजपा में मोदी, शाह, जेटली, राजनाथ जैसे बड़े नेताओं के साथ साथ दूसरे कई स्थानीय और क्षेत्रीय नेताओं को भी चुनाव के दौरान तवज्जो देनी पडेगी और चाहिए। क्योंकि पिछले (दिल्ली और बिहार) चुनावों में हुई हार का यही बड़ा कारण रहा। भाजपा ने स्थानीय नेताओं के बजाय राष्ट्रीय नेताओं पर भरोसा किया।

दूसरा, भाजपा को ध्रुवीकरण की राजनीति करने से बचना चाहिए। लोकसभा चुनाव में जनता ने नरेन्द्र मोदी को विकास के एजेंडे पर चुना। लेकिन अब भाजपा ध्रुवीकरण की राजनीति करने की कोशिश में लगी है। लेकिन वो भूल गई कि बहुसंख्यकों के बीच में अल्पसंख्यकों का डर पैदा कर किसी और राज्य में तो चुनाव जीता जा सकता है लेकिन बिहार डअ नहीं। बिहार में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक का मतलब हिंदू-मुस्लिम नहीं बल्कि उच्च और निम्न जातियां होती हैं।

तीसरा, सीएम उम्मीदवार घोषित करना। भाजपा की दिल्ली और बिहार में हुई हार का मुख्य कारण सीएम उम्मीदवार ही रहा। दिल्ली में किरण बेदी को सीएम उम्मीदवार घोषित करके भाजपा ने बहुत बड़ी भूल की थी। और बिहार में किसी नेता को सीएम उम्मीदवार न घोषित करके भूल करदी। भाजपा को बिहार में नीतिश या लालू की टक्कर का कोई नेता तैयार कर सीएम उम्मीदवार घोषित करना चाहिए था जिससे जातीय गणित बन सकता था और भाजपा की हालत बद से बदतर होने से बच सकती थी।

चौथा, चुनाव के दौरान विवादित बयानों से बचना। वैसे तो विवादित बयानों से सभी पार्टी को बचना चाहिए लेकिन बीजेपी के लिए ऐसे बयान खतरनाक साबित होते हैं क्योंकि अभी बीजेपी सत्ता में पूर्ण बहुमत से है और विरोधी दलों को मौका मिल जाता है। चुनावी समर में संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण संबंधी बयान को भाजपा के कई नेताओं ने हार का कारण माना है। गौरक्षा से जुड़े बयानों ने भी भाजपा को काफी नुकसान पहुंचाया है।

पाँचवां, अगर भाजपा सत्ता में है तो वो सिर्फ और सिर्फ विकास के मुद्दे पर और उसे अपना विकास का वादा कभी नहीं भूलना चाहिए। नरेन्द्र मोदी को ये बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि वो विकास के एजेंडे पर प्रधानमंत्री बने हैं न कि  हिंदुत्व के। तो भाजपा को फिलहाल संघ से दूरी बनाए रखना चाहिए क्योंकि संघ अब भाजपा के लिए चुनौती बनता जा रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी जब सरकार में थे तब उन्होंने संघ को कभी हावी नहीं होने दिया। और शायद मोदी सरकार के पूर्ण बहुमत में होने से ही संघ आज भाजपा पर हावी हो रहा है और अपना हिंदुत्व का एजेंडा भाजपा पर थोप रहा है।

आने वाले समय में असम, केरल, बंगाल और उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। और मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए भाजपा के लिए यदि असम को छोडदें तो बाकी अन्य राज्यों में सरकार बनाना काफी मुश्किल है। यदि बिहार चुनाव में हुई हार से बीजेपी ने सबक नहीं लिया तो इन राज्यों में भाजपा की हालत उसी तरह होगी जिस तरह लोकसभा में कांग्रेस की थी।

प्रियंक द्विवेदी
भोपाल
8516851837
[email protected]

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