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जयगुरुदेव से इंदिरा दो बार मिलने गईं और दोनों बार तनाव लेकर लौटीं

Ashok Bansal : एक किस्सा नायाब… जलवा जयगुरुदेव का और इंदिरा गांधी का आगमन… इंसानी भीड़ को कौन सा नारा लुभा जाय, कौन सी बात उसकी भृकुटि तान दे, इसका पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है. इसके साथ ही जिसके पास भीड़ है वह ताकतवर है. आजदी से पहले गांधी के पास भीड़ थी, सुभाष के पास भीड़ थी. दोनों ने गोरों की नाक में दम कर दी थी. आजादी के बाद नेताओं की स्वार्थी नीयत देख भीड़ खिसक गई. अब बाबाओं ने भीड़ का मनोविज्ञान समझा और अपने पीछे लामबंद कर लिया है.

Ashok Bansal : एक किस्सा नायाब… जलवा जयगुरुदेव का और इंदिरा गांधी का आगमन… इंसानी भीड़ को कौन सा नारा लुभा जाय, कौन सी बात उसकी भृकुटि तान दे, इसका पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है. इसके साथ ही जिसके पास भीड़ है वह ताकतवर है. आजदी से पहले गांधी के पास भीड़ थी, सुभाष के पास भीड़ थी. दोनों ने गोरों की नाक में दम कर दी थी. आजादी के बाद नेताओं की स्वार्थी नीयत देख भीड़ खिसक गई. अब बाबाओं ने भीड़ का मनोविज्ञान समझा और अपने पीछे लामबंद कर लिया है.

 

संतों, साधुओं और बाबाओं की मंडी कहे जाने वाले मथुरा में बाबा जयगुरुदेव की भीड़ देखकर सभी ने दांतो तले अंगुली दबाई. बाबा परलोक में हैं पर उनकी भीड़ और उस पर लार टपकाने वाले नेताओं के अनेक किस्से आज भी जीवंत हैं. आपातकाल लगा और बाबा जयगुरुदेव जेल में डाल दिए गए. २९ जून १९७५ से २३ मार्च ७७ तक बाबा देश की कई जेलों में रहे. बरेली जेल में बाबा को बेड़ियों में रखा गया. यही बेड़ी बाबा के लिए वरदान साबित हुई. जेल से छूटने पर बाबा की भीड़ में इजाफा हो गया. बाबा के आश्रम में बेड़ी वाला आदमकद फोटो जगह-जगह लटका दिया गया.

जनता पार्टी आई. कांग्रेसी सत्ता के लिए मचलने लगे. तभी बाबा की भीड़ ने इंदिरा गांधी का ध्यान अपनी ओर खींचा. २२ नवम्बर ७९ को संजय गांधी बाबा के आश्रम में बाबा के तेवर भाँपने आये. उन्होंने
बाबा के अंदर विरोध का कोई भाव न देखा तो दिल्ली लौटकर अच्छी खबर दी. तब इंदिरा गांधी ने बाबा के आश्रम में आने का मन बनाया. इंदिरा गांधी से पहले नारायण दत्त तिवारी, मोहसिना किदवई, विजय लक्ष्मी पंडित मथुरा आये और आने वाले चुनावों के लिए बाबा से आशीर्वाद ले गए.

उस वक्त बाबा के चेले गुलाबी पगड़ी बांधते थे. इंदिरा गांधी नवंबर ७९ (तारीख याद नहीं) में मथुरा आईं तो बाबा के चेले गुलाबी पगड़ी में गोवर्धन रोड से आश्रम तक (करीब तीन किलोमीटर) लम्बी लाइन लगाकर खड़े दिखाई दिए. आश्रम में बाबा की कुटिया में इंदिरा जी बाबा के सामने जमीन पर बैठ गईं. कुटिया में बाबा के खास सेवक बिठ्ठल भाई पटेल और बालमुकुंद तिवारी के अलावा कोई नहीं था. बाबा ने बातचीत में कड़े तेवर नहीं दिखाए. हाँ, इतना जरूर कहा— ”देश में इमरजेंसी से बहुत कष्ट हुआ.” इंदिरा ने हाँ कहा न ना. मीटिंग बहुत संक्षिप्त रही. मथुरा के वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र मित्र व गणेश प्रसाद चतुर्वेदी बाबा के बेहद करीबी थे. वे कुटिया के बाहर थे. उन्होंने कार की ओर जाती इंदिरा के चेहरे पर ख़ुशी नहीं तनाव देखा.

चुनाव हुए. इंदिरा जी को अपनी कुर्सी वापस मिल गई. उनके मन में बाबा की भीड़ का शुक्रिया अदा करने का शिष्टाचार याद रहा सो १९८० में शाम के वक्त अचानक आश्रम आईं. तब देश में महंगाई का आलम था. बाबा ने महंगाई की चर्चा की और चीनी के दाम पूछ लिए. इंदिरा जी ने कहा– ”मैं बाजार नहीं जाती, मुझे नहीं मालूम”. इस पर बाबा ने कह दिया— ”ऐसे कैसे देश चलेगा”. तब भी कुटिया के बाहर पत्रकार नरेंद्र मित्र मौजूद थे. इस बार भी इंदिरा जी के चेहरे पर संतोष नहीं, तनाव था.

बाबा की भीड़ का नमन चंद्रशेखर, आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, जगजीवन राम और न जाने कितने अन्य राजनेताओं ने किया. बाबा के स्वर्ग जाते भी उस्ताद भीड़ न जाने कहाँ गायब हो गई.

इस भीड़ को अपुन का भी शत शत नमन.

पत्रकार अशोक बंसल के फेसबुक वॉल से.

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