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ताकि खुदा बंदे से खुद पूछे…

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह दूसरी अमेरिका-यात्रा भी काफी प्रचारित हो रही है। यह धारणा गलत सिद्ध हो रही है कि यह दूसरी यात्रा, पहली यात्रा की तरह सुप्रचारित नहीं होगी। लोगों को लगता है कि पहली यात्रा के मुकाबले इस यात्रा के दौरान कुछ ठोस उपलब्धियां होने की संभावनाएं दिखाई पड़ती हैं। हेलिकॉप्टरों की खरीद का बड़ा सौदा तो हुआ ही है, अमेरिकी कंपनियों के नामी-गिरामी मालिकों का जैसा मेला मोदी को देखने के लिए जुटा है, वैसा शायद ही किसी प्रधानमंत्री को देखने के लिए जुटा हो। रुपर्ट मर्डोक जैसे कई व्यक्तियों ने मोदी की तारीफ के पुल बांध दिए हैं लेकिन असली सवाल यह है कि ये सब बातें और मुलाकातें कहीं कोई गहरा भ्रमजाल बनकर न रह जाएं?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह दूसरी अमेरिका-यात्रा भी काफी प्रचारित हो रही है। यह धारणा गलत सिद्ध हो रही है कि यह दूसरी यात्रा, पहली यात्रा की तरह सुप्रचारित नहीं होगी। लोगों को लगता है कि पहली यात्रा के मुकाबले इस यात्रा के दौरान कुछ ठोस उपलब्धियां होने की संभावनाएं दिखाई पड़ती हैं। हेलिकॉप्टरों की खरीद का बड़ा सौदा तो हुआ ही है, अमेरिकी कंपनियों के नामी-गिरामी मालिकों का जैसा मेला मोदी को देखने के लिए जुटा है, वैसा शायद ही किसी प्रधानमंत्री को देखने के लिए जुटा हो। रुपर्ट मर्डोक जैसे कई व्यक्तियों ने मोदी की तारीफ के पुल बांध दिए हैं लेकिन असली सवाल यह है कि ये सब बातें और मुलाकातें कहीं कोई गहरा भ्रमजाल बनकर न रह जाएं?

विदेशी पूंजीपतियों को क्या भारत के बारे में पूरी सच्चाई का पता है?  जब भारत में रहनेवाले लोग ही प्रचार की धुंध में कुछ देख नहीं पाते तो विदेशों में रहनेवाले अति-व्यस्त पूंजीपतियों को कहां समय है कि वे भारत की पूरी जानकारी रखें। तारीफों के पुल बांधने में उनका क्या जाता है लेकिन जब करोड़ों डॉलर भारत में लगाने की बात आएगी तो वे अपनी एक-एक कौड़ी पर ध्यान देंगे और सच्चाई की सारी परतें उघाड़कर देखना चाहेंगे। सवा साल में जितनी विदेश-यात्राएं मोदी ने की हैं, क्या किसी अन्य प्रधानमंत्री ने की हैं? जितना खर्च मोदी ने किया है, क्या किसी अन्य प्रधानमंत्री ने किया? उसमें से निकला क्या? लाखों करोड़ रूपये के विनिवेश की घोषणाएं होती रहती हैं लेकिन ‘स्वच्छता अभियान’ की तरह वे साफ हो जाती हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। साल भर बाद खोखले प्रचार के ये बादल फटेंगे और उनमें से आग बरसेगी। तब क्या होगा?
यही हाल है, सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट पाने का। जिन पांच महाशक्तियों के हाथ में असली निर्णायक शक्ति है, उन्होंने तो कन्नी काट रखी है। लेकिन जी-4 यानी जर्मनी, जापान, ब्राजील और भारत एक-दूसरे की पीठ ठोक रहे हैं। वे एक-दूसरे को हवाई आश्वासन दे रहे हैं। मोदी ने न्यूयार्क में ऐसे-ऐसे राष्ट्रों के राष्ट्रपतियों की दाड़िया भी सहलाई हैं, जो भारत के किसी छोटे-से जिले से भी छोटे हैं। यह ठीक है कि मोदी को अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बारीकियों का पता नहीं है लेकिन हमारे नौकरशाह इसी का फायदा उठाकर विदेशों में भी नौटंकियों से मन बहलवा रहे हैं? भारत को महाशक्ति संयुक्तराष्ट्र क्या बनाएगा? उसे खुद महाशक्ति बनना होगा ताकि खुदा बंदे से खुद पूछे कि बता तेरी रज़ा क्या है? क्या इस दिशा में हम सवा साल में एक इंच भी आगे बढ़े हैं?

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
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