‘मांझी’ ने ओम थानवी और दयानंद पांडेय को निराश किया

Om Thanvi : ‘मांझी’ देखी आज। अच्छी कहानी पर अच्छी फिल्म की कोशिश। मगर विफल। केतन मेहता से मुझे ऊँची उम्मीद थी। पता नहीं क्यों यथार्थ पर टिकी चीज देखते-देखते मैलोड्रामा में फिसल गई। दशरथ मांझी का जुनून अत्यधिक फ्लैशबैक दृश्यों के कारण कम असरदार ठहरा। छुआछूत, जमींदारी और हिंसा का चित्रण बॉलीवुडिया लगा। इमरजेंसी के जिक्र, इंदिरा गांधी (दीपा साही) की साक्षात – पूर्णतः अतिनाटकीय, मेकअप की सफेदी से सनी – उपस्थिति के बावजूद उस दौर के माहौल की झलक फिल्म में नहीं मिलती; राजपथ पर क्रांति (सम्पूर्ण?) के हरकारे तो मसखरे ज्यादा प्रकट होते हैं। दरअसल फिल्म को इतना विस्तार देने की जरूरत न थी। छोटी फिल्म चुस्त और ज्यादा असरदार साबित होती। इसके अलावा बड़ी कमी शायद कास्टिंग की है; खासकर राधिका आप्टे फागुनिया के रूप कुछ अधिक ही नफीस हैं। तिग्मांशु धूलिया वासेपुर को दुहराते जान पड़ते हैं। छोटी भूमिकाओं (स्थानीय पत्रकार, नक्सलवादी विद्रोही, दिल्ली में ठुल्ला, बेटी का हाथ मांगता किशोर आदि) में भी अभिनेता सधे अभिनय से परे हैं। कहीं-कहीं बचकाने भी। उन्हें अच्छे संवादों का बड़ा सहारा है। छायांकन भी मुझे बेहतर लगा। गीत-संगीत में अनावश्यक बड़बोलापन है। फिर यह फिल्म कोई देखे क्यों? नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी का अभिनय देखने के लिए। वे फिल्म की जान हैं। दशरथ मांझी के जीवन के विभिन्न पड़ावों को उन्होंने शिद्दत से जिया है। दशरथ मांझी के तकिया-कलाम को याद करते हुए कहें तो उनका अभिनय शानदार, जबरजस्त, जिंदाबाद!   

Dayanand Pandey : केतन मेहता निर्देशित माझी फ़िल्म एक निहायत ही औसत फ़िल्म है। यह फ़िल्म प्रकाश झा या श्याम बेनेगल जैसे किसी निर्देशक के हाथ में होती तो बड़ी फ़िल्म बन गई होती। क्लासिक । लेकिन केतन मेहता के कमजोर हाथ में आ कर फ़िल्म बरबाद हो गई है। न पहाड़ काटने की ज़िद पूरी तरह आ पाती है न रोमांस ही वह कलेवर पा पाता है , जो पाना चाहिए था। निर्देशन , संवाद और गीत सभी लचर है। समूची फ़िल्म में बिहार की बोली-बानी और बुनावट भी नदारद है । जैसे एक बैल की खेती होती है , वैसे ही एक एक्टर की फ़िल्म है यह। लस्त-पस्त। बावजूद इस के नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का अभिनय भी बहुत ही औसत है। बहुत निराश करते हैं । वह इस भूमिका का सुर ही नहीं पकड़ पाए हैं। अब तक के उन की फिल्मोग्राफी में उन का सब से बेसुरा अभिनय उपस्थित है माझी में। कोई लय ही नहीं है। ख़ास कर तब और जब हाल ही में हमने भाग मिल्खा , भाग ! , पान सिंह तोमर और मेरी काम जैसी बेमिसाल फ़िल्में देखी हों । मिल्खा सिंह , पान सिंह तोमर या मेरी काम से भी ज़्यादा बड़े आदमी थे दशरथ माझी । उन का काम भी इन व्यक्तियों की तुलना में इन सब से बड़ा था । विराट संघर्ष है दशरथ माझी का । माझी का संघर्ष भी व्यक्तिगत कैरियर या झगड़े का नहीं है। उन का संघर्ष सामाजिक है । और ख़ास सरोकार का है। माझी का यह संघर्ष ज़बरदस्त , शानदार , जिंदाबाद का ज़रुर है पर यह फ़िल्म इस संवाद के पूरी तरह विपरीत है। फ़िल्म की जाने क्यों लोग इतनी तारीफ झोके हुए हैं। समझ नहीं आता। फ़िल्म अनेक तथ्यात्मक चूक और मूर्खताओं से अटी पड़ी है। इतना कि अनेक जगह माथा पीट लेना पड़ता है । यह फ़िल्म देख कर वक्त और मन दोनों ही खराब हुआ।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी और दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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