तेल मंत्रालय भी सीख गया सफेद झूठ बोलना!

Anil Singh : केंद्रीय तेल व पेट्रोलियम मंत्रालय ने दावा किया है कि बीते वित्त वर्ष 2014-15 में एलपीजी सब्सिडी को सीधे उपभोक्ता के बैंक खाते में डालने की स्कीम, पहल से 14,672 करोड़ रुपए की सब्सिडी बच गई है। उसका गणित बड़ा सीधा-सरल है। 1 अप्रैल 2015 तक देश में कुल पंजीकृत एलपीजी उपभोक्ता 18.19 करोड़ थे, जबकि सक्रिय उपभोक्ता 14.85 करोड़ थे। मतलब कि 3.34 (18.19 – 14.85) करोड़ एलपीजी उपभोक्ता फर्जी, डुप्लीकेट या निष्क्रिय थे। औसतन एक उपभोक्ता साल में 12 सिलिंडर लेता है और हर सिलिंडर पर 366.07 रुपए सब्सिडी जाती है तो इन फर्जी उपभोक्ता को किनारे करने के चलते सरकार की कुल बचत हो गई 3.34 x 12 x 366.07 = 14,672 करोड़ रुपए।

इससे पहले जुलाई में भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने पहल स्कीम से इसी अवधि में 12,700 करोड़ रुपए की सब्सिडी बचाने का दावा किया था। सवाल उठता है कि तेल मंत्रालय ने दो महीने में ही लगभग 2000 करोड़ रुपए की ज्यादा बचत कैसे कर ली। वो भी तब, जब कुछ दिन पहले ही इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (आईआईएसडी) ने भारत सरकार के 12,700 करोड़ रुपए बचाने के पिछले दावे को खंडित करते हुए कहा था कि असली बचत बमुश्किल 143.4 करोड़ रुपए की हुई होगी।

उसकी गणना व तर्क बड़ा साफ था। एक तो पहल स्कीम नवंबर 2014 तक यानी वित्त वर्ष 2014-15 के 12 में से 8 महीनों में देश के केवल 54 जिलों में लागू थी और उसे देश के सभी 676 जिलों में जनवरी 2015 से लागू किया गया। दूसरे एलपीजी उपभोक्ता को बैंक खाते वगैरह के रजिस्ट्रेशन के लिए तीन महीने का वक्त दिया गया था। तब तक सब्सिडी उनके खाते में नहीं जाती थी, बल्कि वे डीलर से पहले की तरह सब्सिडाइज्ड सिलिंडर ले रहे थे। यानी, जनवरी 2015 के बाद देश के सभी जिलों में लागू करने के बाद भी बैंक खाते में सब्सिडी का ट्रांसफर 31 मार्च 2015 के बाद शुरू हुआ है। सवाल उठता है कि 54 जिलों तक सिमटी असलियत को 676 जिलों तक फुलाकर तेल मंत्रालय आखिर क्यों और किसके लिए झूठ बोल रहा है?

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार और अर्थकाम डाट काम के संपादक अनिल सिंह के फेसबुक वॉल से.