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दोस्तों, पेश है वो कविता जो मैंने बीड़ियों पर लिखी है… लंबी है, धीरज से पढ़िए….

Neelabh Ashk : दोस्तो, आज शायद आठ-नौ बरस बाद शराब के साथ सिगरेट पी. मैं जब अपने पिता के साथ दारू पीता था तो विल्ज़ पिया करता था. फिर जब एक बार बड़े बेटे के साथ दारू और सिगरेट पी तो उसने कहा, बाबा, गोल्ड फ़्लेक पीजिये, ज़्यादा अच्छी है. तब से यही पीता रहा. बीच-बीच में अपने हाथ से बनायी सिगरेट या पाइप भी पीता, जिसमें विदेशी, ख़ास तौर पर वर्जिनिया का तम्बाकू इस्तेमाल करता. फिर एक दिन आया कि तम्बाकू को विदा कर दिया. आज जब अर्से बाद गोल्ड फ़्लेक पिया तो मज़ा आया, पर वो मज़ा स्मृति और अपने बड़े बेटे के प्यार का था, जिससे अब हालात के चलते कलाम भी नहीं होता. ताहम, वो मज़ा नहीं जो बीड़ी और दोस्तों की सोहबत से मिलता है. सो दोस्तो, पेश है वो कविता जो मैंने बीड़ियों पर लिखी है. लम्बी है, पर धीरज के साथ पढ़िये, अगर धीरज और दोस्त हैं तो. यह कविता मैं अपने प्यारे दोस्त और नायाब कवि नरेन्द्र जैन को समर्पित करता हूं.

Neelabh Ashk : दोस्तो, आज शायद आठ-नौ बरस बाद शराब के साथ सिगरेट पी. मैं जब अपने पिता के साथ दारू पीता था तो विल्ज़ पिया करता था. फिर जब एक बार बड़े बेटे के साथ दारू और सिगरेट पी तो उसने कहा, बाबा, गोल्ड फ़्लेक पीजिये, ज़्यादा अच्छी है. तब से यही पीता रहा. बीच-बीच में अपने हाथ से बनायी सिगरेट या पाइप भी पीता, जिसमें विदेशी, ख़ास तौर पर वर्जिनिया का तम्बाकू इस्तेमाल करता. फिर एक दिन आया कि तम्बाकू को विदा कर दिया. आज जब अर्से बाद गोल्ड फ़्लेक पिया तो मज़ा आया, पर वो मज़ा स्मृति और अपने बड़े बेटे के प्यार का था, जिससे अब हालात के चलते कलाम भी नहीं होता. ताहम, वो मज़ा नहीं जो बीड़ी और दोस्तों की सोहबत से मिलता है. सो दोस्तो, पेश है वो कविता जो मैंने बीड़ियों पर लिखी है. लम्बी है, पर धीरज के साथ पढ़िये, अगर धीरज और दोस्त हैं तो. यह कविता मैं अपने प्यारे दोस्त और नायाब कवि नरेन्द्र जैन को समर्पित करता हूं.

बीड़ियां

तम्बाकू छूट जाने के वर्षों बाद भी बसी हुई है याद
मन में 501 नम्बर गणेश छाप मंगलूर बीड़ी की
पहली बार पी थी जो अपने कवि-मित्र नरेन्द्र जैन के
साथ भोपाल में मज़हर डेरी वाले उसके कमरे में
नये खरीदे मरफ़ी रेडियो पर मुकेश को सुनते हुए
ठर्रे के घूँट भरते।।

उम्दा-से-उम्दा सिगरेट उपलब्ध हो भले ही
मगर ठर्रे के साथ बीड़ी ही जमती है — इस
आप्त-कथन को प्रामाणिक मानने के लिए
ठर्रे के साथ-साथ मरफ़ी रेडियो और मुकेश
की अहमियत का पता होना बहुत ज़रुरी है।।

वैसे यारों का ख़याल था कि इस सूची में कविमित्र
नरेन्द्र जैन और भोपाल, और भोपाल में भी
मारवाड़ी रोड से सटा मज़हर डेरी का इलाका
भी शुमार किया जाना चाहिए। मगर जानकार
क़िस्म के लोगों का तो यह कहना था कि ये सब न
भी होते तो भी कम नहीं होती बीड़ी की महत्ता
जिसका धुँआ फिल्मों में तो नहीं मगर ज़िन्दगी में
अकसर फ़िक्र को उड़ाते चले जाने के काम आता था।।

हालाँकि झूठ बोले कौवा काटे की शोहरत के बावजूद
सागरवासी विट्ठल भाई पटेल बतौर गीतकार नहीं,
बल्कि “बीड़ी किंग” के रुप में मशहूर थे और
भारत की पहली फ़िल्टर टिप्ड बीड़ी बना कर
इस खाँटी हिन्दुस्तानी उद्योग को अन्तर्राष्ट्रीय
दर्जा दिलाने में कामयाबी हासिल कर चुके थे
ताहम हमारे शहर में भी बनती थीं वे और ख़ास-ओ-आम में
अकसर एनुद्दी, 18 नम्बर, लाल मुहम्मद या फिर
चीता फ़ाइट के नाम से जानी जाती थीं। कभी-कभी
स्थानीय निशात टाकीज़ में कोहिनूर या हातिम ताई
के शो में इण्टरवल के दौरान दिखाये जा रहे
इश्तहारों में कुक्कू के नाच पर गाते हुए जानी वाकर
दिख जाते थे सुट्टा लगा कर उनका प्रचार करते हुए
टेलिविजन से पहले के युग में।।

डब्ल्यू.डी. ऐण्ड एच.ओ. विल्स जैसा बहुराष्ट्रीय
साम्राज्य नहीं था उनका, गो इतने लोग जुड़े हुए थे
उन्हें बनाने में जिनसे खड़े किये जा सकते थे कई साम्राज्य।।

हर शहर के गुंजान इलाकों में तंग गलियों की गुंजलकों से
घिरे सीले नीम-अँधेरे मुहल्लों में जहाँ ज़्यादातर मुस्लिम
और छोटी-बड़ी तादाद में हिन्दू ग़रीब-ग़ुरबा बसते
अकसर दिख जाती थीं बड़ी-बड़ी पनियाली आँखों वाली
यक्ष्मा-उन्मुख औरतें गोद में सूप और सूप में तम्बाकू
और पत्ते रखे, सधी हुई उँगलियों की मशीनी फुर्ती से बीडि़याँ बनातीं।।

किसी-किसी घर में पूरे-का-पूरा कुनबा
ही जुटा रहता। एक तरफ़ बीडि़यों जैसे नन्हे-नन्हे बच्चे
इकट्ठा करते बीडि़यों के ढेर, दूसरी तरफ़ पन्द्रह-सोलह
बरस की लड़कियाँ बीडि़यों को सेंकने के लिए
धौंकनी से आग लहकाती हुई बाँह की आस्तीन से
पोंछती रहतीं बीड़ी के गुल जैसे लाल हो आये चेहरे।।

हलका काम सिर्फ़ मर्दों का रहता, जो दाँतों में
बीड़ी दबाये, बीडि़यों को गिन-गिन कर नीले-लाल
रंग में छपे पतले पतंगी काग़ज़ के बण्डल
बनाते रहते सैण्डो बनियान से झलकती पसलियों को
छिपाने की चिन्ता किये बग़ैर।।

इसीलिए शायद जहाँ मध्यवर्गीय बैठकें भरी रहती
थीं विज्ञापनों की चकाचैंध और शोर से, दूरदर्शन पर
कभी दिखता नहीं था उनका कोई विज्ञापन। ऐसा भी
नहीं जिसमें तहमद-कमीज़ पहने कोई ट्रक ड्राइवर
बीड़ी के कश लगाता फक्कड़पने के साथ जा सवार
होता अपने मर्सिडीज़ बेन्ज़ पर और धुआँ
उड़ाता चल देता उस ओर जहाँ एक हो रहे होते
ज़मीन और आसमान डूबते सूर्य की लाली में। या फिर
चाऱखाने का मुण्डू और आधी आस्तीन वाली सफ़ेद झक्क
बनियान पहने कोई मलियाली मछुआरा ही होता
अपनी नाव के सिरे पर खड़ा मस्तूल पर हाथ टिकाये
बीड़ी का सुट्टा मारता हुआ दूर आक्षितिज फैले
समन्दर के नीलेपन को निहारता।।

सच तो यह है कि जिनके लिए वे मेड फ़ौर
ईच अदर थीं वे ही कभी दिखे नहीं थे दूरदर्शन पर।।

मुक्तिबोध पीते थे उन्हें और मल्लिकार्जुन मंसूर
और स्वामीनाथन भी भारत भवन के सुरुचि सुसज्जित
सभागार में। और उन्हें धौंकते हुए 800 मील की
दूरी बात-की-बात में पार करने का दावा करते थे
विष्णु नागर जिन्होंने कभी नहीं पी थी कोई बीड़ी।।

चर्चित और मशहूर साहित्यिक-सांस्कृतिक शख्सियत नीलाभ अश्क के फेसबुक वॉल से.

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