ब्यूरोक्रेट्स क्यों नहीं कर सकते सरकार की आलोचना वाली अमिताभ ठाकुर की याचिका पर फैसला सुरक्षित

Petition challenging bureaucrats speech restriction : order reserved

In the petition filed by IPS Officer Amitabh Thakur challenging the complete prohibition on the members of All India Services to criticize any recent policies or acts of the State government, Central Administrative Tribunal (CAT), Lucknow today reserved its order. Sri Thakur said in the petition that rule 7 of the All India Services Conduct Rules 1968 makes a blanket prohibition on any statement of fact or opinion having adverse criticism of any current or recent policy or action of the Central Government or a State Government made by IAS, IPS and IFS officers, but such a blanket ban in too wide and vague to be legally sustainable.

The petition said that the right to freedom of speech and expression can be curtailed only through the restrictions imposed under Article 19(2) of the Constitution but the restrictions under Rule 7 are completely unrelated with these grounds and hence they need to be quashed. The Union government’s counsel opposed it on the grounds that giving such permission will result in indiscipline and chaos, leading to public disorder. The bench consisting of Navneet Kumar and OPS Malik reserved their order on this important issue after hearing both the parties.

ब्यूरोक्रेट्स द्वारा सरकार की आलोचना पर प्रतिबन्ध को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित

आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर द्वारा आईएएस, आईपीएस अधिकारियों के किसी भी सरकारी कार्य की आलोचना करने पर लगे प्रतिबन्ध को समाप्त किये जाने हेतु दायर याचिका पर केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की लखनऊ बेंच ने आज अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. याचिका में श्री ठाकुर ने कहा था कि अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली 1968 के नियम 7  में इन अधिकारियों द्वारा किसी भी ऐसे वक्तव्य दिए जाने पर प्रतिबन्ध है जिससे केंद्र अथवा राज्य सरकार के किसी प्रचलित नीति अथवा कार्य की आलोचना हो अथवा उसके सम्बन्ध में प्रतिकूल टिप्पणी हो, लेकिन यह प्रावधान बहुत ही व्यापक और अस्पष्ट होने के कारण विधिक रूप से सही नहीं है. याचिका के अनुसार किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार मात्र संविधान के अनुच्छेद 19(2) में वर्णित आधारों पर ही वर्जित किया जा सकता है पर नियम 7 में बताये गए कारणों का इस अनुच्छेद से कोई भी सम्बन्ध नहीं है. अतः इन नियम के संविधान के विरुद्ध होने के आधार पर इसे निरस्त करने की मांग की गयी थी. इस पर भारत सरकार के अधिवक्ता ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देने से अनुशासनहीनता आएगी जिससे कुव्यवस्था होगी और लोक व्यवस्था भंग होगी. नवनीत कुमार और ओपीएस मालिक की बेंच ने इस महत्वपूर्ण विषय पर दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया.

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