प्याज़ और आलू दो ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें हम सब्जि़यों की सब्जियां कह सकते हैं और प्याज, जिसे कांदा भी कहते हैं, आजकल सब्जियों का राजा बन गया है। हर सब्जी में प्याज़ की उपस्थिति आजकल अनिवार्य-सी हो गई है। गरीब हो या अमीर, प्याज के बिना किसी की भी रसोई पूरी नहीं होती। और देश के कई हिस्सों में मैंने किसानों और मजदूरों को सिर्फ प्याज के साथ रोटी खाते हुए देखा है। ऐसा प्याज़ आजकल किसानों और मज़दूरों तो क्या, मध्यमवर्गीय शहरियों के लिए भी नायाब हो गया है। 80-90 रु. किलो प्याज खरीदकर कौन खा सकता है? प्याज की मंहगाई की वजह से कुछ साल पहले कई पार्टी राज्यों के चुनाव में हार गई थी लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार को कोई खास डर नहीं है, क्योंकि चुनाव अभी चार साल दूर हैं। इसीलिए हफ्तों से चल रही इस लूट-पाट के बावजूद यह 56 इंच की सरकार 500 इंच की रजाई तानकार सो रही है।
असली सवाल यह है कि प्याज के थोक व्यापारियों पर यह सरकार यमराज की तरह टूट क्यों नहीं पड़ती? कहीं इस सरकार के नेता भी प्याज़वालों की चांदी तो नहीं काट रहे हैं? देश में प्याज की सबसे बड़ी मंडी महाराष्ट्र के लसालगांव में है। इस मंडी पर चार-पांच व्यापारियों का एकाधिकार-सा है। वे मनमानी करते हैं। ये जमाखोर व्यापारी प्याज की कीमत को एकदम उछाला दे देते हैं। एक विधिवत जांच से पता चला है कि इन महाव्यापारियों का जाल पूरे देश में बिछा हुआ है। ये ही लोग थोक-व्यापारियों, मंडियों, दलालों, भंडारों और रेल्वे-एजेंटों को अपने काबू में रखते हैं। खेरची दुकानदार भी मुनाफाखोरी में इनका पूरा-पूरा साथ देते हैं। देश में एक करोड़ 70 लाख टन प्याज खपता है और इस साल इसका उत्पादन हुआ है- एक करोड़ 90 लाख टन। 20 लाख टन प्याज अतिरिक्त है,इसके बावजूद 10-15 रु. किलो का प्याज 80 रु. में कैसे बिक रहा है? राष्ट्र और महाराष्ट्र, दोनों जगह भाजपा की सरकारें हैं। यदि इन सरकारों के नेताओं में ज़रा भी दम होता तो अब तक प्याज के सारे जमाखोर जेल की हवा खा रहे होते और उनका प्याज जब्त करके 10 रु. किलो में बिकवा दिया जाता। हमारे नेताओं में नैतिक शक्ति का भी अभाव है। किसी भी नेता ने जनता से यह नहीं कहा कि वह सिर्फ दो-तीन सप्ताह तक प्याज़ न खाए। देखिए, प्याजवालों के आंसू झरने लगते या नहीं?
लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.


