राजेंद्र यादव होते तो मौजूदा व्यवस्था के ख़िलाफ़ ‘मेरी तेरी उसकी बात’ में बवाल काट देते

Hareprakash Upadhyay : राजेन्द्र यादव ने हिंदी साहित्य में दलित और स्त्री अस्मिता की पहचान और उसके उभार के लिए अपना जी-जान लगा दिया। इस विमर्श को वे केंद्र में ले आये। दलित और स्त्री लेखन को साहित्य की मुख्य धारा के तौर पर स्थापित किया। इसके लिए उन्होंने न जाने कितनों के कैसे-कैसे बोल सहे। उन पर तरह-तरह का लांछन लगाया गया। मगर वे हताश नहीं हुए। उन्होंने डटकर उन सबका जवाब दिया जिन्होंने दलित और स्त्री लेखन को कमतर या हीनतर बताने की चेष्टा की। उन्होंने ‘हंस’ के माध्यम से न सिर्फ दर्ज़नों स्त्री और दलित लेखकों को पहचान दी बल्कि उन्हें मुख्य धारा के दिग्गज लेखकों के तौर पर स्थापित होने में भरपूर संबल बने रहे। इसके कारण कई बार उन्हें समकालीन लेखकों और आलोचकों द्वारा अकेला कर देने की भी कोशिश की गयी पर वे टूटे नहीं क्योंकि उनके साथ देश भर में नए रचनाकारों और पाठकों की एक फ़ौज़ खड़ी हो चुकी थी जिन्होंने साहित्य में उनके नए बोध, नई चेतना का भरपूर स्वागत किया।

राजेन्द्र जी “हंस” के साधारण पाठकों की भी असहमति का स्वागत करते थे। वे उनके विचारों को “अपना मोर्चा” में सम्मान से प्रकाशित करते थे और ज़रूरी हुआ तो तार्किक संवाद बनाकर सन्तुष्ट करने की कोशिश करते थे। उनकी “मेरी तेरी उसकी बात” पर प्रायः हर महीने बवण्डर उठता था। आप जरा हिंदी साहित्य से “हंस” की उपस्थिति को काटकर उसके स्वरुप की कल्पना कीजिये। राजेन्द्र जी स्वयं एक जीवंत शख़्सियत थे और उन्होंने हिंदी साहित्य को जीवन्त और विचारोत्तेजक बनाने की कोशिश की। “हंस” व्यक्तिगत प्रयासों से निकाले जाने वाली हिंदी की शायद पहली पत्रिका है जिसने इतनी लम्बी यात्रा की और अपना प्रगतिशील तेवर कभी खोया नहीं। राजेन्द्र जी एक जुझारू व्यक्ति थे, चाहे “नई कहानी” आंदोलन में उनके तेवर और सक्रियता देखें या “हंस” के सन्दर्भ में, उनमें एक अद्भुत जीवट दिखाई पड़ता है, जिस चीज के पीछे लग गए तो लग गए।

जब बड़े घरानों ने हिंदी साहित्य के प्रति अपनी उपेक्षा बरतनी शुरू कर दी। एक-एक कर अपनी पत्रिकाएं बन्द करने लगे या साहित्य का स्पेस घटाने लगे, राजेन्द्र जी अकेले दम पर जूझे रहे। उनके मित्र कमलेश्वर ने भी अपने दम पर कई बार इस तरह की कोशिश की पर वे इस जोखिम को बहुत झेल नहीं सके। उन्होंने बड़ी-बड़ी नौकरियां की, बहुत सफल व्यक्ति रहे वे। राजेन्द्र जी वही अपने जीवन के स्वर्णिम वर्ष से लेकर अंत समय तक दरियागंज के 2/36 अंसारी रोड की तंग गलियों में टीके रहे। उन्हें कोई मलाल भी न था। ऐसा न था कि बड़े सेठ-व्यापारी उनके सामने न बैठे होंगे। मगर मुझे पक्का यकिन है कि उनके प्रस्तावों को सुनकर राजेन्द्र जी ने ठहाके लगाते हुए कहा होगा- “मार डाला” और बात बदल दी होगी। आज राजेन्द्र जी नहीं हैं पर उनके आगे नवोदित लेखक की तरह पेश बहुत सारे लेखक बड़ी ऊँची-ऊँची जगहों पर हैं जिन्हें राजेन्द्र जी ने तराशा और उन्हें बड़ा बनाने में खुद को खपा दिया।

मैं सोचता हूँ कि सबके अपने खेमे हैं, चेले हैं, संघ हैं, मेरे राजेन्द्र जी का कौन है? वक्त आ गया है कि जो हैं वे सामने आएं। जब वे थे, तो ऐसा न था कि वे अकेले थे, उनका दरबार भरा रहता था। राजेन्द्र जी हिंदी साहित्य में वंचित को केंद्र में स्थापित करने वाले एक प्रतीक की तरह हैं, उनकी परम्परा को नष्ट नहीं होने देना चाहिए। उनकी स्मृति को सम्मानित किया जाना चाहिए। उनकी अत्यंत आत्मीय मैत्रेयी जी आज बड़ी चीज हैं, वे चाहें तो राजेन्द्र जी के काम को सम्मान देने की दिशा में ठोस पहल कर सकती हैं। और भी लोग हैं। हम आज बहुत कठिन दौर से गुज़र रहे हैं। राजेन्द्र जी बरबस याद आते हैं, वे होते तो हिंदी साहित्य की दुनिया में इतनी चुप्पी न होती। मौजूदा व्यवस्था के ख़िलाफ़ वे “मेरी तेरी उसकी बात” में बवाल काट देते। प्रतिरोधी रचनात्मकता से एक सशक्त विपक्ष का निर्माण कर रहे होते।

कई पुरस्कारों से सम्मानित साहित्यकार और संपादक हरेप्रकाश उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.