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बर्बर शासक टीपू सुल्तान का महिमा मंडन क्यों?

हिंदू मानबिंदुओं पर प्रहार तथा हिंदू धार्मिक आस्था पर चोट करना आज के ‘सेक्यूलरवादियों’ का अधिकार-सा बनता जा रहा है। भारत, जो कि सोने की चिड़िया थी को पहले मुगलों ने, उसके बाद अंग्रेज़ों ने लूटा। उन्होंने न सिर्फ़ आर्थिक बल्कि धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक रूप से भी हमें कंगाल किया। भारत की राजनैतिक स्वतंत्रता के बाद हमने भौतिक प्रगति तो की किंतु धार्मिक व सांस्कृतिक आधार पर देश को बाँटने वाले लोग और उनकी विचारधाराओं पर अभी तक अंकुश नहीं लगा पाए। देश की शिक्षा पद्धति हो या इतिहास लेखन, इनकी विकृतियों से हम आज भी उबर नहीं पाए हैं।

हिंदू मानबिंदुओं पर प्रहार तथा हिंदू धार्मिक आस्था पर चोट करना आज के ‘सेक्यूलरवादियों’ का अधिकार-सा बनता जा रहा है। भारत, जो कि सोने की चिड़िया थी को पहले मुगलों ने, उसके बाद अंग्रेज़ों ने लूटा। उन्होंने न सिर्फ़ आर्थिक बल्कि धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक रूप से भी हमें कंगाल किया। भारत की राजनैतिक स्वतंत्रता के बाद हमने भौतिक प्रगति तो की किंतु धार्मिक व सांस्कृतिक आधार पर देश को बाँटने वाले लोग और उनकी विचारधाराओं पर अभी तक अंकुश नहीं लगा पाए। देश की शिक्षा पद्धति हो या इतिहास लेखन, इनकी विकृतियों से हम आज भी उबर नहीं पाए हैं।

भारत की जनता पर क्रूरतम अत्याचार करने वाले आक्रमणकारियों को महिमामंडित करने तथा इस देश की वीरता को नज़रअंदाज़ कर देश के युवा मन को प्रभावित करने का जो कार्य कुछ पक्षपाती और पूर्वाग्रही तथाकथित इतिहासकारों ने किया उसके गंभीर परिणाम अब सामने आ रहे हैं। हिंदू समाज की भावनाओं पर प्रहार के सिलसिले को आगे बढाने हेतु कभी गौ हत्या पर प्रतिबंध संबधी कानून पर रोक लगाई जाती है तो कभी भारत के सबसे बड़े त्योहार- दीपावली के दिन हिंदुओं के सर्वोच्च धर्मगुरु जगद्गुरु शंकराचार्य को झूंठे मुकदमों में फ़ँसाकर गिरफ़्तार किया जाता है। इतना ही नहीं अब कर्नाटक सरकार तो इतिहास की एक ऐसी विकृति को दीपावली के दिन ही सार्वजनिक रूप से सम्मानित करने जा रही है जिसने न सिर्फ़ हिंदुओं का धर्मांतरण, मंदिरों पर हमले किए बल्कि असंख्य हिंदू महिलाओं और बच्चों की जान भी ली। जनता के खून-पसीने की कमाई से इतिहास के एक ऐसे दुर्दांत चहरे की 266वीं जयन्ती मनाने के निर्णय से पूर्व कर्नाटक सरकार ने टीपू सुल्तान की निम्नांकित कारगुज़ारियों को भी यदि देखा होता तो शायद हिन्दू समाज का स्वाभिमान भी रह जाता:

Ø  इलान्कुलम कुंजन पिल्लई लिखते हैं कि टीपू सुल्तान के मालाबार आक्रमण के समय कोझीकोड में 7000 ब्राह्मणों के घर थे जिनमे से 2000 को टीपू ने नष्ट कर दिया और हज़ारों हिंदू उसके अत्याचारों से परेशान होकर जंगलों में भाग गए थे। धर्मांतरण के कारण मोपला मुसलमानों की संख्या में अत्यंत वृद्धि हुई तथा हिंदू जनसंख्या न्यून हो गई। कुर्ग में करीब 10000 हिंदुओं को ज़बरदस्ती मुस्लिम बनाया गया तथा 1000 हिंदुओं को पकड़कर इस्लाम कबूल कराने के लिए जबरन श्री रंगपट्टनम के किले में बंद कर दिया गया जो अंग्रेज़ों द्वारा टीपू को मार दिए जाने के बाद ही जेल से छूट पाए। कुर्ग राजपरिवार की एक कन्या को भी टीपू ने जबरन मुसलमान बनाकर निकाह किया था। सन् 1783 में पालघाट के किले पर विजय के दौरान हज़ारों निहत्थे ब्राह्मणों का वध करने का विवरण कर्नल फ़ुलार्टोन की रिपोर्ट में मिलता है।

Ø विलियम लोगेन ने मालाबार मेन्यूअल में टीपू द्वारा तोड़े गए मंदिरों की संख्या सैकड़ों में बताई है। वे लिखते हैं कि चिराकाल ताल्लुक के थलिप्पारंपू तथा त्रिचंबरम मंदिर, बड़ाकारा के पौनमेरी मंदिर तथा तेलीचेरी के तिरुवानगटु मंदिर उन प्रमुख मंदिरों में थे जिनका ध्वंस टीपू ने किया। राजा वर्मा ‘केरल में संस्कृत साहित्य का इतिहास’ में मंदिरों के तोड़ने का विवरण लिखते हुए कहते हैं कि उसने हिंदू देवी-देवताओं की असंख्य मूर्तियों को तोड़ा व पशुओं के सिर काटकर मंदिरों को अपवित्र किया जाता था।

Ø  टीपू ने अनेक स्थलों के नाम भी बदले जैसे मंगलौर/ मंगलापुरी को जलालाबाद, मैसूर को नज़ाराबाद, बेपुर को सुल्तानपट्टनम्, केन्नानौर को कुशानाबाद, गूटी को फ़ैज़हिसार, धारवाड़ को कुर्शेद-शबाद, डिंढीगुल को खालिकाबाद, रत्नागिरि को मुस्तफ़ाबाद तथा कोझीकोड को इस्लामाबाद किया गया। टीपू की मृत्यु के बाद सत्ता बदलने पर इस नामों को पुन: बदला गया।

टीपू सुल्तान ने अपवाद रूप में एक-दो मंदिरों व मठों को सहयोग तो किया किंतु उसके बदले में हज़ारों मंदिरों के नाश व लाखों हिंदुओं के मतांतरण को अंजाम देने का कार्य किया। कहा जाता है कि टीपू ने श्री रंगपट्टनम के मंदिर और श्रंगेरी मठ में दान किया एवं मठ के शंकराचार्य के साथ टीपू का पत्र व्यवहार भी था। डॉ एम गंगाधरन ने ‘मातृभूमि साप्ताहिक’ में बताया है कि टीपू सुल्तान का भूत-प्रेत आदि में गहन विश्वास था। भूत-प्रेत आदि के कुप्रभव से बचाने हेतु उसने श्रंगेरी मठ के पुजारियों को तांत्रिक अनुष्ठान करने के लिए धन भेजा था। श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर के पुजारियों द्वारा टीपू सुल्तान के लिए जो भविष्यवाणी की थी कि विशेष अनुष्ठान द्वारा वह दक्षिण भारत का सुल्तान बन जाएगा, उसे फ़लवती बनाने के लिए उसने मंदिर में विशेष अनुष्ठान करवाया। अंग्रेज़ों से मिली विजय का श्रेय टीपू ने ज्योतिषियों और मंदिरों को देकर उन्हें सम्मानित किया। इस प्रसंग द्वारा टीपू को धार्मिक समरसता व धर्मनिरपेक्ष होने का पक्षधर बताना तथ्यों के साथ छेड़कानी करने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

टीपू के राज्य में हिंदुओं को न के बराबर सरकारी नौकरी में रखा जाता था, राज्य में 65 सरकारी पदों में से एक भी प्रतिष्ठित पद हिंदुओं के पास न था। इतिहासकार एम ए गोपालन के अनुसार अनपढ़ और अशिक्षित मुसलमानों को महत्त्व के पदों पर केवल मुसलमान होने के कारण नियुक्त किया जाता था।

उपर्युक्त बातों का अध्ययन करने पर यह परिणाम मिलता है कि जिस टीपू को तथाकथित ‘बुद्धिजीवी इतिहासकारों’ ने “महान, धर्म व पंथनिरपेक्ष, सामाजिक व धार्मिक समरसता के आधार” का सर्वोच्च उदाहरण मानकर हिंदुस्तान को गुमराह किया है उसी टीपू ने किस प्रकार हिंदू मान बिंदुओं पर कुठारागात, मंदिरों का विध्वंस, हिंदुओं को धर्मांतरित कर मुस्लिम संख्या दर में वृद्धि, हिंदुओं की प्रताड़ना अथवा सामाजिक सहिष्णुता व एकता का अंत करने का निरंतर प्रयत्न किए हैं। ऐसे में कर्नाटक सरकार का टीपू सुल्तान की 266वीं जयंती मनाना कितना न्यायसंगत है इसका निर्णय मैं आप पर ही छोड़ता हूँ।

लेखक विनोद बंसल विश्व हिंदू परिषद के नेता हैं. उनसे संपर्क मो. 9810949109 या अणु डाक [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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