किसी भी न्यूज़ चैनल से उम्मीद की जाती है कि, वो आम जनता की परशानियों, दिक्कतों से रूबरू हो और सरकार की गलत नीतियों का लेखा-जोखा जनता -जनार्दन के सामने रखे। सरोकार को सनसनी का जामा ना पहनाये और हसने-हंसाने का काम मनोरंजन चैनल्स पर छोड़ दे। उपलब्धि के रूप में पुरस्कारों का बखान ना करे, क्योंकि उसे मालूम होना चाहिए कि आज पुरस्कारों का हाल- बेहाल है। रहा सवाल आर्थिक मजबूरियों का, तो न्यूज़ चैनल का लाइसेंस लेते समय “दिग्गजों” को ये मालूम रहता है। ऐसे में न्यूज़ चैनल्स के नाम पर मनोरंजन और सनसनी दिखा कर टी.आर.पी. बटोरना कहाँ की ईमानदारी है? गर ऐसा ही था- तो लाइसेंस, मनोरंजक चैनल का लिया होता। न्यूज़ के नाम पर मनोरंजन का झांसा क्यों? आज “टी.आर.पी.” पर बात इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि इसी छद्म मापक यन्त्र ने इलेक्ट्रौनिक मीडिया का पूरा हुलिया बिगाड़ रखा है। टीआरपी यानी Totally Rejected Performer उपरी पायदान पर और Real performer निचले पायदान पर। हाल ही में कई चैनल्स पर नज़र डाला तो परिणाम कुछ इस तरह सामने आया-
A Grade न्यूज़ चैनल्स- ndtv India, Zee News और तकरीबन सारे अंगरेजी समाचार चैनल्स अपनी पुराने रौ में रहे। यानी खालिस पेशेवर अंदाज़ में न्यूज़ पर जमे रहे। सरोकार रखे रहे और बहस करते और कराते रहे। आम जनता को भी, हमेशा की तरह, शामिल किया गया। कॉमेडी सर्कस और यू-ट्यूब के ज़रिये सांस लेने की कवायद से, न्यूज़ चैनल्स के मापदंडों के अनुरूप, नैतिक दूरी बनाए रखा। भारतीय समाचार चैनल्स की थोड़ी-बहुत साख इन्हीं की बदौलत जिंदा है।
B Grade न्यूज़ चैनल्स – आज तक, आई.बी.एन.७, स्टार न्यूज़ मिले जुले अंदाज़ में रहे। न्यूज़ चैनल्स कहलाने का नाटक भी करते रहे और मनोरंजन चैनल्स होने का आभास भी कराते रहे। इनके प्राइम टाइम के पत्रकार अपने-अपने अंदाज़ में गंभीर पत्रकार होने का वर्चुअल आभास भी कराते रहे। कुछ सफल रहे- कुछ असफल। सनसनी फैलाने का इनका शौक और काबिले तारीफ हुनर इन्हें न्यूज़ चैनल्स कहलवाने में तो सफल नहीं रहा, पर टी.आर.पी. (Television Rating Point) बटोरने में और टी.आर.पी. के ज़रिये कइयों के जॉब को स्थाईत्व प्रदान करने में सफल रहा।
C Grade न्यूज़ चैनल्स – न्यूज़ २४, इंडिया टी.वी. नाम के ये दो चैनल्स न्यूज़ चैनल्स हैं या entertenment चैनल्स हैं, इसकी खबर इन चैनल्स के मालिकान को भी है या नहीं – पता नहीं। ये दोनों चैनल्स बाज़ार की टी.आर.पी. (Television Rating Point) के नज़रिए से विख्यात होते जा रहे हैं और न्यूज़ चैनल्स की गुणवत्ता के मामले में कुख्यात। ये दोनों चैनल्स के मालिक बंद कमरे में बैठ कर दर्शकों पर हँसते होंगे या खुद पर – ये कहना जल्दबाजी होगी। हाँ, इतना ज़रूर है कि खालिस पत्रकारों की नज़र में ये न्यूज़ चैनल्स के “जोकर” हैं। …अपने पे हंस के जग को हंसाया-बन के तमाशा दुनिया में आया – राज कपूर साहब की फिल्म और अमर गायक मुकेश साहब की आवाज़ का ये नगमा इन दोनों चैनल्स को आईना दिखाता है।
D Grade न्यूज़ चैनल्स -न्यूज़ एक्सप्रेस सहित बाकी चैनल्स आज कल निर्मल बाबा के सहारे ऑक्सीजन पर जिंदा रहने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए बेहद बेचारे हैं। ये चैनल्स निर्मल बाबा के नाम पर आज-कल, “चिकन पार्टी” मना रहे हैं, पर उसके बाद इनके सामने रोज़ी-रोटी की फिर समस्या क्योंकि खबर से सरोकार इनका आने वाले दिनों में रह पायेगा कहना मुश्किल है। इन चैनल्स की तरफ से मैं निर्मल बाबा को धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने मरन्नासन्न को ऑक्सीजन प्रदान कर कुछ दिनों का जीवन दिया। (इन चैनल्स को यशवंत, भड़ास४मीडिया से सीखना चाहिए. यशवंत ने बागी मिजाज़ के बावजूद निर्मल बाबा की खामियों पर उतना ही प्रहार किया, जितना की सच में, ज़रूरी था. एक साइट मात्र का सहारा होने के बावजूद यशवंत ने निर्मल बाबा को रोजी-रोटी या अपना कद बढ़ाने का ज़रिया नहीं बनाया)।
खैर! टी.आर.पी. का मतलब बाज़ार में Television Rating Point होता है, पर ऊपर दर्शाए गए ग्रेड पर गर आप नज़र डालेंगे तो लगेगा कि न्यूज़ चैनल्स के मापदंडों के उलट Totally rejected performer, बाज़ार की टी.आर.पी. (Television Rating Point) में काफी ऊपर हैं। ऐसे में बुनियादी सवाल ये उठता है कि टी.आर.पी. का असली मतलब क्या है? क्योंकि मनोरंजन और न्यूज़ चैनल्स की टी.आर.पी. अलग-अलग आंकी जाती है। पर इसके आंकने का पैमाना क्या है? क्या न्यूज़ चैनल्स में सनसनी और मनोरंजन के प्रोग्राम्स के ज़रिये न्यूज़ चैनल्स की टी.आर.पी. आंकी जानी चाहिए, या न्यूज़ चैनल्स के मापदंडों और खबरों के मुताबिक न्यूज़ चैनल्स की टी.आर.पी. आंकी जानी चाहिए। ये ऐसा बुनियादी सवाल है, जो न्यूज़ चैनल्स को उठाना चाहिए। न्यूज़ के नाम पर मनोरंजन और सनसनी के कारोबार से, पेशेवर खालिस पत्रकारों और संस्थानों को मुसीबत झेलनी पड़ रही है। पत्रकारिता के तालाब में अब कुछ ही मछलियां साफ़ सुथरी बची हैं, ज़्यादातर तो तालाब गंदा कर चुकी हैं। ऐसे में टी.आर.पी. का असल मतलब सामने आना चाहिए- गर बात न्यूज़ और सिर्फ न्यूज़ चैनल्स की हो तो।
लेखक नीरज टेलीविजन पत्रकार हैं.


