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संथारा आत्महत्या नहीं : मृत्यु-जैसी सबसे कष्टदायक घटना को सुखदायक बनाने से बड़ी अहिंसा क्या हो सकती है?

राजस्थान उच्च न्यायालय ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है। उसने अपने फैसले में कह दिया है कि संथारा ओर संलेखना तथा आत्महत्या में कोई फर्क नहीं है। संथारा और संलेखना जैन-धर्म की ऐसी प्रथा है, जिसके अंतर्गत जैन लोग अनशन करके अपना जीवन-त्याग देते हैं। इसे समाधि-मरण भी कहा जाता है। अब यदि यह फैसला लागू हो गया तो संथारा करनेवाले हर जैन को वही सजा भुगतनी होगी, जो आत्महत्या करनेवाले को भुगतनी होती है। अदालत के इस फैसले का विरोध करने के लिए अलग-अलग शहरों में हजारों जैन सड़कों पर उतर आए हैं।

राजस्थान उच्च न्यायालय ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है। उसने अपने फैसले में कह दिया है कि संथारा ओर संलेखना तथा आत्महत्या में कोई फर्क नहीं है। संथारा और संलेखना जैन-धर्म की ऐसी प्रथा है, जिसके अंतर्गत जैन लोग अनशन करके अपना जीवन-त्याग देते हैं। इसे समाधि-मरण भी कहा जाता है। अब यदि यह फैसला लागू हो गया तो संथारा करनेवाले हर जैन को वही सजा भुगतनी होगी, जो आत्महत्या करनेवाले को भुगतनी होती है। अदालत के इस फैसले का विरोध करने के लिए अलग-अलग शहरों में हजारों जैन सड़कों पर उतर आए हैं।

यदि अदालत ने यह फैसला उन लोगों को ध्यान में रखकर किया है, जिन्हें जबर्दस्ती या सामाजिक दबाव में संथारा के लिए बाध्य किया जाता है तो माना जाएगा कि इस फैसले के पीछे मूल भाव करुणा का है या जीवन के अधिकार का है लेकिन ऐसा एक भी उदाहरण आज तक सुनने या देखने में नहीं आया है। बल्कि इसके विपरीत भारत का जैन समाज सारी दुनिया में इस दृष्टि से बेजोड़ है कि उसके बच्चों को बचपन से ही उपवासों के जरिए आत्म-संयम का पाठ पढ़ाया जाता है। पर्यूषण के दिनों में साल में एक बार तो हर जैन उपवास रखता ही है लेकिन अन्य अवसरों पर जैन लोग एक-एक माह तक खाना तो दूर रहा, पानी भी नहीं पीते। इस प्रक्रिया के चरमोत्कर्ष का नाम ही संथारा है। स्वेच्छा और प्रसन्नता से देहत्याग करने को आत्महत्या कहना बिल्कुल अनुचित है। आत्महत्या क्यों की जाती है? अपराध-बोध, अपमान-बोध और अवसाद-बोध के कारण! क्रोध, निराशा, हताशा के कारण! क्या संथारा के भी कारण यही होते हैं? नहीं। संथारा करनेवाला उत्साह, सम्मान, पुण्य-भाव, समर्पण और त्याग से परिपूर्ण होता है। यदि संथारा आत्महत्या है तो आमरण अनशन क्या है? गांधी, विनोबा, करपात्रीजी और कई शंकराचार्यों को आत्महत्या के लिए गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया?
 
अदालत का यह कहना कि संथारा या समाधि-मरण जैन-धर्म का मूल सिद्धांत नहीं है, अजीब-सा है। यह कौन तय करेगा? जैनाचार्य करेंगे या अंग्रेजी कानून के अंधानुयायी जज लोग? मूल सिद्धांत अहिंसा है और संथारा तो उसको व्यवहार में लागू करना है। मृत्यु-जैसी सबसे कष्टदायक घटना को सुखदायक बनाने से बड़ी अहिंसा क्या हो सकती है? देह-त्याग की यह अद्भुत भारतीय परंपरा भगवान राम, महावीर और भीष्म पितामह के ज़माने से चली आ रही है। अपने चित्त को देहाभिमान से मुक्त करना तो सदेह मोक्ष ही है। सदेह मोक्ष की इस साधना को खंडित करना किसी भी कानून के बूते की बात नहीं है।

लेखक डा. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और चिंतक हैं.

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