जहां सनातन धर्म में विवाह सोलह संस्कारों में से एक है वहीं सामाजिक रूप से सामान्य तौर पर यह दो लोगों को एक साथ पति-पत्नी के रूप में रहने की सार्वजनिक मान्यता पर आधारित विषयवस्तु है। आज के दौर में जब विवाह में जातीय और धार्मिक समानता की बाध्यताओं को तोड़ता नजर आ रहा है वहीं भाषाई दृष्टी से यह एक विशिष्ट परिवर्तन के कारण के रूप में स्थापित हो रहा है। वर्तमान में जब भारत में दसवां विश्व हिन्दी दिवस का आयोजन किया जा रहा है और लोग हिन्दी दिवस को मना रहें हैं विद्वान हिन्दी संरक्षण और संवर्धन को लेकर चिंतित हैं, ऐसे में इस विषय पर विचार करना और भी जरूरी हो जाता है कि अन्र्तसांस्कृतिक विवाह किस प्रकार से भौगोलिक प्रवासन का कारण बन रहें है और किस प्रकार से हिन्दी को प्रभावित कर रहें हैं। जब हम इस प्रकार के विवाह और उसके भाषाई प्रभाव पर नजर डालते हैं तो कुछ दिलचस्प मामले हमारे सामने इस प्रकार से आते हैं-

(मेखला भारद्वाज, पति श्रीकांत के साथ पुत्र अनंत)
मेखला भारद्वाज- मेखला श्री कांत भारद्वाज एक हिन्दी भाषी क्षेत्र उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद से हैं परन्तु इनका विवाह सुदुर दक्षिण क्षेत्र कर्नाटक के मंगलौर में कन्नड़ भाषी अध्यापक श्री कांत भारद्वाज से होता है। आज विवाह के चार से अधिक वर्ष हो जाने पर मेखला न सिर्फ कन्नड़ में बात करतीं हैं अपितु उनका पुत्र अनन्तकृष्ण भी इसी भाषा को अग्रसारित कर रहा है। मेखला से यह प्रश्न पूछने पर कि आप अपने पुत्र को हिन्दी बोलने और लिखने के लिए प्रेरित नहीं करतीं हैं? पर वह जवाब देतीं हैं कि हम अपने पुत्र को हिन्दी सिखाना तो चाहतें हैं पर यह इस परिस्थिति में न ही उसके लिए उपयोगी है और न ही इससे कोई लाभ है। हां यह जरूर है कि अनन्त को अंग्रेजी सिखाने का प्रयास किया जा रहा है। मेखला का कहना है कि उनके ससुराल पक्ष से कई लोगों का प्रवासन मध्य एशियाई देशों के लिए होता है और आज कई लोग वहीं रहने लगे हैं ऐसे में अनन्त के लिए हिन्दी से कहीं अधिक भाषा अंग्रेजी है जो कि संधि भाषा के रूप में भारत में स्थापित हो चुकी है।
सूरीनाम में हिन्दी -इसी प्रकार सुदूर दक्षिणी अमेरिकी देश में भी उत्तर प्रदेश के कुछ लोग विवाह के कारण प्रवासित हुए हैं। सूरीनाम में हिन्दी ‘सरनामी’ के रूप में बोली जाती है। सरनामी में भारतीय क्षेत्रीय बोलियां भोजपुरी आदि का प्रभाव अधिक है इसीलिए आज के दौर में प्रवासित होने वाले भारतीय युवा इसको अपनाने से कतराते नजर आतें हैं उनका मानना है कि भारतीय शिक्षा पद्धति में इन क्षेत्रीय भाषाओं को उचित स्थान प्राप्त नहीं है अतः उनका सरोकार इससे कभी नहीं रहा अतः सूरीनाम में क्षेत्रीय लोगों से संवाद करने के लिए ये अंग्रेजी को ही माघ्यम बनाते हैं। हालांकि सूरीनाम में हिन्दी और भारतीयों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, यहां की आबादी 5 लाख 73 हजार से कुछ अधिक है जिसमें 40 प्रतिशत मुलाटोज हैं जो कि यूरोपीय और भारतीयों की मिश्रित प्रजाति हैं जिसका सीधा अर्थ हिन्दी और डच के ज्ञान से लिया जा सकता है। सूरीनाम में भारतीय प्रवासन 5 जून 1873 से माना जाता है जबकि ‘‘लल्ला रूह’’ नामक जहाज 452 भारतीयों को लेकर सूरीनाम जाता है। अगर सूरीनाम में भारतीयों की संख्या पर नजर डाली जाए तो इस प्रकार के आंकड़े प्राप्त होतें हैंः-
सन् भारतीयों की संख्या
1925 28807
1935 36331
1945 51530
1965 121162
1970 142049
इस आंकड़े के साथ एक बात और गौर करने वाली है कि ‘‘नीदरलैण्ड के दोहरा अधिवास’’ नियम के कारण सूरीनाम से भारतीयों की एक बड़ी संख्या नीदरलैण्ड गयी आज नीदरलैण्ड में 1 लाख 60 हजार सूरीनामी भारतीय रह रहे हैं। सूरीनाम में हिन्दी को लेकर भी अनेक कार्य किए गये हैं इनको इस प्रकार से देखा जा सकता है।
– यहां पर ‘सूरीनाम हिन्दी परिषद’ हिन्दी प्रचार की प्रमुख संस्था है।
– बाबू महातम सिंह ने हिन्दी के विकास पर महत्वपूर्ण कार्य किये। इन्होंने रामायण को अपने नजरिये से लिखा।
– सभी धार्मिक संस्थाओं ( आर्य समाज, सनातन धर्म महासभा, सूरीना साहित्य मित्र) ने हिन्दी के प्रचार प्रसार में योगदान दिया।
– हरि देव सहतू तथा मुंशी रहमान खान के काव्य यहां प्रचलित है। रहमान खान ने हजरत नबी मुहम्मद रसूलिल्लाह के जीवन चरित्र को तुलसीदास कृत रामचरित मानस की शैली में रचना की ।
परन्तु आज जो सूरीनाम में भारतीयों की चौथी व पांचवी पीढ़ी रह रही है जो कि परंपरागत मूल्यों की अपेक्षा आधुनिकता की ओर अग्रसर है। इसीलिए आज विवाह के कारण सूरीनाम प्रवासित तमाम भारतीय युवा चाहकर भी व्यवहारिक तौर पर हिन्दी को अधिक वरीयता नहीं दे पा रहे है।
तीसरा मामला 60 वर्षीय अशोक नारायण चौधरी का है जो कि मूलत: कलकत्ता से हैं परन्तु अधिकांश समय उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में बीतने के कारण बांग्ला जानने के बावजूद हिन्दी का ही प्रयोग करते थे परन्तु पांच वर्ष पूर्व जर्मनी की मालविका से विवाह के पश्चात जर्मनी के निवासी हो गये तथा आज कोलोन शहर में अपनी पत्नी तथा पुत्र युस्तुस के साथ जीवनयापन कर रहें हैं। अशोक चौधरी आज गहरे भाषाई संकट से जूझ रहें हैं जर्मन का ज्ञान सरकार के मानक के अनुरूप न होने के कारण जर्मनी में कार्य करने में अत्यधिक परेशानी का सामना कर रहें है। इनका कहना है कि मात्र अंग्रेजी को जानने से यहां पर कार्य कर पाना असंभव है, जर्मनी के निवासी व सरकार अपनी भाषा को लेकर काफी संवेदनशील है तथा यहां पर हर सरकार व प्रशासन से जुड़ा कार्य जर्मन भाषा में ही होता है। यहां तक कि उनका पुत्र युस्तुस भी उन्हें ‘वाटर’ (जर्मन में पिता को कहते हैं) ही कहकर संबोधित करता है। जर्मन सरकार ऐसे नागरिकों के लिए जर्मन अध्ययन का एक कार्यक्रम चलाती है जिन्हे वहां की नागरिकता तो प्राप्त हो गयी है परन्तु जर्मन भाषा का ज्ञान नहीं है। चौधरी जी बताते हैं कि वह इस जर्मन पाठ्यक्रम का प्राथमिक चरण भी बमुश्किल उत्तीर्ण कर पाएं है। इस उम्र में नई भाषा सीखना भी समस्या का एक सबब कहा जा सकता है। जर्मनी में 2003 के आंकड़ों के अनुसार 43,566 भारतीय नागरिक और 17,500 भारतीय मूल के लोग रह रहें हैं। और आज यह संख्या निश्चित रूप से और अधिक हो गयी है।

(मॉरीशस की शिक्षामंत्री श्रीमती लीला लछुमन इंटरव्यू देते हुए)
मॉरीशस में हिन्दी – डॉ. उदय नारायण गंगू का मानना है कि मॉरीशस में हिन्दी की यात्रा कुल एक सौ अस्सी वर्षों की है। यहां पर हिन्दी का इतिहास तीन भागों अप्रवासन काल, स्वतंत्रता के पूर्व का काल और स्वतंत्रता के बाद का काल है। यहां पर पंडित काशीनाथ, गीता मंडल और हिन्दू महासभा, वेणी माधव सतीराम, अभिमन्य अनत, मोहन लाल मोहित आदि ने हिन्दी पर उत्कृष्ठ कार्य किये। विश्व हिन्दी सम्मेलन में आयीं मॉरीशस की शिक्षा मंत्री श्रीमती लीला लछुमन ने मॉरीशस और विश्व में हिन्दी के विकास के लिए मॉरीशस में स्थित विश्व हिन्दी सचिवालय को और मजबूत बनाने, विश्व में हिन्दी शिक्षा के प्रसार को बढ़ाने आदि अनेक संस्तुतियां प्रस्तुत कीं।
आज जब भारत में विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा और हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा और भारत की राष्ट्रभाषा बनाने पर विचार किया जा रहा है। ऐसे में इन मामलों को देखते हुये हिन्दी के विकास और उसे आत्मसात करने की व्यवहारिक समस्याओं पर भी गौर करना होगा, अन्यथा पिछले नौ विश्व हिन्दी सम्मेलनों की तरह दसवें हिन्दी सम्मेलन की संस्तुतियां व सुझाव कागज तक ही सीमित रह जाएंगे।
सक्षम द्विवेदी।
मो0 7588107164
रिसर्च ऑन इंडियन डायस्पोरा एण्ड माइग्रेशन,महात्मा गांधी इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी।
(विश्व हिन्दी सम्मेलन और हिन्दी दिवस पर विशेष)


