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शिवराज जी, व्यापमं महाघोटाले को देखते हुए स्वाभिमान की बजाय माफी यात्रा निकालें

इंदौर। व्यापमं महाघोटाले की जांच आखिरकार कल से ही सीबीआई के पाले में आ गई और नई दिल्ली से भोपाल पहुंची सीबीआई की 40 सदस्यों की टीम ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जांच शुरू कर दी है। इस टीम के मुखिया और सीबीआई हेड क्वार्टर दिल्ली के ज्वाइंट डायरेक्टर आरपी अग्रवाल ने भरोसा दिलाया है कि इस जांच से देश को निराश नहीं होने देंगे। इधर मुख्यमंत्री से लेकर पूरी भाजपा व्यापमं महाघोटाले की सीबीआई जांच परिणामों से पहले ही इसे छुटपुट घोटाला बताते हुए खुद ही क्लीन चिट ले रही है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान बार-बार ये दोहरा रहे हैं कि व्यापमं घोटाले की जांच उन्हीं ने शुरू करवाई और अब विपक्ष तथा मीडिया उन पर ही आरोप लगा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि देश के इतिहास में आज तक जितने भी घोटाले हुए उनकी जांच या तो अदालतों ने अथवा सत्ता पक्ष में कुर्सी पर बैठे जिम्मेदारों ने ही करवाई है। विपक्ष और मीडिया को ये अधिकार नहीं है कि वह किसी मामले की जांच करवा सके, सिवाय उस मामले को उठाने के। लिहाजा शिवराजजी आपने कोई नया और अनोखा काम नहीं किया है। कोई भी मुख्यमंत्री अथवा मंत्री या अधिकारी ऐसे तमाम मामलों की जांच के आदेश करते हुए दोषियों को सख्त से सख्त सजा दिलवाने की रटी-रटाई बातें कहते रहे हैं। व्यापमं महाघोटाले की जांच आपकी जगह दूसरा मुख्यमंत्री रहता तो वह भी करवाता, बल्कि जांच करवाने से अधिक महत्वपूर्ण है उसके परिणाम। आप जनता को जांच के परिणामों की जानकारी दो बजाय उसका श्रेय लेने के।

इंदौर। व्यापमं महाघोटाले की जांच आखिरकार कल से ही सीबीआई के पाले में आ गई और नई दिल्ली से भोपाल पहुंची सीबीआई की 40 सदस्यों की टीम ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जांच शुरू कर दी है। इस टीम के मुखिया और सीबीआई हेड क्वार्टर दिल्ली के ज्वाइंट डायरेक्टर आरपी अग्रवाल ने भरोसा दिलाया है कि इस जांच से देश को निराश नहीं होने देंगे। इधर मुख्यमंत्री से लेकर पूरी भाजपा व्यापमं महाघोटाले की सीबीआई जांच परिणामों से पहले ही इसे छुटपुट घोटाला बताते हुए खुद ही क्लीन चिट ले रही है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान बार-बार ये दोहरा रहे हैं कि व्यापमं घोटाले की जांच उन्हीं ने शुरू करवाई और अब विपक्ष तथा मीडिया उन पर ही आरोप लगा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि देश के इतिहास में आज तक जितने भी घोटाले हुए उनकी जांच या तो अदालतों ने अथवा सत्ता पक्ष में कुर्सी पर बैठे जिम्मेदारों ने ही करवाई है। विपक्ष और मीडिया को ये अधिकार नहीं है कि वह किसी मामले की जांच करवा सके, सिवाय उस मामले को उठाने के। लिहाजा शिवराजजी आपने कोई नया और अनोखा काम नहीं किया है। कोई भी मुख्यमंत्री अथवा मंत्री या अधिकारी ऐसे तमाम मामलों की जांच के आदेश करते हुए दोषियों को सख्त से सख्त सजा दिलवाने की रटी-रटाई बातें कहते रहे हैं। व्यापमं महाघोटाले की जांच आपकी जगह दूसरा मुख्यमंत्री रहता तो वह भी करवाता, बल्कि जांच करवाने से अधिक महत्वपूर्ण है उसके परिणाम। आप जनता को जांच के परिणामों की जानकारी दो बजाय उसका श्रेय लेने के।

यह एक सामान्य बुद्धि की बात है कि जो कुर्सी पर बैठा है या किसी जिम्मेदार पद पर है उसी को जांच करवाने का अधिकार प्राप्त रहता है। हम पत्रकार आए दिन किसी मामले का भंडाफोड़ करते हैं तो इससे संबंधित प्रतिक्रिया या बयान जब किसी भी मुख्यमंत्री अथवा मंत्री या अधिकारी से लिए जाते हैं तो उसका पहला जवाब यही रहता है कि इस पूरे मामले की जांच गंभीरता से करवाई जाएगी और किसी दोषी को बख्शेंगे नहीं। यह एक रटा-रटाया जवाब है जो तमाम प्रतिक्रिया या बयानों में प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मिल जाएगा अथवा लोकसभा से लेकर विधानसभा में भी जब किसी घोटाले या अनियमितताओं पर सवाल पूछे जाते हैं या बहस होती है तब भी प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री अथवा विभागीय मंत्री द्वारा ये ही बयान दिए जाते हैं और इसी तारतम्य में संबंधित विभाग या एजेंसी को उसकी जांच सौंपी जाती है। अगर जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग जब जांच से कतराते हैं तो फिर अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ता है और याचिकाएं दायर कर इस तरह की जांचों की मांग करवाई जाती रही है, लिहाजा व्यापमं घोटाले की जांच अगर मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने (जैसा कि वे लगातार दावा कर रहे हैं) मानों करवाई भी तो कोई नया या अनोखा काम नहीं किया है।

उनकी जगह कोई भी मुख्यमंत्री होता तो इस तरह मामला उजागर होने और विधानसभा में भी हल्ला मचने पर इसी तरह की जांच करवाता। क्या 2-जी स्पैक्ट्रम और कोयला घोटाले की जांच तत्कालीन केन्द्र की सरकार ने शुरू नहीं करवाई थी? वो तो बाद में जब जांच व्यापमं महाघोटाले की तरह इधर-उधर भटकने लगी और रसूखदारों को बचाया जाने लगा तब सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करते हुए सीबीआई से अपनी निगरानी में जांच करवाना पड़ी। लगभग इसी तरह का मामला व्यापमं महाघोटाले का भी है। मुख्यमंत्री ने अगर एसटीएफ को जांच सौंपी तो उसने भी जांच सही तरीके से नहीं की, जिसके परिणाम स्वरूप मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को एसटीएफ की मॉनिटरिंग के लिए एसआईटी का गठन करना पड़। अगर मुख्यमंत्री जी आपके द्वारा एसटीएफ को सौंपी गई जांच गंभीरता से होती तो ना तो एसआईटी का गठन हाईकोर्ट को करवाना पड़ता और ना ही बाद में सुप्रीम कोर्ट इस जांच को सीबीआई को सौंपता। तमाम दस्तावेज बताते हैं कि जांच तो सिर्फ दिखावे के लिए की गई और असली गुनहगारों को लगातार बचाया जाता रहा। अपने मंत्री से लेकर कुछ अन्य अफसरों की बलि चढ़ाकर शिवराज जी आप अगर यह समझते रहे कि आपका जांच करवाने का दायित्व पूरा हो गया, तो यह सफेद झूठ है, क्योंकि आपने राजधर्म का भी पालन नहीं किया। अगर आपने जांच शुरू करवाई थी तो उसे स्पष्ट नतीजों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी आप ही की थी। क्या कारण रहे कि एसटीएफ पर पैसा वसूली के आरोप तो लगे ही, वहीं बेगुनाहों को गिरफ्तार कर जेलों में ठूंस दिया गया और संदिग्ध मौतों का सिलसिला कम होने की बजाय लगातार बढ़ता ही रहा?

मैं आपको याद दिला दूं इस तरह की कई जांचों की घोषणाएं आप पहले भी करवा चुके हैं, जिनमें भूमाफियाओं से लेकर खनिज माफियाओं के खिलाफ की गई तमाम घोषणाएं और दावे शामिल हैं, जबकि मैदानी हकीकत इसके ठीक विपरित आज भी नजर आती है। व्यापमं महाघोटाले की जांच से नहीं, बल्कि जनता को उसके परिणामों से मतलब है और आप बिन्दुवार क्या ये बता सकते हैं कि जांच के ये परिणाम रहे और इस महाघोटाले के लिप्त तमाम असली गुनाहगार जेल के सीखचों के पीछे पहुंच चुके हैं। आपको अगर यह महसूस हो रहा था कि एसटीएफ और एसआईटी इस महाघोटाले की जांच सही तरीके से नहीं कर रहे हैं और आपकी सरकार पर ऊंगलियां उठ रही है तो आपको पहली फुर्सत में ही इसकी जांच सीबीआई को सौंपने की अनुशंसा कर देना थी। आखरी वक्त में किस तरह सीबीआई जांच के लिए पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखा गया यह भी सबको पता है और अब इस मामले में दी जा रही सफाई किसी के भी गले नहीं उतर रही। देश का इतिहास बताता है कि ऐसे तमाम महाघोटालों और संदिग्ध मौतों की जांचों की घोषणाओं का क्या हश्र हुआ है और तमाम जांच आयोग तक सरकारों द्वारा गठित किए जाते रहे हैं। किसी भी जांच आयोग के नतीजे किसी निष्कर्ष पर पहुंचते नजर नहीं आए और सालों तक जांच चलने के बाद फाइलों में ही दफन हो गई। कुछ मामलों में जो परिणाम दिखे उनका भी कारण अदालतों की सख्ती ही रहा वरना कांग्रेस के राज में 2-जी स्पैक्ट्रम और कोयला घोटाला भी जांच के बाद इसी तरह दफन हो जाता और भाजपा सत्ता में नहीं आती और कोयला खदानों और स्पैक्ट्रम की निलामी से हजारों-लाखों करोड़ सरकारी खजाने में जमा भी नहीं होते, जिसका पूरा-पूरा श्रेय सुप्रीम कोर्ट को जाता है। लिहाजा शिवराज जी व्यापमं महाघोटाले में स्वयंभू व्हिसलब्लोअर बनने और जांच के आदेश देने को खुद की उपलब्धियों के रूप में प्रचारित ना करें, क्योंकि तमाम मीडिया की खबरें और विधानसभा में रखे तथ्य आपके इन दावों का सिरे से ही खंडन कर रहे हैं और अब सीबीआई भी ये सच्चाई उजागर कर ही देगी।

भाजपा की यह खासियत है कि वह सत्ता पक्ष में रहते हुए भी एक तरह से विपक्ष की भूमिका भी बखूबी निभाती है। यह गुर आज तक कांग्रेस को कभी नहीं आया। पहले जहां केन्द्र में भाजपा विपक्ष में थी तब तमाम बड़े-बड़े घोटालों से लेकर छोटी-मोटी बातों पर भी संसद से लेकर सड़क तक हल्ला मचाती रही और सत्ता में आने के बाद भी अपनी तथाकथित उपलब्धियों का ढोल पीटने में भी आगे रही। मध्यप्रदेश के व्यापमं महाघोटाले की देश और दुनिया में व्यापक चर्चा होने के बाद जब भाजपा कठघरे में खड़ी हुई तो एक बार फिर प्रचार-प्रसार का अभियान शुरू कर दिया। अभी मध्यप्रदेश भाजपा मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के नेतृत्व में 9 अगस्त से 29 नवंबर तक स्वाभिमान यात्रा निकालने जा रही है, जिसमें व्यापमं महाघोटाले की जांच करवाने का श्रेय लेते हुए जनता को यह भरोसा दिलाया जाएगा कि इस महाघोटाले पर विपक्ष या मीडिया द्वारा लगाए गए तमाम आरोप गलत हैं। बेहतर होता कि मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी स्वाभिमान की बजाय माफी यात्रा निकालते और यह स्वीकार करते कि वाकई जांच पारदर्शी और प्रभावी तरीके से नहीं करवा पाए, जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करतेे हुए जांच सीबीआई को सौंपना पड़ी।
छुटपुट घोटाला है तो फिर ये बेचैनी क्यों ?

मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार में ही 12 साल तक ताकतवर काबिना मंत्री रहे और अब भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए कैलाश विजयवर्गीय का बड़बोलापन कायम है। पहले उन्होंने व्यापमं महाघोटाले के मद्देनजर आज तक के रिपोर्टर अक्षय सिंह की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत पर फूहड़ बयान दिया था कि पत्रकार-वत्रकार क्या होता है… हमसे बड़ा कोई पत्रकार है क्या ? इस बयान की जबरदस्त निंदा राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया ने भी की और पार्टी आलाकमान ने भी इस बयान को गलत माना, जिस पर श्री विजयवर्गीय को बकायदा माफी मांगना पड़ी। मगर कल फिर उनकी जुबान फिसली और उन्होंने व्यापमं जैसे देश के अब तक के सबसे बड़े महाघोटाले को महज छुटपुट घोटाला ही बताया और यह भी कहा कि इससे भाजपा को कोई फर्क नहीं पड़ा है। अब अगर श्री विजयवर्गीय की बात मानें कि यह छुटपुट घोटाला ही है, तो फिर मुख्यमंत्री से लेकर उनकी पूरी पार्टी इतनी बेचैन क्यों है और सीबीआई जांच से आखरी वक्त तक क्यों बचते रहे?

लेखक राजेश ज्वेल हिन्दी पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं. सम्पर्क – 098270-20830 Email : [email protected]

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