ग्रेटर नोएडा के गांव बिसाड़ा में मुहम्मद अखलाक को कुछ लोगों ने इसलिए मार डाला कि उन्हें शक था कि उसके घर में गाय का मांस खाया जा रहा है। सिर्फ शक था,किसी ने उस परिवार में गाय को कटते हुए या उन लोगों को मांस खाते हुए अपनी आंख से देखा नहीं था। गांव के पुजारियों ने लाउडस्पीकर पर घोषणा की और भीड़ ने हमला बोल दिया। अखलाक के बेटे दानिश पर भी कातिलाना हमला हुआ।
यह ठीक है कि उत्तर प्रदेश में गोवध पर प्रतिबंध है लेकिन चोरी-छिपे लोग गोमांस खाते भी हैं, खरीदते-बेचते भी हैं। जैसे कई और कानून तोड़े जाते हैं, यह कानून भी अक्सर टूटता रहता है। लेकिन यह बात समझ के बिल्कुल परे है कि कहीं किसी कानून के उल्लंघन का शक हो तो लोग-बाग खुद ही न्यायाधीश बन जाएं और बिना किसी तर्क-वितर्क के ‘मुजरिम’ को फांसी दे दें। यदि किसी ने जान-बूझकर या अनजाने ही गोवध कर दिया हो तो उसे बाकायदा कानूनी प्रक्रिया से गुजरना चाहिए। लेकिन यह कौन-सा धर्म है कि एक पशु की हत्या के बदले मनुष्य की हत्या कर दी जाए? यह कैसा न्याय है, यह न्याय है या अन्याय है? यह कौन-सा धर्म है? यह धर्म है या अधर्म है? यह ठीक है कि गाय को हिंदुओं ने माता का दर्जा दे रखा है और इसमें भी शक नहीं है कि गाय सर्वोत्तम पशु है लेकिन ऐसा इसलिए माना जाता है कि हम गाय का समुचित आदर करें, न कि उसे मनुष्य से भी ऊंचा समझने लगें। गाय क्या, किसी भी पशु या पक्षी की हत्या अनुचित है। मांस चाहे जिसका हो, गाय का या सूअर का, एक समान है। अखाद्य है। त्याज्य है लेकिन कोई उसे खाता है तो क्या उसकी हत्या करना उचित है? मांसाहारियों की हत्या करके आप उनका मांस खाना छुड़ा सकते हैं, क्या? सांप्रदायिक तनाव फैलाने से क्या हम गोवध को रोक सकेंगे? ऐसा करने से गायें भी मरती रहेंगी और आदमी भी मरते रहेंगे।
सबसे दुखद बात यह है कि हमारे नेता लोग ऐसे कारुणिक प्रसंगों को भी राजनीतिक दंगल में बदल देते हैं। वे एक-दूसरे की टांग खींचने में लगे रहते हैं लेकिन मैं बिसाड़ा गांव के उन तीन हिंदू नौजवानों को शाबाशी देता हूं, जिन्होंने अपना पड़ौसी-धर्म बखूबी निभाया। उन्होंने अपने 70 मुसलमान पड़ौसियों को रातों-रात दादरी पहुंचा दिया। रात के अंधेरे में उन्होंने इन 70 मुसलमानों को गांव का तालाब पार करवाया। रात को दो बजे तक वे जुटे रहे। उन लोगों के लिए क्या कहा जाए, जिन्होंने अपने ही पड़ौसियों को मार डाला।


