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ये संजना कुछ अलग हटके है

शिरीष कुछ बड़ा काम करने के लिए, कुछ हटके करने के लिए एक उद्देश्य होना चाहिए। अगर मकसद सामने हो और फिर उसे पाने के लिए कुछ किया जाये, तो बहुत कुछ मिल जाता है। खुद को भी, दूसरों को भी, समाज को भी। उस राह पर और कदम भी चल पड़ते हैं। धीरे-धीरे एक कारवां बन जाता है। नयी राहों पर चलने वालों का मकसद कारवां बनाना कभी नहीं होता। वह तो खुद-ब-खुद बन जाता है। पर जब वे पीछे मुड़कर देखते हैं, अपने पीछे बढ़े आ रहे बहुत से कदमों को आते देखते हैं, तो उन्हें अपने मकसद और उसकी कामयाबी से भी बड़ा अहसास होता है। शायद संजना सांघी को भी यह अहसास हो। 18 साल की संजना मुंबई की आम जोशीली, चुलबुली किशोरियों की तरह ही दिखती है। पर वह है एकदम अलग।

शिरीष कुछ बड़ा काम करने के लिए, कुछ हटके करने के लिए एक उद्देश्य होना चाहिए। अगर मकसद सामने हो और फिर उसे पाने के लिए कुछ किया जाये, तो बहुत कुछ मिल जाता है। खुद को भी, दूसरों को भी, समाज को भी। उस राह पर और कदम भी चल पड़ते हैं। धीरे-धीरे एक कारवां बन जाता है। नयी राहों पर चलने वालों का मकसद कारवां बनाना कभी नहीं होता। वह तो खुद-ब-खुद बन जाता है। पर जब वे पीछे मुड़कर देखते हैं, अपने पीछे बढ़े आ रहे बहुत से कदमों को आते देखते हैं, तो उन्हें अपने मकसद और उसकी कामयाबी से भी बड़ा अहसास होता है। शायद संजना सांघी को भी यह अहसास हो। 18 साल की संजना मुंबई की आम जोशीली, चुलबुली किशोरियों की तरह ही दिखती है। पर वह है एकदम अलग।

अलग इसलिए, कि वह इस उम्र की आम लड़कियों की तरह केवल अपने और अपने भविष्य के बारे में ही नहीं सोचती। उसका दिल दूसरों के लिए भी धड़कता है। वह दूसरों के लिए भी सोचती है। भले ही वे ‘दूसरे’ एकदम अनजान क्यों न हों। उसके लिए हर कोई एक इंसान है। और इंसानियत के इसी जज्बे से वह एक नयी राह पर चल पड़ी है। संजना ने पिछले साल जून में एक वेबसाइट www.innocenttouch.in बनायी। और इस कदम ने उसकी जिंदगी को एक मकसद दे दिया।

संजना ब्रीच कैंडी के बीडी सोमानी स्कूल की छात्रा है। वह भी अपनी उम्र के दूसरे किशोरों की तरह पढ़ना, घूमना और फेसबुक पर मौजूद रहना पसंद करती है। पर उसे लगा कि किशोर ऊर्जा से सराबोर होते हैं, जोश से उफनते हैं। उनकी इस ऊर्जा और जोश का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अपनी वेबसाइट के जरिये वह किशोरों को विभिन्न एनजीओ से जोड़ती है। एनजीओ से जुड़कर वे किशोर अपनी पढ़ाई, दोस्तों के साथ गपबाजी और सोशल नेटवर्किंग से समय निकालकर दूसरों के लिए कुछ करते हैं।

दरअसल, एक साल पहले संजना के मन में आया कि किसी एनजीओ से जुड़कर समाज के लिए कुछ काम किया जाए। पर उसे यह नहीं पता था कि शुरुआत कैसे करे, किससे संपर्क करे। बस, तभी उसे अपना मकसद मिल गया। किसी तरह उसे विक्टोरिया मेमोरियल स्कूल फॉर ब्लाइंड का पता चला। वह उससे जुड़ गयी। उसे अपना जीवन सार्थक लगने लगा। उसे खयाल आया कि उसकी तरह और भी बहुत से किशोर ऐसा कुछ करना चाहते होंगे, यह उन्हें भी पता नहीं होता होगा कि कैसे शुरुआत करें, किससे संपर्क करें। उसने ठान लिया कि वह ऐसे किशोरों को राह दिखायेगी। काफी माथापच्ची के बाद उसने पांच एनजीओ चुने। उसे लगा कि किशोर इनसे जुड़कर कुछ करना चाहेंगे। और शुरू हो गई वेबसाइट। चंद महीनों में ही यह वेबसाइट दक्षिण मुंबई के विद्यार्थियों में लोकप्रिय हो गई। इसके जरिये 200 से ज्यादा विद्यार्थी सक्रिय स्वयंसेवक बन चुके हैं।

17 साल के वेदांत मुंशी को संजना की वेबसाइट से ही ‘आकांक्षा’ एनजीओ का पता चला। वह उससे जुड़ गया। 16 साल की प्रीति गंगवानी शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय ‘प्रथम’ के लिए काम करने लगी। सेंट जेवियर्स कॉलेज के 15 विद्यार्थियों का समूह क्राई (चाइल्ड रिलीफ एंड यू) से जुड़ गया। एनजीओ भी इससे खुश हैं। उन्हें कर्मठ और उत्साही स्वयंसेवक मिल रहे हैं। स्कूलों में सभ्यता और सामाजिक जागरूकता के लिए काम कर रहे एनजीओ संस्कार इंडिया फाउंडेशन के संस्थापक किरण मदन का कहना है, ‘संजना की उम्र को देखते हुए यह वेबसाइट उसकी बड़ी पहल है। उसके इस प्रयास से हमें जुनूनी कार्यकर्ता मिल रहे हैं। यह कोशिश रंग लायेगी।’

यह वेबसाइट सरल और सूचनाप्रद है। एनजीओ से जुड़कर समाज के लिए कुछ करना चाहने वालों को केवल तीन स्टेप में ही मनचाही जानकारी मिल जाती है। वेबसाइट पर एक फेसबुक पेज भी है, जिस पर 200 से ज्यादा सदस्य हैं। एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ एफलेरॉन ने संजना को दो सप्ताह की कांफ्रेंस में एम्सटर्डम में भी बुलाया। संजना को जरा भी नहीं लगता कि वह कोई बड़ा काम कर रही है। वह मासूमियत से कहती है, ‘हम सभी किसी मकसद को लेकर पैदा होते हैं। मैं भी इसमें योगदान कर सकती हूं, पर दूसरों के सहयोग के बिना नहीं। मेरा सपना है कि हर कोई किसी ना किसी के जीवन को सुंदर बनाये।’

आज हमें एक नहीं, बल्कि अनेक संजनाओं की जरूरत है। अनगिनत संजनाएं चाहिएं हमें। ऐसी संजनाएं, जो अपने तमाम कामकाज, अपनी तमाम व्यस्तता और भागमभाग जिंदगी के बीच कुछ पल दूसरों के लिए भी निकाल सकें। कुछ देर ठहरकर दूसरों के लिए सोच सकें। कुछ नया कर सकें। एक श्रृंखला बना सकें। ऐसी श्रृंखला, जिसकी पहली कड़ी वे खुद बनें और फिर दूसरी कडि़यां जुड़ती चली जायें… वह श्रृंखला एक सुंदर हार में तब्दील हो जाये… और वह हार समाज में मानवीय भावनाओं को जगा दे… उमड़-घुमड़ पड़ें वे भावनाएं… और इंसानियत की भीनी-भीनी खुशबू वाली बरसात हो जाए।

भारत एक युवा देश है। अगले एक दशक में युवाओं की आबादी और बढ़ेगी। ये जोश और ऊर्जा से सराबोर युवा होंगे। अगर उनके इस जोश और ऊर्जा को जागृत करके घनीभूत कर दिया जाए, उन्हें कुछ मकसद दिखा दिया जाए, तो प्रगति की दौड़ की अकल्पनीय और अविश्वसनीय तेजी नजर आयेगी। भले ही संजना को इसका अहसास नहीं है, पर इस सबमें आखिर उसका भी तो योगदान होगा ही!

लेखक शिरीष खरे सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए पत्रकार हैं। पत्रकारिता की डिग्री लेने के बाद चार साल तक डाक्यूमेंट्री फिल्म संगठन में शोध और लेखन का कार्य किया। उसके बाद दो साल तक ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ से जुड़े रहे। इन दिनों ‘चाइल्ड राईट्स एंड यू, मुंबई’ के ‘संचार विभाग’ से जुड़े हुए हैं।

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