देख सखी फागुन के उत्पात : भइल गुलाबी गाल

हई ना देखs ए सखी फागुन के उत्पात।मनोज भावुक

दिनवो लागे आजकल पिया-मिलन के रात॥1॥

अमरइया के गंध आ कोयलिया के तान।

दइया रे दइया बुला लेइये लीही जान॥2॥

ठूठों में फूटे कली, अइसन आइल जोश।

अब एह आलम में भला, केकरा होई होश॥3॥

महुआ चुअत पेड़ बा अउर नशीला गंध।

भावुक  अब टुटबे करी, संयम के अनुबंध॥4॥

बाहर-बाहर हरियरी, भीतर-भीतर रेह।

जले बिरह के आग में गोरी-गोरी देह॥5॥

भावुक हो तोहरा बिना कइसन ई मधुमास।

हँसी-खुशी सब बन गइल बलुरेती के प्यास॥6॥

हमरो के डसिये गइल ई फागुन के नाग।

अब जहरीला देह में लहरे लागल आग॥7॥

मन महुआ के पेड़ आ तन पलाश के फूल।

गोरिया हो एह रूप के कइसे जाईं भूल॥8॥

हँसे कुंआरी मंजरी भावुक डाले-डाल।

बिना रंग-गुलाल के भइल गुलाबी गाल॥9॥

जब-जब आवे गाँव में ई बउराइल फाग।

थिरके हमरा होठ पर अजब-गजब के राग॥10॥

कोयलिया जब-जब रटे काम-तंत्र के जाप।

तब-तब हमरो माथ पर चढ़िये जाला पाप॥11॥

मादकता ले बाग में जब वसंत आ जाय।

कांच टिकोरा देख के मन-तोता ललचाय॥12॥

तन के बुझे पियास पर मन ई कहाँ अघाय।

ई ससुरा जेतने पिये ओतने ई बउराय॥13॥

गड़ी, छुहाड़ा, गोझिया भा रसगुल्ला तीन।

के तोहसे बा रसभरल, के तोहसे नमकीन॥14॥

चढ़ल ना कवनो रंग फिर जब से चढ़ल तोहार।

भावुक कइसन रंग में रंगलs अंग हमार॥15॥

आग लगे एह फाग के जे लहकावे आग।

पिया बसल परदेश में, भाग कोयलिया भाग॥16॥

लहुरा देवर घात में ले के रंग-गुलाल।

भउजी खिड़की पे खड़ा देखें सगरी हाल॥17॥

अंगना में बाटे मचल भावुक हो हुड़दंग।

सब के सब लेके भिड़ल भर-भर बल्टी रंग॥18॥

साली मोर बनारसी, होठे लाली पान।

फागुन में अइसन लगे जस बदरी में चान॥19॥

कबो चिकोटी काट के जे सहलावे माथ।

कहाँ गइल ऊ कहाँ गइल, मेंहदी वाला हाथ॥20॥

फागुन में आवे बहुत निर्मोही के याद।

पागल होके मन करे खुद से खुद संवाद॥21॥

माघ रजाई में रहे जइसे मन में लाज।

फागुन अइसन बेहया थिरके सकल समाज॥22॥

कींचड़-कांदों गांव के सब फागुन में साफ।

मिटे हिया के मैल भी, ना पूरा त हाफ॥23॥

महुए पर उतरल सदा चाहे आदि या अंत।

जिनिगी के बागान में उतरे कबो वसंत।।24॥

के बाटे अनुकूल आ के बाटे प्रतिकूल।

ई कहवाँ सोचे कबो उड़त फागुनी धूल॥25॥

फागुन के हलचल मचल खिलल देह  के फूल।

मन-भौंरा व्याकुल भइल, कर ना जाये भूल॥26॥

झुक-झुक के चुम्बन करे बनिहारिन के गाल।

एतना लदरल खेत में जौ-गेहूं के बाल॥27॥

एतना उड़ल गुलाल कि भउजी लाले-लाल।

भइया के कुर्ता बनल, फट-फुट के रूमाल॥28॥

मह-मह महके रात-दिन पिया मिलन के याद।

भीतर ले उकसा गइल, फागुन के जल्लाद॥29॥

भावुक तू कहले रहS आइब सावन बाद।

फगुओ आके चल गइल, ना चिट्ठी, संवाद॥30॥


मनोज ‘भावुक’ इन दिनों ‘हमार टीवी’ में प्रोग्राम प्रोड्यूसर हैं। उनके बारे में www.manojbhawuk.com पर जाकर ज्यादा जानकारी पा सकते हैं। मनोज से संपर्क manojsinghbhawuk@yahoo.co.uk के जरिए कर सकते हैं।

 

सीखें, जानें, जुड़ें, जोड़ें और निडरता से खड़े हों लेखक

12 मार्च 2017 को इंदौर स्थित देवी अहिल्या केंद्रीय पुस्तकालय के अध्ययन कक्ष में प्रगतिशील लेखक संघ, इंदौर इकाई द्वारा एक बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में प्रलेसं के प्रांतीय महासचिव, कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी ने हाल ही में मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के 11 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल के साथ शहीद लेखकों डॉ नरेंद्र दाभोलकर, कॉ गोविन्द पानसरे और एम एम कलबुर्गी के गृह नगरों क्रमशः सतारा, कोल्हापुर और धारवाड़ की अपनी यात्रा के संस्मरण सुनाए। इस यात्रा का उद्देश्य लेखकों की शहादत के प्रति अपना सम्मान प्रकट करना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता ज़ाहिर करना एवं शहीद लेखकों के परिजनों के प्रति एकजुटता जताना तथा इस संकल्प का प्रसार करना था कि तर्कशीलता और विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का संघर्ष जारी रहेगा।

लेखकों के प्रतिनिधिमंडल में मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष और ‘प्रगतिशील वसुधा’ पत्रिका के संपादक श्री राजेन्द्र शर्मा (कवि) तथा महासचिव श्री विनीत तिवारी (कवि-नाटककार और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता) के साथ अध्यक्ष मंडल के सदस्य सर्व श्री हरिओम राजोरिया (कवि-नाटककार), प्रान्तीय सचिव मंडल सदस्य और वरिष्ठ कवि श्री बाबूलाल दाहिया, श्री शिवशंकर मिश्र ‘सरस’, तरुण गुहा नियोगी, सुश्री सुसंस्कृति परिहार, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार श्री हरनाम सिंह, कहानीकार श्री दिनेश भट्ट, नाट्य निर्देशिका और अभिनेत्री सुश्री सीमा राजोरिया, तथा ‘समय के साखी’ पत्रिका की संपादक और कवयित्री सुश्री आरती शामिल थे। ये लेखक प्रदेश के भोपाल, इंदौर, अशोकनगर, मंदसौर,सतना,सीधी, जबलपुर, छिंदवाड़ा और दमोह शहरों से आते हैं।

विनीत तिवारी ने अपने वक्तव्य में महाराष्ट्र, कर्नाटक और गोआ के अनुभवों को विस्तार से साझा किया। शहीद लेखकों के परिजनों से भेंट, फ़िल्म संस्थान के अनुभव एवं गोवा के संस्मरण तथा प्रेस कॉन्फ्रेंस आदि के अनुभव बांटे।

विनीत तिवारी ने बताया- आज सबसे अधिक ख़तरा और पहला हमला विचारकों, शिक्षकों एवं लेखकों पर ही है। एक समय था जब बुद्धिजीवियों का लिहाज़ होता था और बुरी से बुरी परिस्थिति में भी शिक्षकों, लेखकों पर हमला नहीं होता था। लेकिन आज हालात बिलकुल उलटे हैं। विगत वर्षों में मारे गए तीनों शहीद लेखक सत्तर और 80 वर्ष की आयु के वरिष्ठ विचारक ही थे। उनके सिरों में ही गोली मारकर यह स्पष्ट संकेत दिया गया कि हत्यारे, विचारों के ही हंता हैं। चरमपंथियों के निशाने पर प्रगतिशील विचार ही हैं।

विनीत तिवारी ने पुणे फ़िल्म संस्थान के और पुणे प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा साधना मीडिया सेंटर में हुई पुणे के प्रखर बौद्धिक विचारवंतों के साथ हुई सभा के संस्मरण भी सुनाए। उसके अतीत एवं गौरव पूर्ण उपलब्धियों से परिचय कराया। प्रख्यात संगीतज्ञ विदुर महाजन, अपर्णा महाजन, मैत्रबन, क्रांति कानाडे, ईशा, शांता रानाडे, राधिका इंग्ले, रूचि भल्ला, लता भिसे, माओ, मिलिंद, एस. पी. शुक्ला, अमित नारकर, दीपक मस्के, लतिका जाधव, नीरज, जहाँआरा, अहमद, नाची मुत्थु, राकेश शुक्ल, आदि से मुलाक़ात के किस्से सुनाए। फ़िल्म निर्माण तकनीकि में काम आनेवाली पुरानी सामग्री के चित्र और पूरी यात्रा के दौरान के अनेक चित्र दिखाये।

विनीत ने बताया कि पुणे से सबसे पहले हम लोग डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की पत्नी डॉ. शैला दाभोलकर और बेटे डॉ. हमीद दाभोलकर से मिलने सतारा पहुंचे। वहां अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के काम और अभियान को जाना। आत्मीय बातचीत में डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की पत्नी का अनुभव सुनना संकल्प से भर गया। उन्होंने कहा- मुझे लगता ही नहीं कि नरेंद्र अब नहीं हैं। मैं कुछ भी करने जाऊं तो मन में उन्हीं से पूछ लेती हूँ। उन्होंने बताया कि दशकों तक संघर्ष के बाद आखिर महाराष्ट्र सरकार को ओझा, टोने-टोटके करने वालों के खिलाफ कानून बनाना ही पड़ा। डॉ. दाभोलकर की मृत्यु को 4 वर्ष होने वाले हैं। आंदोलन बढ़ रहा है लेकिन सरकारें धीमे-धीमे काम कर रही हैं। नहीं भूलना चाहिए तीनों शहीद लेखकों के हत्यारे अब तक पकड़े नहीं गए हैं।

विनीत तिवारी ने साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने वाले लेखक और एम एम कलबुर्गी के लिए धारवाड़ में न्याय की लड़ाई लड़ रहे लेखक पद्मश्री गणेश देवी के प्रयासों और दक्षिणायन संगठन के बारे में बताया। गणेश देवी अब गुजरात से धारवाड़ आकर रहने लगे हैं और कन्नड़ के लेखकों और अकादमिक विद्वानों को कलबुर्गी के लिए न्याय की मांग के लिए निर्भय होकर लामबंद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कलबुर्गी विशुद्ध लेखक थे। उन्होंने 120 से ज़्यादा दर्शन और इतिहास विषयक ग्रन्थ लिखे थे। उनके साथ उनके लिए लड़ी जा रही लड़ाई में यदि लेखक शामिल न हुए तो कौन शामिल होगा? कलबुर्गी ने अकेले इतना वैचारिक लेखन किया है जितना कर्नाटक में शताब्दियों में नहीं लिखा गया है। कलबुर्गी का कमरा अब पूरी तरह उनकी तस्वीर एवं पुस्तकों के साथ एक लेखक के स्मृति कक्ष के रूप में उपस्थित है। धारवाड़ में प्रतिनिधिमंडल ने प्रो. कलबुर्गी के परिजनों, उनकी पत्नी उमादेवी, प्रो. गणेश देवी, प्रो. सुलेखा देवी, विख्यात सामाजिक आंदोलनकारी एस.आर. हीरेमठ और कर्नाटक के विभिन्न हिस्सों से आये 40 कन्नड़ लेखकों से मुलाक़ात की।

कोल्हापुर में गोविन्द पानसरे ने बड़ी संख्या में अलग-अलग संगठन बनाये। उन्होंने जब किसी की तक़लीफ़ जानी तो उस तरह की तक़लीफ़ में पड़े अन्य लोगों को भी खोजा और उन्हें संगठित किया। पानसरे ने अपने संगठन के लोगों के सामने लक्ष्य रखा कि आप लोग उन सामाजिक कार्यकर्ताओं को ढूंढकर उनकी जीवनी परक कम से कम 80 किताबें छापें जो बिना प्रसिद्ध हुए ख़ामोशी से काम करते रहते हैं। यह काम हुआ और कॉमरेड पानसरे ने स्वयं शिवाजी सहित बहुत से विषयों पर आँख खोल देनेवाली, सरकारों को असुविधा पैदा करनेवाली किताबें लिखीं।

विनीत तिवारी ने कोल्हापुर में पानसरे की याद में प्रातः होनेवाली निर्भय यात्रा का भी हाल सुनाया कि किस तरह हम लगभग 200 लोग सुबह इस ऐलान के साथ टहलने निकले कि हम डरे हुए नहीं हैं। हमारी लड़ाई जारी है। हम बच-बचाकर नहीं, बल्कि पूरे मन से और समर्पण के साथ एकजुटता में संलग्न है और किसी भी खतरे के लिए तैयार हैं। लोग गीत गाते चले कि”गोल्या लठ्या घाला, विचार नहीं मरणार” (गोली लाठी चला लो लेकिन विचार को नहीं मार पाओगे।)। कोल्हापुर में पानसरे जी का प्रभाव हज़ारों लोगों पर है और वहां उनकी पत्नी उमा पानसरे, बहू मेघा पानसरे, पोते मल्हार और कबीर के साथ ही उनके चाहने वाले हज़ारों लोगों से बहुत ही आत्मीय अभिनन्दन हमें प्राप्त हुआ।

उन्होंने बताया कि गोवा की यात्रा कई मायने में अविस्मरणीय एवं दूरगामी प्रभाव डालनेवाली रही। गोवा में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पत्रकारों लेखकों की उपस्थिति उनके सवालों एवं सहयोग आदि ने आश्वस्त किया। इसी बीच सरकार द्वारा कोल्हापुर में दिए एक नोटिस का ज़िक्र भी आया जिसमें कहा गया था कि आप लोग मीटिंग में किसी का भी नाम नहीं लेंगे और किसी की निंदा नहीं करेंगे वर्ना आप लोगों को गिरफ्तार कर लिया जायेगा। तब पत्रकार निखिल वागले ने अपने वक्तव्य की शुरुआत ही यह कहकर की कि जिन्होंने हत्या की आप उन्हें पकड़ नहीं रहे उलटे आप हमें ही कह रहे हैं कि हम उनकी आलोचना न करें उनके ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाएं। यह ठीक नहीं। हम संघर्ष नहीं छोड़ सकते। आप लोग हमें डराने की बजाय अपना काम कीजिये। इसके बाद देखा यह गया कि जो पुलिसकर्मी, अधिकारी ग़ुस्से में थे इत्मीनान से बैठ गए और ध्यान से सुनने लगे।

कुलमिलाकर विनीत ने इस बात से अपने वक्तव्य का उपसंहार किया कि आज हर स्वतंत्र सोचने विचारने वाले व्यक्ति के लिए एकजुटता, संलग्नता और संघर्ष ज़रूरी हैं। इस यात्रा के संस्मरणों के प्रकाशन को जल्द ही परिणति दी जायेगी एवं फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ निडर लेखन करनेवाले इन तीनों लेखकों की विचार पुस्तकों को हिंदी में भी अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचाया जाएगा। ध्यान रहे, लेखकों के लिए देशाटन आवश्यक इसीलिए बताया गया है ताकि लेखक के अनुभव का दायरा बढ़े। हमने इस यात्रा को सोद्देश्य बनाया और अन्य भाषा-भाषी समाज से सीखा-जाना, उनसे जुड़े, उन्हें जोड़ा और जहाँ ज़रूरत हो वहां खड़े होने की निडरता लेकर लौटे। इस यात्रा के दौरान प्रत्येक दिन हमारे सत्तर साला साथियों ने भी युवाओं के उत्साह और सक्रियता का परिचय दिया। हमने इस यात्रा में बहसें की, योजनाएं बनायीं, वास्तविक अमल की रुपरेखा तैयार की और सभी साथियों को यह भी काफी ऊर्जा देने वाला और एक दूसरे को समृद्ध करने वाला अनुभव लगा। हमारे समूह में तीन महिला साथी भी थीं। उनकी सक्रिय भागीदारी पूरी यात्रा में रही।

बैठक के अंत में विनीत तिवारी ने हाल ही में गिरफ़्तार किये गए पत्रकार – संपादक दीपक ‘असीम’ के मामले से लोगों को अवगत करवाया कि किस तरह ओशो के एक लेख के पुनर्मुद्रण पर उनके खिलाफ कार्रवाई की गयी। ये समाज में विरोधी विचार के प्रति कम होती सहनशीलता की प्रवृत्ति को दर्शाता है। इसके लिए हमें निर्भय होकर जनता से अपने विचार साझा करने होंगे और तर्कशील स्वस्थ बहस का वातावरण बनाना होगा। बैठक में अन्य लोगों ने भी विचार व्यक्त किये। उपस्थित लोगों में ब्रजेश कानूनगो, अभय नेमा, सुलभा लागू, डॉ. कामना शर्मा, शशिभूषण, तौफ़ीक़, प्रशांत, रामासरे पाण्डे, अजय लागू, आदि प्रमुख थे।

प्रस्तुति- शशिभूषण

केजरीवाल पर आरोप : सच की सभावनाएं

कविवर रहीम का कथन है – ”रहिमन अँसुआ नैन ढरि, जिय दुख प्रकट करेइ। जाहि निकासौ गेह ते, कस न भेद कहि देइ।।”  अर्थात् जिस प्रकार आँसू नयन से बाहर आते ही हृदय की व्यथा को व्यक्त कर देता है उसी प्रकार जिस व्यक्ति को घर से निकाला जाता है, वह घर के भेद बाहर उगल देता है। कुछ ऐसी ही आँसू जैसी स्थिति श्री कपिल मिश्रा की भी है जिन्होंने ‘आप’ के मंत्रिमंडल से बाहर होते ही दो करोड़ की मनोव्यथा जग जाहिर कर दी। रहीमदास के उपर्युक्त दोहे से इस प्रश्न का उत्तर भी मिल जाता है कि श्री कपिल मिश्रा ने दो करोड़ का रहस्य पहले क्यों नहीं प्रकट किया ? आँसू जब तक नेत्र से झरेगा नहीं तब तक मनोगत व्यथा व्यक्त कैसे हो सकती है ? वह तो आँसू के बाहर आने के बाद ही सार्वजनिक होगी।

आप सुप्रीमो श्री अरबिन्द केजरीवाल पर लगा आरोप तब तक कोई अर्थ नहीं रखता जब तक कि पुष्ट प्रमाणों से वह सिद्ध न हो जाय किन्तु इस आरोप की गंभीरता से इनकार नहीं किया जा सकता। साथ ही अन्य अनेक परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी उक्त आरोप की आधारहीनता पर संदेह उत्पन्न करते हैं। दिल्ली सरकार के उपमुख्यमंत्री श्री मनीष सिसोदिया आदि आप नेताओं द्वारा आरोप को निराधार कह देने मात्र से वह निरस्त नहीं हो सकता। आरोप की असत्यता सिद्ध करनी होगी। श्री कपिल मिश्रा को झूठा साबित करना होगा।

मौन को स्वीकार का लक्षण माना गया है -‘मौनं स्वीकार लक्षणं’। श्री केजरीवाल का मौन भी आरोप की स्वीकृति का संदेह उत्पन्न करता है। अन्यथा श्री कपिल मिश्रा के विरूद्ध कड़ी कार्यवाही क्यों नहीं हो रही है ? उनके आरोपों का सप्रमाण खंडन क्यों नहीं किया जा रहा है? श्री केजरीवाल भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष का नारा उछालकर राजनीति में आये और अपनी ईमानदार नेतृत्व की छवि प्रचारित करते हुए श्री अन्ना हजारे की लोकप्रियता का लाभ लेकर भारतीय राजनीति में प्रतिष्ठित हो गए। अन्ना आन्दोलन से बने वातावरण ने उन्हें और ‘आप’ को अपूर्व बहुमत देकर बड़े विश्वास के साथ दिल्ली की सत्ता सौंपी किन्तु सत्ता में आने के बाद ‘आप’ में हुए विखराव, मंत्रियों पर लगे गंभीर आरोप और स्वयं श्री केजरीवाल की कार्यशैली ने उनकी तथाकथित ईमानदार छबि को उत्तरोत्तर प्रश्नांकित किया है।

आप पार्टी के प्रारंभिक उत्थान में ही श्री योगेन्द्र यादव, श्री प्रशान्तभूषण आदि समर्पित ईमानदार नेताओं का पार्टी छोड़ना, श्री अरविन्द केजरीवाल का भ्रष्टाचार के लिए अलग पहचान वाले श्री लालू यादव से गले मिलना और उनके साथ गठजोड़ की राजनीति करना, नोटबंदी और सर्जीकल स्ट्राइक जैसी महत्त्वपूर्ण घटनाओं पर अनर्गल बयानवाजी करना, श्री रामजेठमलानी की फीस दिल्ली सरकार के खजाने से भुगतान कराने का प्रयत्न आदि अनेक ऐसी स्थितियाँ हैं जो आप पार्टी सुप्रीमों श्री केजरीवाल की ईमानदारी पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। श्री सत्येन्द्र जैन से उनकी निकटता भी स्वयं में एक गंभीर प्रश्न है। जिस व्यक्ति पर आयकर विभाग ने कालेधन को सफेद करने का प्रकरण दर्ज कराया हो उसका आप के मंत्रिमंडल में होना और श्री केजरीवाल की उनसे घनिष्ठता होना भी श्री कपिल के आरोपों को आधार प्रदान करते हैं।

यह सत्य है कि देश भ्रष्टाचार से संत्रस्त है और देश की सभी राजनीतिक पार्टियाँ और उनके नेता भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे रहे हैं। इस स्थिति में भ्रष्टाचार का पुरजोर विरोध करते हुए सत्ता में आने वाले श्री केजरीवाल का अन्य सभी दलों के भ्रष्टाचारियों के साथ छत्तीस का आकड़ा होना था किन्तु उनके अब तक के बयान स्पष्ट करते हैं कि उनका सारा विरोध ईमानदार छवि वाले श्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा नेतृत्व से ही है। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे अन्य नेताओं से नहीं।

आश्चर्य का विषय है कि जिन श्री नरेन्द्र मोदी पर लम्बे राजनीतिक जीवन में अब तक भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा उन्हीं नरेन्द्र मोदी को भ्रष्टाचार के विरूद्ध आवाज बुलन्द करने वाले श्री केजरीवाल ने कदम-कदम पर अपना निशाना बनाया। अन्य दलों के नेताओं के साथ उनके सम्बंध मैत्रीपूर्ण हो गये। विचारणीय है कि भ्रष्टाचार के आरोपियों से उनकी मैत्री क्यों परवान चढ़ी ? पंजाब और गोवा में हुए चुनावी खर्च के संसाधन उन्होंने कहाँ से जुटाए और उनका कितना सही ब्यौरा चुनाव आयोग को दिया गया ? एम.सी.डी.चुनावों में आप की हार के पीछे यही सब कारण प्रमुख हैं।

सदाचरण और सदाचार के आडम्बर में भारी अन्तर है। संन्यासी-उपदेशक का ढोंग रचकर कुछ समय तक मनमानी हरकतें की जा सकती हैं किन्तु अन्त में कारावास की काली कोठरी ही मिलती है। साधु के वेश में सत्ता का सीताहरण किया जा सकता है किन्तु जागरूक जनता रूपी राम के तीखे वाणों से नहीं बचा जा सकता। कालनेमि हनुमान को क्षण भर के लिए भले ही भ्रमित कर ले किन्तु भेद खुलने पर उसका अन्त निश्चित होता है। देवताओं की पंक्ति में बैठकर अमृत पीना संभव हो सकता है किंतु अंततः धोखा देने वाले का कंठ कटता ही है। काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती। ईमानदारी का ढोंग रचकर जनता को देर तक नहीं बहकाया जा सकता। सत्य अंततः सामने आता ही है। संभव है आप की राजनीतिक कथित ईमानदारी के और भी काले कारनामें सामने आयें। उस स्थिति में इस राजनीतिकदल की दशा भी अन्य राजनीतिक दलों से भिन्न नहीं होगी। जनता जनार्दन की अदालत में श्री केजरीवाल को अब जबाव देना ही होगा।
                                                             
डा. कृष्णगोपाल मिश्र
सहायक-प्राध्यापक (हिन्दी)                              
उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान,
भोपाल
म.प्र.

चचा शिवपाल ने तलाशा अलग रास्ता!

अजय कुमार, लखनऊ
आखिरकार समाजवादी कुनबा बिखर ही गया। इसका दुख नेताजी मुलायम से अधिक शायद ही किसी और को हो। समाजवादी पार्टी को मुलायम ने अपने खून-पसीने से खड़ा किया था। अनु शिवपाल यादव उनके साथ ‘हनुमान’ की तरह डटे रहे तो मुलायम की राह आसान हो गई। मुलायम की मेहनत के बल पर समाजवादी पार्टी ने न केवल उत्तर प्रदेश में अपनी पहचान बनाई बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी सपा का झंडा हमेशा बुलंद रहा। यूपी में सपा को तीन बार सत्ता हासिल हुई इतनी ही बार मुलायम सिंह यूपी के सीएम भी बने।(पहली बार मुलायम जनता दल से सीएम बने थे और बाकी दो बार समाजवादी पार्टी के बल पर सत्ता हासिल की थीं।) केन्द्र में गठबंधन की सियासत के दौर में नेताजी मुलायम सिंह ने रक्षा मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी संभाली थी। दस वर्षो तक यूपीए की मनमोहन सरकार मुलायम के समर्थन से मजबूती हासिल करती रही। मुलायम के दांव के सामने सियासत के बड़े-बडे सूरमाओं को कई बार चारो खाने चित होते देखा गया है,लेकिन वो ही मुलायम अपने बेटे से हार गये।

यूपी विधान सभा चुनाव से कुछ माह पूर्व सपा प्रमुख मुलायम सिंह को किनारे करके उनकी पार्टी को जिस तरह से बेटे अखिलेश ने कब्जा कर लिया था, उसकी घर-बाहर सभी जगह लगातार विपरीत प्रतिक्रिया हो रही थी। घर के भीतर तो परिवार में ही बवाल मच गया था। जिस बेटे अखिलेश को किसी की भी नाराजगी की परवाह न करते हुए मुलायम ने 2012 में सीएम का ताज सौंप दिया था,उसी ने पांच वर्षो में बाप मुलायम को पार्टी से बेदखल कर दिया। अखिलेश के द्वारा नेताजी की कोई भी बात सुनना बंद कर दिया गया। फिर चाचा शिवपाल यादव की क्या बिसात थी। उनको तो भरी सभा में अपमानित किया जाने लगा था। सपा में जो भी नेता मुलायम-शिवपाल के करीब नजर आता उसका पत्ता काट दिया जाता। अमर सिंह जैसे तमाम सपा नेताओं के साथ ऐसा ही सुलूक किया गया। मुलायम के करीबियों को टिकट नहीं दिया गया। बा पके खिलाफ चुनाव आयोग तक में पैरवी करने अखिलेश पहुंच गये थे। यह सब बातें पुरानी हो गई हैं,लेकिन करारी हार के बाद भी अखिलेश का दंभ नहीं टूटा है। वह विधान सभा चुनाव बाद पार्टी की कमान नेताजी को सौपने वाले वायदे से मुकर गये। 

परिवार दो हिस्सों में बंट गया। अखिलेश और उनके चचेरे चचा रामगोपाल यादव एक तरफ थे तो मुलायम सिंह यादव उनके अनुज शिवपाल यादव सहित करीब-करीब पूरा कुनबा असहाय नेताजी के साथ खड़ा नजर आया। बात यही तक सीमित नहीं रही। बात शिखंडी और शकुनी तक पहुंच गई। इस बीच मुलायम दो राहे पर खड़े नजर आये। शिवपाल यादव अब समाजवादी पार्टी में नहीं है। यह बात जब सार्वजनिक रूप से रामगोपाल यादव ने कहीं तो पानी सिर से ऊपर चला गया। आहत शिवपाल सिंह यादव ने नई पार्टी का ऐलान कर दिया है। चौंकाने वाली बात ये थी  कि इस नई पार्टी  का अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को बनाने की बात कही गई थी।

शिवपाल यादव 0 मई 2017  को पार्टी संरक्षक मुलायम सिंह यादव से मुलाकात करने इटावा पहुंचे। उसके बाद शिवपाल यादव ने घोषणा कर दी कि  सामाजिक न्याय के लिए सेक्युलर मोर्चा बनाया जा रहा है। इसके अध्यक्ष नेताजी मुलायम सिंह यादव ही होंगे। शिवपाल का कहना था कि नेताजी को सम्मान दिलाने और समाजवादियों को एक जुट करने के लिए ये मोर्चा बनाया जा रहा है।

गौरतलब हो, सेक्युलर मोर्चा के गठन से दो दिन पहले ही शिवपाल ने इटावा में अपने चचेरे भाई रामगोपाल यादव पर हमला बोला था और उन्हें शकुनि तक कह डाला था। इससे ठीक चार दिन पहले मीडिया के सवालों और शिवपाल के बयानों से भड़क कर रामगोपाल ने कहा था कि शिवपाल यादव बेकार की बातें करते हैं। उन्होंने पार्टी का संविधान नहीं पढ़ा है। पार्टी का सदस्यता अभियान चल रहा है. शिवपाल तो अभी सदस्य तक भी नहीं बने हैं। बात अखिलेश यादव की कि जाये तो यूपी विधानसभा चुनावों के वक्त मुलायम सिंह को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष पद से हटाकर खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे। उन्होंने मीडिया से कहा था कि वह सिर्फ तीन महीने के लिए अध्यक्ष बने हैं और चुनाव के बाद वह नेताजी को राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद लौटा देंगे,लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो मुलायम तो नाराज हुए ही इसके अलावा शिवपाल और नेताजी की छोटी बहू अपर्णा यादव भी कह चुकी थीं कि मुलायम सिंह को अध्यक्ष पद लौटा दिया जाना चाहिए। उनके परिवार में मुलायम सिंह यादव उनकी दूसरी पत्नी साधन यादव और छोटे बेटे प्रतीक यादव, बहू अपर्णा यादव और शिवपाल एक तरफ हैं जबकि रामगोपाल यादव परिवार के इस विवाद में शुरू से ही मुलायम और शिवपाल के खिलाफ अखिलेश के साथ खड़े हैं। मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद हटवाने में भी रामगोपाल यादव का बड़ा रोल था।

शिवपाल ने 15 जून को सेक्युलर पार्टी बनाने की बात कही है।  15 जून तक का समय इस लिये रखा गया है कि अखिलेश अगर इस बीच पछतावा करना चाहें तो कर सकते हैं।उधर,पछतावा जताने से दूर सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि उन्हें ऐसे किसी मोर्चे के बारे में जानकारी नहीं है. हालांकि, अखिलेश ने कहा कि अगर ऐसा मोर्चा बन रहा है, तो अच्छी बात है.। इस बीच आस्तीन के सांप का उदाहरण देते हुए उन्होंने चाचा शिवपाल की घेरने की कोशिश की. अखिलेश ने कहा कि सपेरे कहीं से भी सांप निकाल लेते हैं. हम लोग आस्तीन के सांप को अच्छी तरह पहचानते हैं. वहीं, अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की दोस्ती आगे भी कायम रहेगी. बता दें कि अभी पिछले दिनों ही मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि कांग्रेस से गठबंधन करना गलती थी. इसी वजह से करारी हार मिली. उन्होंने कहा था कि वो कांग्रेस से गठबंधन के पक्ष में नहीं थे।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

कोई दलित चेहरा होगा भाजपा का अगला उत्तर प्रदेश अध्यक्ष!

भाजपा का यह एक अचूक निशाना हो सकता है, यदि भाजपा ऐसा करती है तो एक तीर से कई निशाने निश्चित साध लेगी, क्योंकि भाजपा की रणनीति आने वाले लोक सभा चुनाव में सभी समीकरणों को मजबूती से सिद्ध करना होगा, वास्तव में भाजपा आने वाले लोकसभा चुनाव में पुन: अपनी बड़ी जीत दर्ज करवाने का प्रयास करेगी, जिसके लिए भाजपा को उत्तर प्रदेश की धरती पर एक ऐसा प्रदेश अध्यक्ष चाहिए जोकि ऐसी जाति से आता हो जिससे दलित वोट बैंक को भी आसानी से साधा जा सके, आने वाले लोक सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी अपने राजनीतिक समीकरण को मजबूती से धरातल पर उतारने का प्रयास करेगी जिसमें सभी जातियों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करेगी जिसका मुख्य आधार दलित एवं पिछड़ा वर्ग होगा दलित वोट बैंक को अपने साथ जोड़ने हेतु भारतीय जनता पार्टी सम्पूर्ण रूप से इस क्षेत्र में सफल होने का प्रयास करेगी। अत: इस समीकरण को एक मजबूत एवं आधारयुक्त स्थिति में धरातल पर उतारने हेतु कर्मठ एवं योग्य व्यक्ति की आवश्यकता होगी, जो कि सभी समीकरणों को संगठन के साथ आसानी बैठा सके|

दलित वोट बैंक की राजनीति करने वाली पार्टियों को कमजोर किया जा सके| साथ ही भाजपा का जनाधार और ज्यादा बढाया जा सके| ऐसे मजबूत एवं जनाधार युक्त नेता कि आवश्यकता होगी| जोकि इस वोट बैंक में सीधे सेंधमारी कर सके, इन सभी बिन्दुओं पर पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारणी निश्चित गहनता से विचार करेगी एवं मंथन करेगी। क्योंकि उत्तर प्रदेश की धरती इस देश की राजनीति में सबसे अहम भूमिका रखती है, उत्तर प्रदेश से ही वास्तव में देश की राजनीतिक का भविष्य निधारित होता है यह प्रदेश राजनीतिक यात्राओं के लिए जो मार्ग स्थापित करता है वह सशक्त, दृढ़ एवं अत्यंत मजबूत एवं शक्तिशाली मार्ग होता है।

यदि दिल्ली की यात्रा करनी है तो निश्चित उत्तर प्रदेश की धरती की अहम भूमिका होगी, इस प्रदेश को नजरअंदाज करके दिल्ली की यात्रा में सफल हो पाने की कल्पना भी करना न्याय संगत नहीं होगा क्योंकि यह प्रदेश भारत की राजनीति की रूप रेखा तैयार करता है, यदि शब्दों को परिवर्तित करके कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा कि उत्तरप्रदेश भारत के राजनीति की धुरी है, भारत की राजनीति इसी धरती के चारों ओर सम्पूर्ण रूप से घूमती हुई नजर आती है, इतिहास साक्षी है जब से भारत वर्ष आजाद हुआ तब से लेकर आज तक उत्तर प्रदेश का, भारत की राजनीति में सबसे बड़ा योगदान रहा है। इसी प्रदेश ने बढ़-चढ़ कर देश के नेतृत्व में हिस्सा लिया|

भारतीय जनता पार्टी आगामी लोक सभा चुनाव को बड़ी मजबूती के साथ लड़ने का प्रयास करेगी जिसमें जनसंख्या के आधार पर सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में दलित आबादी अधिक है। जिसे कदापि नजर अंदाज नहीं किया जा सकता इसलिए भारतीय जनता पार्टी नए रूप एवं नए सिद्धांत के अनुसार किसी दलित समुदाय पर मजबूत पकड़ रखने वाले नेता को प्रदेश की बागडोर दे सकती है, जिससे दलित वोट बैंक को मजबूती के साथ अपने साथ जोड़ा जा सके, इन सभी समीकरणों के आधार पर भारतीय जनता पार्टी के एक मजबूत, कर्मठ एवं संघर्षशील नेता राम शंकर कठेरिया के रूप में सबसे मजबूत दावेदार हो सकते हैं जो की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से काफी समय तक जुड़े रहे एवं संगठन में काफी प्रतिबद्धता के साथ कार्य भी किया।

अत: वर्तमान समय में देश की राजनीतिक रूप रेखा अलग पथ की ओर गतिमान है भारत के लगभग सभी राज्यों में राज्यस्तरीय पार्टियां जातीय समीकरण के आधार पर ही अब चुनाव को धार देने का प्रयास करती हैं तथा जातिय समीकरण के आधार पर ही अब चुनावी कि रणनीति भी तैयार की जाती है। खास बात यह है कि संगठन एवं संगठन के पदाधिकारी तथा प्रत्याशियों के टिकट बंटवारे पर भी जातीय समीकरण की भूमिका मुख्य रूप से होती है, संगठन का जिला अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं विधान सभा अध्यक्ष की नियुक्ति भी समीकरण के आधार पर ही की जाती है, तथा जातीय समीकरण के आधार पर मतदाताओं की गणना करते हुए विधान सभा क्षेत्र में किस विरादरी की मतदाता बाहुल्य है, तो उसी को आधार बनाते हुए सम्पूर्ण रूप से मतों का धु्रवीकरण करने प्रयास किया जाता है, इस आधार पर ध्यान केन्द्रित करते हुए टिकट भी प्रदान किया जाता है, इस गणित को बखूबी गंभीरता से आज के समय की राजनीति में निभाया जाता है ।

उत्तर प्रदेश की राजनीतिक प्रयोगशाला में यदि देखे तो  बहुजन समाज पार्टी अपने आप को दलित हितैषी बता कर दलितों की राजनीति करती है, तथा दलितों के वोट बैंक पर अपनी मजबूत पकड़ रखती है जिसके कारण कई बार बहुजन समाज पार्टी सत्ता में आई, तथा उत्तर प्रदेश की प्रमुख दुसरी पार्टी समाजवादी पार्टी के नाम से जानी जाती है, जिसका वोट बैंक यादव एवं मुस्लिम मतदाता हुआ करते हैं| भाजपा सवर्णों की पार्टी मानी जाती रही है परन्तु वर्त्तमान समय में भाजपा ने अपना रूप तेजी से बदल लिया है| केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाना, गैर यादव वोट बैंक को सीधे भाजपा के साथ जोड़ने का प्रयास था जिसमें भाजपा लगभग सफल हो गई|

ज्ञात हो केशव प्रसाद मौर्य जिस बिरादरी से आते हैं उसी बिरादरी से स्वामी प्रसाद मौर्य भी आते हैं, जोकि कभी  बहुजन समाज पार्टी के एक कदावर नेता की मुख्य भूमिका में रहा करते थे, जिसका कारण गैर यादव वोट बैंक का ध्रुवीकरण ही था| जिसके आधार पर स्वामी प्रसाद मौर्य का कद बहुजन समाज पार्टी में काफी बड़ा था, केशव प्रसाद मौर्य एवं स्वामी प्रसाद मौर्य के भारतीय जनता पार्टी के साथ जुड़ने से मायावती का बड़ा नुकसान हुआ, जिससे भारतीय जानता पार्टी एक मजबूत एवं जनाधारयुक्त पार्टी बनकर प्रदेश की धरती पर उभरी जिसने अभूतपूर्व विजय प्राप्त की।

अत: भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई जिसमें मुख्य रूप से क्षत्रिय समाज से मुख्य मंत्री की कुर्सी पर योगी आदित्यनाथ को विराजमान किया गया। तथा उप मुख्यमंत्री की कुर्सी पर गैर यादव बिरादरी से आये हुए नेता केशव प्रसाद मौर्य को विराजमान किया गया। तथा ब्राम्हण समाज से आये हुए दिनेश शर्मा को क्रमश: उप मुख्य मंत्री की कुर्सी पर विराजमान किया गया। अत: 2019 के चुनाव में दलितों पर भाजपा अपना ध्यान केन्द्रित करेगी| इसके संकेत स्पष्ट रूप से भारतीय जानता पार्टी के शीर्श नेताओं के द्वारा मिल रहे हैं, भीम ऐप एवं भीमराव अम्बेडकर पर भारतीय जानता पार्टी का मुख्य रूप से ध्यान है जो इस बात के साफ संकेत देता है कि अब भारतीय जानता पार्टी दलित वोट बैंक को अपने साथ सीधे-सीधे जोड़ना चाहती है। तो इस दिशा में कदम बढाने के लिए किसी दलित नेता को निश्चित एक बड़ा एवं श्रेष्ठ पद प्रदान करना होगा ताकि दलित वोट बैंक   बहुजन समाज पार्टी को छोड़ कर भारतीय जानता पार्टी के साथ जुड़ सके| तो निश्चित प्रदेश की अध्यक्ष कि कुर्सी पर आने वाले 2019 के लोक सभा चुनाव में किसी बड़े दलित नेता को जिम्मेदारी दी जा सकती है।

एम०एच० बाबू
mh.babu1986@gmail.com

माओवाद का समाधान है–आर्थिक समानता और कृषि व ग्रामीण विकास

छत्तीसगढ़ के सुकमा क्षेत्र में केन्द्रीय सुरक्षा बलों (सीआरपीएफ) पर योजनाबद्ध तरीके से किये गये हालिया हमले में जिस तरह लगभग तीन सौ माओवादियों ने तकरीबन दो सौ ग्रामीणों को आगे कर अकस्मात् हमला किया वह उनकी हर बार बदलती पैंतरेबाजी का एक नया नमूना है। जिस प्रकार माओवादी प्रहार और विस्तार में निरंतर वृद्धि कर अपने शक्तिशाली होते जाने का संदेश दे रहे हैं, वह और भी चिंता पैदा करता है। सुरक्षा मामलों के जानकार मानते हैं कि नक्सलियों के गढ़ में सेना की छावनी स्थापित करने से आतंकवाद पर अंकुश लगाया जा सकेगा और प्रभावित क्षेत्र में विकास कार्यों को गति मिलेगी। दूसरी तरफ योजनाकारों के लिए विचारणीय तथ्य यह होना चाहिए कि जब तक देश में आर्थिक समानता और कृषि व ग्रामीण विकास के द्वार नहीं खुलेंगे तब तक आंतरिक शांति और सीमाओं पर खतरा मंडराता रहेगा।

माओवादियों ने सुकमा क्षेत्र के इस हमले में एके-47, एके-56, एलएमजी. जैसे हथियारों का इस्तेमाल करते हुए ग्रामीणों की आड़ लेकर किये गये हमले में जिस रणनीतिक कौशल का परिचय दिया है, उससे पता चलता है कि क्षेत्र में उनकी जड़ें कितना गहरी हैं। उनकी सांगठनिक रचना और क्षेत्रीय जनता पर पकड़ से यह पता नहीं चलता कि कौन उनका हमदर्द व सहयोगी है और कौन विरोधी। वे घात लगा कर अचानक हमला करके गायब हो जाते हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के अलावा उनके समर्थक देश भर के महानगरों, विश्वविद्यालयों, समाचार माध्यमों, प्रशासन-तंत्र तथा अन्य महत्वपूर्ण जगहों पर मौजूद हैं जिनके बल पर ये देश के लगभग 620 जिलों के आधे से भी अधिक यानी कुल 230 में सक्रिय हैं। इससे सरकार के लिए चिंताजनक स्थिति उत्पन्न हो गई है।

सुरक्षा मामलों के जानकारों की मानें तो पुलिस और केसुब. को इलाके में नक्सलियों का डटकर मुकाबला करने और उनके विरुद्ध ऑपरेशन्स में अच्छी सफलता मिली है। इसीसे छटपटाये नक्सली अब बड़े हमले कर रहे हैं। देश के पूर्व गृह सचिव एलसी. गोयल के अनुसार नक्सलियों के गढ़ छत्तीसगढ़ में बस्तर जिले के अबूझमाड़ में सेना की छावनी स्थापित करना जरूरी हो गया है। उनका मानना है कि सेना का नक्सलियों के गढ़ में कोई सीधा रोल नहीं होगा, सिर्फ उसकी मौजूदगी ही नक्सलियों पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल की जाएगी। इससे क्षेत्र के विकास का रास्ता खुलेगा साथ ही सड़क व संचार की स्थिति भी सुधरेगी।

यह सोच गाड़ी को घोड़े के आगे लगाने वाली है, क्योंकि जब तक रोग के ठीक-ठीक कारण जानने की सही व ईमानदार कोशिश तथा उसके निवारण का प्रयास पूरी दृढ़ता से नहीं किया जायेगा, तब तक अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के 16 राज्यों में पिछले अनेक दशकों से माओवादी सक्रिय हैं। इन राज्यों में इनकी सक्रियता के कमोवेश एक जैसे ही कारण हैं। देशभर में सत्ता प्रतिष्ठान पर कब्जा जमाये राजनीतिबाज नेताओं, नौकरशाहों, नवधनाढ्यों और उनके पालतू किस्म के मुट्ठी भर लोगों ने एक ओर यहाँ के जल, जंगल, जमीन तथा अन्य प्राकृतिक सम्पदा का स्वयं को मालिक समझ कर भारी लूट मचा रखी है और दूसरी तरफ देश का बहुसंख्यक ग्रामीण, गिरिवासी तथा आदिवासी समाज घोर दरिद्रता झेलते हुए न मर सकने की मजबूरी में किसी तरह जी रहा है। एक ताजा घटनाक्रम के अनुसार झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन तथा अन्य प्रभावशाली लोगों द्वारा धनबाद व छोटा नागपुर में जनजातीय आदिवासियों की जमीन गैर-कानूनी तरीके से हथियाने के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए चिंता व्यक्त की है कि ऐसे चलन के कारण ही उन इलाकों में नक्सलवादी पनप रहे हैं।

इस प्रकार एक ओर सत्ता के दलालों से सांठ-गांठ कर गरीबों का खून चूसने और देश के प्राकृतिक व मानव संसाधनों को वैध-अवैध तरीकों द्वारा लूटी गई दौलत के अंबारों का नग्न प्रदर्शन है तो दूसरी ओर एक जून की भरपेट रोटी और तन ढकने को मामूली कपड़े तक नसीब नहीं। उस पर भी असरदार लोगों के शोषण, अन्याय तथा उत्पीड़न की कहीं कोई सुनवाई नहीं। ऊपर से क्षेत्र में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, विद्युत, संचार, सिंचाई आदि सुविधाओं का अकाल कोढ़ में खाज बन कर बेहद पीड़ाजनक हो जाता है। व्यवस्था जनित इस अभाव के विरुद्ध निराशा व आक्रोश का मुखर होना स्वाभाविक है जिसकी अभिव्यक्ति लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ प्रैस तथा समय-समय पर मतदान के माध्यम से की जा सकती है लेकिन इधर एक-दो दशकों से देश के मीडिया पर कॉरपोरेट घरानों ने कब्जा कर घोर व्यावसायिक दृष्टिकोण अपनाते हुए इसे अपनी तिजौरियां भरने का साधन बना लिया है, उससे रही-सही आशा पर तुषारापात हुआ है। देश में आजादी के बाद से ही एक ओर निरंतर अमीर को और भी धनवान तथा गरीब को अत्यधिक निर्धन बनाने का जो सिलसिला शुरू हुआ था उसमें और देश के प्राकृतिक संसाधनों की लूट, बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक घोटालों, अपराधों, राजनीतिक अस्थिरता, सुविधाओं का शहरों में केन्द्रीकरण व गाँवों में अभाव, कृषि क्षेत्र की उपेक्षा, अंधाधुंध औद्योगीकरण व शहरीकरण से जीवन में आपाधापी आदि नकारात्मक क्रिया-कलापों में विगत दो-तीन दशकों में बहुत तीव्रता आई। जबकि दूसरी ओर राष्ट्रीयता की जिस भावना ने देश को आजादी दिलाई वह निरंतर कमजोर हुई। परंपराओं, सांस्कृतिक-सामाजिक मूल्यों की उपेक्षा और पश्चिम के अंधानुकरण ने भी भारत व भारतीयता को बेहद कमजोर किया। कुल मिलाकर आज यह देश ‘इंडिया’ और ‘भारत’ दो परस्पर बहुत दूर स्थित ध्रुवों पर खड़ा है। इनके बीच दिन-प्रतिदिन गहराता फासला ही उपेक्षित-पीड़ित समाज को ‘सत्ता बन्दूक की नली से आती है’ वाली माओवादी-नक्सलवादी सोच की ओर मोड़ने वाला मुख्य आधार है।

समस्या का एक बड़ा कारण पड़ौसी मुल्क चीन की विस्तारवादी नीति भी है, जिसने भारत की पूरे 360 डिग्री में स्ट्रैटेजिक घेरेबंदी कर रखी है। तिब्बत पर कब्जा करना उसकी इसी नीति का हिस्सा था। उस ऐतिहासिक घटना के इन 56 वर्षों के भीतर वह लगातार कूटनीतिक, आर्थिक, सामरिक हर दृष्टिकोण से भारत को कमजोर करने में न केवल लगातार जुटा रहा, बल्कि एक तरह से वह इस पर दिन-प्रतिदिन अपना शिकंजा मजबूत करता रहा। चीनी नेता माओ त्से तुंग और रूसी तानाशाह स्टालिन की विचारधारा से प्रभावित कुछ व्यक्तियों द्वारा पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के एक छोटे से गांव नक्सलवाड़ी से मार्च, 1967 में शुरू किए गये सत्ता के विरुद्ध इस सशस्त्र विद्रोह को आज पचास साल पूरा हो गए हैं। इस अवधि में यह देश के 16 राज्यों में अपनी जड़ें मजबूती से जमाने में कामयाब हो गया है और धीरे-धीरे फैलता जा रहा है। समझा जाता है कि देश को अस्थिर करने के लिए इन राज्यों को परस्पर ‘लाल गलियारे’ के रूप में जोड़ने वाले इस संगठन को किसी हद तक चीन का समर्थन हासिल है। यही वे मुख्य कारण हैं जिन्होंने देश में माओवाद-नक्सलवाद के पनपने की पृष्ठभूमि तैयार करने में मदद की है।

एक ओर लोकतंत्र को लूट-तंत्र में बदल कर अनुचित तरीकों से पैदा की गई बेशुमार दौलत के अंबारों की निर्लज्ज व दंभपूर्ण नुमाइश और दूसरी तरफ इस व्यवस्था के लुटेरे अलंबरदारों द्वारा बहुसंख्यक समाज पर धूर्ततापूर्वक थोपी गई गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, लाचारी, बीमारी, अशिक्षा आदि अनगिनत कमजोरियों से भरे विरोधाभास ही लोगों में व्यवस्था और प्रभुसत्ता सम्पन्न वर्ग के प्रति आक्रोश तथा घृणा उपजने का एक मुख्य और स्वाभाविक कारक हैं। माओवादियों और उनके समर्थकों का मानना है कि इसी प्रभुता सम्पन्न वर्ग ने देश के बहुसंख्यक समाज के विरुद्ध छल और षड्यंत्रपूर्वक प्रपंच रच कर गरीबी और साधनहीनता थोप दी है और देश के बहुसंख्यक समाज को यह सब भोगने को विवश कर दिया है।

दरअसल, यह एक बहुत कड़वी सच्चाई है कि देश के सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज कुछ लोगों तथा उनके शागिर्दों ने देश के तमाम संसाधनों पर अनैतिक रूप से न केवल कब्जा जमा लिया है, बल्कि वे ही इनके मालिक बन बैठे हैं। इससे देश में एक खास वर्ग के पास अकूत दौलत के ढेर लग गये हैं तो दूसरी ओर लोग भूख से बिलबिलाते हुए अकाल मौत के शिकार हो रहे हैं। सामाजिक विषमताओं के इस विद्रूप ने ही माओवादी विचारधारा को जन्म दिया और शोषित-वंचित वर्ग इसे अपनी बची-खुची ऊर्जा का खाद-पानी देकर पुष्ट कर रहा है। हालांकि माओवादी विचारधारा एक सशस्त्र राजनीतिक आन्दोलन के रूप में देश भर में लगातार फैल रही है और अन्याय तथा शोषण के प्रतिकार का उसका अपना तरीका है।

यदि इसी तरह व्यवस्था से पीड़ित और असंतुष्ट नवयुवकों का रुझान माओवाद की तरफ बढ़ता है तो देश की आंतरिक शांति और व्यवस्था को जर्बदस्त खतरा पैदा होने का अंदेशा है; लेकिन इस खतरे से निबटने के लिए वर्ग-संघर्ष को कम करने की अपेक्षा पुलिसिया हथकण्डे अपनाना या क्षेत्र में सैनिक छावनी स्थापित कर देना किसी भी तरह उचित नहीं होगा। देश में माओवाद का प्रसार पुलिस के दमन से नहीं, बल्कि लोगों की सहभागिता से उनकी समस्याओं का समयोचित समाधान तथा आर्थिक समानता और देश के बहुसंख्यक ग्रामीण व कृषि आधारित समाज की बेहतरी से रोका जा सकता है। इसके अलावा पूँजीपतियों द्वारा सत्ताधारियों तथा नौकरशाही से सांठ-गांठ कर देश में लूट-खसोट का जो आर्थिक आतंक मचाया हुआ है, उसे नियंत्रित कर बहुत तेजी से बढ़ती अमीर व गरीब के बीच की खाई को कम करना जरूरी है। यदि सरकार इस समस्या को कानून और व्यवस्था का मामला समझने की भूल करती है तो निश्चित तौर पर यह कम होने की अपेक्षा दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जायेगी। जबकि इसकी जड़ें व्यवस्था से उपजी निराशा व आक्रोश में हैं और इसका समाधान भी राजनैतिक-सामाजिक तौर-तरीकों से ही सम्भव हो सकता है।

लेखक श्यामसिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं.

देश और प्रदेश में भाजपा की सरकार है और कश्मीर की आग बेकाबू है

कश्मीर में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर नहीं लगता कि आग जल्दी बुझेगी। राजनीतिक नेतृत्व की नाकामियों के बीच, सेना के भरोसे बैठे देश से आखिर आप क्या उम्मीद पाल सकते हैं? भारत के साथ रहने की ‘कीमत’ कश्मीर घाटी के नेताओं को चाहिए और मिल भी रही है, पर क्या वे पत्थर उठाए हाथों पर नैतिक नियंत्रण रखते हैं यह एक बड़ा सवाल है। भारतीय सुरक्षाबलों के बंदूक थामे हाथ सहमे से खड़े हैं और पत्थरबाज ज्यादा ताकतवर दिखने लगे हैं।

यह वक्त ही है कि कश्मीर को ठीक कर देने और इतिहास की गलतियों के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराने वाले आज सत्ता में हैं। प्रदेश और देश में भाजपा की सरकार है, पर हालात बेकाबू हैं। समय का चक्र घूम चुका है। “जहां हुए बलिदान मुखर्जी वह कश्मीर हमारा है” का नारा लगाती भाजपा देश की केंद्रीय सत्ता में काबिज हो चुकी है। प्रदेश में भी वह लगभग बराबर की पार्टनर है। लेकिन कांग्रेस कहां है? इतिहास की इस करवट में कांग्रेस की प्रतिक्रियाएं भी नदारद हैं। फारूख अब्दुल्ला को ये पत्थरबाज देशभक्त दिख रहे हैं। आखिर इस देश की राजनीति इतनी बेबस और लाचार क्यों है। क्यों हम साफ्ट स्टेट का तमगा लगाए अपने सीने को छलनी होने दे रहे हैं। कश्मीर में भारत के विलय को ना मानने वाली ताकतें, भारतीय संविधान और देश की अस्मिता को निरंतर चुनौती दे रही हैं और हम इन घटनाओं को सामान्य घटनाएं मानकर चुप हैं। जम्मू, लद्दाख, लेह के लोगों की राष्ट्रनिष्ठा पर, घाटी के चंद पाकिस्तानपरस्तों की आवाज ऊंची और भारी है। भारतीय मीडिया भी उन्हीं की सुन रहा है, जिनके हाथों में पत्थर है। उसे लेह-लद्दाख और जम्मू के दर्द की खबर नहीं है।

अपनी जिंदगी को जोखिम में डालकर देश के लिए पग-पग पर खड़े जवान ही पत्थरबाजों का निशाना हैं। ये पत्थरबाज तब कहां गायब हो जाते हैं, जब आपदाएं आती हैं, बाढ़ आती है। भारतीय सेना की उदारता और उसके धीरज को चुनौती देते ये युवा गुमराह हैं या एक बड़ी साजिश के उत्पाद, कहना कठिन है। दरअसल हम कश्मीर में सिर्फ आजादी के दीवानों से मुकाबिल नहीं हैं बल्कि हमारी जंग उस वैश्विक इस्लामी आतंकवाद से भी जिसकी शिकार आज पूरी दुनिया है। हमें कहते हुए दर्द होता है पर यह स्वीकारना पड़ेगा कि कश्मीर के इस्लामीकरण के चलते यह संकट गहरा हुआ है। यह जंग सिर्फ कश्मीर के युवाओं की बेरोजगारी, उनकी शिक्षा को लेकर नहीं है-यह लड़ाई उस भारतीय राज्य और उसकी हिंदू आबादी से भी है। अगर ऐसा नहीं होता कि कश्मीरी पंडित निशाने पर नहीं होते। उन्हें घाटी छोड़ने के लिए विवश करना किस कश्मीरियत की जंग थी? क्या वे किसी कश्मीरी मुसलमान से कश्मीरी थे? लेकिन उनकी पूजा-पद्धति अलग थी? वे कश्मीर को एक इस्लामी राज्य बनने के लिए बड़ी बाधा थे। इसलिए इलाके का पिछड़ापन, बेरोजगारी, शिक्षा जैसे सवालों से अलग भी एक बहस है जो निष्कर्ष पर पहुंचनी चाहिए।

क्या संख्या में कम होने पर किसी अलग समाज को किसी खास इलाके में रहने का हक नहीं होना चाहिए? दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में मानवाधिकारों और बराबरी के हक की बात करने वाले इस्लाम मतावलंबियों को यह सोचना होगा कि उनके इस्लामी राज में किसी अन्य विचार के लिए कितनी जगह है? कश्मीर इस बात का उदाहरण है कि कैसे अन्य मतावलंबियों को वहां से साजिशन बाहर किया गया। यह देश की धर्मनिरपेक्षता, उसके सामाजिक ताने-बाने को तार-तार करने की साजिश है। कश्मीर का भारत के साथ होना दरअसल द्विराष्ट्रवाद की थ्यौरी को गलत साबित करता है। अगर हिंदुस्तान के मुसलमान पहले भारतीय हैं, तो उन्हें हर कीमत पर इस जंग में भारतीय पक्ष में दिखना होगा। हिंदुस्तानी मुसलमान इस बात को जानते हैं कि एक नयी और बेहतर दुनिया के सपने के साथ बना पाकिस्तान आज कहां खड़ा है। वहां के नागरिकों की जिंदगी किस तरह हिंदुस्तानियों से अलग है। जाहिर तौर पर हमें पाकिस्तान की विफलता से सीखना है। हमें एक ऐसा हिंदुस्तान बनाना है, जहां उसका संविधान सर्वोच्च और बाकी पहचानें उसके बाद होगीं। एक पांथिक राज्य में होना दरअसल मनुष्यता के तल से बहुत नीचे गिर जाना है।

कश्मीर को एक पांथिक राज में बदलने में लगी ताकतों का संघर्ष दरअसल मानवता से भी है। यह जंग मानवता और पंथ-राज्य के बीच है। भारत के साथ होना दरअसल एक वैश्विक मानवीय परंपरा के साथ होना है। उस विचार के साथ होना है जो मनुष्य-मनुष्य में भेद नहीं करती, भले उसकी पूजा-पद्धति कुछ भी हो। कश्मीर का दर्द दरअसल मानवता का भी दर्द है, लाखों विस्थापितों का दर्द है, जलावतन कश्मीरी पंडितों का दर्द है। कश्मीर की घरती पर रोज गिरता खून आचार्य अभिनव गुप्त और शैव आचार्यों की माटी को रोज प्रश्नों से घेरता है। सूफी विद्वानों की यह माटी आज अपने दर्द से बेजार है। दुनिया को रास्ता दिखाने वाले विद्वानों की धरती पर मचा कत्लेआम दरअसल एक सवाल की तरह सामने है। आजादी के सत्तर साल बाद भी हम एक नादान पड़ोसी की हरकतों के चलते अपने नौजवानों को रोज खो रहे हैं। दर्द बड़ा और पुराना हो चुका है। इस दर्द की दवा भी वक्त करेगा। किंतु राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना यह कब तक हो पाएगा, कहना कठिन है।

लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्लेषक हैं. संपर्क : मोबाइलः 09893598888

योगी के सामने नतमस्तक

अजय कुमार, लखनऊ
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार तेजी से फैसले ले रही है। उम्मीद है कि जल्द इसका प्रभाव देखने को मिलेगा। बात आज तक की कि जाये तो फिलहाल  कानून व्व्यवस्था को छोड़कर अन्य फैसलों का अभी जमीन स्तर पर कोई खास असर नहीं दिखाई पड़ रहा है और यह उम्मीद भी नहीं की जा सकती है,इतनी जल्दी किसी सरकार के फैसले जमीन पर उतर सकते है, लेकिन जनता में योगी सरकार को लेकर विश्वास है। यह बड़ी वजह है। गलत काम करने वालों के हौसले पस्त पड़ रहे हैं। सरकारी धन की लूट पर शिकंजा कसा जा रहा है तो समाज में व्याप्त भेदभाव और भय के माहौल को कम करने के लिये भी योगी सरकार प्रयत्नशील है।

योगी सरकार सीधे जनता से जुड़े मसलों स्वास्थ्य सेवाओं, बिजली-पानी, शिक्षा सुधार,सड़क आदि पर विशेष ध्यान दे रही है। महिलाओं की सुरक्षा पर भी योगी सरकार सजग है। प्रदेश में ऐसे लोंगो की संख्या लगातार बढ़ रही है जिनका मानना है कि योगी सरकार बिना भेदभाव के काम कर रही है। अपराधियों को सरकारी संरक्षण मिलना बंद हो गया है। धर्म की आड़ में अधर्म के खेल  पर भी योगी सरकार सख्त रूख अपनाये हुए है।  सरकारी योजनाओं का बंदरबांट करके भ्रष्टाचार का खेल खत्म भले नहीं हुआ हो अंकुश तो लगा ही है। परंतु सबसे बड़ी समस्या है नौकरशाही को हैंडिल करना। अभी तक यूपी की नौकरशाही नई सरकार के साथ तालमेंल नहीं बैठा पाई है। वह पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार के तौर-तरीकों पर ही चल रही है।

सीएम योगी के बार-बार कहने के बावजूद तमाम नौकरशाहों ने अपनी सम्पति का ब्योरा शासन को उपलब्ध नहीं कराया है। वैसे,सम्पति की घोषणा के मामले में योगी के नौकरशाह ही नहीं मंत्री भी टाल-मटोल का रास्ता अपना रहे हैं। बात नौकरशाहों की हठधर्मी की कि जाये तो ऐसा स्वभाविक भी है क्योंकि तमाम महत्वपूर्ण पदों पर अभी भी सपा के वफादार ही विराजमान हैं। हालांकि कुछ आईएएस/पीसीएस अधिकारियों को इधर से उधर किया जरूर गया है,मगर इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है। हॉ, जो बदलाव किया जा रहा है उससे यह संकेत जरूर मिलते हैं कि योगी राज में ईमानदार अफसरों की पूछ बढ़ रही है। डीजीपी के पद पर सुलखान सिंह की नियुक्ति इसकी बानगी है।

सिक्के के दूसरे पहलू पर नजर दौड़ाई जाये तो नौकरशाही की लगाम अभी तक भले ही सीएम पूरी तरह से कस नहीं पाये हों, लेकिन उनके मंत्रिमंडल के सदस्य प्रदेश की तस्वीर बदलने  के लिये लगातार प्रयासरत है। हो सकता है कहीं-कहीं पर अनुभव की कमी आड़े आ रही हो,परंतु किसी मंत्री की नियत में खोट नजर नहीं आती है। मंत्री तो ठीकठाक महत्व कर रहे हैं,लेकिन बदलाव दिखे इसके लिये सीएम योगी को थानों से लेकर ऊपर तक के अधिकारियों का चाल-चरित्र और चेहरा बदलना होगा। पूरा सिस्टम सुधारना होगा। अधिकारियों/कर्मचारियों का मात्र तबादल करके हालात बदलने वाले नहीं है। इन लोंगो का जमीर जगाना होगा और इन पर इतना सख्त पहरा बैठाना होगा जिससे कोई गलत काम हो ही नहीं सके। शायद यह बात सीएम योगी समझते भी हैं,इसी लिये वह तबादलों पर ज्यादा जोर नहीं दे रहे हैं, जो अधिकारी एक जगह ठीक से काम नहीं कर रहा है,वह दूसरी जगह कैसे ठीक से काम कर सकता है।

बहरहाल, योगी सरकार ने पहले पंचम तल पर थोडा-बहुत बदलाव किया और उसके बाद पुलिस महानिदेशक की कुर्सी पर सुलखान सिंह  ताजपोशी करके यह संकेत जरूर दे दिये हैं कि योगी सरकार की सुधार की प्रकिृया ऊपर से ही शुरू करनी पड़ेगी। अगर ऊपर बैठा अधिकारी सही होगा तो नीचे के स्टाफ को सुधारने में ज्यादा मेहनत नहीं करना पड़ेगी। सीएम योगी सरकार की छवि को लेकर काफी सजग हैं तो पिछली सरकार की खामियां भी उजागर करने में गुरेज नहीं कर रहे हैं। अभी तक अखिलेश सरकार की करीब डेढ़ दर्जन योजनाओं पर वह जांच बैठा चुके हैं। अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट लखनऊ का गोमती रिवर फ्रंट घोटाला, आगरा एक्सप्रेस वे के लिये भूमि अधिग्रहण के नाम पर किया गया सपाइयों का कारनामा।

समाजवादी चिंतक स्वर्गीय जनेश्वर मिश्र के नाम पर बने पार्क में घोटाला, पुराने लखनऊ में इमामबाड़े के आसपास सौर्न्द्रीयकरण पर घोटाला, सपा एमएलसी बुक्कल नबाब को नजूल की जमीन का मालिक बताकर उन्हें करोड़ों का मुआवजा देना, पिछले पांच वर्षो में तमाम जमीनों का भू-उपयोग परिवर्तन किये जाने की जांच, नियमों की धज्जियां उड़ाकर यश भारती अवार्ड बांटना। वक्फ बोर्ड की सम्पत्ति पर अवैध कब्जे और अनाप-शनाप तरीके से बेचे जाने की जांच, लखनऊ में साईकिल ट्रैक बनाने के नाम पर और कई जिलों में खनन घोटाला जिसकी चर्चा चुनाव के समय भी हुई  थी। इसके अलावा 29 विकास प्रधिकरण की सीएनजी से जांच दायरे में ग्रेटर नोएडा, लखनऊ बनारस, आदि के प्राधिकरण भी निशाने पर हैं। बंुदेलखंड की 721 करोड़ की एरच बांध परियोजना की  जांच के लिये भी कमेटी गाठित कर दी गई है। भू-माफियाओं से सरकारी जमीन कब्जा मुक्त कराने के लिये एक टास्क फोर्स का गठन किया गया है। देखना यह है कि इन जांचो का निचोड़ क्या निकलता है। क्योंकि पूर्व भी ऐसी तमाम जांचे ठंड बस्ते में चले जाने की परम्परा रही है।

एक तरफ योगी अखिलेश सरकार के कारनामों की जांच करा रहे हैं तो दूसरी तरफ वह अपने एजेंडे पर भी आगे बढ़ रहे हैं। चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अखिलेश सरकार पर हमलावार होते हुए अवैध बूचड़खानों, महिलाओं की अस्मिता से खिलवाड़, अवैध खनन, प्रदेश में व्याप्त गुंडागर्दी को अहम मुद्दा बनाया था,इस तरह के तमाम मोर्चे पर योगी सरकार काफी मशक्कत के साथ काम कर रही है। फिलहाल, जो माहौल बना हुए है,उससे तो यह ही लगता है कि योगी अपने कड़क मिजाज के अनुसार ही कड़क फैसले ले रहे हैं और उनके सामने सब नतमस्तक नजर आ रहे हैं।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

ई.वी.एम. पर आक्षेप : कितना सही?

एक पुरानी कहावत है – ‘नाच न आवै आँगन टेढ़ा’। इसका सीधा सा अर्थ है — अपनी त्रुटि अथवा अक्षमता के लिए अन्य को दोषी ठहराना । यह बड़ी सहज मानव प्रवृत्ति भी है कि मनुष्य स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने और आरोप मुक्त बनाने के लिए अपनी गलतियाँ दूसरों के सिर पर मढ़ देता है। विगत कुछ महीनों में आए चुनाव परिणामों के अनन्तर ई.वी.एम. पर किया गया आक्षेप भी ऐसी ही मानवीय निम्नवृत्ति का परिचायक है। रोचक यह है कि हारे हुए लोग एक स्वर से ई.वी.एम. को दोषी ठहराने लगे हैं जबकि विजयी पक्ष दलीय भेदभाव त्यागकर ई.वी.एम. से चुनाव की निष्पक्षता का समर्थन कर रहें हैं। इस संदर्भ में उ.प्र. और पंजाब के चुनावों में विजयी नेता एकमत हैं , जबकि पराजित दलों के नेता परस्पर सर्मथन करते हुए अपनी पराजय का ठीकरा ई.वी.एम के माथे पर फोड़ रहे हैं।

ई.वी.एम. से प्राप्त चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता पर बहुत पहले भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने संदेह प्रकट किया था। उल्लेखनीय है कि उस समय उनकी पार्टी चुनाव हारी थी। वही संदेह अब पूरे दमखम से पराजित पार्टियाँ व्यक्त कर रही हैं और वैलेट पेपर से मतदान कराने की पुरानी प्रक्रिया बहाल करने की अनावश्यक माँग कर रही हैं।  यह रेखांकनीय है कि जब इसी ई.वी.एम. से बिहार का चुनाव जीतकर राजद ने सरकार बनायी तब इसकी प्रामाणिकता पर संदेह नहीं किया गया। भारी बहुमत से दिल्ली में विजयी होने पर ‘आप’ के नेताओं ने ई.वी.एम. में गड़वड़ी की बात नहीं की। इसी ई.वी.एम. ने सपा, बसपा, और कांग्रेस की सरकारें बनवाईं और तब इसे ठीक माना जाता रहा किन्तु उत्तरप्रदेश में हुई करारी हार और अब दिल्ली नगर निगम में मिली पराजय से बौखलाए नेता अपनी गलत बयानवाजी, अनाप-शनाप व्यय और मनमानियों पर आत्मनिरीक्षण करने के बजाय ई.वी.एम. को दोष दे रहे हैं। यह अनुत्तरदायित्वपूर्ण बयानवाजी है; जिम्मेदार लोगों के गैर जिम्मेदाराना बयान हैं।

यह नहीं कहा जा सकता कि बैलेट पेपर पर होने वाले चुनाव सर्वथा निष्पक्ष और ईमानदारी भरे ही होते हैं। बाहुबली उस समय भी मतपत्रों, मतपेटियों को लूटकर मतदान दलों को धमकाकर, मतदान केद्रों पर बलात कब्जा करके चुनावों को दूषित करते थे। चुनाव आयोग और प्रशासन हर संभव प्रयत्न कर ऐसे अपराधी-तत्त्वों को नियंत्रित करता था; चुनाव प्रक्रिया दूषित पायी जाने पर पुनर्मतदान होता था। आज भी चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े लोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए हर संभव प्रयत्न करते हैं तथापि यदि कहीं चूक होती है तो उसे सुधारने और दोषियों को दण्डित करने के लिए पर्याप्त प्रावधान चुनाव प्रक्रिया में उपलब्ध हैं। अतः हारने पर चुनाव-प्रक्रिया अथवा ई.वी.एम. पर दोषारोपण निरर्थक है।

ई.वी.एम. एक यन्त्र है। यन्त्रों में गड़बड़ी नहीं होती या नहीं की जा सकती; उन्हें अपने मनोनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए परिवर्तित नहीं किया जा सकता यह कहना गलत होगा। यह सब कुछ संभव है किन्तु हमारी चुनाव प्रक्रिया में किए गए प्रावधान ऐसी किसी भी गड़बड़ी को रोकने में पर्याप्त समर्थ हैं। व्यवस्था इस प्रकार सुनिश्चित की गई है कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े लोग चाहकर भी ई.वी.एम. व्यवस्था में गड़बड़ी नहीं कर सकते। वैलेट पेपर के मतदान में मतदान दल दबाब, लोभ अथवा अन्य किन्हीं कारणों से गड़बड़ी कर सकता है जबकि ई.वी.एम. में यह संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में वैलेट पेपर से चुनाव कराए जाने की माँग ,माँग करने वालों की नीयत पर ही संदेह उत्पन्न करती है।

ई.वी.एम. से मतदान की एक सुनिश्चित प्रक्रिया है। चुनाव से पूर्व ई.वी.एम. जिला मुख्यालय पर लायी जाती हैं जहाँ प्रत्येक मशीन की जाँचकर उसके सही पाये जाने पर उसमें चिन्हांकित मतपत्र लगाकर सील कर दिया जाता है। सील करने वाला दल यह नहीं जानता कि यह मशीन किस मतदान केन्द्र के लिए तैयार की गई है। मतदान से एक या दो दिन पूर्व ई.वी.एम. सम्बंधित मतदान दल के पीठासीन अधिकारी को आवश्यक सीलबंद स्थिति में मिलती है। वह उसका परीक्षण करता है। यदि त्रुटिपूर्ण हो तो वहीं उसे वापस करके दूसरी ई.वी.एम. प्राप्त करता है। यहाँ तक ई.वी.एम. की सही स्थिति का निर्धारण चुनाव प्रक्रिया में संलग्न अधिकारियों कर्मचारियों तक सीमित रहता है किन्तु मतदान वाले दिन मतदान प्रारंभ होने से पूर्व ई.वी.एम. की सही स्थिति सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के उपस्थित अभिकत्र्ताओं के समक्ष उनसे बनावटी मतदान (माकपोल) कराते हुए उनके मतों की गणना करके ई.वी.एम. के सही पाये जाने पर उनके समक्ष ई.वी.एम. में आवश्यक सीलें लगायी जाती हैं और यदि वे चाहें तो पेपर सीलों पर अपने हस्ताक्षर भी करते हैं।

मतदान समाप्ति पर भी यही अभिकत्र्ता ई.वी.एम. अपने सामने सील कराते हैं। मतगणना के दिन संबंधित अभिकत्र्ता पुनः अपनी सीलों का निरीक्षण करते हैं। उनके सामने ही गणनाकार्य सम्पन्न होता है। सम्पूर्ण प्रक्रिया पारदर्शितापूर्ण और सुव्यवस्थित हैं जिसमें हेरफेर की गुंजाइश नहीं है। तथ्य यह भी है कि ई.वी.एम. की कार्यवाही में नेताओं के प्रतिनिधि अभिकत्र्ता भी स्वयं उपस्थित रहकर प्रक्रिया सम्पन्न कराते हैं फिर चुनावों में प्रयुक्त किसी ई.वी.एम. का दोषपूर्ण होना कैसे संभव है ?

ई.वी.एम. पर दोषारोपण करने वाले नेताओं की बयानवाजी सुनकर लगता है कि या तो इन्हें ई.वी.एम. की प्रक्रिया के सम्बंध में पूर्ण जानकारी ही नहीं है अथवा वे जानबूझकर गलत बयानवाजी कर रहे हैं। उन्हें ई.वी.एम. पर और मतदान से जुड़े अधिकारियों-कर्मचारियों की विश्वसनीयता पर संदेह हो सकता है किन्तु अपने अभिकत्र्ताओं, जिनकी उपस्थिति में ई.वी.एम. प्रयुक्त होती हैं, पर तो भरोसा होना चाहिए। प्रश्न यह है कि जब किसी मतदान केन्द्र के किसी नेता या उसके अभिकत्र्ता ने चुनाव के दिन ई.वी.एम. के त्रुटिपूर्ण होने की शिकायत दर्ज नहीं करायी तो चुनाव परिणाम घोषित होने के पश्चात ई.वी.एम. अचानक कैसे अविश्वसनीय हो गयी ? जब तक अपनी जीत की आशा शेष थी तब तक ई.वी.एम. भी ठीक थी और जैसे ही अपनी हार सामने आयी वैसे ही ई.वी.एम. की विश्वसनीयता संदिग्ध हो गयी ? देश के कर्णधारों का यह कैसा आचरण है ? ऐसी सत्तालोलुप अपरिपक्व मानसिकता का प्रदर्शन निश्चय ही लज्जास्पद है।   

जनता को लुभाने और बहकाने के लिए आरोप प्रत्यारोप की भ्रामक राजनीति छोड़कर हमारे नेता मर्यादा, संयम, शील और मितव्ययिता के आदर्श प्रस्तुत करके ही आगामी चुनावों में विजयी हो सकते हैं। अन्ना के आन्दोलन में ईमानदारी और भ्रष्टाचार के विरोध का नारा उछालकर सत्ता में आया जा सकता है लेकिन मनमाने ढंग से सोलह हजार की थाली में भोजन करते हुए जनता की गाढ़ी कमाई को बरवाद करके सत्ता में देर तक टिक पाना अब संभव नहीं है। काठ की हाँडियाँ बार-बार नहीं चढ़तीं, चाहें वे किसी भी दल की क्यों न हों। राजनेताओं की मनमानियाँ और विलासिताएँ बहुत परवान चढ़ चुकी हैं अब देश सेवा और संयम की राजनीति का स्वागत करने को आतुर है। हमें ‘नेहरू’ नहीं ‘शास्त्री’ चाहिए।
         
डा. कृष्णगोपाल मिश्र
सहायक-प्राध्यापक (हिन्दी)                              
उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान,
भोपाल
म.प्र.

पत्थरबाजों का उपचार पत्थर से ही संभव

कश्मीर के अलगाववादी संगठनों से प्रेरित और पाकिस्तानी कूटनीतिओं की अमानवीय षडयंत्रकारी मानसिकता से पोषित पत्थरबाजों के विरुद्ध आदिवासी युवाओं की आवाज राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण संदेश है। राष्ट्रीय आपदा के समय राष्ट्र की अस्मिता और गौरव की रक्षा के लिए ; अपने देशवासियों के लिए हम क्या कर सकते हैं ; प्रगति और विकास के इन सोपानों में हमारी रचनात्मक और रक्षात्मक भूमिका क्या हो सकती है, इसका उत्कृष्ट उदाहरण देकर आदिवासी जनसामान्य ने देश के उन बड़े कर्णधारों को आईना दिखाया है जो मानवाधिकारों के नाम पर कश्मीर की आतंकवादी और अलगाववादी शक्तियों के साथ खड़े हैं; उनके पक्ष में बयानवाजी करते हैं।

कश्मीर में आतंक और अलगाव की जो आग फैली है उसके मूल में पूर्व की भारतीय सरकारों की उदारवादी नीतियाँ ही हैं। हमंे विचार करना चाहिए कि कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देकर , धारा 370 के माध्यम से उन्हें अतिरिक्त सुविधाएं देकर, पिछले सत्तर वर्षों में देश की अपार धनराशि कश्मीरी अवाम पर व्यय करने के बाद भी हम उनके एक बड़े वर्ग की पाकिस्तानपरस्त मानसिकता को बदल नहीं पाए। अनेक  अलगाववादी शक्तियाँ नेशनल कान्फ्रेंस की छाया तले भारत विरोधी गतिविधियों को निरंतर संचालित करती रहीं। उन्होंने भारत को दुधारु गाय की तरह दुहा लेकिन कभी उसे अपना नहीं माना। खून हमारा चूसा और बफादारी पाक्स्तिान से निबाही। हमारी सरकारें मूक दर्शक बनी देखती रह गई और कश्मीर में पाकिस्तान परस्त भारत विरोधी गतिविधियाँ बढ़ती गई।

कश्मीर से हिन्दुओं को अमानुषिक यंत्रणाएं देकर पलायन के लिए विवश करना भारत विरोधी ताकतों की  अलगाववादी रणनीति का हिस्सा था और अब कश्मीर से सैनिक नियंत्रण को हटाने के लिए की जा रही पत्थरबाजी भी ऐसा ही कूट प्रयत्न है। यह चिंताजनक है कि अलगाववादियों की भारत  विरोधी गतिविधियों पर कश्मीर से भारत के पक्ष में स्वर क्यों नहीं उभरते ? कश्मीरी पंडितों के पलायन को रोकने का कोई सार्थक प्रयत्न कश्मीरी अवाम और वहाँ के नेताओं ने क्यों नहीं किया ? कश्मीर में बाढ़ आने पर अथवा अन्य संकट उपस्थित होने पर भारतीय सैनिक जान हथेली पर रखकर पूरे मनोयोग से उनकी सहायता करते हैं; उन्हें सुरक्षा देते हैं‘ लेकिन जब उन्हीं सैनिकों पर पत्थर फेके जाते हैं तब कश्मीरी अवाम अपने तथाकथित भटके नौजवानों को सैनिकों पर पत्थर फेंकने से क्यों नहीं रोकता ? रोकना तो दूर रोकने की बात तक नहीं की जाती। उल्टे फारूक अब्दुल्ला जैसे नेता सत्ता पाने के लिए पत्थरबाजों का समर्थन करते दिखाई देते हैं। यह क्यों न समझा जाये कि ऐसे लोगों की सहानुभूति और मौन स्वीकृति अपने पत्थरबाजों के साथ ही है ? इस स्थिति में उन्हें अतिरिक्त सुविधायें और संरक्षण दिये जाने का क्या अर्थ है ?

राजनेताओं और कश्मीरी पत्थरबाजों की पैरवी करने वाले हमारे मानवाधिकारवादियों को यह भी विचार करना चाहिए कि क्या सेना में भर्ती होने पर सैनिक के मानवाधिकार समाप्त हो जाते हैं ? क्या सैनिकों को अपनी सुरक्षा करने और अपने ऊपर आक्रमण करने वालों के विरूद्ध शस्त्र प्रयोग का अधिकार नहीं होना चाहिए? आश्चर्य होता है कि पत्थरबाजों को रोकने – समझाने के लिए मानवाधिकारवादियों का भी कोई बयान सामने नहीं आता जबकि पत्थरबाजों के विरूद्ध होने वाले सैन्य-प्रयत्नों पर नए-नए सवाल उठाये जाते हैं ?

अब यह अत्यावश्यक हो गया है कि हम आर-पार की लड़ाई लड़ें। सैनिकों का अपमान, उन पर पत्थर-प्रहार और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए की जा रही कार्यवाहियों में बाधा किसी भी कीमत पर सहन नहीं की जा  सकती। पाकिस्तानपरस्त अलगाववादी तत्त्व और उनके संरक्षक-समर्थक हमारे नहीं हो सकते। इन्हें चिन्हित किया जाना और इन पर कठोर नियंत्रण किया जाना आवश्यक है । जब तक दूसरों के मानवाधिकारों  का हनन करने वालों, सैनिकों पर पत्थर फेंकने वालों के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्यवाही नहीं होगी तब तक पत्थरबाजी बंद नहीं हो सकती। हमारी उदार नीतियों ने ही पत्थरबाजों को प्रोत्साहित किया है। उनकी संख्या बढ़ी है।

पत्थरबाजों को उनकी भाषा में उत्तर देने के लिए प्रस्तुत आदिवासी युवाओं की आत्म प्रस्तुति सराहनीय है, स्वागत के योग्य है। यह हमारी सच्ची राष्ट्रभक्ति और तद्विषयक जागरुकता की भी सही साक्षी है। जहाँ वोट के लिए तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले कथित नेता और स्वयं को चर्चा में चमकाने के लिए उदारता की बातंे करने बाले कथित बुद्धिजीवी राष्ट्रीय-हितों को ताक पर रखकर अलगाववादी ताकतों और पत्थरवाजों के पक्ष में बयानवाजी करके निराश करते हैं वहाँ इन भील आदिवासियों की जनता-जनार्दनी जाग्रत चेतना राष्ट्रीय-सुरक्षा के पक्ष में नयी आशा और नये विश्वास की स्वर्णिम किरणें विकीर्ण करती है।

शरीर में चुभा हुआ काँटा निकालने के लिए काँटे की आवश्यकता होती है। लोहा ही लोहे को काट पाता है और विष का उपचार विष से ही संभव होता है। इन प्राकृतिक सिद्धान्तों के आधार पर ‘शठे शाठ्यम् समाचरेत्’ (जैसे को तैसा) की नीति अपनाते हुये पत्थरबाजों को उन्हीं की भाषा में उत्तर देना होगा। विश्वास है कि हमारे आदिवासी युवा अपने पारंपरिक हथियार ‘गोफन’ का उपयोग कर पत्थरबाजों का सही उपचार कर सकेंगे।

डाॅ. कृष्णगोपाल मिश्र
सहायक-प्राध्यापक (हिन्दी)                              
उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान,
भोपाल – म.प्र.

VVPAT can easily do voter fraud in Indian Elections

Indian political parties, central gov is again fooling you through vvpat machines. These machines can easily do frauds like Evm  and go undetected. All political parties do hunger strike in front of Parliament until gov is forced to ban evm, vvpat and EC agrees for paper ballot System only. Common VVPAT Frauds are:

Video of voter behavior during an actual election revealed that most voters do not “verify” their choices by reading the VVPAT.

A manual VVPAT recount/audit is labor-intensive and expensive, and likely unaffordable to most candidates seeking it.

And while VVPAT is designed to serve as a check on DRE (Direct Recording Electronic) vote recorders, it relies on the same proprietary programming and electronics to produce the audit trail, which may be tampered.

Security concerns:

The introduction of malicious software into a VVPAT system can cause it to intentionally misrecord the voter’s selections. This attack could minimize detection by manipulating only a small percentage of the votes or for only lesser known races.

Another security concern is that a VVPAT could print while no voter is observing the paper trail, a form of ballot stuffing. Even if additional votes were discovered through matching to the voters list, it would be impossible to identify legitimate ballots from fraudulent ballots.

Alternatively the printer could invalidate the printed record after the voter leaves and print a new fraudulent ballot. These ballots would be undetectable as invalidated ballots are quite common during elections. Also, VVPAT systems that are technically able to reverse the paper feed could be open to manipulated software overwriting or altering the VVPAT after the voter checks it.

Save Democracy in India. If EVM or VVPat is used in 2019 LS elections Bjb would get 450 seats. If paper ballot is used in 2019 electiuon Bjb would get only or less than 45 seats. Go for ballot papers only in elections , employ more gov servants in ballot paper counting.

Jai hind.

md rizwan siddiqui

mdrizwansiddiqui@gmail.com

डरे-डरे से राहुल और सहमी-सहमी सी कांग्रेस

कार्यकर्ताओं के टूटते मनोबल और चुनाव में लगातार मिल रही  हार ने कांग्रेस और उसके नेता बुरी तरह परेशान है। हालात सुधारने के लिए मंथन किया जा रहा है। लेकिन पहली कोशिश ही फेल हो गई। कांग्रेस अध्य़क्ष सोनिया गांधी ने सांसदों से मिलने के लिए भोज का आयोजन किया। सबको न्यौता दिया। कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने 44 लोकसभा और 59 राज्यसभा सांसदों के लिए पहुंचने की सुविधा का भी खयाल रखा और संसद परिसर में ही इस रात्रि भोज का आयोजन किया। लेकिन फिर भी कुल 103 में से सिर्फ 60 सांसद ही सोनिया गांधी से मिलने पहुंचे। 43 आए ही नहीं और न ही न आने की कोई सूचना तक दी। जो कांग्रेसी कभी सोनिया गांधी के निवास 10 जनपथ के बाहर घंटों कतार लगाकर अपने नेता की एक झलक पाने के लिए बेताब रहते थे, उनका व्यक्तिगत निमंत्रण पर भी न पहुंचना कांग्रेस को सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है। शर्म से बचने के लिए कांग्रेस की तरफ से बहाना यह बनाया गया कि मोतीलाल वोरा की तबियत खराब हो गई थी, सो सांसद वहां चले गए थे। लेकिन देश बेवकूफ नहीं है, वह सब समझता है। मोतीलाल वोरा कोई गांधी परिवार के बुलावे के सामने इतने महत्वपूर्ण है कि सांसद राहुल गांधी और सोनिया की उपेक्षा करके उन्हें देखने चले जाएं। फिर ऐसे बहानों से अब बचाव की कोशिशें उल्टे कांग्रेस की भद्द ही पिटवा रहे है। हालात खराब है और सुधरने की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है।

कांग्रेस की सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि उसके सबसे बड़े नेता राहुल गांधी सार्वजनिक रूप से अदम्य आत्मविश्वास से भरे हुए तो लगते है, लेकिन हर बार चुनाव परिणाम में राहुल गांधी में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता। उल्टे राहुल गांधी भीतर से साफ साफ डरे सहमे से लगते हैं। अभी अभी जो नतीजे आए हैं, उन उपचुनावों में तो वे खैर कहीं गए तक नहीं। लेकिन बीते चुनाव में भी देखें, तो उनके भाषण बिल्कुल वैसे ही रहे, जैसे पिछले विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव में हुआ करते थे। एक ही लाइन। कोजरीवाल की तर्ज पर सिर्फ मोदी विरोध। राहुल गांधी अब तक देश के सामने न तो अपना कोई विजन पेश कर पाए हैं और न ही कांग्रेस के नेताओं पर लगे गंभीर आरोपों से पार्टी का बचाव कर पा रहे हैं। कांग्रेस की सबसे ज्यादा खराब हालत यूपी चुनाव के बाद हुई है। हर तरफ निराशा और स्तर पर हताशा। न केवल कांग्रेस कार्यकर्ता, बल्कि पूरे देश के दिल में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह पार्टी अपने सबसे बुरे दौर से आखिर कैसे बाहर निकलेगी। और यह देखकर देश दुखी भी हो रहा है कि कांग्रेस इसके लिए कोई मजबूत कोशिश करती भी नहीं दिख रही है।

राहुल गांधी से लोग कन्नी काट रहे हैं। मतदाताओं में उनका आकर्षण खत्म सा हो गया है। युवा वर्ग में भी वे कोई आशा की किरण नहीं जगा पा रहे हैं। कांग्रेस के भीतर भी अब करीब करीब यह तथ्य स्थापित सा होता जा रहा है कि राहुल गांधी में राजनीतिक रूप से परिपक्व होने की संभावनाएं कतई नहीं हैं। उनमें वो बीज ही नहीं है, जिसमें से कोई पौधा प्रस्फुटित हो सके। उनकी राजनीतिक गंभीरता का आलम यह है कि वे अपने सलाहकारों से सवाल पूछते हैं, और सलाहकार जब जवाब दे रहे होते हैं, तो राहुल उनकी बात पर ध्यान देने के बजाय अपने मोबाइल फोन पर गेम खेल रहे होते हैं। या फिर अपने कुत्ते के साथ खेल रहे होते हैं। कांग्रेस में यह बात धीरे धीरे फैलकर अब बहुत आम सी हो गई है कि राहुल गांधी को कुछ भी कहने का सही समय आने तक भी कोई मतलब नहीं निकलता। सो कांग्रेस के नेताओं में भी राहुल से मिलने में कोई उत्सुकता नहीं है। और जो संसद में बैठे हैं, उनको यह भरोसा हो गया है कि वे अगर अगले आम चुनाव में मैदान उतरे भी, तो कांग्रेस के नाम पर नहीं बल्कि अपनी मेहनत और अपने दम पर ही जीत पाएंगे। सो, राहुल गांधी नामक किसी नेता की छत्रछाया की अब उन्हें जरूरत नहीं है। संसद भवन में सोनिया गांधी के डिनर में सांसदों के कम पहुंचने की एक सबसे बड़ी वजह यह भी रही।

कांग्रेस के लिए सबसे खराब बात यह है कि कुछ लोगों ने गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स से संपर्क करके सबसे ज्यादा चुनाव हारनेवालों में राहुल गांधी का नाम शामिल करने की मांग की है। बहुत कोशिश करके भी कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी की छवि नहीं सुधर रही है। यह तथ्य स्थापित हो चुका है कि जहां भी राहुल गांधी ने प्रचार किया, वहीं पर ज्यादातर जगहों पर कांग्रेस हार गई। पिछले पांच साल में वे कुल 27 चुनाव हार चुके हैं। केवल नौ जगह ही कांग्रेस को जीत मिली है। ऐसे में किसी एक नेता के सर्वाधिक चुनाव हारने का रिकार्ड राहुल गांधी के खाते में दर्ज है। अगले चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार उन्हें अपने इलाके में प्रचार करने के लिए बुलाएं, इसके लिए राहुल गांधी को सबसे पहले अपनी सभाओं में आई भीड़ को वोटों में तब्दील करने का तरीका सीखना होगा। वरना, तो राहुल का कहीं प्रचार के लिए जाना भी उम्मीदवार के लिए किसी संकट से कम नहीं होगा। दरअसल, राहुल गांधी जहां भी आमसभा करने जाते हैं, वहां से निकलने के साथ ही बहुत बड़ी संख्या में अपनी पार्टी के वोट कम करके निकलते हैं। क्योंकि उनकी उपस्थिति किसी को भी उत्साहित नहीं करती। न मतदाता को और न ही कार्यकर्ता को।

कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी समस्या उसके संगठन का लगातार कमजोर होना भी है। कई राज्यों में कई – कई सालों से कांग्रेस संगठन की कार्यकारिणी का गठन तक नहीं हुआ है। यही नहीं राहुल गांधी ने अपने नजदीकी ऐसे लोगों को प्रदेश की बागडोर सोंप दी है, जिनका न तो कोई राजनीतिक आधार है और न ही कोई बड़ा अनुभव। राजस्थान में अशोक गहलोत को दरकिनार करके सचिन पायलट जैसे नौसिखिए नेता तको युवा होने के कारण प्रदेश की बागडोर सौंपना कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है। सचिन के आने के बाद प्रदेश में कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिर रहा है। वे कार्यकर्ताओं में उम्मीद जगाने में भी नाकाम रहे हैं। राजस्थान में कांग्रेस का मामला बिन गहलोत सब सून है। अपना मानना है कि राहुल गांधी को चाहिए कि वे केंद्र सरकार की कमजोरियों पर आक्रामक रुख अख्तियार करने के साथ-साथ पार्टी संगठन को मजबूत करने की दिशा में भी तेज कदम उठाएं। एक पार्टी के रूप में कांग्रेस के लिए भी यह बेहतर होगा कि उसके नेता राहुल गांधी औपचारिक तौर पर पार्टी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी ग्रहण कर लें। ताकि उनके जिम्मेदारी से बचने के बहाने भी खत्म हो जाएं। और नीजे के तौर पर खैर, जो भी होना होगा, जल्दी हो जाएगा। वक्त बरबाद करने से वैसे भी किसी का भला नहीं हुआ है। दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में इस साल की शुरूआत में राहुल गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि कांग्रेस पार्टी का अर्थ है – ‘डरो मत’। लेकिन राहुल गांधी के भाषण में बार बार मोदी का जिक्र सुनकर लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सबसे ज्यादा तो वे खुद ही डरे हुए हैं।

लेखक Niranjan Parihar राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं. संपर्क : niranjanparihar@gmail.com

बालक भीम के बचपन के नायक कबीर थे

ज्ञान और कल्याण के प्रतीक बाबा साहब अंबेडकर… बाबा साहब अंबेडकर जैसे महापुरूष की जयंती मनाने से अपने आप में गर्वबोध महसूस होता है। अंबेडकर जयंती मनाने में हमें एकदम से डूबना नहीं है, बल्कि बाबा साहब द्वारा बताए गए मार्ग को अनुसरण करना है और उनकी विचारधारा को अनुसरण करने लिए आह्वान करना है। डॉ.अंबेडकर के आदर्शों को आत्मसात करने की जरूरत है। वर्तमान परिवेश में उनका जीवन, विचार और आदर्श अतिप्रासंगिक है। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का जन्म मध्य प्रदेश के महू छावनी कस्बे में 14 अप्रैल,1891 को भीमा बाई तथा रामजी की संतान के रूप में हुआ। वे दलित परिवार के महार जाति में जन्म लिए थे। यह वह समय था जब भारतीय समाज पूरी तरह से वर्ण-व्यवस्था के चंगुल में फंसा हुआ था ऐसी स्थिति में एक दलित बालक का संविधान निर्माता बनना तो दूर, पढ़ना और काबिलियत के बल पर अपने लिए एक नई राह का निर्माण किया।

बालक भीम के बचपन के नायक कबीर थे। कबीर पंथी परिवार होने के कारण कबीर के दोहे, पद और गीत भीम को घुट्टी में मिले थे। उनके पिता धार्मिक और अनुशासन प्रिय व्यक्ति थें, दैनिक उपासना करते थे। पिता रामजी सकपाल का यह प्रभाव बालक भीम पर भी पड़ा। रामजी सकपाल पहले रामानंदी वैष्णव थें बाद में कबीर–पंथी हो गएं। अंबेडकर ने जीवन में स्वयं को कबीर की तरह एक विद्रोही नायक के रूप में पाया। इसका प्रमाण जानने के लिए हमें उनके द्वारा दिए गए मई 1956 के भाषण को पढ़ना चाहिए। अछूत परिवारों में वर्ण-व्यवस्था की पोल खोलने वाले कबीर से बड़ा नायक कौन हो सकता है? सन् 1907 में जब तरुण भीमराव ने मैट्रिक की परीक्षा पास की तब यह किसी अछूत समुदाय से आने वाले युवक के लिये यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी। उस मौके पर मराठी लेखक और समाज सुधारक दादा कृष्णाजी ने भीम राव के पुस्तक प्रेम को देखते हुए उन्हें गौतम बुद्ध पर आधारित मराठी पुस्तक ‘गौतम बुद्ध का जीवन’ की प्रति भेंट की, नि:संदेह युवा अंबेडकर पर बुद्ध का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने पाली की किताबें उन्हीं दिनों पढ़ डाली थीं। उन दिनों बौद्ध धर्म सामाजिक अधिक था धार्मिक कम। बाबा साहब ने अंत में अपनी अंतिम पुस्तक की रचना ‘द बुद्धा एंड हिज धम्म’ को उसी ज्ञान का आधार बनाया। राजकुमार सिद्धार्थ की तरह उनके मन में भी बहुत सारे प्रश्न घुमते रहे, अंततः उन्हें बौद्ध धर्म में जीवन की अंतिम गति दिखाई देती है।

डॉ.अंबेडकर कबीर, रैदास, दादू, नानक, चोखामेला, सहजोबाई आदि से प्रेरित हुए। आधुनिक युग में ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, रामास्वामी नायकर पेरियार, नारायण गुरु, छ्त्रपति शाहूजी महाराज, गोविन्द रानाडे आदि ने सामाजिक न्याय को मजबूती के साथ स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ.अंबेडकर ने कबीर और ज्योतिबा फुले को अपना गुरु बताया और अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘हू वेयर दी शुद्राज’ फुले जी को समर्पित किया। अपने समर्पण में 10 अक्टूवर 1946 को डॉ.अंबेडकर में लिखा है कि ‘जिन्होंने हिन्दू समाज की छोटी जातियों से लेकर उच्च वर्णों के प्रति उनकी गुलामी की भावना के सम्बन्ध में जागृत किया। विदेशी शासन से मुक्ति पाने में सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना अधिक महत्वपूर्ण है, इस सिद्धांत की स्थापना उस आधुनिक भारत के महान ‘राष्ट्रपिता’ ज्योतिराव फुले ने की।’ डॉ.अंबेडकर यह मानते थे कि फुले के जीवन दर्शन से प्रेरणा लेकर ही वंचित समाज मुक्ति पा सकता है।

जॉन ड्युई डॉ.अंबेडकर के अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्राध्यापक थे। ड्युई के साधनावाद के ज्ञान (philosophy of instrumentation) का प्रभाव डॉ.अंबेडकर पर था। ड्युई ने पुराने आदर्शवाद के दर्शन का टीकात्मक विश्लेषण किया है, इसी प्रकार डॉ.अंबेडकर ने भी भारत के धार्मिक दर्शन पर टीका किया। ड्युई के अनुसार शिक्षा विश्व के परिवर्तन का साधन है। इसी तरह जान स्टुअर्ट मिल के विचारों का डॉ.अंबेडकर पर बहुत प्रभाव पड़ा। श्रमिकों के हित की दृष्टि से कार्ल मार्क्स द्वारा प्रस्तुत विचारों का प्रभाव उनपर था। लेकिन मार्क्स तथा डॉ.अंबेडकर के विचारों का मूल अंतर यह था कि शोषण केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक भी होता रहता है। बाबा साहब अंबेडकर अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, शिक्षाशास्त्र तथा कानून के विशेषज्ञ तथा विद्वान थे। उनके ज्ञान और परिश्रम के कारण समाजशास्त्री से लेकर अर्थशास्त्री तक हर कोई कायल था। जब 1920 में डॉ.अंबेडकर कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहें थें, तो अर्थशास्त्री एडविन आर सेलिगमेन ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एल. एस. ई.) में पढ़ाने वाले प्रोफेसर हार्बर्ट फॉक्सवेल को पत्र लिखकर अंबेडकर की पढ़ाई में मदद करने को कहा था।

डॉ.अंबेडकर ने विभिन्न देशों के संविधान का अध्ययन करने के बाद लोकतंत्र की मजबूती के लिए एक ऐसे संविधान का निर्माण किया, जिसमें समाज के सभी लोगों को अधिकार दिए गए। वे केवल दलितों, आदिवासियों या पीछड़ों के मसीहा नहीं हैं, बाबा साहब का संपूर्ण जीवन गरीबों तथा भारतीय समाज विशेषकर हाशिए में जी रहे शोषित वर्ग (स्त्री, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा पीछड़ा वर्ग) के उत्थान, कल्याण और विकास के लिए समर्पित था। डॉ.अंबेडकर की सामाजिक और राजनैतिक सुधार की विरासत का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है। बाबा साहब ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आज भारत की सोच को प्रभावित किया है। उनकी सोच आज की सामाजिक, आर्थिक नीतियों, शिक्षा, कानून तथा सकारात्मक कार्यवाही के माध्यम से प्रदर्शित होती है।

भारत के भावी भविष्य के लिए शासन-प्रणाली व संविधान के बारे में रूप-रेखा तय करने के उद्देश्य से ब्रिटिश ने साइमन कमीशन की सिफारिश पर गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया। यह सम्मेलन लंदन में 12 नवंबर 1930 को शुरू हुआ। इस सम्मेलन से ब्रिटिश सरकार और भारतवासियों के 89 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। डॉ. अंबेडकर ने इसमें अछूत लोगों के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। यह एक ऐसा समागम था, जिसमें मुख्य विषयों पर अपने विचार प्रकट करने थे और वे नोट किए जाने थे। डॉ.अंबेडकर ने अपनी प्रभावशाली आवाज से अपने भाषण के शुरू में ही कहा कि ‘वह ब्रिटिश-भारत की जनसंख्या के पाँचवें भाग का, जो कि इंग्लैण्ड या आयरलैण्ड और स्कॉटलैण्ड की जनसंख्या से भी अधिक है, दृष्टिकोण प्रस्तुत का रहे हैं। इन लोगों की दशा पशुओं से भी गई-गुजरी है।’ इंग्लैण्ड के समाचार पत्रों पर भी डॉ.अंबेडकर के भाषण का बहुत प्रभाव पड़ा।

‘दि इंडियन डेली मेल’ ने तो यहीं तक प्रशंसा की कि समूची कॉन्फ्रेंस में डॉ.अंबेडकर का भाषण सर्वोत्तम भाषण था। उस भाषण का प्रभाव तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री मिस्टर रैमजे मैकडोनाल्ड पर भी अच्छा पड़ा। अब समाचार पत्रों और राजनीतिज्ञों ने दलित वर्ग और डॉ.अंबेडकर की ओर अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया। डॉ.अंबेडकर ने इस गोलमेज कॉन्फ्रेंस की अवधि के दौरान लन्दन में रहते हुए मौके का भरपूर सदुपयोग किया। उन्होंने समाचार पत्रों को लेख भेजे, सभाएं की व प्रमुख ब्रिटिश नेताओं से मिले। बाबा साहब के कठोर परिश्रम का फल यह निकला कि समस्त विश्व को ज्ञात हुआ कि भारत के अछूतों की दशा वास्तव में बहुत चिंतनीय है। कई अंग्रेज नेताओं का ह्रदय भी पिघल गया। लॉर्ड सेंकी ने वायदा किया कि दलित वर्गों को भारत के अन्य निवासियों के समान रखा जाएगा। डॉ.अंबेडकर ने मांग की कि दलित वर्गों को दूसरे नागरिकों के समान नागरिक अधिकार दिए जाएं, कानून में प्रत्येक प्रकार का भेदभाव व उच्च-नीच एकदम समाप्त किए जाएं। दलित वर्गो को विधानसभाओं में अपने प्रतिनिधि अपने लोगों द्वारा स्वयं चुनने की छूट हो और दलित वर्गों को सरकारी नौकरियों में पूर्ण प्रतिनिधित्व दिया जाए और कर्मचारियों की भर्ती और नियंत्रण के लिए सार्वजनिक सेवा आयोग स्थापित किए जाएं। गोलमेज सम्मेलन मे डॉ.अंबेडकर ने जो भाषण दिए व अपनी मांगें रखीं, भारत मे उनकी प्रतिक्रिया होने लगी। इसके पश्चात् ही सरकार ने पुलिस विभाग में दलित वर्गों के लिए भर्ती खोल दी।

दलितों के धर्मांतरण को लेकर अंबेडकर और गाँधीजी के बीच तो तीखा मतभेद था उसके मूल में थी इन दोनों महापुरूषों की अपनी-अपनी प्राथमिक प्रतिबद्धताओं की पारस्परिक टकराहट। गाँधीजी हिंदू धर्म में रहकर जातिगत भेदभाव मिटाना चाहते थे पर वर्ण-व्यवस्था खत्म नहीं करना चाहते थे। वे जाति-व्यवस्था को पारंपरिक व्यवस्था और कार्य पद्धति से जोड़ कर देखते थे। गाँधीजी चाहे स्वयं को संपूर्ण भारत का प्रतिनिधि कहते थे किंतु अंबेडकर उन्हें दलितों का प्रतिनिधि मानने के लिए तैयार नहीं थे। वे उन्हें शंकराचार्य के बाद दूसरा सबसे बड़ा हिंदू हित रक्षक बताते थे। और आगे चलकर दलितों के पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के मुद्दे पर अंबेडकर ही सही साबित हुए क्योंकि गाँधीजी अछूतों को किसी भी कीमत पर भी हिंदू धर्म में पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के रूप में किसी प्रकार का विभाजन नहीं देख सकते थे। दलितों के लिए अंग्रेज सरकार द्वारा प्रस्तावित पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के खिलाफ ब्रिटिश प्रधानमंत्री को आमरन अनशन के अपनी निर्णयगत अडिगता की सूचना देते हुए गाँधीजी कठोर चेतावनी देते हैं कि ‘आप बाहर के आदमी हैं अत: हिंदुओं में फूट डालने वाले ऐसे किसी भी मसले में कोई हस्तक्षेप न करें। दलित वर्गों के लिए यदि किसी पृथक निर्वाचन मंडल का गठन किया जाना है तो वह मुझे ज़हर का ऐसा इंजेक्शकन दिख पड़ता है, जो हिंदू धर्म को तो नष्ट करेगा ही, साथ ही उससे दलित वर्ग का भी रंचमात्र हित नहीं होगा। आप मुझे यह कहने की अनुमति देंगे कि भले ही आप कितनी भी सहानुभूति रखते हों, पर आप संबद्ध पक्षों के लिए ऐसे अति महत्वपूर्ण तथा धार्मिक महत्व के मामले पर कोई ठीक निर्णय नहीं ले सकते।’ स्पष्ट है कि गाँधीजी के लिए दलितों का हित दूसरे स्थान पर था, उनकी पहली प्राथमिकता थी हिंदू धर्म को तथाकथित सर्वनाश से बचाना जबकि अंबेडकर अपना पहला दायित्व दलितों का कल्याण और उत्थान चाहते थे। उन्हें हिंदू धर्म की वर्ण-व्यवस्था को खत्म करना था जोकि सामाजिक असमानता का मूल कारण है। अंबेडकर हिंदू जाति-व्यवस्था द्वारा दलितों पर लादे अलगाव को और तदजन्य हीन भावना से दलितों को छुटकारा दिलवाने का एक मात्र रास्ता धर्म परिवर्तन को पाते थे बशर्तें कि अपनाया जाने वाला नया धर्म दलितों के साथ हिंदू धर्म में जारी तमाम प्रकार के बहिष्कार, बेरूखी और पूर्वाग्रहों से मुक्त हो।

पुरूष सत्तात्मक समाज ने सबसे ज्यादा कठोर, उत्पीड़नकारी, शोषणकारी और अन्यायपूर्ण रहा है क्योंकि यह नारी को सभी मूलभूत अधिकारों से वंचित कर उसे नारकीय जीवन जीने पर मजबूर करता है जबकि आर्यों के समाज में स्त्री और शूद्रों को एक ही स्थिति में रखा जाता था। शिक्षा के अधिकार से भी उन्हें वंचित रखा जाता था। परिवर्तनवादी समाज व्यवस्था के प्रणेता डॉ.अंबेडकर ने देश का क़ानून मंत्री रहते हुए स्त्री-शिक्षा और समान अधिकार को समाज में स्थापित करने के लिए विधिवत हर संभव प्रयास किया। वे नारी शिक्षा, स्वतंत्रता, समानता तथा अस्मिता के प्रबल समर्थक थे। जोतिबा फुले की ही तरह इन्होंने सबसे अधिक जोर स्त्री-शिक्षा पर दिया क्योंकि शिक्षा ही वह रास्ता है जिससे होकर अपने अधिकारों को पाया जा सकता है और पितृ सत्तात्मक व्यवस्था तथा संस्था से मुक्ति भी पाया जा सकता है। स्त्री की दशा ही किसी देश की दशा, प्रगति और उन्नति निर्धारित करती है। अतः डॉ.अंबेडकर का मानना था कि शिक्षा ही प्रगति और उन्नति का मार्ग खोल सकती है, शिक्षा ही सामाजिक क्रान्ति का पहला कदम है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय  भी स्त्रियों की दशा काफी दयनीय थी। संपत्ति में उनका कोई अधिकार नहीं था, बहुपत्नी विवाह स्त्रियों को नारकीय जीवन जीने पर बाध्य करता था, पति द्वारा परित्याग कर दिए जाने पर उसके गुजर-बसर का कोई साधन न होता था। डॉ.अंबेडकर भारतीय स्त्रियों की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक स्थिति में परिवर्तन चाहते थे। वो एक ऐसा क़ानून बनाना चाहते थे जो स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक और कानूनी स्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन कर सके। इसलिए उन्होंने स्त्रियों के अधिकार के लिए ‘हिन्दू कोड बिल’ बनाया, जिसके कारण कई बार उन्हें व्यक्तिगत रूप से अपमानित भी होना पड़ा। स्त्रियों की प्रगति के लिए उठाए गए इस कदम को विरोधों का सामना करना पडा। इस बिल में आठ अधिनियम बनाए गए थे जो इस प्रकार हैं-‘1.हिन्दू विवाह अधिनियम 2.विशेष विवाह अधिनियम 3.गोद लेना दत्तक ग्रहण अल्पायु संरक्षता अधिनियम 4.निर्बल तथा साधनहीन परिवार के भरण-पोषण अधिनियम 5.हिन्दू उत्तराधिकारी अधिनियम 6.अप्राप्त व्यय संरक्षण सम्बन्धी अधिनियम 7.उत्तराधिकारी अधिनियम और विधवा विवाह को पुनर्विवाह अधिनियम 8.पिता की संपत्ति में अधिकार अधिनियम।’ संविधान ने स्त्रियों को हर वो अधिकार दिया जिससे मनुवादियों ने उसे वंचित रखा। पुरूष प्रधान भारतीय समाज पर आघात करते हुए यह बिल भारतीय महिलाओं को पुरूषों के बराबार कानूनी और सामाजिक अधिकार के मांग पर आधारित था।

हिन्दू कोड बिल के तहत किसी भी जाति की लड़की या लड़के का विवाह होना अवैध नहीं था। इस कोड के अनुसार पति और पत्नी एक समय में एक ही विवाह कर सकते है। कोई भी पति पहली पत्नी के और कोई भी पत्नी पहले पति के रहते दूसरा विवाह अगर करे तो दंडनीय अपराध माना जाएगा, पति के गुजर जाने पर पत्नी को उसकी संपत्ति में संतान के बराबर हिस्सा मिलेगा, पिता की संपत्ति में पुत्रियों को भी पुत्रों के समान अधिकार दिया जाएगा। विधवाओं के लिए दूसरे विवाह का प्रावधान, पति के अत्याचार से पीड़ित पत्नी के लिए तलाक का प्रावधान, और तलाक देने की स्थिति में पति को पत्नी के गुजारा भत्ता देने का प्रावधान, महिलाओं को बच्चे न होने पर अपनी मर्जी से बच्चा गोद लेने का प्रावधान इत्यादि परन्तु दुर्भाग्यवश कुछ कट्टरपंथियों के कारण यह बिल संसद में पारित न हो सका और डॉ.अंबेडकर ने क़ानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। वर्तमान समय में महिलाओं को पुरूषों के समान जो शैक्षणिक, आर्थिक, सामाजिक और समस्त अधिकार प्राप्त हैं इसका श्रेय ‘हिन्दू कोड बिल को जाता है क्योंकि बाद में हिन्दू कोड बिल कई हिस्सों में बंटकर संसद में धीरे-धीरे पारित होने लगा। इस बिल के कई प्रावधानों को संसद में दूसरी सरकारों ने पास कराकर अपना वोट बैंक बनाया। सदियों से जिस अधिकार से स्त्रियाँ अछूती थीं, उससे संविधान ने ही अवगत कराया। नारी स्वतंत्रता, अस्मिता और सम्मान के लिए बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान में कई प्रावधानों को सुनिश्चित किया। डॉ.अंबेडकर की ही देन है कि भारतीय क़ानून का प्रारूप बदला और उसमें मानवीयता प्रसार हो पाया।    

लेखक आनन्द दास वर्तमान में ए.जे.सी. बोस कॉलेज, कोलकाता में अतिथि प्रवक्ता हैं। कोलकाता से प्रकाशित होने वाली ‘अग्निगर्भा पत्रिका’ के सहायक संपादक हैं। आनन्द दास की हिन्दी में ‘मणिकर्णिका’ का समाजशास्त्रीय अनुशीलन पुस्तक प्रकाशित होने वाली है। साथ ही हिन्दी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आनन्द दास की रचनाएं निरन्तर प्रकाशित होती हैं।
संपर्क- 4 मुरारी पुकुर लेन, कोलकाता-700067, ई-मेल- anandpcdas@gmail.com, 7003871776, 9804551685

योगी का ‘मिशन-100’

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश में 100 नंबर पर डायल करने पर पुलिस भले ही घटना स्थल पर पहुंचने में देरी कर दे, लेकिन राज्य के मुखिया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 100 दिनों के एक्शन प्लान में कहीं किसी तरह की कोताही की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। गत दिनों योगी ने जैसे ही 100 दिनों के एक्शन प्लान पर अंतिम मुहर लगाई पूरी सरकारी मशीनरी सक्रिय हो गई है। भूमाफिया से लेकर सरकारी योजनाओं में सेंधमारी करने वाले तक योगी के निशाने पर हैं। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही पहले दिन से ही योगी आदित्यनाथ ने सख्ती से नियमों का पालन कराना शुरू कर दिया था। किसानों का कर्ज माफ हो चुका है। एंटी रोमियों स्क्वायड ने लड़कियों पर फब्तियां कसने और छेड़छाड़ करने वाले आवारा किस्म के लोंगो के हौसले काफी हद तक पस्त कर दिये हैं।

कई वर्षो से जनता के स्वास्थ्य की अनदेखी करके नियम विरूद्ध चल रहे अवैध बूचड़खानों पर ताला लटक गया है। अब भूमाफियाओं की बारी है। सीएम योगी लगातार सभी विभागों के प्रेजेंटेशन देख कर विकास का खाका खींच रहे हैं। जनता से जुड़े कई अहम फैसले लेकर योगी सरकार ने अपना इकबाल तो कायम कर लिया है, लेकिन अभी मंजिल दूर है। योगी के सामने बीजेपी के संकल्प पत्र में किये गये वायदे,‘भूमाफियाओं के खिलाफ कार्रवाई होगी।’ की अभी परीक्षा होनी बाकी है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती भूमाफिया से निपटने की है। पिछली सरकार के दौरान कब्जा की गई सरकारी जमीनों को छुड़ाने के अलावा लम्बे समय से सरकारी जमीन को कब्जाये दंबगों पर भी नकेल कसनी होगी। इसके लिए ही 100 दिन का एक्शन प्लान तैयार किया गया है। एक्शन प्लान के तहत कब्जा की गई सरकारी जमीनों की पहचान और छुड़ाने का जिम्मा टास्क फोर्स को दिया गया। भू-माफिया पर टास्क फोर्स का गठन तीन स्तरीय किया गया है। जिला स्तर पर जिलाधिकारीे टास्क फोर्स की कमान संभालंेगे तो मंडल स्तर पर चास्क फोर्स की कमान कमिश्नर के हाथ होगी। मुख्य सचिव पूरे प्रदेश में टास्क फोर्स के मुखिया होंगे।

इसी प्रकार से सरकारी पैसे को डकार जाने वाले लोंगो पर भी शिकंजा कसने की तैयारी की जा रही है। सरकारी योजनाओं में सेंधमारी कर चूना लगाने वालों पर भी योगी सरकार की खास नजर है। सरकारी निर्माण कार्यो से लेकर, गरीब-गुरबों की मदद करने की वाली तमाम योजनाओं, राशन वितरण व्यवस्था तक में खूब बंदरबांट का खेल चल रहा था। योगी सरकार राशन कार्ड को आधार नंबर से लिंक करके फर्जी कार्ड धारकों की पहचान करायेगी। पुराने राशन कार्ड रद्द तो किये ही जायेंगे, गलत तरीके से सस्ता राशन लेने वालों से अभी तक लिए गए राशन की कीमत भी वसूली जाएगी।

इसके अलावा 100 दिनों के एक्शन प्लान में तमाम जनकल्याण की योजनाओं को भी आधार से लिंक करने की तैयारी है ताकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सके। एक्शन प्लान में मदरसों के आधुनिकीकरण में भी योगी सरकार का खासा जोर है। इसके तहत 19,213 मदरसों के पाठ्यक्रम में हिंदी अंग्रेजी गणित और विज्ञान शामिल होगा। मदरसे में पढ़ने वाले 6 लाख 87 हजार 728 छात्रों को छात्रवृत्ति मिलती है। अब आधार से जोड़कर बैंक खाते में छात्रवृत्ति डालने की तैयारी की जा रही है। बदलाव की प्रक्रिया पूरी होने तक नए मदरसों को मान्यता नहीं मिलेगी।

इसके अलावा योगी सरकार के 100 दिन के एक्शन प्लान के तहत कई और बड़े फैसलों के अमल में आने की तैयारी है। जिन्हे गैस कनेक्शन मिला है उन्हें केरोसिन नहीं मिलेगा। भूमिहीन किसानों के दो बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति मिलेगी। जुलाई में शुरू होने वाली हज यात्रा के लिए बेहतर सुविधाओं की तैयारी की जा रही है। इसके अलावा गरीब मुस्लिम लड़कियों का सामूहिक विवाह कराये जाने के लिये भी आर्थिक मदद के लिये योजना बन रही है।

अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

कश्मीर में सरकार आपकी पर ‘राज’ किसका?

कश्मीर में सुरक्षा बलों की दुर्दशा और अपमान के जो चित्र वायरल हो रहे हैं, उससे हर हिंदुस्तानी का मन व्यथित है। एक जमाने में कश्मीर को लेकर हुंकारे भरने वाले समूह भी खामोश हैं। ऐसे में यह सवाल पूछने का मन हो रहा है कि कश्मीर में सरकार तो आपकी है पर ‘राज’ किसका है ? कश्मीर एक ऐसी अंतहीन आग में जल रहा है जो हमारे प्रथम प्रधानमंत्री की नादानियों की वजह से एक नासूर बन चुका है। तब से लेकर आजतक सारा देश कश्मीर को कभी बेबसी और कभी लाचारी से देख रहा है।

नीतियों में स्पष्टता न होने के कारण हम वहां एक सरकार बनाकर खुश हो लेते हैं, जबकि वहां पर ‘राज’ लंबे अरसे से कुछ अराजक ताकतें ही कर रही हैं। कश्मीर घाटी के कुछ इलाकों में देशद्रोही जमातों की मिजाजपुर्सी में हमारी सरकारें लेह-लद्दाख, जम्मू की उपेक्षा तक करती आ रही हैं। सच्चाई तो यह है कि घाटी के चंद उपद्रवी तत्वों को भारत के साथ बने रहने की हम लंबी कीमत दे रहे हैं। जबकि देशभक्ति की भावना से भरा समाज यहां प्रताड़ित हो रहा है।

देशद्रोही मानसिकता के लोगों को पालपोसकर हमने वहां राष्ट्रीय मन के समाज के निरंतर आहत किया है। जबकि जिनके हाथ कश्मीरी पंडितों के खून से रंगें हैं, उन्हें पालकर हम क्या हासिल कर हैं? अब जबकि घाटी लगभग हिंदू विहीन है तब वे किससे और क्यों लड़ रहे हैं ? हिंदुओं के वीरान पड़े घर, मंदिर और देवालय हमें बता रहे हैं कि इस जमीन कैसा खूरेंजी खेल गया है। आज उन्हीं दहशतगर्दों की हरकतें इतनी कि वे हमारे सुरक्षा बलों पर भी पत्थर बरसाने से लेकर लात मारने की कार्रवाई कर रहे हैं। शायद ही कोई देश हो जो ऐसे समय में अपने सुरक्षाबलों को संयम की सलाह दे। संयम और नियम आम जनता के लिए होते हैं या पेशेवर आतंकियों के लिए? यह हमें सोचना होगा।

भारत का मान बचाने वाली सेना या केंद्रीय बलों के नौजवान अगर अपनी ही घरती पर अपमानित हो रहे हैं तो हम रहम क्यों कर रहे हैं? संयम की सलाह सेना और सुरक्षा बलों को ही क्यों दी जा रही है? भाड़े के टट्टू पाकिस्तान परस्ती पर अपनी ही सेना पर पत्थर बरसा रहे हैं, आतंकियों को भाग निकलने के लिए अवसर दे रहे हैं। कश्मीर पर खर्च हो रहे देश के करोड़ों रूपयों का मतलब क्या है? अगर वे खुद अपनी जिंदगी जहन्नुम बनाए रखना चाहते हैं तो सरकार क्या कर सकती है? लेकिन इतना तय है कि देश की सरकार को कश्मीर के लिए कोई निर्णायक कदम उठाना होगा। इसका पहला समाधान तो यही है कश्मीर में निरंतर हस्तक्षेप कर रहे पाकिस्तान को पूंछ को सीधा करने के लिए बलूचिस्तान, सिंध और पाकअधिकृत कश्मीर हो रहे मानवाधिकार के दमन को  लेकर दबाव बनाया जाए। बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा और मान्यता देने की पहल हो सकती है और अपेक्षित साहस दिखाते हुए बलूस्चितानी निर्वासित नेताओं को भारत में शरण देने की पहल भी की जा सकती है। संस्कृत में एक वाक्य है शठे शाठ्यं समाचरेत्। यानि दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए। हम पाकिस्तानी के प्रति कितने भी सदाशयी हो जाएं ,वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आ सकता। कुलभूषण जाधव का प्रसंग इसका साफ उदाहरण है। बावजूद इसके हम फिल्में दिखाने, क्रिकेट खेलने, सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे मूर्खताओं से जेहादी आतंकवाद का सामना करने का सपना देख रहे हैं।

आज जबकि कश्मीर घाटी में किराए के टट्टूओं ने पूरी कश्मीर के वातावरण को बिगाड़ रखा तब हमें सोचना होगा कि आखिर हमारी रणनीति में ऐसी क्या खामी है कि हम अपने ही घर में पिट रहे है। भारत को इस समय अपेक्षित आक्रामकता दिखानी ही होगी। खेल का मैदान बदलना होगा। हमारी जमीन पर रोज हो रही लीला बंद होनी चाहिए। अब जमीन और जंग का मैदान दोनों बदलने का समय है। हम हिंदुस्तानी मन लेकर पाकिस्तानी पापों का प्रतिरोध नहीं कर सकते। इसलिए ये घटनाएं सबक भी हैं और संकेत भी। इसके साथ ही वहां आतंक का प्रसार कर रहे तत्वों और गिलानी समर्थक समूहों की आर्थिक शक्ति को भी तबाह करने का समय है। क्योंकि ये तत्व पूरी घाटी के चेहरे बने हुए हैं। इनकी शक्ति को तोड़ने और इनके अर्थतंत्र को तबाह करने की जरूरत है। घाटी में लगातार बंद और हड़तालों से आगे अब इनके लोग स्कूलों पर हमले कर रहे हैं। स्कूलों को तबाह कर रहे हैं। यह बात बताती है कि इनके इरादे क्या हैं। हमें सोचना होगा कि कश्मीरी युवाओं को शिक्षा और रोजगार के मार्ग से भटका कर उन्हें किस स्वर्ग के सपने दिखाए जा रहे हैं?

आखिर पाकिस्तान कश्मीर को पाकर कौन सा स्वर्ग वहां रचेगा, जबकि उसके कब्जे वाला कश्मीर किस तरह मुफलिसी और तबाही का शिकार है। जाहिर तौर पर पाकिस्तान की कोशिश कश्मीर को अशांत रखकर भारत की प्रगति और उसकी एकता को तोड़ने की है। अब यह मामला बहुत आगे बढ़ चुका है। सात दशकों की पीड़ा को समाप्त करने का समय अब आ गया है। केंद्र की सरकार को बहुत सधे हुए कदमों से आगे बढ़ना होगा ताकि कश्मीर का संकट हल हो सके। उसके शेष भागों लेह, लद्दाख और जम्मू का विकास हो सके। अकेली घाटी के कुछ इलाकों की अशांति के नाते समूचे जम्मू-कश्मीर राज्य की प्रगति को रोका नहीं जा सकता। धारा-370 को हटाने सहित अनेक प्रश्न जुड़े हैं, जिनसे हमें जूझना होगा।

घाटी के गुमराह नौजवानों को भी यह समझाने की जरूरत है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा। पाकिस्तान और आईएस के झंडे दिखा रही ताकतों को जानना होगा कि भारत के संयम को उसकी कमजोरी न समझा जाए। इतनी लंबी जंग लड़कर पाकिस्तान को हासिल क्या हुआ है, उसे भी सोचना चाहिए। दुनिया बदल रही है। लड़ाई बदल रही है। कश्मीर घाटी में लोकतंत्र की विरोधी शक्तियां भी पराभूत होगीं, इसमें दो राय नहीं। राजनीति के कारण नहीं, देश की जनता के कारण। केंद्र में कोई भी सरकार रही हो सबने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानकर, उसे अपना माना है। इसलिए देश को तोड़ने का यह दुःस्वप्न कभी फलीभूत नहीं होगा। कश्मीर घाटी के उपद्रवी और सीमा पार बैठे उनके दोस्त, इस सच को जितनी जल्दी समझ जाएं बेहतर होगा।

लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्लेषक हैं. मोबाइलः 09893598888

तो ‘आधार आधारित पेमेंट’ सिस्टम के कारण उंगलीमार डाकुओं की होगी वापसी!

केंद्र की मोदी सरकार ने भीम एप शुरू कर दिया है| आधार पेमेंट का सिस्टम शुरू हो गया गया है| डिजिटल इंडिया का सपना जल्द ही साकार होगा| हमारा देश भी विकसित हो जाएगा| लेकिन इसी बीच एक और बात ख़ास होगी। वो ये कि अब चोरी और अपराध की वारदातों में कमी आएगी| साथ ही पुलिस को भी अब थोड़ी राहत मिलेगी| लेकिन शायद अब आफत गले पड़ने वाली है| क्यूंकि अब हर पेमेंट एक ऊँगली से हुआ करेगी। तो ऐसे में चोर या ऐसे आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोग उँगलियाँ ही काटा करेंगे| फिर ऊँगली या अंगूठा ही उनकी तिजोरी की चाबी हुआ करेगी|

शायद सुर्खियाँ भी यही बने- पेमेंट देते वक्त एक गिरफ्तार, १० उँगलियाँ बरामद। कौन सी महिला की, कौन सी पुरुष की, पहचान कर पाना मुश्किल। जाँच के बाद होगा खुलासा। ऊँगली मार डाकुओं से अब सबको सावधान रहना होगा| किसी से हाथ मिलते वक्त भी शायद ध्यान रखना होगा| क्यूंकि पहले गले काटे जाते थे, अब उँगलियाँ काटी जाएंगी। इस बात को कहने में कोई हर्ज़ नहीं होगा कि ऊँगलीमार डाकुओं की वापसी होगी| लेकिन संज्ञा बदल दी जाएगी. शायद उनको कोई और नाम दिया जाए या किसी पर्यायवाची शब्द का इस्तेमाल हो!

इतना ही नहीं अगर किसी ने दो- चार उँगलियाँ काट भी ली तो इनकी भी एक अवधि हुआ करेगी| क्यूंकि एक कटी हुई ऊँगली कितने दिन काम कर पायेगी| जिसके बाद ऊँगली मार डाकुओं को नई ऊँगली की तलाश हुआ करेगी|

इसका सबसे बढ़ा नुक्सान उनको भी होगा जो बाज़ार से सामान लाने के बाद घर पहुँचने तक उसके दाम में 5 या 10 रूपये की वृद्धि कर दिया करते थे| हंसने वाला किस्सा नहीं है। बचपन में हर कोई करता है और सबने किया भी होगा इसमें कोई दोराय नहीं है| जो भी हो सब आने वाले वक्त में ही पता चलेगा कि आधार आधारित पेमेंट सिस्टम का जमीनी आधार कितना सफल हो पाता है| उम्मीद सब बेहतरीन होने की है|

सुनील कुमार हिमाचली
mediasunil1@gmail.com
+91- 95016 25450

Minority Coordination Committee Gujarat

C/o- D 404 Hateem 1, Sonal Cinema Road, Juhapura, Ahmedabad, M-9328416230

Press Note

Minority coordination committee Gujarat is formed on 18 December 2016 on Minority rights day to advocate issues of minorities. We see that minority in Gujarat is more underprivileged than others.

We see that No any additional classroom between 2013-2016 is allotted in districts with substantial minority population,  under JNNURM Basic Service to the Urban Poor (BSUP) cities/towns having a substantial minority population No any project is sanctioned, Operationalization of anganwadi centres under Integrated Child Development Services (ICDS) in Blocks having a substantial minority population No any target is framed during 2012-2015, Infrastructure Development for Minority Institutions (IDMI) only 6 institutions got around 17.68 lacs, Number of minority beneficiaries assisted for setting up of Individual and Group micro-enterprises under DAY-NULM (erstwhile SJSRY) no data available, Multi-sectoral Development Programme (MsDP) during 2014-2017 no project approved no fund released.

Number of New Primary Schools Opened under SSA in districts with substantial minority population target not been fixed, Ministry of Drinking Water & Sanitation: National Rural Drinking Water Programme (NRDWP) 2012-2015 target not fixed, Placement of skill trained minority beneficiaries under DAY-NULM (erstwhile SJSRY) target was 1384 achievement is 0, Number of minority beneficiaries in SHGs covered in SHGs-Bank Linkages under DAY-NULM (erstwhile SJSRY) target was 330 achievement is 0, Number of minority beneficiaries covered under Self-Help Groups (SHGs) formed under DAY-NULM (erstwhile SJSRY) target was 4424 achievement is 0, Number of minority beneficiaries imparted skill training under DAY-NULM (erstwhile SJSRY) in 2015 target was 5535 achievement is 0, Modernization of Madarsa Education Programme Scheme to Provide Quality Education in Madarsa (SPQEM) 2012-2015 no target no achievement, Number of Posts for Teachers Sanctioned under SSA in districts with substantial minority population 2012-15 No target no achievement.

The population of minorities in Gujarat is 11.5% (as per data of govt 2011) that include Muslims 9.7%, Jain 1.0%, Christian 0.5%, Buddh 0.1%, and others 0.1% . In the state like Gujarat 75% Muslim children take admission at Primary Schools up to 8th standard this percentages decreases and comes up to 45%  further reaching to Matriculation or Standard 10th these percentage further decreases and comes to 26% only. This is very serious situation. Gujarat is witness of internal migration since years. Due to riots and establishment of industries at large scale on the bank of the sea about 2 lac people have migrated and settled in the big cities. They are helpless to live their lives in the lack of minimum basic amenities to live and have to live in the slum areas. The most affected community is Muslim. 

As per Sacchar committee’s report poverty is 800% high in Muslims as compared to High Caste Hindus, it is 50% in comparing with other backward casts. According to Sacchar Committee average of organized and manufacturing sector is 21% and Muslims have average share of 13% only.   However, other communities of the country have share more than the average. In the field of self-employment Muslims share is 54% which is less than average of the country i.e.57%. In the informal occupation Muslims share is 23% while country’s rate is just above 17%. It is clear from these figures that Muslims are becoming victim of discrimination.

After recommendation of Sacchar committee’s Minority Welfare Ministry was established by govt of India in 2006, the main object of it is to bring minorities of the country to main stream, therefore schemes for Scholarships, Talent Development, Wakf development, Prime Ministers 15 points program, assistance for preparation of Administrative Examinations etc. are launched. There is neither separate Minority Welfare ministry nor separate provision for minority made in the budget in Gujarat State.   

In Gujarat formal course for religious rituals for majority community is available but there is no such scheme for minorities this is a glaring example of discrimination. There are commissions established for preparation of strategies for redressal of grievances and development of deprived classes, groups like Women’s Commission, Scheduled Caste Commission, Scheduled Tribe Commission, Commission for Other Backward castes and Commission for children Rights, Minority Commission etc.

In Gujarat we have no separate Ministry for Minority Affairs, no budget allocation for the upliftment of minorities in state budget, nor implementation of schemes by the Government of India. There is no grievances redressal mechanism for minorities in Gujarat in the form of a commission.

Considering all these, we all minority communities will have to unite together. 

From today, we starts state level Campaign under auspices of MCC. One lac post card from the whole state will be written addressed to Hon. Chief Minister, meetings and awareness among minorities in each district and there will be demonstration at each district head quarter, a memorandum mentioning demands addressing the Chief Minister through the Collector will be given. After that a massive rally will be arranged in Ahmedabad for asking our demand.

Main Demands:

Form port-folio/ministry for the welfare of minority in the state.

Separate financial provisions should be made in the state budget for development of minorities.

Open the Government Higher Secondary schools where the minorities are residing in considerable number.

Recognize the Degree of Madarsa equivalent to the Gujarat Board.

Form State Minority Commission and law should be passed in the State Assembly giving it constitutional standing.

Special financial package should be given for development of minorities.

Frame a Policy for rehabilitation of internal displaced persons by Natural disaster and Communal violences.

Yours
Mujahid Nafees
Convener
9328416230

शरियत की द्रोपदी का चीरहरण कर रहे है टीवी चैनल्स

खामोश क्यों है वोटो की तिजारत करने वाले उलमा!

मौलाना साहब। आप तो सर्जन हैं सर्जरी करिये, दातों के इलाज में ही मत उलझे रहिये! शरियत की हिफाजत करियेगा तो अवकाफ, कौम, मुसलमान और उनके हुकूक खुद महफूज हो जायेंगे। जिस्म तनदुरुस्त रहेगा तो दन्त, केश, नाखून खुदबखुद चमकेंगे। रूहानियत को संवारये… इसका ख्याल रखियेगा तो जिस्म गलत काम करना छोड़ ही देगा।

तमाम उलेमा, धार्मिक विद्वान और इस्लामी संगठन चलाने वाले आलिमो, आप सम्मानीय है। आप लोग चुनावी मौसम मे हराने-जिताने की अपील मे खूब एक्टिव रहते है। मुसलमानो के हुकूक (अधिकारों) की बात करते हो। अवकाफ की हिफाजत, अवकाफ मे भ्रष्टाचार, और मुसलमानो की असुरक्षा की बात करते हो। ऐसे मे आप सब बतौर मुस्लिम नेता अपने फरायज बखूबी निभाते हो। आरोप लगते है कि इस तरह की आवाजो के पीछे कौम की भलाई नही आपके जाति मफाद ( पर्सनल फायदे) छिपे रहते है। सियासी दलो से दोस्ती-या दुश्मनी निभाने के लिये ऐसे शोर बरपा होते है। हो सकता है आप लोगो पर लगाने वाले ये इलजामात गलत हो।

आप जौहरी हो लेकिन किसी छोटे कबाडी की तरह गली-गली लोहा और टीन खरीदने-बेचने मे ही क्यो अपना वक्त बर्बाद कर रहे हो । जबकि आपका हीरा-जवाहरात और बेशकीमती कोहेनूर लुट रहा है। तमाम टीवी चैनल्स किस किस तरह से शरियत को बदनाम कर रहे है। कथित अमेरिका के एजेन्ट शरियत के विशेषज्ञ बनकर फतवे दे रहे है।

किस सियासी दलो को वोट दे – किसे ना दे, किस हुकुमत की हिमायत करे किस हुकुमत की मुखालफत करे। इन मामलो मे आप लोगो के खूब बयान आते है। खूब प्रेस कॉन्फ्रेंस भी करते है आप लोग। लेकिन क्या आपने कभी ” फतेह का फतवा, टीवी शो के खिलाफ आवाज उठायी। किन-किन दलालो, फसादियो, कठमुल्लाओ , शरियत के अनाडियो/जाहिलो से शरियत की के फतवे मांगे जा रहे है। तमाम मुस्लिम मसायल और सामाजिक/राष्ट्रीय मुद्दो पर इनकी राय को इस्लामी नजरिये के तौर पर पेश किया जा रहा है। एक नेशनल टीवी पर सीआईए का कथित एजेन्ट फतवा देने के लिये बैठाया जाता है। कुछ दाढी और टोपी वाले जाहिल और कुछ तथाकथित मुस्लिम जाहिल औरतो के बीच शरियत के मसाइल पर जूतमपैजार किया जाता है।

इस तरह के टीवी शो के जरिये टीवी चैनल्स इस्लाम को बदनाम करने का टारगेट पूरा करके जबरदस्त टीआरपी लाते है। अरबो रूपये और करोडो डालर से मालामाल हो रहे है। और आप लोग शरियत की द्रोपदी का चीरहरण होता देख रहे है। इस्लाम के दुश्मन मुल्को के कथित एजेन्ट शरियत, कुरआन और हदीस के झूठे हवालो के साथ फतवे दे रहे है और शरियत के असली जानकार उलमा .. वक्फ बोर्ड .. आजम खान … वसीम रिजवी … सपा- बसपा- काग्रेस- भाजपा …. मे ही उलझ कर रह गये है। यानी एजेन्ट शरियत के अधिकृत उलमा बनकर फतवे दे रहे है और शरियत के सचमुच के जानकार उलमा सपा, बसपा,काग्रेस,भाजपा की एजेन्टगीरी पर उतर आये है।

मजाक नहीं कर रहा, इस्लाम सचमुच खतरे में है।

नवेद शिकोह
09918223245

भाजपा के आंबेडकर प्रेम का सच

उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से चुनाव जीतने के बाद भातीय जनता पार्टी (भाजपा) को यह अहसास हुआ है कि इस चुनाव में उसे सबसे अधिक आरक्षित सीटें मिली हैं क्योंकि दलितों का एक बड़ा हिस्सा उसकी तरफ आ गया है. इस सफलता में उस द्वारा पिछले कुछ वर्षों से आंबेडकर के प्रति दिखाए गए प्रेम का भी काफी बड़ा हाथ है. दलितों को आकर्षित करने के लिए उसने दलित नेताओं को भाजपा में शामिल  करने के साथ साथ आंबेडकर को भी हथियाने के गंभीर प्रयास किये हैं. एक तरफ जहाँ उसने इंग्लॅण्ड में डॉ. आंबेडकर के पढ़ाई के दौरान रहने वाले मकान को खरीद कर स्मारक का रूप दिया है वहीँ दूसरी तरफ बम्बई में उनके रहने के  स्थान पर एक भव्य स्मारक बनाने हेतु भूमि का अधिग्रहण भी किया है. पिछले साल मोदीजी ने दिल्ली में बाबासाहेब के निवास स्थान पर एक भव्य स्मारक बनाने का शिलान्यास भी किया था. 

आगामी 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती के अवसर पर भाजपा ने डॉ. आंबेडकर को आगे हथियाने के प्रयास में पूर्व की अपेक्षा इसे बहुत बड़े स्तर पर मनाने की घोषणा की है. इसके अनुसार उस दिन बाबासाहेब के चित्र पर माल्यार्पण एवं उनका स्तुति गान करने के साथ साथ प्रत्येक मंडल स्तर पर बृहद समुदायक सहभोज का आयोजन भी किया गया है जिसमे भाजपा के सभी नेता अधिक से अधिक संख्या में भाग लेंगे. इसके बाद वे दलितों की सेवा बस्तियों में जायेंगे और उनके साथ अपनी एकता प्रदर्शित करेंगे.

आरएसएस और बीजेपी शुरू से ही जाति-विरोधी नजरिया रखते रहे हैं और अंतरजातीय सहभोज उसका एक पहलु रहा है. आरएसएस विचारधारा के स्तर पर जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ रहा है यद्यपि वह जाति के उच्छेद की वकालत नहीं करता है परन्तु जाति के मुद्दे पर वह रोटी-बेटी के सम्बन्ध द्वारा इसे व्याखित करता रहा है. इसके इलावा वह तथा उसके अनुषांगिक संगठन अधिक से अधिक लोगों को अपने में शामिल करने के लिए  “एक मंदिर, एक शमशान घाट तथा एक कुआं” की वकालत करते रहे हैं. इसके पीछे उनका मंशा अपने संगठन में भोजन, पूजा स्थल और पानी के श्रोत सम्बन्धी भेदभाव को समाप्त करना रहा है.

आरएसएस और भाजपा द्वारा अधिक से अधिक दलितों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए जो कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं या डॉ. आंबेडकर को हथियाने के लिए जो आयोजन किये जा रहे हैं क्या उनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि वह वास्तव में वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था को समाप्त करके समतामूलक समाज की स्थापना के पक्षधर बन गए हैं. इसके साथ ही क्या यह कहा जा सकता है कि आरएसएस या भाजपा (पूर्व जनसंघ) जिसने डॉ. आंबेडकर का उनके जीते जी इतना कड़ा विरोध किया था का हृदय परिवर्तन हो गया है और उन्होंने उन्हें पूरी तरह से स्वीकार कर लिया है. इसके साथ ही वे डॉ. आंबेडकर के हिन्दू राष्ट्र के प्रबल समर्थक और कट्टर मुस्लिम विरोधी होने की बात को भी जोर शोर से प्रचारित करते रहे हैं. अतः इस विषय का गहन विश्लेषण करने की ज़रुरत है.

अपने प्रसिद्ध लेख “राज्य और क्रांति” में लेनिन ने कहा है, “मार्क्स की शिक्षा के साथ आज वही हो रहा है, जो उत्पीड़ित वर्गों के मुक्ति-संघर्ष में उनके नेताओं और क्रन्तिकारी विचारकों की शिक्षाओं के साथ इतिहास में अक्सर हुआ है. उत्पीड़क वर्गों ने महान क्रांतिकारियों को उनके जीवन भर लगातार यातनाएं दीं, उनकी शिक्षा का अधिक से अधिक बर्बर द्वेष, अधिक से अधिक क्रोधोन्मत घृणा तथा झूठ बोलने और बदनाम करने की  अधिक से अधिक अंधाधुंध मुहिम द्वारा स्वागत किया. लेकिन उन की मौत के बाद उनकी क्रन्तिकारी शिक्षा को सारहीन करके, उसकी क्रन्तिकारी धार को कुंद करके, उसे भ्रष्ट करके उत्पीड़ित वर्गों को “बहलाने”, तथा धोखा देने के लिए उन्हें अहानिकर देव-प्रतिमाओं का रूप देने, या यूँ कहें, उन्हें देवत्व प्रदान करने और उनके नामों को निश्चित गौरव प्रदान करने के प्रयत्न किये जाते हैं.” क्या आज आंबेडकर के साथ भी यही नहीं किया जा रहा है?

पिछले वर्ष हमारे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी ने आंबेडकर राष्ट्रीय मेमोरियल के शिलान्यास के अवसर पर डॉ. आंबेडकर मेमोरियल लेक्चर दिया था जिस में उन्होंने डॉ. आंबेडकर के कृत्यों की प्रशंसा करते हुए अपने आप को आंबेडकर भक्त घोषित किया था. उनकी यह घोषणा भाजपा की हिंदुत्व की भक्ति के अनुरूप ही है क्योंकि भक्ति में आराध्य का केवल गुणगान करके काम चल जाता है और उस की शिक्षाओं पर आचरण करने की कोई ज़रुरत नहीं होती. तब मोदी जी ने भी डॉ. आंबेडकर का केवल गुणगान किया था जबकि उन की शिक्षाओं पर आचरण करने से उन्हें कोई मतलब नहीं है. यह गुणगान भी लेनिन द्वारा उपर्युक्त रणनीति के अंतर्गत किया जा रहा है. कौन नहीं जानता कि भाजपा की हिन्दुत्ववादी विचारधारा और आंबेडकर की समतावादी विचारधारा में छत्तीस का आंकड़ा है. आइये  इस के कुछ पह्लुयों का विवेचन करें-

अपने भाषण में मोदी जी ने कहा था- कि डॉ. आंबेडकर ने जाति के विरुद्ध लडाई लड़ी थी परन्तु कौन नहीं जानता कि भाजपा का जाति और वर्ण व्यवस्था के बारे में क्या नजरिया है. डॉ. आंबेडकर ने तो कहा था कि जातिविहीन एवं वर्गविहीन समाज की स्थापना हमारा राष्ट्रीय लक्ष्य है परन्तु भाजपा और उसकी जननी आरएसएस तो समरसता (यथास्थिति) के नाम पर जाति और वर्ण की संरक्षक है. मोदी जी का जीभ कटने पर दांत न तोड़ने का दृष्टान्त भी इसी समरसता अर्थात यथास्थिति का ही प्रतीक है.   

मोदी जी ने अपने भाषण में बाबा साहेब की मजदूर वर्ग के संरक्षण के लिए श्रम कानून बनाने के लिए प्रशंसा की थी. परन्तु मोदी जी तो मेक-इन-इंडिया के नाम पर सारे श्रम कानूनों को समाप्त करने पर तुले हुए हैं. जिन जिन प्रदेशों में भाजपा की सरकारें हैं वहां वहां पर श्रम कानून समाप्त कर दिए गए हैं. पूरे देश में सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्र में नियमित मजदूरों की जगह ठेकेदारी प्रथा लागू कर दी गयी है जिस से मजदूरों का भयंकर शोषण हो रहा है. बाबा साहेब तो मजदूरों की राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी के प्रबल पक्षधर थे. यह भी सर्वविदित है कि वर्तमान में मजदूरों के कल्याण सम्बन्धी जितने भी कानून हैं वे अधिकतर डॉ. आंबेडकर द्वारा ही बनाये गए थे जिन्हें वर्तमान सरकार एक एक करके समाप्त कर रही है या कमज़ोर बना  रही है.

बाबा साहेब के बहुचर्चित “शिक्षित करो, संघर्ष करो और संगठित करो” के नारे को बिगाड़ कर “शिक्षित हो, संगठित हो और संघर्ष करो” के रूप में प्रस्तुत करते हुए मोदी जी ने कहा था कि बाबा साहेब शिक्षा को बहुत महत्व देते थे और उन्होंने शिक्षित हो कर संगठित होने के लिए कहा था ताकि संघर्ष की ज़रुरत ही न पड़े. इस में भी मोदी जी का समरसता का फार्मूला ही दिखाई देता है जबकि बाबा साहेब ने तो शिक्षित हो कर संघर्ष के माध्यम से संगठित होने का सूत्र दिया था. बाबा साहेब तो समान, अनिवार्य और सार्वभौमिक शिक्षा के पैरोकार थे. इस के विपरीत वर्तमान सरकार शिक्षा के निजीकरण की पक्षधर है और शिक्षा के लिए बजट में निरंतर कटौती करके गुणवत्ता वाली शिक्षा को आम लोगों की पहुँच से बाहर कर रही है.

अपने भाषण में आरक्षण को खरोच भी न आने देने की बात पर मोदी जी ने बहुत बल दिया था. परन्तु उन्होंने वर्तमान में आरक्षण पर सब से बड़े संकट पदोन्नति में आरक्षण सम्बन्धी संविधान संशोधन का कोई उल्लेख नहीं किया था. इसके साथ ही दलितों की निजी क्षेत्र और न्यायपालिका में आरक्षण की मांग को बिलकुल नज़रंदाज़ कर दिया जाता रहा है. उन्होंने यह भी नहीं बताया कि निजीकरण के कारण आरक्षण के निरंतर घट रहे दायरे के परिपेक्ष्य में दलितों को रोज़गार कैसे मिलेगा. इसके अतिरिक्त आरएसएस के अलग अलग पदाधिकारी आरक्षण की समीक्षा तथा इसका आर्थिक आधार बनाये जाने की मांग करते रहे हैं.

मोदी जी ने इस बात को भी बहुत जोर शोर से कहा था कि डॉ आंबेडकर औद्योगीकरण के पक्षधर थे परन्तु उन्होंने यह नहीं बताया कि वे निजी या सरकारी किस औद्योगीकरण के पक्षधर थे. यह बात भी सही है कि भारत के औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण में जितना योगदान डॉ. आंबेडकर का है उतना शायद ही किसी और का हो. उन्होंने यह महान कार्य 1942 से 1946 तक वायसराय की कार्यकारिणी समिति के श्रम सदस्य के रूप में किया था परन्तु इसके लिए उन्हें कोई भी श्रेय नहीं दिया गया.. डॉ. आंबेडकर ने ही उद्योगों के लिए सस्ती बिजली, बाढ़ नियंत्रण और कृषि सिचाई के लिए ओडिसा में दामोदर घाटी परियोजना बनाई थी. बाद में इसके अनुसरण में ही देश में बहुउद्देशीय हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स बने थे. इस के लिए उन्होंने ही सेंट्रल वाटर एंड पावर कमीशन तथा सेंट्रल वाटरवेज़ एंड नेवीगेशन कमीशन की स्थापना की थी. हमारा वर्तमान पावर सप्लाई सिस्टम भी उनकी ही देन है.

यह सर्विदित है कि बाबासाहेब राजकीय समाजवाद के प्रबल समर्थक थे जब कि मोदी जी तो निजी क्षेत्र और न्यूनतम गवर्नेंस के सब से बड़े पैरोकार हैं. बाबासाहेब तो पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद को दलितों के सब से बड़े दुश्मन मानते थे. मोदी जी का निजीकरण और भूमंडलीकरण बाबासाहेब की समाजवादी अर्थव्यवस्था की विचारधारा के बिलकुल विपरीत है. मोदी जी ने डॉ. आंबेडकर की एक प्रख्यात अर्थशास्त्री के रूप में जो प्रशंसा की थी वह तो ठीक है. परन्तु बाबासाहेब का आर्थिक चितन तो समाजवादी और कल्याणकारी अर्थव्यस्था का था जिस के लिए नोबेल पुरूस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने उन्हें अपने अर्थशास्त्र का पितामह कहा है. इसके विपरीत मोदी जी का आर्थिक चिंतन और नीतियाँ पूंजीवादी और कार्पोरेटपरस्त हैं.

अपने भाषण में मोदी जी ने कहा था कि डॉ. आंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल को लेकर महिलायों के हक़ में अपने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. यह बात तो बिलकुल सही है कि भारत के इतिहास में डॉ. आंबेडकर ही एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने दलित मुक्ति के साथ साथ हिन्दू नारी की मुक्ति को भी अपना जीवन लक्ष्य बनाया था और उन के बलिदान से भारतीय नारी को वर्तमान कानूनी अधिकार मिल सके हैं. बाबासाहेब ने तो कहा था कि मैं किसी समाज की प्रगति का आंकलन उस समाज की महिलायों की प्रगति से करता हूँ. इस के विपरीत भाजपा सरकार की मार्ग दर्शक आरएसएस तो महिलायों को मनुस्मृति वाली व्यवस्था में रखने की पक्षधर है.

मोदी जी ने डॉ. आंबेडकर का लन्दन वाला घर खरीदने, बम्बई में स्मारक बनाने और दिल्ली में आंबेडकर स्मारक बनाने का श्रेय भी अपनी पार्टी को दिया था. वैसे तो मायावती ने भी दलितों के लिए कुछ ठोस न करके केवल स्मारकों और प्रतीकों की राजनीति से ही काम चलाया है. भाजपा की स्मारकों की राजनीति उसी राजनीति की पूरक है. शायद मोदी जी यह जानते होंगे कि बाबा साहेब तो अपने आप को बुत पूजक नहीं बुत तोड़क कहते थे और वे व्यक्ति पूजा के घोर विरोधी थे. बाबा साहेब तो पुस्कालयों, विद्यालयों और छात्रावासों की स्थापना के पक्षधर थे. वे राजनीति में किसी व्यक्ति की भक्ति के घोर विरोधी थे और इसे सार्वजनिक जीवन की सब से बड़ी गिरावट मानते थे. परन्तु भाजपा में तो मोदी जी को एक ईश्वरीय देन मान कर पूजा जा रहा है.

अपने भाषण में मोदी जी ने दलित उद्यमिओं को प्रोत्साहन देने का श्रेय भी लिया था. मोदी जी जानते होंगे कि इस से कुछ दलितों के पूंजीपति या उद्योगपति बन जाने से इतनी बड़ी दलित जनसँख्या का कोई कल्याण होने वाला नहीं है. दलितों के अंदर कुछ उद्यमी तो पहले से ही रहे हैं. दलितों का कल्याण तो तभी होगा जब सरकारी नीतियाँ जनपक्षीय होंगी न कि कार्पोरेटपरस्त. दलितों की बहुसंख्या आबादी भूमिहीन तथा रोज़गारविहीन है जो उनकी सब से बड़ी कमजोरी है. अतः दलितों के सशक्तिकरण के लिए भूमि-आबंटन और रोज़गार गारंटी ज़रूरी है जो कि मोदी सरकार के एजंडे में नहीं है.   

उपरोक्त संक्षिप्त विवेचन से स्पष्ट है कि अपने भाषण में मोदी जी द्वारा डॉ. आंबेडकर का किया गया गुणगान उन्हें केवल राजनीति के लिए हथियाने का प्रयास मात्र है. उन्हें डॉ. आंबेडकर की विचारधारा अथवा शिक्षाओं से कुछ भी लेना देना नहीं है. सच तो यह है कि भाजपा और उसकी मार्ग दर्शक आरएसएस की नीतियाँ तथा विचारधारा डॉ. आंबेडकर  की समतावादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक विचारधारा के बिलकुल विपरीत है. वास्तविकता यह है कि भाजपा सहित अन्य  राजनैतिक पार्टियाँ भी डॉ. आंबेडकर को हथिया कर दलित वोट प्राप्त करने की दौड़ में लगी हुयी हैं जब कि किसी भी पार्टी का दलित उत्थान का एजंडा नहीं है. अब यह दलितों को देखना है कि क्या वे इन पार्टियों के दलित प्रेम के झांसे में आते हैं या डॉ. आंबेडकर से सही प्रेरणा लेकर अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष का मार्ग अपनाते हैं. 

एस.आर. दारापुरी
राष्ट्रीय प्रवक्ता
आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

‘इंदौरी’ भण्डारा..!

`लौन्डा-लपाड़ी मित्रमण्डल’ आप सभी ‘धरम पिरेमी’ जनता का हारदीक-हारदीक अभिनंदन करती है… सुवागत करती है… वंदन करती है… इसी के साथ जनता ‘हेमा’ बन गई… (अब इतना डिपली में मत घुसो और आगे बढ़ो!)

वो हुवा यूं कि अपन भण्डारे में गए थे… ये लिख इसलिए रिया हूं कि भण्डारे की लोकेशन ही कुछ ऐसी थी कि – एकदम खुल्लमखुल्ला जगो… (गंदगी वाला ‘झक्कास कम्पाउण्ड’ बोल सकते हो!)… अपन ने आयोजक को ‘दण्डवत’ तभी कर दिया जब देखा कि एक ओर ‘कल्लू की कलाली’ पर ‘सोमरस’ के लिए ‘श्रद्धालु’ लाइन में लगे थे, वहीं उसके ठीक सामने ‘जिमने का जश्न’ चल रहा था… मतलब इधर पियो… और उधर सूतो…

सूतने में तो तादाद कम थी, लेकिन ‘लपक की झपक’ ‘कल्लू की कलालीÓ पर ज्यादा थी… इसी बीच अपना नम्बर भी सूतने के लिए आ गया… अपन भी सूतने में माहिर ठहरे… ‘कर्मठों’ ने पेले तो 3-4 जगो से उठाया… भिया यां नी… भिया वां नी… अपन ने पूछ ही लिया… भिया ‘सूतने’ आया हूं, तुम तो ‘सताने’ लगे… डांस कर दूं क्या..!

जैसे-तेसे जगो मिली, बैठ गए…, दोने-पत्तल आए… गिलास के साथ पूड़ी-सब्जी भी आ ही गई थी… अपनने खाना चालू किया ही था कि पास में बैठा ‘टल्ली टुनटुन’ बोला – भिया कैसा बना..?  मैं बोला – अरे, भिया खान्तो दो..!
 
अपन समझ ही गए थे कि भिया ‘सोमरस’ का स्वाद लेकर आए हैं… फिर 2-3 पूड़ी सूती ही थी कि टल्ली टुनटुन फिर बोल उठा…  खैर, इस बार उसका टारगेट सामने वाला था – भिया कुछ मंगाऊँ क्या..? टल्ली टुनटुन पूछ-परख तो ऐसी कर रिया था कि मानों जंवाईं के ससुराल वालों को निमंत्रण पर बुलाया हो…

इसी बीच माइक से अनाऊंस हुआ… लौन्डा-लपाड़ी मित्रमण्डल भाई ‘छगन छबिला’ का हारदीक-हारदीक स्वागत करती है… वंदन करती है… अभिनंदन करती है… ‘माइक का माइकल’ आगे बोला… भाई छगन छबिला की ओर से इस भंडारे में ‘अति स्वादिष्ट’ भूमिका निभाई है… मैंने मन में सोचा – ‘अति स्वादिष्ट’ मतलब!! माइकल बोला – भिया ने भंडारे में ‘नमक’ की व्यवस्था करवाई है… मैंने भी छगन छबिला को ‘सब्जी सहित परणाम’ किया… वाकई बन्दे ने ‘नमकÓ का कर्ज अदा किया था… बस थोड़ा ‘कम’ था, वो अलग बात है..!

भण्डारे की सब्जी की बात ही अलग होती है… तीन पूड़ी जादा सूती… इसी बीच माइकल फिर बोल उठा… लौन्डा-लपाड़ी मित्रमण्डल एक बार फिर हमारे जुझारू… कर्मठ… अण्ड-सण्ड आवाज निकालने वाले… भाई… पप्पू पाटनीपुरी (ऑन ली ‘पाटनीपुरी’ नॉट ‘पानीपुरी’… ऑफ ली तो कुछ भी बोल सकते हो… मुझे क्या!!)  का हार्दिक सुवागत करता है…
वहीं मैं कोरा ठूंस ही रहा था कि टल्ली टुनटुन फिर बोला – भाई कैसा बना..? मैंने बोला… भाई एक नम्बर… वो बोला… पर हो तो ‘दो नम्बर’ में रिया है… ऐसा कहते ही टल्ली टुनटुन की ‘वार्तालाप’ ने मेरे ‘खाने’ को ‘भोजविलाप’ में बदल दिया…

खैर अपन तो निपट चुके थे… अब दौर विदाई का था… अरे भिया… इतना माथा तो खपा लिया… पर ये नी पूछा कि भण्डारा काए का था..? खैर, ये तो मैं भी नहीं बता सकता… पता ही नी चल रिया था… बस ‘माइक का माइकल’ यही बोल रिया था… ‘विशाल भण्डारा… विशाल भण्डारा…’ लगता है किसी ‘विशाल’ को भण्डारे के लिए बुला रिया था…
अपन जाने के लिए गाड़ी पीछे मोड़ ही रिये थे कि मन में ‘खोजी खियाल’ आया… यार इस ‘विशाल’ का पता तो करो..! इसी बीच टल्ली टुनटुन प्रकट हुए… मैंने पूछा – भाई, ये ‘विशाल’ है कहां..? वो बोला – भिया मेरे साथ ही ‘कल्लू की कलाली’ पर था… मैं उसे सुला के आया हूं उसके घर पे… जादा हो गई थी, इसलिए आ नी पाया… तब जा के अपने को तसल्ली हुई… अपनने टल्ली को बोला – जा फिर माइकल को बोल आ… फिर अपन निकल लिए… इसी के साथ जय-जय सिया राम..!!

(नोट – यह लेख पूरी तरह से काल्पनिक है… इसे केवल ‘हास्य-व्यंग्य’ के रूप में ही लिया जाए…)

रोहित पचौरिया `इंदौरी’
8827875444
rohitpachoriya1992@gmail.com

जानवर क्यों हो रहे हैं आक्रामक?

देहरादून। मनुष्य स्वयं तो स्वतंत्रता चाहता है मगर दूसरे को अपने वश में रखना चाहता है। जैसे पालतू बेजुबानों के साथ करता है। बंधन में रखना, उन पर अत्याचार करना, पालतू जानवरों से उनकी क्षमता से अधिक कार्य लेना अपना अधिकार समझता है। यही नहीं जंगली जानवरों पर भी अपना अधिकार जताता है। अपने को सबसे शक्तिशाली जता कर बेजुबानों के आगे दंभ भरने को शायद अपनी फितरत समझता है।

मनुष्य की मूर्खतापूर्ण हरकतों से जानवरों के व्यवहार में जो बदलाव हो रहा है वह मनुष्य के लिए ही खतरनाक साबित हो रह है। अक्सर देखने में उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में जंगली जानवरों द्वारा मनुष्य एवं पालतू पशुओं पर आए दिन हमले किए जाना वास्तव में चिंता का विषय बनता जा रहा है। जंगली जानवरों द्वारा आक्रमण किए जाने का बदला हम उन्हें मार कर ले रहे हैं। शायद हम यह सोच रहे हैं कि उनका खात्मा कर इस समस्या से छुटकारा पा लेंगे। मगर यह समस्या का हल नहीं। हमने कभी भी यह सोचने की हिमाकत ही नहीं कि जानवर आक्रामक क्यों हो रहे हैं? वास्तव में सच्चाई यह है कि जंगली जानवरों को आक्रमक बनाने में मनुष्य का सबसे बड़ा हाथ है।

विकास के नाम पर मनुष्य की जंगलों में जबरन घुसपैठ से जंगली जानवर स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्हें उनके अनुकूल वातावरण न मिलने के कारण उनके व्यवहार में बदलाव आना स्वाभाविक है। दूसरे प्राकृतिक आपदाओं से भी उनका जीवन- चक्र प्रभावित हो रहा है। भोजन एवं अपने अनुकूल वातावरण की खोज में आबादी की ओर उनकी चहलकदमी बढ़ती ही जा रही ही है। जिसके कारण मनुष्य व पालतू जानवरों पर हावी होकर उन्हें अपना शिकार बना रहे हैं।पहाड़ी इलाकों में ही नहीं तराई क्षेत्र में भी जंगली जानवरों के धमक बढ़ती ही जा रही है।मैदानी क्षेत्रों में अक्सर गुलदार, हाथियों, बंदरों जैसे जानवरों का आतंक बढ़ता ही जा रहा है। इनके हमलों से यदि बचना है तो हमें सबसे पहले जंगलों को बचाना होगा। उनके अधिकार क्षेत्र मुक्त करने होंगे। इसके लिए सरकार व आम नागरिक को एकजुट होकर काम करना होगा। वरना आदमखोर जानवरों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती रहेगी। जंगली जानवर और अधिक आक्रामक न बनें व मनुष्य को भी कोई नुकसान न पहुंचे इसके लिए पहले बीच का रास्ता ढूंढना दोनों के लिए हितकर होगा। बेजुबानों के साथ यदि अच्छा व्यवहार किया जाए, उनकी पीड़ा समझी जाए तो उनका रुख भी नरम होगा।

ओम प्रकाश उनियाल                        
9760204664

नए रूप में महुआ प्लस, अब मिलेगा और ज़्यादा मनोरंजन

काफी कम समय में देश विदेश के भोजपुरिया दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बनाने मे कामयाब रहा महुआ प्लस अब दर्शकों को एक नए कलेवर और नये रंग रूप में नज़र आएगा। महुआ प्लस पहले से ही अपने एक से बढ़कर एक  बेहतरीन रिएलिटी शोज के लिए दर्शकों के बीच काफी प्रसिद्द है जिसके वजह से यह चैनल दर्शकों के बीच पहली पसंद के साथ हमेशा सुर्खियों मे रहा है। भौजी नं वन, सुरवीर जैसे रिएलिटी शोज, नए भोजपुरी फिल्म, हिंदी – भोजपुरी फ़िल्मी गाने , भक्ति भजन आरती जैसे उम्दा कार्यक्रम को दर्शकों ने हमेशा अपना प्यार दिया है।

अब एक बार फिर महुआ प्लस दर्शकों को ध्यान मे रखते हुए दर्शकों के पसंद के प्रोग्राम ,नए – नए फिल्म और गानों के साथ आने वाले समय  मे कई नए प्रोग्राम की भी शुरुवात करने वाली है “सोंग्स ऑन डिमांड” जैसे प्रोग्राम जल्द ही लांच होंगे…जिसमे दर्शक अपने पसंद के गाने “सोंग्स ऑन डिमांड” प्रोग्राम मे देख पायेंगे । यह प्रोग्राम अन्य टेलीविज़न के प्रोग्राम से बिलकुल अलग होगा इस प्रोग्राम की खास बात यह होगी कि दर्शक अपने पसंद के गाने “WHATSAPP”  MESSAGE के जरिए हमे भेजेंगे और लाइव देख सकेंगे।

विशेष अवसर पर नए- नए महुआ प्लस और भी कई अन्य खास प्रोग्राम लेकर आयेंगे। इसे भोजपुरी जगत के आपके चहेते सितारे मोनालिसा, आम्रपाली दुबे, गुंजन पन्त, सीमा सिंह, पवन सिंह, खेसारीलाल, निरहुआ,विक्रांत सिंह राजपूत,प्रियेश सिन्हा,देवी, गोपाल राय,  विनय आनंद, व अन्य भोजपुरी सितारेंअपने दमदार परफॉरमेंस से सजाएंगे. महुआ प्लस अब DEN NETWORK, SITI MAURYA, FASTWAY, ASIANET, SKYNET, SEVENSTAR, E DIGITAL, NETVISION, HDS, GTPL  जैसे बड़े केवल नेटवर्क पर भी उपलब्ध है।
  
प्रेस रिलीज.

जब पुलिस अफसर ने कहा- काजू खान, मैं आपकी हिस्ट्री जानता हूं!

एक पुलिस अधिकारी के वक्तत्व पर समर्पित मेरा यह आलेख! हुआ यूं की मैंने एक मामले को लेकर पुलिस अधिकारी से कल बात की। उस अधिकारी ने अपने पद के रौब में आकर मुझे अर्दब देने के लिए कहा “काजू खान” मैं आपकी हिस्ट्री जानती हूं। पुलिस अधिकारी का यह कहना कितना जायज है, और उसके क्या मायने हैं। मैंने सच को हमेशा सच कहा है कभी कोई प्रशासनिक अधिकारी अगर गलत रहा है तो मैंने उसे गलत ही कहा है। मैं दिन को दिन ही कहूंगा, किसी के दबाव में रात नहीं कह सकता हूं। रही बात मेरी हिस्ट्री की तो इतना समझ लो, किसी ने बदतमीजी की तो मैंने उसे मुंह तोड़ जवाब दिया है, फिर चाहे पुलिस विभाग के सब इंस्पेक्टर ने मुझे गोली ही क्यों न मार दी हो।

मुझ पर लिखे गए मुकदमे, पुलिस की ढोंगी दरियादिली का नमूना है, मेरे ऊपर पुलिस इंस्पेक्टर ने मुकदमा दर्ज किया कि मैंने कोतवाली में घुसकर पुलिस वालों पर हमला किया! अब यह बात स्वत: स्पष्ट हो जाती है कि पुलिस कितनी कमजोर है, या फिर मक्कार! मुकदमों की संख्या बढ़ जाने से कोई अपराधी नहीं हो जाता है। सच बोलना और सच के लिए लड़ना मेरे लिए एक आंदोलन है। या आंदोलन मेरा जारी रहेगा।

मैं यह भी जानता हूं की पुलिस मेरी हिस्ट्री नहीं बल्कि मेरे ऊपर गोलियां भी चलवा सकती है, मुझे जेल भिजवा सकती है। तो क्या जेल जाने या फिर मौत से बचने के लिए जिंदगी छोड़ दूं। मेरे सच को सच समझो, इसे आंदोलन समझो, इसे इस युग की एकल क्रान्ति समझो। तुम घूसखोर, रिश्वतखोर, बे अंदाज हो, तुम्हें अंदाजा नहीं समय की गतिविधियों का! समयचक्र एक सा नहीं रहता, इसके बदलने का तुम्हें अंदाजा भी नहीं है। मुकदमें तो भगतसिंह, अशफाक उल्ला, राजगुरु पर भी ब्रिटिश हुकूमत ने लिखा था लेकिन भगत सिंह, अशफाक उल्ला, राजगुरु का उद्देश्य अत्याचारियों के विरुद्ध अपने आंदोलन का संदेश था। देश की आवाम को अत्याचारियों के विरुद्ध खड़ा करना था, हो सकता है कि ब्रिटिश हुकूमत के लिए वह अपराधी थे, लेकिन जिनकी आजादी के लिए लड़े और हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़े उनके लिए जननायक है।

मेरा इतिहास (हिस्ट्री) भी दूसरों की हक की लड़ाई लड़ने के लिए बना है। और इस इतिहास को और भी गंभीर बनना है, अभी तो यह अंगड़ाई है। जन आकांक्षाओं की अनदेखी करने वाले भ्रष्ट अफसरों और भ्रष्ट व्यवस्था के लिए मेरा आंदोलन जारी रहेगा। मेरे पत्रकार मित्र के ऑफिस में एक स्लोगन लिखा है
“मेरी कलम के पुर्जे सलामत हैं जब तक,
तब तक यह जंग जारी है,
जिस दिन स्याही कलम की खत्म हो जाए,
उस दिन मुझे जला देना”

ना मुकम्मल है अभी वर्दी पुलिस की हुजूर,
इनमें कुछ चूड़ियों का इजाफा होना चाहिए।

यह शेर जब कभी भी लिखा गया था उस वक्त शायर के दिमाग में पुलिस विभाग की बदली व्यवस्था की कल्पना भी नहीं होगी, लेकिन मौजूदा परिवेश में सब कुछ बदल गया है और भाषाई रुप से आज भी पिछड़ी हुई है पुलिस।

जय हिंद
जय भारत
आपका अपना
काजू खान (पत्रकार)
kajukhan123@gmail.com
संपर्क सूत्र – 08924999786

डीयू नॉर्थ कैंपस के हॉस्टलस की अनसुनी कहानियां पर है मूवी ‘माय वर्जिन डायरी’

वर्जिन ट्री की पूजा के बारे में आपने तो सुना ही होगा, हिन्दू कॉलेज के हॉस्टलर्स अपनी वर्जिनिटी से छुटकारा पाने के लिए हर साल 14th Feb को इसकी धूमधाम से पूजा करते है, ये एक बहुत ही बड़ा उत्सव होता हैं!  मूवी के बारे में : “माय वर्जिन डायरी” मूवी, नॉर्थ कैंपस दिल्ली विश्विद्यालय, के हॉस्टलस की उन अनसुनी कहानियों के बारे में है! वहां ज़िन्दगी की शुरआत रात में होती है, सिगरेट और चाय के प्याले पर ज़िन्दगी की सारी उलझनों का समाधान खोजा जाता हैं !

यहाँ डिस्कसनस थिअटर, पॉलिटिक्स, फिलोसोफी, U.P.S.C. की तैयारी, इलेक्शन्स, सिविल सर्विसेज़ की तैयारी आदि से शुरुआत होती है, और गर्लफ्रेंड/बॉयफ्रेंड कैसे बनाएं, पर ख़तम होती हैं! हडसन लेन, किंग्सवे कैंप, कमला नगर, जी. टी. बी. नगर, निरंकारी कॉलोनी इत्यादि उन स्टूडेंट्स से भरे पड़े है जो यहाँ पर पी. जी. या फ्लैट्स को कीराऐ पर लेकर रहते हैं! माँ – बाप के साये से दूर यहाँ पर उनकी खुद की पहचान होती  है, यहाँ पर उनकी अपनी भाषा, फैशन, और आइडियालोजी होती हैं!

अपने कैंपस जीवन में जो वयक्तिगत प्रयोगो तथा घटनाओ को ध्यान में रखते हुए डायरेक्टर नलिन सिंह ने “माय वर्जिन डायरी ” फिल्म को निर्देशित किया हैं! “माय वर्जिन डायरी ” “हिंदू कॉलेज हॉस्टल में अपने ऐक्स रूम पार्टनर ‘अरुण जायसवाल (जिन्होंने बाद में आत्महत्या कर ली) को समर्पित हैं ! अरुण जायसवाल और हमारे अन्य साथियो ने मिल कर “परिवतन” नुक्कड़ नाटक सोसाइटी की स्थापना कि  थी !
दिल्ली विश्विद्यालय एवं अन्य राष्ट्रीय स्तर पर नुक्कड़ नाटक प्रतियोगिताओ एवं कॉलेज के समारोहों में उनके नाटको को सवर्ण पदक से पुरस्कारीत किया गया था! “माय वर्जिन डायरी” सभी अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर इन गर्मी छुट्टियो में रिलीज होने वाली हैं! नलिन सिंह का कैहन है कि – मेरे दर्शक  जो की ज्यादातर यूथ है, मूवी को मोबाइल पर  देखना पसन्द करते है, इसलिए इस बार हमने इस मूवी को डिजिटल  प्लेटफॉर्म्स एवम मोबाइल ऐप्स पर रिलीज़ करने का फैसला किया है, ये मूवी फ्रेंच, जर्मन एवम अंग्रेजी में भी डब की जाएगी! इस मूवी में पोलेंड और ब्राजील की अभिनेत्रीओ के काफी हॉट सीन्स हैं!

Bollywood Actor Director Nalin Singh comes up with a movie ‘My Virgin Diary’ which is based on those untold stories of the hostels and the pg’s north campus. Few small town Indian guys, rebel in their college and form a musical band. The band becomes popular and it is their first experience of life, sex, money and salvation. “It’s dedicated to my Ex roomy Arun Jaiswal, from Hindu College, he had later committed suicide. We often use to sit down, meditate and not only talk about the philosophies, but implement them also in our personal lives. When me and Arunesh were penning down the script, We were scared and very conscious as we were on a very dangerous path, dealing with the subject, that wanted us to live two types of lives, one on the spiritual front and the other, that dealt with the day to day life, I was in the mountains and  then on the beaches for months, before I clubbed my thoughts with lot of humour and entertaining music for the international audience” said Nalin Singh.

“Have you heard the colors speaking, have you heard the music that comes out of a non living thing, is your third eye awakened yet, I will take you to trance, make you fly in the skies, with music, when you look at down from the top, the life that you are leading will seem so funny to you…” said Nalin Singh. ‘My Virgin Diary’ is scheduled to be released this year, on all international and national digital platforms; it will be subtitled in English for the western audiences.

सरकार के संरक्षण में युवा वाहिनी कर रही है ईसाइयों पर हमले!

उत्तर प्रदेश की पुलिस हिन्दू वाहिनी की लठैत बन गयी है…. दलितों पर हमले करने वाले सवर्णों को पता है कि मुख्यमंत्री उनके समर्थक हैं…

लखनऊ : रिहाई मंच में महाराजगंज में हिन्दू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं द्वारा धर्मान्तरण का आरोप लगाकर जबरन चर्च में प्रार्थना रोकने पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि हिन्दू युवा वाहिनी के लोग अल्पसंख्यक समुदाय के मौलिक अधिकारों का हनन कर रहे है जिसको बर्दाश्त नही किया जायेगा. मंच ने राजधानी लखनऊ में दलित परिवार के ऊपर हमले और आगरा,प्रतापगढ़ और फिरोजाबाद में पुलिसकर्मियों की हत्या पर टिप्पणी करते हुए कहा कि योगी की कानून व्यवस्था की यही सच्ची तस्वीर है.

रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने बताया की महाराजगंज जिले के कोठीभार क्षेत्र के बिजापार गाँव जिस तरह से हिन्दू युवा वाहिनी के लोगों ने चर्च में जाकर प्रार्थना रोकी इससे साबित होता है कि योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद किस तरह से हिन्दू युवा वाहिनी के गुंडों का मनोबल बढ़ा है. उत्तर प्रदेश की पुलिस को बताना चाहिए की किस अधिकार के चलते हिन्दू युवा वाहिनी के लोग दूसरे धर्मों के धार्मिक आयोजनों में खलल डाल रहे हैं और सिर्फ इस तरह के लोगों की आपत्ति पर उत्तर प्रदेश की पुलिस इस तरह के कार्यक्रमों को क्यों रोक रही है. मंच महासचिव ने कहा कि क्या उत्तर प्रदेश की पुलिस हिन्दू वाहिनी की लठैत बन गयी है. मामला सिर्फ प्रार्थना रोके जाने का ही नही हैं बल्कि विदेश से आए उन पर्यटकों का भी है जिसको अतिथि भव कहकर पर्यटन विभाग स्वागत करने का विज्ञापन जारी करता है और युवा वाहिनी के लम्पट और गुंडे पुलिस के साथ मिलकर उनको परेशान कर रहे हैं. उन्होंने कहा की चर्च पर हमला करना हिन्दू युवा वाहिनी और आदित्यनाथ योगी की पुरानी सांप्रदायिक जेहनियत का उदाहरण है. इसाई मिशानरियों पर हमले करने वालों को शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र में बगैर किसी भेदभाव के किये गए योगदान को नही भूलना चाहिए जो कल्याणकारी सरकारों से कम नही है.

रिहाई मंच लखनऊ प्रवक्ता अनिल यादव ने लखनऊ के बीकेटी में दलित परिवार के ऊपर हमले की निंदा करते हुए कहा की प्रदेश के मुख्यमंत्री जिस हिन्दू राष्ट्र की तरफदारी करते फिर रहे हैं उसी हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा के तहत सवर्ण दलितों पर हमले कर रहे है क्योंकि उनको पता है की मुख्यमंत्री जी उनके समर्थक हैं. उन्होंने कहा कि जिस प्रदेश के मुख्यमंत्री के ऊपर गंभीर अपराधिक मुकदमें दर्ज हो वह कानून व्यवस्था क्यों ठीक करेंगे. योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद जिस तरह से आगरा, प्रतापगढ़ और फिरोजाबाद में पुलिसकर्मियों की हत्या हुई है वह योगी की कानून व्यवस्था की सच्ची तस्वीर है.

द्वारा जारी
अनिल यादव
प्रवक्ता, रिहाई मंच लखनऊ
मो न – 8542065846

यशोधरा जी..तो क्या सिर्फ लाल बत्ती के लिए ‘अम्मा महाराज’ का अपमान भी सह लिया?

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने न जाने किस झोंक में कह दिया कि “सिंधिया परिवार” ने अंग्रेजों से मिल कर भिण्ड के लोगों पर बहुत ज़ुल्म किये… शायद वे भूल गए कि जिस पार्टी ने उन्हें यहाँ तक पहुँचाया उसकी रक्त मज्जा में राजमाता विजया राजे सिंधिया का खून पसीना लगा है…और तो और उसी सिंधिया परिवार की वसुंधरा राजे राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं और खुद उनकी कैबीनेट में यशोधरा राजे मंत्री हैं…!

“रहिमन जिव्हा बावरी कह गयी सरग पतार..” को चरितार्थ कर शिवराज सिंह अब कपाल पर वह सब सह रहे हैं जो रहीम कह गए हैं…लेकिन इससे भी बड़ा लाख टके का सवाल ये है कि आखिर यशोधरा राजे अपनी माँ और अपने कुल का ऐसा अपमान क्यों कर सह रहीं हैं…सिर्फ अखबारों में भावुक इंटरव्यू देकर उनका मन मान गया..? उस पर भी तुर्रा यह कि कह रहीं हैं.. लगता नहीं शिवराज जी ने ऐसा कहा होगा… पता लगाऊंगी क्या कहा था…आदि आदि…!

तो क्या सी आर पी सी की धारा 164 के तहत शिवराज सिंह इकबालिया बयान दर्ज़ कराएँगे कि हाँ यह सब कहा था तब यकीन होगा…? ऑडियो, वीडियो, अखबार ,चैनल सब पर मौज़ूद है वो बयान तो तस्दीक क्या और किस बात की करना है…? आश्चर्य है कि बहुत छोटी छोटी बातों पर अधिकारियों, कर्मचारियों पर बिफर जाने वालीं यशोधरा राजे इतने बड़े अपमान को किन्तु परंतु के साथ जब्त कर जाना चाहतीं हैं…! पहली बार जब मंत्री बनीं थीं तो अपने कुल की प्रतिष्ठा के लिए बाकायदा नोटिफिकेशन जारी करवा कर “श्रीमंत” शब्द तक विधानसभा और सचिवालय तक के शासकीय दस्तावेजों में भी जुड़वा लिया था यशोधरा राजे ने…तो अब क्या हो गया…?

यह तो सर्व विदित ही है कि जनसंघ से लेकर भाजपा तक पार्टी का तरक्की का सफ़र राजमाता विजया राजे सिंधिया के योगदान के बिना एक कदम नहीं चल सकता था…उसी सिंधिया परिवार को उसी पार्टी के मुख्यमंत्री अंग्रेजों के साथ जुल्म करने वाला बता रहे हैं और आप खामोश हैं…!

स्वाभिमान की मूर्ति  राजमाता..

आइये आपको याद दिलाएं कि आपकी माता विजयाराजे स्वाभिमान की रक्षा  के लिए किस हद तक संघर्ष करने वालीं थीं..! राजमाता से लोकमाता तक का मार्ग उन्होंने यूँही तय नहीं किया था..बहुत संघर्ष किया था। इंदिरा गांधी का दौर था..विजयाराजे कांग्रेस में ही थीं।तब राजनीति के चाणक्य समझे जाने वाले पं द्वारिका प्रसाद मिश्र मुख्य मंत्री थे। सन् 1967 के विधानसभा चुनाव से पहले विजयाराजे की पं मिश्र से ठन गयी। मुद्दा ये था कि विजया राजे ग्वालियर चम्बल की सीटों पर अपनी पसंद के लोगों को टिकिट देना चाहतीं थीं लेकिन मिश्र इसके लिए तैयार नहीं थे। बात इंदिरा गांधी तक पहुंची लेकिन उन्होंने भी द्वारिका प्रसाद मिश्र का ही साथ दिया।

राजमाता विजयाराजे ने क्रुद्ध होकर कांग्रेस छोड़ दी और अपने उम्मीदवार हर सीट पर उतार दिए…अधिकांश जीते भी। और, तब द्वारिकाप्रसाद मिश्र को करारी शिकस्त देकर राजमाता ने देश की “पहली गैर कांग्रेसी सरकार” बनवा कर इंदिरा गांधी तक को आइना दिखा दिया…! विजयाराजे ने जीवन की आख़िरी सांस तक कांग्रेस की तरफ पलट कर नहीं देखा… और जनसंघ और भाजपा के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन होम कर दिया…!

और जान लीजिये…उस समय राजमाता चाहतीं तो खुद मुख्य मंत्री बन सकतीं थीं लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया तब गोविन्द नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने और 30 जुलाई 1967 से 12 मार्च 1969 तक मुख्यमंत्री रहे।

और माधवराव जैसे स्वाभिमानी भाई..

यशोधरा जी …क्या आपको याद नहीं कि आप माधवराव सिंधिया जैसे राजीनीति के बिरले, बेदाग़ और स्वाभिमानी व्यक्ति की सगी बहन हैं.. यह तो याद होगा न कि जब पी वी नरसिम्हाराव ने माधवराव सिंधिया का नाम “जैन हवाला डायरी” में लाने का षड़यँत्र रचा तो बिना देर किये उन्होंने न केवल केंद्रीय मंत्री पद बल्कि कांग्रेस तक छोड़ दी थी..अपने पर लगे आरोप से बेदाग़ निकल कर ही माधवराव सिंधिया ने चैन की सांस ली…अपनी पार्टी बनाई और ऐतिहासिक वोटों से जीत कर सीना तान फिर संसद पहुंचे…

अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए सब कुछ त्याग देने वाली विजय राजे की बेटी और माधव राव की बहन होने का गौरव क्या आपको जरा भी प्रेरणा नहीं देता…? पार्टी और सरकार में लगातार हो रही उपेक्षा और अब आपके कुल वंश पर ही जुल्म और सितम के आरोप आपके ही नेता लगा रहे हैं तब भी क्या आत्मा कचोटती नहीं….? अगर मंत्री पद और लाल बत्ती आपके मान सम्मान से बड़ा है… तो आपसे कुछ नहीं कहना…!

सन् 1857 के विद्रोह में सिंधिया परिवार की भूमिका पर फैले अर्द्ध सत्य और कोरी कल्पनाओं पर फिर कभी…इतिहास के प्रामाणिक तथ्य और तर्क के साथ। बस इतना याद रखिये कि कविता में शामिल एक पंक्ति “इतिहास” नहीं होती.

लेखक डा. राकेश पाठक वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हैं.

National Song “Vandemataram” is more important than National Anthem “Jana-Gana-Mana”

The poem ‘Vande Mataram’ is written by Sh. Bankim Chandra Chatterjee. It literally means ‘I praise thee Mother’ but the translation by Sh. Aurobindo  is rendered as ‘I bow to thee Mother’.  It played a vital role in the Indian independence movement, the first sung in a political context by Sh. Tagore at the 1896 session of the Indian National Congress.  English translation of first two versus by Sh. Arvindo is thus: “Mother, I bow to thee, Rich with thy hurrying streams, bright with orchard gleams, Cool with thy winds of delight, Dark fields waving Mother of might, Mother free.

Glory of moonlight dreams, Over thy branches and lordly streams, Clad in thy blossoming trees, Mother, giver of ease Laughing low and sweet ! Mother I kiss thy feet, Speaker sweet and low ! Mother, to thee I bow. Who hath said thou art weak in thy lands, when the swords flash out in seventy million hands And seventy million voices roar, Thy dreadful name from shore to shore, With many strengths who art mighty and stored, To thee I call Mother and Lord ! Thou who savest, arise and save ! ”. Sh. Chatterjee was very interested in the Revolt of 1857 and Sanyasi Rebellion. Around the same time, the administration was trying to promote “God Save the Queen” as the ‘National Anthem of India’, which Indian nationalists disliked. He wrote the poem ‘Vande Mataram’ spontaneously using Sanskrit  and Bengali words. It was published in book ‘Anandamatha’   in 1882, which is set in the events of the Sannyasi Rebellion. Sh. Jadunath Bhattacharya set the tune for this poem.

‘Vande Mataram’ was the whole nation’s thought and motto for independence from British during independence movement. Large rallies, fermenting initially in the major cities, work themselves up into a patriotic fervour by shouting the slogan ‘Vande Mataram’. The British, fearful of the potential danger of incited Indian populace, at one point of time banned the utterance of ‘Vande Mataram’ at public places and imprisoned many  independence activists  for disobeying the proscription. Sh. Rabindranath Tagore sang the ‘Vande Mataram’ in 1896 and Sh. Dakhina Charan Sen in 1901 at the Calcutta Congress Session. Poet Smt. Sarala Devi Chaudurani sang the ‘Vande Mataram’ in Benares Congress Session in 1905.  Sh. Lala Lajpat Rai  started a journal called ‘Vande Mataram’ from Lahore.  Sh. Hiralal Sen made India’s first political film in 1905, which ended with chant ‘Vande Mataram’.  Smt. Matangini Hazra’s last words as the Police shot her to death was  ‘Vande Mataram’. The first version of ‘National Flag’ created by Bhikaiji Cama in 1907,  had ‘Vande Mataram’ written in its middle band. The book titled ‘Kranti Geetanjali’ published by Arya Printing Press (Lahore) and Bharatiya Press (Dehradun) in 1929 contains first two stanzas of ‘Vande Mataram’  on Page 11 as the ‘Matra Vandana’. The Ghazal ‘Vande Mataram’ composed by Sh. Ram Prasad Bismil is also written on its back, i.e. on Page 12. The book written by the famous  martyr  of  Kakori  Pandit  Ram Prasad Bismil was proscribed by the then British Government.

On 24.01.1950, Constituent Assembly adopted the poem ‘Jana Gana Mana’, as the ‘National Anthem’ and ‘Vande Mataram’, as the ‘National Song’.  Dr. Rajendra Prasad said: “There is one matter which has been pending for discussion, namely the question of the National Anthem. At one time, it was thought that the matter might be brought up before the House and a decision taken by the House by way of a resolution. But it has been felt that, instead of taking a formal decision by means of resolution, it is better if I make a statement with regard to the national anthem. Accordingly, I make this statement.

Composition consisting of the words and music known as ‘Jana Gana Mana’ is the ‘National Anthem of India’, subject to such alternations in the words, as the Government may authorize as occasions arises; and the song ‘Vande Mataram’, which has played a historic part in the struggle for Indian freedom, shall be honoured equally with ‘Jana Gana Mana’ and shall have equal status with it. I hope this will satisfy the members.”

Underlying message of the ‘Jana Gana Mana’ is  pluralism. It was the first sung on 27.12.1911 at  Calcutta  Congress Session. It is written in a literary register of the Bengali language called Sadhu Bhasa, entirely using nouns that also can function as verbs. Most of the nouns are in use in all major languages. Music was composed by Sh. Ram Singh Thakuri, who is also the composer of number of famous patriotic songs, including ‘Qadam Qadam Badhaye Ja’.

India is a Union of States and not an association or confederation of States. There is only one nationality i.e. Indian, one National Anthem i.e. ‘Jana Gana Mana’, one National Song i.e. ‘Vande Mataram’ and one National Flag i.e. ‘Tiranga’ and it is duty of every Indian to respect them. ‘Jana Gana Mana’ and ‘Vande Mataram’ have to be equally respected. There is no reason why it should evoke any other sentiment as the both are decided by the Constitution makers. The sentiments expressed in ‘Jana Gana Mana’ have been expressed keeping the State in view. However, the sentiments expressed in ‘Vande Mataram’ denote the nation’s character and style and deserve similar respect. Sometimes National Anthem/Song is sung in such circumstances, which are not permissible and can never be countenanced in law. It is the duty of every Indian to show respect when the National Anthem / Song is played or recited or sung. National Anthem / Song should not be utilized by the person involved with it either directly or indirectly and have any commercial benefit or any other benefit. There shall not be dramatization of the National Anthem / Song and it should not be included as a part of any variety show because when the National Anthem / Song is sung or played, it is imperative on the part of every one present to show due respect and honour. In order to keep the country united, it is duty of the Government to frame a National Policy to promote and propagate National Anthem, National Song and National Flag.

Ashwini Upadhyay
Advocate and BJP Leader
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राम जेठमलानी की कहानी

न्यूज चैनलों पर चलने वाले खबरों के ज्वार – भाटे से अक्सर ऐसी – ऐसी जानकारी ज्ञान के मोती की तरह किनारे लगते रहती हैं जिससे कम समझ वालों का नॉलेज बैंक लगातार मजबूत होता जाता है। अभी हाल में एक महत्वपूर्ण सूचना से अवगत होने का अवसर मिला कि देश के एक बड़े राजनेता अरविंद केजरीवाल का केस लड़ रहे वकील राम जेठमलानी ने उन्हें मात्र चार करोड़ रुपए की फीस का बिल भेजा है। इस बिल पर हंगामा ही खड़ा हो गया। इसलिए नहीं कि बिल बहुत ज्यादा है, बल्कि इसलिए कि बिल का पेमेंट राजनेता करें या वह सरकार जिसके वे मुख्यमंत्री हैं।

विवाद जारी रहने के दौरान ही एक और राजनेता ने बयान दिया कि वकील साहब एक जमाने में उनका केस भी लड़ चुके हैं। वे काफी दयालू प्रवृत्ति के हैं। क्लाइंट गरीब हो तो वे केस लड़ने की अपनी फीस नहीं लेते।  अब काफी बुजुर्ग हो चुके इन वकील साहब की चर्चा मैं छात्र जीवन से सुनता आ रहा हूं।वे  पहले भी अमूमन हर चर्चित मामले में ये किसी न किसी तरह कूद ही पड़ते थे। साल में दो – चार केस तो ऐसे होते ही थे जिसकी मीडिया में खूब चर्चा होती। वाद – वितंडा भी होता। विवाद के चरम पर पहुंचते ही मैंं अनुमान लगा लेता था कि अब मामले में  जरूर उन वकील साहब की इंट्री होगी। बिल्कुल बचपन में देखी गई उन फिल्मों की तरह कि जब मार – कुटाई की औपचारिकता  पूरी  हो जाए और हीरो पक्ष के लोग एक – दूसरे के गले मिल रहे होते तभी सायरन बजाती पुलिस की जीप वहां पहुंचती। 

अक्सर ऐसा  होताा भी  था।  कभी किसी के पीछे हाथ धो कर पड़ जाते और जब बेचारा शिकार की तरह आरोपी बुरी तरह फंस जाता तो खुद ही वकील बन कर उसे बचाने भी पहुंच जाते। पहले मैं समझता था कि यह उनके प्रतिवादी स्वभाव की बानगी है जो उन्हें चैन से नहीं बैठने देती। जिसके पीछे पड़ते हैं फिर उसे बचाने में भी जुट जाते हैं। तब तक मोटी फीस का मसला अपनी समझ में नहीं आया था। मुझे तो यही लगता था कि स्वनाम धन्य ये वकील साहब प्रतिवादी होने के साथ ही दयालू प्रवृत्ति के भी होंगे। तभी तो पहले जिसे लपेटते हैं उसकी हालत पर तरस खाकर उसे बचाने के जतन भी खुद ही करते हैं। लेकिन चार करोड़ी फीस मामले ने धारणाओं को बिल्कुल उलट – पलट कर रख दिया।

मेरे शहर में भी अनेक ऐसे प्रतिवादी रहे हैं जो पहले तो बात – बेबात किसी के पीछे पड़ते रहे हैं। सुबह जिसके साथ लाठियां बजाई, शाम को उसी के साथ बैठ कर चपाती खाते नजर आ जाते और कल जिसके साथ रोटियां तोड़ रहे थे, आज उसी के साथ लट्ठलठ में जुटे हैं। जनाब इसे अपने प्रतिवादी स्वभाव की विशेषता बताते हुए बखान करते  कि यह संस्कार उन्हें रक्त में मिला है। वे अन्याय बर्दाश्त नहीं कर सकते। उनके सामने कोई मामला आएगा तो वे चुप नहीं बैठेंगे। कड़ा प्रतिकार होगा… वगैरह – वगैरह। फिर एक दिन अचानक बिल्कुल विपरीत मोड में नजर आएंगे। आश्चर्य मिश्रित स्वर में यह पूछते ही  कि … अरे आप तो … फिर… रहस्यमय मुस्कान में जवाब मिलेगा … समझा करो … विरोध – प्रतिवाद अपनी जगह है। लेकिन धंधा – पेशा या वाणिज्य भी तो कोई चीज है।

मेरे चेहरे पर उभर रहे भावों को समझते हुए फिर बोलेंगे … समझा करो यार… बी प्रैक्टिकल… एक डॉक्टर के पास यदि किसी डाकू का केस जाएगा तो क्या डॉक्टर उसे नहीं देखेगा। कहेगा कि यह गलत आदमी है, इसलिए मैं इसका उपचार नहीं करुंगा…। यही बात मेरे साथ भी लागू होती है। व्यक्तिगत तौर पर तो मैं उस आदमी का अब भी विरोधी हूं। लेकिन बात पेशे की है। मुझे पहले अंदाजा नहीं था कि शून्य से शिखर तक ऐसे रहस्यमयी चरित्र बिखरे पड़े हैं। अब कुछ – कुछ समझने लगा हूं।

लेखक तारकेश कुमार ओझा पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं। संपर्कः 09434453934 , 9635221463

मंत्री प्रकाश पन्त द्वारा एक क्रांतिकारी पहल

देहरादून । प्रकाश पन्त माननीय वित्त, पेयजल, आबकारी, संसदीय कार्य, व विधाई मंत्री उत्तरारखण्ड सरकार द्वारा कल दिनांक 8 अप्रैल 2017 को उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री आदित्यनाथ योगीजी से लखनऊ स्थित उनके कार्यालय में शिष्टाचारपूर्ण भेंट की गई। सौहार्दपूर्ण वातावरण में मा0 मंत्री श्री पन्तजी द्वारा उत्तर प्रदेश के मा0 मुख्यमंत्री जी के सामने उत्तराखण्ड से जुड़े तमाम पहलुओं पर चर्चा की गई और उत्तराखण्ड की परिसम्पत्तियों को हस्तांतरित करने का अग्रहपूर्ण निवेदन किया गया।

मंत्री प्रकाश पन्त ने मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश को जमरानी बांध परियोजना के बारे में विस्तृत जानकारी दी, जिससे उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश दोनों को होने वाले लाभ के बारे में बताया। जिस पर मुखयमंत्री उत्तर प्रदेश ने अपनी सहर्ष सहमति प्रकट की और दोनों राज्यों के उच्चाधिकारियों के स्तर पर परियोजना पर चर्चा करने के लिए सहमति प्रदान की। सबसे पहले प्रकाश पन्तजी ने मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश योगीजी को उनके द्वारा किये जा रहे क्रांतिकारी और ऐतिहासिक कार्यों के लिये बधाई दी और उत्तर प्रदेश के छोटे भाई उत्तराखण्ड के हितों से जुड़ी चिंताओं से अवगत कराया।

उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश के व्यापक हित में प्रकाश पन्त ने अपनी महत्त्वाकांक्षी परियोजना जमरानी बांध हल्द्वानी के बारे में बताया कि 130.6 मीटर ऊंचे जमरानी बांध के निर्माण से हल्द्वानी शहर और आस-पास के क्षेत्रों को पेयजल की आपूर्ति होगी और परियोजना से प्राप्त होने वाले सिंचाई सुविधा का 57 प्रतिशत अतिरिक्त सिंचाई उत्तर प्रदेश के 47,607 हेक्टेअर कृषि क्षेत्र में और 43 प्रतिशत सिंचाई उत्तराखण्ड राज्य के 9458 हेक्टेअर कृषि क्षेत्र में प्राप्त होगी। इस परियोजना में कुल लागत रु0 2350.56 करोड़ आयेगी जिसका 25 प्रतिशत भाग (लगभग 595.00 करोड़) उत्तर प्रदेश राज्य को और शेष 75 प्रतिशत भाग उत्तराखण्ड राज्य को वहन करना है।

प्रकाश पन्तजी द्वारा इस परियोजना की विस्तृत जानकारी देने के बाद मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश के द्वारा इस योजना को सहर्ष सहमति प्रदान की गई। इसके अतिरिक्त मंत्री प्रकाश पन्त ने उत्तराखण्ड परिक्षेत्र में आने वाली परिसम्पत्तियों जिनमें सिंचाई विभाग के 318 आवासीय भवन, 2 अनावासीय भवन, 357.326 हेक्टेअर भूमि और 37 नहरों को भी उत्तराखण्ड राज्य को देने का आग्रह किया, जिस पर मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश योगी जी द्वारा सकारात्मक रुख दिखाया गया और उन्होंने कहा है कि इस पर सचिव स्तर की वार्ता करके जल्दी ही इन समस्याओं का हल निकाला जायेगा।

इससे पूर्व ऐसे प्रयास उत्तराखण्ड सरकार की ओर देखने को नहीं मिले थे। पहली बार दूरदर्शी नेतृत्व का परिचय देते हुये उत्तराखण्ड के प्रभावशाली मंत्री प्रकाश पन्त द्वारा मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश के सामने दोनों राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुये परियोजना निर्माण का आग्रह किया गया। मंत्री प्रकाश पन्त ने बताया कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने सौहाद्रपूर्ण वातावरण में सकारात्मक रुख दिखाते हुये जल्दी ही सभी मामलों के निस्तारण का आश्वासन दिया है।

मनोज अनुरागी
मीडिया प्रभारी
श्री प्रकाश पन्त
मंत्री, उत्तराखण्ड सरकार

कब ख़त्म होगा अयोध्या का वनवास?

वैसे तो आस्था इतिहास एवं कानून की जटिलताओं में दीर्घकाल से जकड़ी अयोघ्या नगरी के लिए 30 सितंबर 2010 का दिन स्वतंत्रता दिवस के समान साबित हो सकता था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस संवेदनशील मुद्दे पर अपना फैसला सुनाकर वह रोशनी दिखाने का प्रयास किया था, जो सम्पूर्ण राष्ट्र को अतीत के अन्धेरे से बाहर निकाल सकती थी। मालूम हो कि भारत के इतिहास में अयोध्या का यह मामला पिछले 500 – 600 वर्षो से धार्मिक विवादों में फंसा है एवं गत 67 वर्षो से न्यायालय में चल रहा है। देखा जाए तो यह समय अपने आप में राम के वनवास से भी काफी लम्बा है। साल 2010 से उच्चतम न्यायालय में लंबित पड़ा ये मामला एक बार फिर फ़रवरी 2016 में सुब्रमण्यम स्वामी के इस विवाद को लेकर काफी सक्रिय हो जाने के बाद  मीडिया की सुर्ख़ियों में आ गया था।

विदित है कि वर्ष 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भारतीयं जनता को अपने निर्णय के द्वारा विवादित जमीन का एक तिहाई हिस्सा निर्मोही अखाड़ा समिति को, एक तिहाई हिस्सा राम लल्ला विराजमान अर्थात भगवान राम की मूर्ति के लिए तथा एक तिहाई हिस्सा सुन्नी वक़्फ बोर्ड को देने का निर्णय किया था। न्यायालय के निर्णय द्वारा जमीन का बटंवारा होता या नहीं परन्तु भारत को जोड़ने का एक सुनहरा अवसर अवश्य ही प्राप्त हो जाता। अर्थात यदि दोनों मुख्य पक्ष चाहते तो भारत अपने आपको 6 दिसंबर 1992 के बाद सही मायने में बदल सकता था और अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति का जीवंत संदेश पूरे विश्व को विवादित स्थल पर मंदिर एवं मस्जिद एक साथ बनवा कर दे सकते हैं। मथुरा एवं बनारस में इसका शानदार उदाहरण देखा जा सकता हैं जहां मंदिर एवं मस्जिद साथ-साथ हैं। इन स्थानों में आरती एवं अज़ान भी एक ही समय में होती है। बाबरी मस्जिद के वर्तमान पक्षकार इकबाल अंसारी (स्वर्गीय हाशिम अंसारी के पुत्र) का भी कहना है कि विवादित ज़मीन में राम मंदिर और मस्जिद का निर्माण किया जा सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इसी आधार पर फैसला सुनाया था। इस मामले में नए राजनीतिक विवाद पैदा करने की कोशिशें एक बड़ी भूल साबित होगी।

मगर दुर्भाग्यवश ये विवाद 60 वर्षो बाद आये इस संतुलित एवं स्वागतयोग्य निर्णय के बाद पुनः सर्वोच्च न्यायालय जा पहुंचा जहां इसके पुनः सात वर्ष होने वाले है और अगर ये विवाद अब भी आपसी बातचीत से नहीं हल हुआ तो भविष्य में उच्चतम न्यायालय का क्या निर्णय एवं किसके पक्ष में आयेगा?  जैसी बातों की दुविधा में ना जाने कितनी सदियां और लगे, इसकी भविष्यवाणी दोनों में से कोई भी पक्ष भी नहीं कर सकता। इस विवाद का हल अंतत: बातचीत से ही संभव मालूम पड़ता है। यानि दोनों पक्षों की आपसी सहमति एवं समझदारी द्वारा ही संभव हो सकता हैं इसलिए इस विवाद को भविष्य के कंधो पर लादना भावी पीढ़ी के साथ अन्याय एवं भविष्य की भारी भूल सिद्ध हो सकती है। जो की विश्व के साथ कदमताल मिलाकर दौड़ने को तैयार है।

गौरतलब है कि हाईकोर्ट के निर्णय ने विवादित जमीन को 2:1 के हिसाब से विभाजित किया था। जिसमें मस्जिद पक्ष के सर्मथकों को आंशिक रूप से निराशा हाथ लगी थी, ऐसा मुस्लिम पक्ष के कुछ लोगों का मानना है। कुछ हिन्दु संगठन भी उच्च न्यायालय के निर्णय से संतुष्ट मालूम नहीं पड़ते थे,  जिसके लिए दोनों ही पक्षों के पास अपने-अपने कई कारण एवं तर्क हो सकते हैं मगर क्या वो सभी कारण एवं तर्क देश की एकता एवं अखंडता को बचाए रखने तथा देश को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर में मजबूती प्रदान करने से ज्यादा शक्तिशाली हो सकते हैं ? क्योंकि आज का भारत 1992 का भारत नहीं है। आज के युवा जानते हैं कि उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं अच्छे स्वास्थ्य की आवश्यकता मंदिर एवं मस्जिद से कहीं ज्यादा है। लेकिन उसके लिए स्कूल कॉलेज एवं अस्पतालों की संख्या दुर्भाग्यवश मंदिर एवं मस्जिद की तुलना में काफी न्यूनतम संख्या में हैं, जिसके लिए शायद ही किसी राजनीतिक दल या फिर किसी धर्म विशेष ने कभी कोई आंदोलन किया हो। आज मसला ये नहीं कि किस पक्ष की हार होगी और किसकी जीत।  बल्कि ये देखना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा कि भारत हारा या जीता। इस अतिसंवेदनशील मसलें पर पूरे विश्व की नजरें हमारे देश पर लगी हुई हैं जो की भारत के भविष्य के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

शायद इस वजह से ही 31 मार्च 2017 को उच्चतम न्यायालय ने भी इस मामले की सुनवाई करते हुए सुब्रमण्यम स्वामी को पक्षकार मानने से इनकार कर दिया है। माननीय उच्चतम न्यायालय इस मामले में जल्द सुनवाई संभव नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि इस मामले में दोनों पक्षकारों को और समय देने की जरुरत है।

इस पूरे विषय में दोनों पक्षों के लोगों के अलावा अन्य धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों और मीडिया की संतुलित एवं सकारात्मक रिर्पोटिंग भी अपेक्षित हैं। भारत में मर्यादापुरूषोतम के नाम पर मर्यादा का उल्लंघन हो, भारत का किसान आत्महत्या करें और हम मंदिर-मस्जिद के लिए झगड़ते रहे ये बात स्वयं राम को भी बुरी लगेगी। अब देश को इस पर विचार करना ही होगा ताकि इस वर्ष दीपावली में जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उनके वनवास के साथ-साथ अयोध्या को भी उसके वनवास से मुक्ति मिल चुका हो।

विवाद – राजनीति = समाधान

विकाश ऋषि
vikash.makkar@yahoo.com