घटिया खाने को लेकर पीएसी ने कर दिया था विद्रोह, गिर गई थी यूपी की कांग्रेस सरकार

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना साधा ।  सोशल मीडिया पर उसके तीन वीडियो आते ही, कुछ ही घंटों में 34 लाख से ज्यादा देशवासियों ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की । यही नहीं, अन्य पैरा मिलेट्री फोर्स के जवानों के विद्रोही तेवर वाले वीडियो की झड़ी भी लग गयी जिनसे देश के अर्ध्य सैन्य बलों में अफसरों की मनमानी और भ्रष्टाचार की झलक मिलती है।

नई पीढ़ी के लोग शायद नही जानते होंगे, बुजुर्गों को याद होगा। घटिया खाने और वेतन विसंगति को लेकर उत्तर प्रदेश में प्रांतीय सशस्त्र बल यानी पी.ए.सी. में सालों पहले विद्रोह की चिंगारी फूट चुकी है। इस विद्रोह ने राज्य सरकार की बलि ले ली थी। आइये देखते हैं,  क्या कुछ हुआ था तब और क्या थी उस समय की मीडिया की भूमिका। इतिहास हमें सीख देता है। आरोपों से घिरे बीएसएफ के अफसरों ने भले तेज बहादुर को  ‘अनुशासनहीन ’  बताकर पूरे प्रकरण पर लीपापोती की कोशिश शुरू कर दी हो, मगर यह मामला सिर्फ जांच और रिपोर्ट में कैद होकर नहीं रह सकता। यह सब अत्यंत गंभीर है शायद इसीलिए नये थल सेनाध्यक्ष बिपिन रावत ने सभी जवानों से अपनी शिकायतें सीधे उनसे करने की अपील की हैं । इसके लिए उन्होंने शिकायत-पेटियां लगाने का निर्देश तो दिया मगर साथ ही जवानों को सोशल मीडिया से दूर रहने की नसीहत भी दे दी।

केंद्र सरकार चौकन्नी है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने तुरंत ही जांच का आदेश दिया। इस मुद्दे की गंभीरता इसी बात से समझी जा सकती है कि गृहमंत्री ने बीएसएफ की पहली रिपोर्ट मिलते ही दो दिन के अंदर दूसरी रिपोर्ट तलब की है। सिर्फ घटिया खाना ही मुद्दा नहीं, जिससे पैरा मिलेट्री के जवानों में असंतोष है । वायरल हुए वीडियो बताते हैं कि सेना के समान पेंशन और अन्य सुविधाएं न मिलने से भी अर्ध्य सैन्य बलों के जवान असंतुष्ट हैं।

हो गया था विद्रोह
बात 1973 की है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, मुख्यमंत्री पं. कमलापति त्रिपाठी थे। घटिया खाना मिलने से पीएसी के जवानों और पुलिसकर्मियों में रोष था, दबी जुबां से शिकायती स्वर उभरे मगर अफसरों ने इसे नजरअंदाज कर दिया। तब इंटरनेट और सोशल मीडिया जैसी कोई सुविधा तो थी नहीं। लखनऊ में अंग्रेजी में नेशनल हेराल्ड और पायनियर और हिन्दी में स्वतंत्र भारत और नवजीवन आदि प्रमुख अखबार छपते थे। यही जनता की आवाज बनते थे। शायद तब के पत्रकार भी प्रदेश के पीएसी जवानों की पीड़ा को नहीं समझ सके। कहा जाता है कि एक छोटे अखबार ने तब सिंगल कालम खबर छापी थी जिसमें जवानों को घटिया खाना दिये जाने का जिक्र किया गया था मगर आला अफसरों के कानों तक उस छोटे अखबार की आवाज नहीं पहुंच सकी।

मई 1973 में पीएसी जवानों में असंतोष फूट पड़ा और वो बगावत पर उतारू हो गये। राज्य सरकार के हाथ-पांव फूल गये, दिल्ली तक खलबली मच गई। आनन-फानन सेना को बुलाना पड़ा। लखनऊ में सड़कों पर सेना के वाहन दौड़ने लगे। सेना ने वहां पुलिस लाइन्स को चारो ओर से घेर लिया। विद्रोही पी.ए.सी.जवान और सेना आमने-सामने आ गई। कहा जाता है कि सेना की गोलीबारी में कम से कम तीस विद्रोही जवान मारे गए। सौ से अधिक जवानों को गिरफ्तार किया गया था। सेना ने जैसे-तैसे विद्रोहियों पर काबू तो कर लिया मगर मुख्यमंत्री पं. कमलापति त्रिपाठी को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। 12 जून 1973 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया, प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। विद्रोह तो दबा दिया गया मगर विद्रोहियों ने राज्य सरकार की बलि तो ले ही ली थी।  

Dhiraj Singh
[email protected]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *