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पढ़ाई छोड़ पानी ढो रहे नौनिहाल

आजाद भारत में आजादी के बाद से महान विभूतियों के नाम पर अनेक महत्वाकांक्षी योजनाओं का क्रियान्वयन सरकारों द्वारा किया जाता है, जिससे उन महान विभूतियों का सम्मान भी हो सके व योजानाएं भी धरातल पर साकार होती रहें. लेकिन जब ऐसी योजनाओं का पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती तो ये आत्‍माएं भी स्‍वर्ग में रोने को मजबूर अवश्‍य होती होंगी. ऐसी ही स्थिति को बयान कर रहा है रूद्र प्रयाग में स्‍थापित श्‍यामा प्रसाद अभिनव विद्यालय. जी हां अपना भविष्य को सुधारने की ललक लिए बच्चे तथा उनके मां-बाप ने शायद ही सोचा होगा कि इन बच्चों को यहां पानी भरने तक ही सीमित रहना होगा। यह एक आवासीय विद्यालय है, जिसका अपना स्वयं का भवन तक नहीं है.

पानी

आजाद भारत में आजादी के बाद से महान विभूतियों के नाम पर अनेक महत्वाकांक्षी योजनाओं का क्रियान्वयन सरकारों द्वारा किया जाता है, जिससे उन महान विभूतियों का सम्मान भी हो सके व योजानाएं भी धरातल पर साकार होती रहें. लेकिन जब ऐसी योजनाओं का पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती तो ये आत्‍माएं भी स्‍वर्ग में रोने को मजबूर अवश्‍य होती होंगी. ऐसी ही स्थिति को बयान कर रहा है रूद्र प्रयाग में स्‍थापित श्‍यामा प्रसाद अभिनव विद्यालय. जी हां अपना भविष्य को सुधारने की ललक लिए बच्चे तथा उनके मां-बाप ने शायद ही सोचा होगा कि इन बच्चों को यहां पानी भरने तक ही सीमित रहना होगा। यह एक आवासीय विद्यालय है, जिसका अपना स्वयं का भवन तक नहीं है.

इन दिनों स्कूली बच्चे पढ़ाई की जगह पानी भरने में व्यस्त हो रखे हैं, क्योंकि खाने-पीने, और शौच तथा नहाने के लिए पानी जरूर है.  यहां तक छोटे-छोटे नौनिहाल भी पानी भरने में लगे हैं और उन मासूमों का कहना है कि उन्होंने अपने घरों में कभी पानी नहीं भरा, जिससे उनके हाथ और पैरों में भी दर्द होता है। जिन हाथों में किताबें होनी चाहिए थी, उनमें पानी की बाल्टी है लेकिन इससे किसी को क्या फर्क पड़ता है. नेता तो भाषण में इन विद्यालयों को खोलने की उपलब्धि का उदाहरण देकर वोट बटोरेंगे लेकिन असली हकीकत क्‍या है यह यहां आकर ही देखा जा सकता है.

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