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केवल विषय नहीं, खेल भी है विज्ञान

आइवर हमारे परम्परागत समाज में बड़ों की हमेशा यही इच्छा रहती है कि उनकी अगली पीढ़ी उनसे आगे निकले तथा जीवन में धन व यश अर्जित करने के साथ साथ खूब सफलता भी पाये। परन्तु यह एक सर्वविदित तथ्य है कि जीवन में सफलता पाने की पहली शर्त है कठिन मेहनत करते हुए समय के साथ चलना क्योंकि जो समय के साथ नहीं चल पाता, समय उसकी बाट नहीं जोहता। उसे तो प्रतिपल आगे बढ़ना ही होता है। परिणामस्वरूप ऐसा व्यक्ति ज़िन्दगी की दौड़ में पिछड़कर असफलता के अंधेरों में कही गुम हो जाता है। अतः यह ज़रूरी है कि हमेशा अपनी बुद्धि का सदुपयोग करते हुए चतुर, चुस्त और चौकस रहा जाए ताकि भविष्य में आने वाली किसी भी परिस्थिति का आसानी से सामना करते हुए उससे पार पाया जा सके। यह बात तो आज आम आदमी भी जनता है कि वर्तमान युग विज्ञान का युग है। एक दिन तो क्या, एक पल के लिए भी हम विज्ञान के बिना आज अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते।

आइवर

आइवर हमारे परम्परागत समाज में बड़ों की हमेशा यही इच्छा रहती है कि उनकी अगली पीढ़ी उनसे आगे निकले तथा जीवन में धन व यश अर्जित करने के साथ साथ खूब सफलता भी पाये। परन्तु यह एक सर्वविदित तथ्य है कि जीवन में सफलता पाने की पहली शर्त है कठिन मेहनत करते हुए समय के साथ चलना क्योंकि जो समय के साथ नहीं चल पाता, समय उसकी बाट नहीं जोहता। उसे तो प्रतिपल आगे बढ़ना ही होता है। परिणामस्वरूप ऐसा व्यक्ति ज़िन्दगी की दौड़ में पिछड़कर असफलता के अंधेरों में कही गुम हो जाता है। अतः यह ज़रूरी है कि हमेशा अपनी बुद्धि का सदुपयोग करते हुए चतुर, चुस्त और चौकस रहा जाए ताकि भविष्य में आने वाली किसी भी परिस्थिति का आसानी से सामना करते हुए उससे पार पाया जा सके। यह बात तो आज आम आदमी भी जनता है कि वर्तमान युग विज्ञान का युग है। एक दिन तो क्या, एक पल के लिए भी हम विज्ञान के बिना आज अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते।

वैसे यदि विज्ञान के द्वारा दी गई सुविधाओं की बात छोड़ भी दें तो हमारा अपना शरीर ही इसकी विभिन्न क्रियाओं, सिद्धान्तों और उपकरणों का एक ऐसा जीता जागता उदाहरण है, जिसका कोई सानी नहीं।  हमारे मस्तिष्क के अन्दर प्रति सेकेण्ड हज़ारों की संख्या में ऐसी रासायनिक क्रियाएँ चलती रहती हैं, जिनके आगे बड़ी-बड़ी रसायनशालाएँ फेल हैं। पूरी ज़िन्दगी लगातार तीन सौ पैंसठ दिन, चौबीसों घण्टे टनों रक्त उलीचते रहने वाले दिल के सामने शायद बेहद शक्तिशाली पम्प भी पानी माँगने लगे और इसी तरह पृथ्वी को कई बार लपेटने लायक लम्बाई वाली, शरीर में मौजूद नाड़ियाँ बिना किसी रिसाव व साफ़-सफ़ाई के अपने अंदर रक्त का बहाव यदि लगातार बनाये रख पाती हैं, तो इन सब क्रियाओं के पीछे कहीं न कहीं विज्ञान ही तो छिपा है और इन सब बातों की हमें जानकारी देने वाला भी तो विज्ञान ही है। इसी जानकारी के आधार पर ही हम शरीर में होने वाले क्रिया-कलापों में आयी गड़बड़ियों को ठीक करने के प्रयास के बारे में सोच पाये हैं और फिर यहीं से शुरुआत हुई है हमारी आधुनिक चिकित्सा प्रणाली की।

यह बात अब स्पष्ट रूप से समझ लेना बहुत ज़रूरी है कि विज्ञान सिर्फ़ एक विषय भर नहीं हैं, यह हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग है और इसे विषय के रूप में समेट कर जिस तरह कक्षाओं और पुस्तकों के दायरे में कैद कर दिया गया है, उससे इसका कम तथा हमारा अहित ज्य़ादा हुआ है। विद्यालयों में पढ़ाये जाने वाले विज्ञान व गणित ये दो ऐसे विषय हैं, जिनसे देशभर के बच्चों का एक बहुत बड़ा प्रतिशत बेहद घबराता है।

उनकी यही घबराहट आगे चलकर इतनी बलवती हो जाती है कि वे इसे किसी भी रूप में स्वीकारने की बात तक नही सोच पाते। दुर्भाग्यवश अपने अंदर जन्मी इसी सोच के कारण वे अपने दो ऐसे मजेदार और उपयोगी दोस्त खो बैठते हैं, जिनसे बिछुड़कर जीवन में वे सफलता की शायद उस पायदान तक नहीं पहुँच पाते जिसके वास्तव में वे हकदार थे।

नई पीढ़ी में इन विषयों के प्रति बैठे डर के लिए हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली पूरी तरह ज़िम्मेदार है। भारी-भरकम पाठ्यक्रम में समाये रूखे सूखे पाठों को किसी तरह रट-रटाकर केवल अच्छे अंक हासिल कर लेने का दबाव बनाती यह प्रणाली यदि इन बाल-छात्रों को स्वयं कुछ करके देखने व सीखने का रोचक तरीका अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते हुए इनमें जिज्ञासा और उत्सुकता पैदा कर पाती तो निश्चित तौर पर हमारे यहाँ आज सिर्फ इंजीनियर और डॉक्टर ही नहीं, अच्छे अन्वेषक और आविष्कारक भी जन्मे होते।

आश्चर्य की बात तो यह है कि विज्ञान के क्षेत्र में एक बहुत बड़ा सत्य है, जिससे हम पूरी तरह आँखें मूँदे बैठे हैं और वह है प्रयोग जो विज्ञान का मुख्य आधार है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि इस मुख्य आधार के बिना ही आज विज्ञान को लोकप्रिय बनाने और इसका स्तर ऊँचा उठाने का प्रयासकर हम विश्वस्तरीय प्रगति की दौड़ में शामिल होने का सुनहरा सपना देख रहे हैं। विज्ञान को, प्रयोगात्मक पक्षवाली इसकी रोचकता से रहित कर, इसका बाकी बचा रूखा-सूखा स्वरूप जिस तरह बच्चों के आगे परोसा जा रहा है, वह उनके मन में इस विषय के प्रति कोई रुझान पैदा करे भी तो भला कैसे?

वास्तव में आवश्यकता तो इस बात की थी कि प्रारम्भ से ही न सिर्फ़ कक्षाओं में विज्ञान के मूलभूत सिद्धान्तों को समझाते हुए छात्रों को प्रयोग कराये जाते बल्कि उन्हें घरों पर भी अपने आसपास मौजूद साधारण वस्तुओं से स्वयं प्रयोग कर परिणाम देखने और समझने के लिए भी प्रेरित किया जाता। इससे उनमें न केवल रचनात्मक प्रवृत्ति का विकास होता बल्कि इस तरह उनके अंदर एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी पनपता जो आगे चलकर उन्हें विज्ञान को सही ढंग से समझने में बहुत मदद करता।

आज के समय में तो नन्हें मुन्ने विद्यार्थियों को भी इस बात का अहसास कराया जाना बहुत ज़रूरी है कि विज्ञान मात्र विषय नहीं है, यह खेल का एक अच्छा साधन भी है और इस तरह खेल के माध्यम से शुरू में इसके आधारभूत और बाद में धीरे-धीरे भारी-भरकम सिद्धान्तों तक को समझने का लाभ उठाया जा सकता है। उदाहरण के लिए एक लम्बी-सी सुई को किसी मोमबत्ती के लम्बवत इसके बीचोंबीच से आरपार करते हुए सुई के दोनों सिरों को दो उल्टे रखे गिलासों पर जरा टिकाकर देखिये। पर हाँ, पहले इसको दोनों ओर से जलाने की व्यवस्था ज़रूर कर लें। इस तरह रखने पर यह क्षैतिज अवस्था में टिकी रहेगी। बस, अब दोनों ओर माचिस की लौ दिखाइए। कुछ ही समय में आपके सामने मोमबत्ती एक मजे़दार तमाशा करना शुरूकर देगी-ठीक सी-साँ झूले की तरह। यहाँ सोचने की बात यह है कि लौ के साथ ऊपर-नीचे झूलती मोमबत्ती की इस क्रिया के पीछे आखि़र कारण क्या है ? रोचकता के आधार पर उपजी उत्सुकता जहाँ जिज्ञासु मन को इसका हल ढूंढ़ने के लिए प्रेरित करेगी वहीं जब इसका समाधान मिल जाएगा तो वह निश्चित तौर पर अधिक स्थायी और अमिट होगा।

कहीं किसी बर्थ-डे पार्टी में एक ऐसा गिलास रखा गया हो जो सोडावाटर से भरा हो और उसमें पड़ी हों दो-चार नैप्थलीन की गोलियाँ तो बस तमाशा देखने काबिल रहेगा। बिना किसी बाहरी सहायता के इन गोलियों का कभी सतह तक ऊपर उठ आना तो कभी तली में जा बैठना भला किसे आकर्षित नहीं करेगा और इसके कारण का एक बार पता लग जाने पर भला इसे जिन्दगी में क्या कभी फिर भूला जा सकता है ?

इसीलिए कहा गया है कि शब्दों से कहीं ज्यादा प्रभावकारी होता है दृश्य और दृश्य से भी कहीं अधिक प्रभाव छोड़ने में सक्षम होता है स्वयं किया गया प्रयोग। इसलिए विज्ञान के प्रयोगात्मक पक्ष की पूरी तरह अनदेखी करके हम आज शायद एक ऐसे भविष्य की रचना कर रहे हैं, जहाँ पहुँच कर हमें निश्चित ही अपनी गलती का अहसास होगा और तब तक स्वाभाविक रूप से विश्व के दूसरे विकसित जागरूक विकासशील देश हमें पीछे छोड़, बहुत आगे बढ़ चुके होंगे। बस, ऐसे में मजबूर हो हमें आज की तरह ही सिर्फ आयातित सोच के सहारे अपनी उन्नति का ढिंढोरा पीटना होगा, क्योंकि तब भी हमारे पास अपनी विरासत के अलावा शायद मौलिक कहने को कुछ भी नहीं होगा।

आइवर यूशिएल चित्रकार, लेखक, वैज्ञानिक हैं. इन्‍होंने गणित और विज्ञान की कई किताबों का लेखन भी किया है. इनसे सम्‍पर्क [email protected] या [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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