मैं इस सवाल का जबाब बीती 18 जनवरी से ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा हूं। दरअसल, उस रोज मैं अपने एक साथी पत्रकार के साथ नैनीताल शहर के डांठ पर खड़ा था। लोगों की भीड़ को देखकर मुझे कहानी समझ में आ गई थी। उसी बीच मेरी नजरों के सामने से एक नहीं बल्कि दो अर्थियां एक साथ गुजर गई। मैंने वहां खड़े एक पुलिसकर्मी से पूछा कि एक साथ जाने वाले दो लोग कौन थे? उसने जबाब दिया कि डीजीसी साहब और उनकी पत्नी। दरअसल, जिला शासकीय अधिवक्ता रवि साह की कार पिथौरागढ़ जिले में खाई में गिर गई थी। उस वक्त उनकी धर्मपत्नी मीना भी उनके साथ थी। रवि साह की मौत तो मौके पर ही हो गई थी, लेकिन उनकी पत्नी की कुछ सांसे बाकी थी। उन्हें पिथौरागढ़ के अस्पताल में भर्ती जरूर कराया गया, लेकिन जिन्दगी की जंग जीत नहीं पाईं।
राम नाम सत्य है कि गूंज के बीच देखते ही देखते अधिवक्ता दम्पत्ति की अंतिम यात्रा आंखों के सामने से ओझल हो गई। इससे पहले कि मैं अपने साथ मौजूद पत्रकार जगदीश जोशी से कुछ कहता। उन्होंने कहा कि यार शेखावत जी दोनों खुशनसीब थे। भगवान ने दोनों में से किसी को भी तड़पने को नहीं छोड़ा। इन्होंने अपनी बेटी की शादी भी चन्द महीनों पहले ही की थी। मैंने अनायास जगदीश जोशी जी से कहा। महाराज, खुशनसीब किसे कह रहे हो। जोशी जी बोले कि दोनों ही एक साथ भगवान को प्यारे हुए हैं। मैंने उनसे फिर एक सवाल किया। क्या रवि साह जी की पत्नी भी उनके जैसी भाग्यवान हैं। जोशी जी ने पहले तो मेरे चौखटे को शांत होकर गौर से देखा और फिर हल्का सा मुस्कराए।
मैंने कहा कि आपका समाज तो पति की मौत पहले होने वाली महिला को विधवा कहता है। भले ही साह दम्पत्ति एक साथ कार दुर्घटना के शिकार हुए। लेकिन पत्नी ने तो बाद में दम तोड़ा था। इतना कहने पर जोशी जी ने कहा कि यार भगवान की माया अपरम्पार है। लेकिन राहुल भाई तुम्हारी दलील एकदम जायज है। इतनी बात के बाद हम दोनों अपने अपने काम पर चल दिए। लेकिन, मुझे सवाल का संतोषजनक जबाब नहीं मिल पाया था। लिहाजा मुझे रूक रूक कर वह बात याद आ ही जाती हैं। शायद यही वजह है कि उस घटना को काफी दिन बीत जाने के बाद मैं अपने मन की व्यथा लिखने को मजबूर हूं। मैं अपने चेतनाकाल से ही कुछ मामलों में अतिवादी रहा हूं। शायद यही वजह है कि मुझे विधवा शब्द से हमेशा ही चिढ़ रही है। फिर भी, ऐसे लम्हें का चश्मदीद बनूंगा, शायद ही मैंने कभी सोचा होगा।
मुझे मृतक दम्पत्ति की बिरादरी के एक व्यवक्ति ने बताया कि मीना साह मरने से पहले होश में आई थी। उस दौरान उन्होंने सबसे पहले अपने पति की तबीयत के बारे में पूछा था। हालांकि उनको असलियत नहीं बताई गई थी। यह भारतीय महिला के व्यक्तित्व का एक खूबसूरत पहलू है। खुद मर रही होती है लेकिन पति की हालत पूछने की हिम्मत जुटा ही लेती है। फिर भी ये किसी बिडम्बना से कम नहीं है कि हमारे समाज में एक महिला का विधवा होना एक विधुर पुरूष के मुकाबले कहीं ज्यादा कष्टकारी है।
लेकिन धर्म और परम्पराओं का लबादा ओढ़ने वाले ठेकेदारों ने रिश्तों ही नहीं बल्कि दुख का भी वर्गीकरण करके तथाकथित आधुनिक समाज पर थोप रखा है। मैं एक बात बिल्कुल साफ कर देना चाहता हूं कि मेरा मकसद मृतक दम्पत्ति के परिजनों की भावनाओं को चोट पहुंचाना नहीं है। मेरा तो मानना है कि पति और पत्नी में अटूट प्यार रहा होगा। तभी तो दोनों जीवन की अन्तिम यात्रा में एक साथ विदा हुए थे। यह मेरा व्यक्तिगत विचार है। इससे हर आदमी और खासतौर पर कर्मकाण्डी लोग सहमत हों जरूरी नहीं है। मैं पूर्ण रूप से नास्तिक तो नहीं, लेकिन बहुत ज्यादा आस्तिक भी कभी नहीं रहा हूं। भगवान ने अधिवक्ता दम्पत्ति को एक साथ दुर्घटना का शिकार बनाकर साथ ही साथ दोनों को वापस अपने पास बुला लिया। बस दोनों की सांसे निकलने में बहुत कम अन्तर था। मैं आपसे जानना चाहता हूं कि क्या पति पत्नी की सांसे निकलने के बीच रहा ये फासला अब विधवा जैसे दकियानूसी शब्द त्यागने का मौका नहीं देता है।
लेखक राहुल सिंह शेखावत उत्तराखंड में ईटीवी के संवाददाता हैं.

