नक्सली निरीह ग्रामीणों को क्यों उठा ले जाते हैं? पुलिस छुटभैया अपराधियों को क्यों पीटती है? गुस्से में लोग गाड़ियों का शीशा क्यों तोड़ते हैं, उन्हें आग क्यों लगाते हैं? मर्द बीवियों को क्यों पीटते हैं? बीवियां बच्चों को क्यों पीटती हैं? लोग रिक्शा वाले, ठेले वाले से क्यों बदतमीजी करते हैं? गृहिणियां सब्जी वाले से, बाई से क्यों मोलभाव करती हैं? पारिवारिक झगड़ों में लोग बच्चों को क्यों निशाना बनाते हैं? इन सभी सवालों का एक ही जवाब सूझता है कि कमजोर लोग इसी तरह अपना गुस्सा निकालते हैं। आपको सरकार पर गुस्सा आ रहा है किन्तु आप सुरक्षा प्रहरियों और अंगरक्षको से घिरे नेता का कुछ नहीं बिगाड़ पाते तो ट्रेन रोक लेते हैं, सरकारी दफ्तरों में तोड़फोड़ करते हैं। बॉस की गालियां हजम नहीं होतीं, बटमारों पर बस नहीं चलता तो घर में आकर बीवी पर गुस्सा उतार लेते हैं। बीवी कमजोर पड़ती है तो पति को पीटने के बजाय अपनी खीझ बच्चों पर उतार लेती है।
विलासिता की वस्तुओं पर अपनी आधी से अधिक तनख्वाह खर्च कर देने वाला मिडिल क्लास सब्जियों से चिल्लर बचाकर अपना बजट ठीक करने की कोशिश करता है। नक्सली सरकार का तख्ता पलट देना चाहते हैं, पुलिस को घुटनों पर लाना चाहते हैं, बस नहीं चलता तो निहत्थे संदिग्ध मुखबिरों को सरे आम काट कर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं। पुलिस बड़े नेताओं और संगठित अपराधियों के पेंदे पर पट्टे मारना चाहती है किन्तु पकड़ में केवल पाकेटमार और चोर ही आ पाते हैं। ए. राजा जैसे लोग करोड़ों डकार कर वीआईपी बने रहते हैं। लोगों की मजदूरी, इंक्रीमेन्ट के पैसे दबाने वाले काले चोरों के खिलाफ सिर्फ कानूनी कार्यवाही ही हो पाती है। बच्चों का अपहरण, उनकी नृशंस हत्या जैसी वारदातों के पीछे भी अकसर यही लॉजिक होता है कि अपराधी कमजोर हिस्से पर वार करता है।
रतनपुर की हाल की घटना के पीछे भी गौर से देखें तो दु:ख, अपमान और बेबसी से बौखलाया एक आदमी दिखता है जिसने और कुछ और नहीं बन पड़ा तो तीन मासूमों को मौत के घाट उतार दिया। उसकी पत्नी बच्चों के चाचा के साथ भाग गई थी। पुलिस ने रिपोर्ट नहीं लिखी। वह पत्नी के पीछे चंडीगढ़ तक हो आया किन्तु पत्नी ने वापस लौटने से इनकार कर दिया। चंडीगढ़ में वह परदेसी था। वहां न तो वह अपनी बेवफा बीवी का कुछ बिगाड़ पाया और न ही अपने सौता का। एक तो पत्नी के जाने का गम, दूसरे पुलिस की तरफ से नाउम्मीदी और तीसरे पड़ोस में मिली जलालत से वह बौखला गया। कुछ न सूझा तो अपने सौत के भतीजों, भतीजी को ही अगवा कर ले गया और उनकी हत्या कर दी। यह एक तरह का वक्ती पागलपन है। कुछ नहीं कर पाने की बेबसी में कुछ कर जाने का उतावलापन है। हत्या के समय उसके मन में केवल एक ही बात रही होगी कि पड़ोसी के परिवार ने उसका आशियाना उजाड़ा तो वह भी उसका आशियाना उजाड़ दे। उसने ऐन यही किया। दरअसल यह हमारी व्यवस्था की पराजय है। हम लोगों के मन से बेबसी, असुरक्षा और अकेलापन दूर नहीं कर पाए हैं। कहां कमी रह गई है इसका ठीकरा किसी अपराधी पर छोड़ना नादानी होगी। जिन्हें इसकी चिन्ता करनी है, वे चेतें तो और बात है।
लेखक दीपक रंजन दास हरिभूमि में कार्यरत हैं तथा दुर्ग-भिलाई के डेस्क प्रभारी हैं.

