देश के न्यायाधीश, सरकारी अफसर, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों की सम्पत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक हो रहा है। लेकिन जब तीन स्तम्भों की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक हो रहा है तो ऐसे में कथित चौथा स्तम्भ को भी अछूता नहीं रहना चाहिए। बात आती है कि मीडिया पर अंगुली नहीं उठनी चाहिए, क्योंकि मीडिया ही देश को आईना दिखाती है, लेकिन ऐसा नहीं है। यही मीडिया है, इसी आईने के चक्कर में गलत राह भी दिखा देती है। इस लाइन में भी ऐसे मठाधीश हैं कि जिन्होंने मीडिया की धौंस में अरबों की संपत्ति अर्जित की है या फिर लोग अपने काले धन को छुपाने के लिए मीडिया का सहारा ले रहे हैं। मीडिया में भी हर तरह का माफिया प्रवेश कर गया है। क्योंकि प्रशासनिक तंत्र को अपने रुतबे से भयभीत कर वह काले धंधे में लगे रहते हैं। यह बात निचले स्तर के पत्रकारों की नहीं है जो मुश्िकल से अपनी गृहस्थी का पालन-पोषण करते हैं। बात है ऊंचे ओहदे पर काम करने वाले मीडिया के अफसरों की। जिन्हें मीडिया समूह के मालिक भी इधर-उधर नहीं करते।
यानी एक स्थान पर जमे रहने वाले ये मठाधीश चिकनी चुपड़ी खबरों से ऐसे लगते हैं कि कितने बेदाग होंगे, जबकि उनके पास बेहिसाब सम्पत्ति है। यह जांच का विषय है कि आखिर उनके पास मात्र मीडिया ही एक माध्यम था तो वेतन से उन्होंने इतनी सम्पत्ति हासिल कहां से की। मीडिया समूह निचले तबके के कर्मचारियों पर तो नौकरी के साथ दूसरा काम करने पर रोक लगाती है, लेकिन बडे़ ओहदे वाले उनके नौकर अपने रुतबे के साथ मोटा धन अर्जित कर रहे हैं। इन पर भी सुप्रीम कोर्ट का शिकंजा होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट हो चाहिए कि जिन विभागों में धौंस से काम लिया जाता है या जिनकी सार्वजनिक रूप से धौंस चलती है, उनकी सम्पति की जांच होनी चाहिए।
इनमें पुलिस, पत्रकार, राजनीतिज्ञ, अफसर, राजनीतिज्ञों से जुडे़ लोग सहित न्यायाधीश शामिल होने चाहिए। लेकिन पत्रकार सभी जगह अछूते रह जाते हैं क्योंकि ये चौथा स्तम्भ हैं, लेकिन ऐसा नहीं है इनकी सम्पति का ब्यौरा सार्वजनिक होने के साथ यह भी होना चाहिए कि यह उसने किस स्रोत से अर्जित की। मीडिया समूह इलेक्ट्रॉनिक या प्रिंट मीडिया हो सभी समूहों के मालिकों के मीडिया की आड़ में सैकडों धंधे चल रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या दूसरे कारोबार करना गलत है, नहीं, लेकिन वे धंधा मीडिया की आड़ में दुनिया को बेवकूफ बनकार सिर्फ धन अर्जित करने के लिए नहीं हो। इस सम्पत्ति के ब्यौरे की शुरुआत समाचार पत्र या चैनल समूहों के मालिकों से होनी चाहिए। साथ में यह भी ब्यौरा हो कि ये समूह मीडिया के अलावा और क्या कार्य कर रहा है। अगर गलत कार्य है तो उन पर कड़ाई से पाबंदी के साथ समूह के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, जिससे उनके चेहरे पर कालिख पोती जा सके।
लेखक राजकुमार जैन पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

