भूख से जब अतड़ियां, पेट में दर्द देती हैं, 
जब रिरियाती नई पीढ़ी, मौत की चादर ओढ़ लेती है,
तब तनी हुई मुट्ठी, हाथ में बन्दूक थाम लेती है,
तब बुन्देलखण्ड के बीहड़ में, बगावत की जंग शुरू होती है,
तब सिसकती ममता है, कंलकित मानवता होती है,
स्तब्ध कर देने वाली शांति, चीत्कार की ध्वनि सन्नाटा तोड़ती है।
कवि अग्निवेद की इस कविता की तरह के हालात में रह रहे बुन्देलखण्ड के लोगों की जिन्दगी को जानने के लिए उत्तर प्रदेश के पिछड़े व पिछवाड़े जिले के रूप में चर्चित ललितपुर को समझना ही काफी है। उत्तर प्रदेश का अंतिम जनपद ललितपुर भूकम्प के संभावित खतरे से सहमा हुआ है। खनन माफिया ग्रुपों ने यहां के पर्यावरण को भारी नुकसान पहुचा दिया है। चित्रकूट, हमीरपुर में धरती फटने की घटना आने वाले खतरे की चेतावनी दे रही है। खनन माफिया ने बुन्देलखण्ड के झांसी, ललितपुर, चित्रकूट, हमीपुर, महोबा, जालौन जनपद में खनिज संपदा का बेतरतीब ढंग से इतना दोहन किया है कि क्षेत्र में लगातार पांच वर्षों से सूखा पड़ रहा है। बुन्देलखण्ड वासियों के सामने जीवन-मरण का सवाल खड़ा हो गया है।
अतीत में चन्देलकालीन 6 हजार तालाबों और नदियों के कारण हरियाली से भरपूर रहने वाला यह क्षेत्र अब उजाड़ क्षेत्र बनने को मजबूर है। ललितपुर जनपद अपने गर्भ में बेशकीमती पत्थरों- ग्रेनाइट, सैंड स्टोन, डाइस्पोर, गौरा पत्थर, लाइम स्टोन व लौह अयस्क छुपाये हुए है। इन बहुमूल्य खनिजों तथा कीमती पत्थरों की विश्व व्यापार मंडी में अलग पहचान है। ग्रेनाइट पत्थर की एक-एक शिलाखण्ड को एक लाख से पांच लाख रुपये तक में खरीदने के लिए व्यापारियों में होड़ लगी रहती है।
ज्ञात हो, 10 बड़ी कम्पनियां तथा 30 से अधिक छोटी कम्पनियां ग्रेनाइट खनन का कार्य राजघाट रोड तथा पुराने चन्देरी
मार्ग पर कर रही हैं। ये खनिज विभाग से मिले खदानों के अलावा अवैध रूप से वन भूमि में बेरोक-टोक खनन कार्य कर रही हैं। खनिज परिहार नियमावली के प्रावधनों का खुला उल्लंघन करते हुए यहां के खनिज माफिया प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ रहे हैं। जमीन को लगातार खोखला करने के बाद उसे खुला छोड़ देने के कारण यहां अनेक प्रकार की समस्या खड़ी हो गई है। कुंओं के जल स्तर में अचानक हो रहे परिवर्तन ने हालात भयावह कर दिये हैं। जनपद के लोगों को भय है कि जमीन के अन्दरूनी हिस्सों की खुदाई से कभी भी ललितपुर लातूर बन सकता है। चट्टानों को तोड़ने के लिए यहां जिस तरह विस्फोटक का प्रयोग किया जाता है, वह और भी खतरनाक है। ग्रेनाइट उत्खनन से संभावित भूकम्प के खतरों को रोकने के लिए बुन्देलखण्ड विकास सेना नामक संगठन का गठन रमेश चौबे, का. जिनेन्द्र जैन, सुरेन्द्र अग्निहोत्री, सुधीर जैन की अगुवाई में एक दशक पूर्व किया गया था। लेकिन कeलान्तर में यह संगठन भी खनिज माफियाओं का भोपू बन गया है। फिल्म अभिनेता राजा बुन्देला का कहना है कि बुन्देलखण्ड की सियासी राजनीति खनिज माफिया के इर्द-गिर्द उलझी हुई है। सत्ता किसी की हो, अवैध खनन का सिलसिला रूकने का नाम नही लेता है।
सैंड स्टोन से लेकर ग्रेनाइट तक निकालने के लिए पूरे बुन्देलखण्ड में विशाल गड्ढे उभर आये हैं। वन भूमि से हरे वृक्ष काट कर राजस्व रिकार्ड में हेरफेर करने का सिलसिला चल रहा है। इससे जहां एक ओर वन समाप्त हो रहे हैं, वही जंगली जानवरों के लिए भी खतरा पैदा हो गया है। बुन्देलखण्ड के बदतर हालात पर उत्तर प्रदेश की विधान सभा में झांसी के विधायक प्रदीप जैन आदित्य ने कहा कि यहां की 70 प्रतिशत आबादी कुपोषण और भुखमरी की शिकार हैं। जल स्तर 15 मीटर तक नीचे खिसक गया है। हैण्डपम्पों से फ्लोराइड और आर्सेनिक निकल रहा है। बेरोजगारी के चलते लोग आत्महत्या कर रहे हैं। शासन एवं प्रशासन की ओर से ध्यान नहीं दिया गया तो यहां के लोग हथियार उठा सकते हैं और यहां पर भी नक्सलवाद की समस्या पैदा हो जाएगी।
ललितपुर जनपद में जहां एक ओर पत्थर माफिया जल्द से जल्द अपनी तिजोरी भरने में लगे हैं तो वहीं दूसरी ओर पत्थर काटने में कार्यरत मजदूरों को सिलकोसिस नामक जानलेवा बीमारी मजदूरी आरम्भ करने के लगभग सात सप्ताह बाद ही अपने आगोश में जकड़ लेती है। खांसी, जुकाम और सर्दी के लक्षण के साथ शुरू होने वाली यह घातक बीमारी, एक वर्ष पूर्ण होते-होते मजदूरों की मौत पक्की कर जाती है। इस दौरान सीने में दर्द और मुंह से रक्त गिरने लगता है। यह सब होना यह सिद्ध करता है कि मजदूर को सिलकोसिस ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है जो पांच वर्ष के अन्तराल में मौत के मुंह में अवश्य चला जाएगा।
सिलिका नामक धूल की वजह से मनुष्य के शरीर में यह बीमारी पैदा होती है। सिलिका की धूल पत्थर काटते समय सांस लेने पर फेंफड़ों मे जमा हो जाती है और फेफड़े कमजोर कर देती है। इस जानलेवा बीमारी का अभी तक काई इलाज संभव नहीं है, इसलिए उपचार के अभाव में प्रतिवर्ष सैकड़ों मजूदर मौत के मुंह में जा रहे हैं। वर्ष 1986 में 16 मजदूरों की एक साथ मौत सिलकोसिस से होने पर तत्कालीन सांसद शरद यादव ने राज्य सभा में सरकार का ध्यान इस समस्या की ओर खींचा था। तब केन्द्र सरकार ने इस रोग की पहचान एवं उपचार के लिए डॉ. एच.एन. सैय्यद के नेतृत्व में राष्ट्रीय व्यावसायिक स्वास्थ्य संस्थान, अहमदाबाद के एक विशेशज्ञ दल को सर्वेक्षण हेतु ललितपुर भेजा था। उक्त दल ने इस क्षेत्र के 500 से अधिक पत्थर खदान मजदूरों में सिलकोसिस के लक्षण का पता लगाया था।
वर्तमान में ग्राम नाराहट, डोगराकला, पाली, जाखलौन, धौर्रा, कपासी, मादोन, बंट, पटना, पारोट, राजघाट, भरपतुरा, मदनपुर, सौरई आदि ग्रामों के पास लगी पत्थर खदानों में काम करने वाले खनिक धीरे-धीरे मौत के आगोश में जाने के लिए अभिशप्त हैं। बेतरतीब खनन के परिणामस्वरूप बुन्देलखण्ड में पर्यावरण को भारी नुकसान हुआ है। प्रदूषण फैलाने में लगे क्रेशर तथा बालू के अवैध खनन के चलते यहां की जीवनदायनी नदी बेतवा के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है। लगातार दोहन आने वाले दिनों की चेतावनी दे रहे है।
बीते पांच वर्षों में बदतर होते हालात, बदहाली, बेबसी, आजीविका पर बढ़ते संकट के कारण 267 लोगों ने आत्महत्या करके इसे अभागा क्षेत्र बना दिया है। खनिज माफियाओं की ताकत के आगे प्रदेश शासन भी झुका हुआ है। माफियाओं के प्रभाव से सपा शासन काल में बुन्देलखण्ड के निवासी खनिज मंत्री विशम्भर प्रसाद निशाद को चलता कर दिया गया। बसपा शासन में खनिज माफियाओं के कहने पर बुन्देलखण्ड के बाबू सिंह कुशवाहा को खनिज मंत्री बनाया गया है। खनिज माफियाओं ने एक बार अपनी ताकत का एहसास कल्याण सिंह सरकार को गिराने में दिखा दी थी और उन्हीं के दम पर जगदिम्बका पाल को रातो रात राजभवन में मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई गयी थी। इस खेल में बुन्देलखण्ड के बड़े खनिज माफिया के रूप मे चर्चित बुन्देला बन्धुओं का प्रमुख रोल था।
नही रूक रहा अवैध खनन
रायल्टी हो या हो ऊपरी कमाई का मामला, खनिज विभाग का कोई सानी नहीं। कंपनी अपना काम खत्म कर महीनों पहले चली गई, मगद दबंगों द्वारा अवैध खनन लगातार जारी है। शिकायतें हुईं पर कार्रवाई आज तक नहीं हुई। उधर खनिज अधिकारी इसे वैध करार देते हुए कोई शिकायत न आने का दम्भ भर हरे हैं।
मालूम हो कि बबीना थाना क्षेत्र के ग्राम खौलार में एक खदान (खसरा नंबर 669) का पट्टा एक कंपनी को हुआ था। वर्ष 2007 के प्रारंभ में उक्त कंपनी वहां से चली गई और खनन भी रुकवा दिया गया। इसी दौरान कुछ मौकापरस्तों ने खनिज विभाग में आंकड़ा फिट किया और उक्त खदान से अवैध रूप से खनन प्रारंभ कर दिया। इसकी भनक लगते ही कंपनी ने अपने एक प्रतिनिधि को झांसी भेजा, जिसने अवैध खनन रूकवाने के संबंध में खनिज अधिकारी को 21 जून 2007 में प्रार्थना पत्र दिया। इसके बाद भी जब खनन नहीं रूका तो पुन: वर्ष 2008 में उक्त प्रतिनिधि ने संबंधित विभागीय अधिकारियों व जिलाधिकारी समेत अन्य अफसरों को पंजीकृत डाक से प्रार्थना पत्र भेजकर अवैध खनन रोके जाने की मांग की। इसके बावजूद खनिज अधिकारी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।
जब खनिज अधिकारी एन. दास से इस संबंध में बातचीत की गई तो उन्होंने अपने पास किसी भी प्रकार की शिकायत आने से ही इंकार कर दिया। उन्होंने दावा किया कि उक्त खदान पर होने वाला खनन कानूनी तरीके से किया जा रहा है। इस अवैध खनन से जनपद में बन रही फोर लेन सड़कों पर मिट्टी तथा पत्थर की आपूर्ति की जा रही है।
रायल्टी पर्ची बिकती है पान की दुकानों पर
बुन्देलखण्ड के महोबा जनपद में खनिज नियमों का खुला उल्लंघन हर कोई देख सकता है। पान की दुकानों पर एम.एम. ग्यारह प्रपत्र की बिक्री ऐसे की जाती है जैसे उसकी कोई कीमत ही न हो। वास्तव में एम.एम. ग्यारह खनिज निकासी का वह प्रपत्र होता है जिसमें पत्थर खदान से निकलने वाले खनिज की घन मीटर में स्थिति दर्ज की जाती है। लेकिन खनिज विभाग से जोड़-तोड़ करके फर्जी खदानों के नाम प्रपत्र जारी करा लिया जाता है। इसका इस्तेमाल अवैध ख
नन की निकासी के लिए किया जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी के एम.एल.सी. स्वतंत्र देव सिंह ने इस मामले की जानकारी होने पर प्रदेश सरकार को आगह कराया है कि खनिज माफियाओं के रैकेट को तोड़ने के लिये रायल्टी पर्ची बिक्री पर रोक लगायी जाये। बीते माह पुलिस द्वारा छापा मारने पर फर्जी एम.एम. ग्यारह पर अवैध निकासी करते दो व्यक्तियों को गिरफ्तार किया था। वर्ष 2005 में डी.एम. महोबा ने स्टोन क्रेसर पर छापा मारकर दस लाख कीमत के फर्जी एम.एम. पत्र पकड़े थे।
लेखक सुरेन्द्र अग्निहोत्री दैनिक भास्कर के लखनऊ ब्यूरो के प्रमुख हैं। वे बुन्देलखण्ड पर विशेष लेखन के लिए ‘रामेश्वरम हिन्दी पत्रकारिता पुरस्कार 2007’ से सम्मानित किए जा चुके है। सुरेंद्र से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

