Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

समाज-सरोकार

ग्‍लोबल होती दुनिया में सिमटता बुजुर्गों का संसार

अलकाशांतिदेवी आज बहुत खुश नज़र आ रही थीं, मनोहरलाल जी ने जब उनकी इस ख़ुशी का राज़ पूछा तो कहने लगीं कि आज मेरा बेटा लन्दन से वापस आ रहा है. मनोहरलाल जी चौंके और कहने लगे – ‘क्यों भई, कोई फ़ोन आया है क्या?’ शांतिदेवी मुस्कराईं और कहने लगीं -‘आज मेरे बेटे को गए पूरा एक साल बीत गया मगर वो नहीं आया, परन्तु आज अपनी माँ का जन्मदिन वो नहीं भूल पायेगा!’ यह सुन कर मनोहरलाल जी बोले- ‘लगता है 65 साल की उम्र में तुम सठिया गई हो. सचमुच शांतिदेवी आज सठिया गई थीं. वह पूरे दिन इंतज़ार करती रहीं और उनका बेटा नहीं आया.

अलकाशांतिदेवी आज बहुत खुश नज़र आ रही थीं, मनोहरलाल जी ने जब उनकी इस ख़ुशी का राज़ पूछा तो कहने लगीं कि आज मेरा बेटा लन्दन से वापस आ रहा है. मनोहरलाल जी चौंके और कहने लगे – ‘क्यों भई, कोई फ़ोन आया है क्या?’ शांतिदेवी मुस्कराईं और कहने लगीं -‘आज मेरे बेटे को गए पूरा एक साल बीत गया मगर वो नहीं आया, परन्तु आज अपनी माँ का जन्मदिन वो नहीं भूल पायेगा!’ यह सुन कर मनोहरलाल जी बोले- ‘लगता है 65 साल की उम्र में तुम सठिया गई हो. सचमुच शांतिदेवी आज सठिया गई थीं. वह पूरे दिन इंतज़ार करती रहीं और उनका बेटा नहीं आया.

शांतिदेवी जैसे आज कितने ही बुजुर्ग दंपत्ति हैं जो उम्मीदों के साए में अपनी सारी ज़िन्दगी बिता देते हैं. इस उम्मीद में कि जिन बच्चों को उन्होंने उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, आज वही बच्चे उनके लड़खड़ाते क़दमों के लिए बैसाखी का सहारा बनेंगे. एक वक्त ऐसा भी आता है जब शांतिदेवी की तरह उनके सपनों का संसार टूट जाता है और वक्त के साथ-साथ उनकी पथरीली आँखों का इंतज़ार कमजोर पड़ जाता है और ज़िन्दगी पर उनकी ढीली सी पकड़ हमेशा के लिए खामोश हो जाती है. आखिर क्यों होता है ऐसा कि जब बुढ़ापे में बचपन फिर लौट कर आता है तो सेवा करने वाले हाथ नदारद होते हैं? वास्तव में तथ्य तो यह है कि उम्र के 50वें पड़ाव को पार करते करते जब ज़िन्दगी बूढ़ी होने लगती है तब वे अपने ही परिवार पर बोझ बनने लगती है और तब शुरुआत होती है ज़िन्दगी के अकेलेपन की.

यहाँ सवाल यह नहीं है कि बच्चे पढ़ाई करने परदेश ना जाएं, अपितु ये हालात तो एक ऐसी दिशा पर उंगली उठाते हैं, जो पढ़ने के बाद अपनों को अपनों से ही दूर कर देती है और बच्चों को इतना स्वार्थी बना देती है कि वो इस पूरी प्रक्रिया में अपने माँ बाप के योगदान को नाकारा कर देते हैं. वास्तव में आज जाने-अनजाने हम स्वयं ही एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं, जिसमें बुजुर्गों की अहमियत ख़तम सी होती प्रतीत हो रही है. इस समाज की युवा पीढ़ी में ऐसे-ऐसे विचार पनपते जा रहे हैं, जो माँ बाप के दकियानूसी विचारों को अपनी आज़ादी में खलल मान रहे हैं, यही कारण है कि आज इन वृद्ध माँ बाप की ज़िन्दगी सूनी होती जा रही है और ये हर संभव अभावों का जीवन जी रहे हैं. इनका वृद्ध संसार एक छोटे से दायरे में सिमट कर रह गया है.

अधिकतर माँ-बाप तो ऐसे हैं जिनका इंतज़ार कभी ख़तम ही नहीं हुआ. इनके बच्चे पढ़ने विदेश तो गए पर पढ़ने के उपरान्त वहीं बस गए और कभी लौट कर नहीं आये. ऐसे माँ-बाप नौकरों के सहारे जीवन काट रहे हैं परन्तु नौकर कब तक साथ देंगे. एक दिन मौका पा कर वे भी सब कुछ लूट कर फरार हो जायेंगे. दिल्ली में किये गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ 40 प्रतिशत वृद्ध माँ-बाप नौकरों के सहारे जीवन काट रहे हैं और 20  प्रतिशत स्थान उन बुजुर्गों का है, जो अकेले रह कर अपनी तकलीफों को झेल रहे हैं. रही-सही कसर उन बच्चों ने पूरी कर राखी है जो अपने माँ-बाप के साथ तो रहते हैं पर पास नहीं. आज का बुजुर्ग वर्ग अपनों की अपनों के प्रति उपेक्षा को बखूबी समझ रहा है. इस उपेक्षा को देखते हुए शायद एक बुजुर्ग अपने बच्चों क प्रति यही सोच रखता है-

बंद कमरे में मुझे घुटन सी महसूस होती है,
हर वक्त दिल में मुझे चुभन सी महसूस होती है,
चलना सिखाया उंगली पकड़कर जिन्हें,
दूर अपने से देख कर उन्हें आज मुझे,
जलन सी महसूस होती है!

करते हैं कभी कभी पास आने का दिखावा भी वो,
पर देख कर ये दिखावा उनका मुझे तपन सी महसूस होती है!
ओढ़ा देते हैं यूँ तो कभी-कभी वो चादर भी आकर,
पर वो चादर भी मुझे कफ़न सी महसूस होती है!

वास्तव में यह एक कटु सत्य है कि आज का युवा वर्ग अपने बुजुर्ग माँ-बाप के प्रति उदासीन तो है ही, साथ ही वह उनकी ज़िन्दगी को भी अपना गुलाम बना लेने पर उतारू नज़र आ रहा है. बढ़ती उम्र के साथ-साथ यही अकेलेपन का दर्द वृद्ध माँ बाप को भीतर तक झकझोर कर रख देता है और उन्हें एकान्तता के ऐसे धरातल पर लाकर खड़ा कर देता है, जहाँ से उन्हें अकेलेपन और परेशानी से बाहर की दुनिया नज़र नहीं आती. वह एक ऐसी स्तिथि में पहुँच जाते हैं जहाँ वे खुद को समाज से अलग-थलग सा प्रतीत करने लगते हैं. इन बच्चों को आज अपने माँ बाप के दकियानूसी विचार अपनी जीवनशैली में विष घोलते से प्रतीत हो रहे हैं. जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर आज कितने ही बुजुर्ग मर कर जीने पर मजबूर हो गए हैं. उनकी आवाज़ इतनी थरथरा गई है कि उन्हें भगवान भी आज सुन नहीं पा रहा है. एक ऐसी ही जिंदगी पर कटाक्ष करती ये पंक्तियाँ उन बुजुर्गों पर इशारा करती हैं, जिनके मरने पर उनके अपनों ने वाहवाही लूटी-

जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर मैंने उम्मीद की राह सी देखी थी,
थकती हुई उन बूढ़ी आँखों में मैंने एक अजीब कराह सी देखी थी,
एक आवाज़ जो सुनी ना गई, उसमें एक अनजानी आह सी देखी थी,
चुपचाप देखती रही मैं उस मौत को मरते हुए,
पर इस अनजाने गम में मैने उसके अपनों की वाह सी देखी थी!

लेखिका अलका शर्मा दिल्ली में एक कंपनी में कार्यरत. ब्लागिंग में सक्रिय.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...