कितना समझाया था बाबा रामदेव को कि सब कुछ करना पर नेताओं से पंगा मत लेना क्योंकि इनसे उलझना यानी ‘‘बर्र के छत्ते’’ में हाथ डालने जैसा है पर नहीं माने बाबाजी और मांग कर डाली कि विदेशों में जमा काला धन सरकार वापस लेकर आये, जब सरकार ने उनके कहे पर कान नहीं दिया तो बाबाजी ने सीधे-सीधे धावा बोल दिया केन्द्र की सरकार पर कि ये जानबूझकर विदेशों मे जमा काला धन वापस लाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, इसका मतलब कहीं न कहीं दाल में काला ही नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है. बाबाजी का निशाना जहां था जैसे ही वहां तक तीर पहुंचा और तीर की चुभन उनको महसूस हुई तो अपने सेनापतियों को आगे कर दिया.
एक आंय-बांय बकने वाले सेनापति ने उल्टा बाबाजी पर ही हमला बोल दिया कि बाबाजी की संम्पत्ति की सीबीआई से जांच करवाना चाहिये कि वे इतने बड़े आदमी कैसे बन गये? और तो और कुछ साधु-संतो ने भी बाबाजी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और क्यों न खोलते बाबाजी ने थोड़े से ही समय में तमाम दूसरे बाबाओं की दुकानों के ‘शटर’’ जो गिरा दिये हैं. इधर उत्तराखंड के कांग्रेसी भी दाना-पानी लेकर चढ़ बैठे बाबजी पर कि वे बतायें कि इतना माल उनके पास कैसे, कहां से, और कब आया. अब बाबाजी अपने ट्रस्ट की ‘‘बैलेन्स शीट’’ लेकर चैनलों के दरवाजे दरवाजे घूम रहे हैं कि देख लो भैया एक-एक पैसे का हिसाब है अपने पास. अब बाबजी को कौन समझाये कि आप दिखाते रहो अपनी बैंलेन्स शीट, देते रहो ‘‘पाई-पाई’’ का हिसाब पर जो चिल्ला रहे हैं वे तो चिल्लाते ही रहेंगे. वैसे भी जिस नेता ने सबसे पहले आपकी धोती ढीली करने की कोशिश की थी उनकी जुबान पर तो लगाम का कोई सवाल ही नहीं है देश में, ‘‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’’ का सबसे ज्यादा लाभ तो वे ही उठा रहे हैं. आला कमान ने उन्हें कुछ भी बोलने की पूरी छूट जो दे रखी है, सो अपनी चापलूसी के कर्तव्यों का वे पूरा पालन कर रहे हैं.
बाबाजी आप तो इतने समझदार हो, अच्छी खासी दुकान चल रही थी आपकी. हीरोइनों से लेकर हीरो, नेताओं से लेकर मंत्री और मुख्यमंत्री आपके दरबार में मत्था टिकाते थे. कड़कड़ाती ठंड में मुंह अंधेरे उठकर आपके शिविरों में आकर ‘‘कपाल भांति’’ करते थे. कोई आश्रम के लिये जमीन दे रहा था तो कोई आपको राजकीय अतिथि बना रहा था. क्या जरूरत थी आपको काले धन के बारे में बात करने की? अरे जब स्व्ट्जिरलैंड, जर्मनी अपने अपने बैंकों के गेट खोलकर बैठे हैं और बार-बार भारत की सरकार को खबर पर खबर कर रहे हैं कि हुजूर आओ और हमसे काला धन जमा करने वालों की लिस्ट ले जाओ, पर एक ‘‘चपरासी’’ तक वहां जाकर लिस्ट लाने के लिये तैयार नहीं है तो फिर आपकी भला कौन सुनेगा?
दूसरी बात ये भी तो सोचो कि कितनी मेहनत से ‘‘पाई-पाई’’ जोड़कर इन नेताओं ने, अफसरों ने अरबों रुपयों का धन जोड़ा है. कितनी रिस्क ली होगी, रात-दिन पकड़े जाने का डर बना रहता होगा, उसके बाद कहीं जाकर जब माल इकठ्ठा हुआ होगा तक उन्हें विदेशी बैको में ‘‘ट्रांसफर’’ किया होगा और आप चाहते हो कि एक ही झटके में उनकी ‘‘मेहनत की कमाई’’ अपने देश में आ जाये. हर इंसान अपनी सात पीढ़ियों की व्यवस्था करने में जुटा हुआ है. अपने दुनिया से विदा हो जाने के बाद बाल-बच्चों का क्या होगा, ये चिन्ता सबको खाये जाती है. अब अपनी ‘‘आल औलादों’’ के लिये कुछ करोड़ रूपये इन गरीब नेताओं ने इकट्ठे कर भी कर लिये तो आपको इसमें ‘‘आब्जेकशन’’ लेने की क्या जरूरत है?
अपनी तो आपको एक सलाह है बाबाजी कि छोड़ों ये नेतागिरी का चक्कर वरना कल तक आप जिन लोगों को ‘‘कपाल भांति’’ और ‘‘भ्रमरी प्राणायाम’’ सिखाते थे, वे कहीं आपको ‘‘शीर्षासन’’ में खड़े होने के लिये न मजबूर कर दें! क्योंकि एक तरफ इन भ्रष्टों की फौज है और दूसरी ओर आप अकेले, कहां तक लडोगे और फिर किस-किस से लड़ोगे, हमाम में सब ही तो नंगे हैं. एकाध भी कपड़ा पहने हुये होता तो फिर भी आपकी मदद हो जाती, पर यहां तो सब वैसे के वैसे ही हैं. अब भी वक्त है आप तो लोगों को ‘‘पेट अंदर करने फिर पेट फुलाने की,’’ ‘‘सांसों को तेज और धीरे चलाने की प्रेक्टिस करवाओ, उसी में फायदा है. इन सब बातों में कुछ नहीं रखा है समझ गये न?
लेखक चैतन्य भट्ट जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे कई अखबारों में संपादक रहे हैं.

