समझ में नहीं आता की केंद्र सरकार अब इस काम में इतनी देर क्यों कर रही है. बिना देर किये केंद्र सरकार को राज्य सरकारों को विश्वास में लेकर सदानीरा को राष्ट्रीय नाला घोषित कर देना चाहिए. गंगा की लगातार बिगड़ती सेहत और केंद्र सरकार के प्रयासों को देखते हुए आम जन को इस बात की पूरी उम्मीद है कि जल्द ही गंगा नदी नहीं रह जाएगी बल्कि मल जल ढोने वाले एक नाले के स्वरुप में आ जाएगी. गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी तक लगभग 2525 किलोमीटर का सफ़र तय करने वाली गंगा अपने किनारों पर बसे करोड़ों लोगों को जीवन देती है. देव संस्कृति इसी के किनारे पुष्पित पल्लवित होती है तो दुनिया का सबसे पुराना और जीवंत शहर इसी के किनारे बसा है.
माँ का स्थान रखने वाली गंगा भारतीय जनमानस के लिए अत्यन्त आवश्यक है. मोक्ष की अवधारणा में गंगा है. मृत्यु शैया पर पड़े जीव के मुंह में गंगा जल की दो बूंदे चली जाएँ तो उसको मोक्ष मिलना तय माना जाता है, लेकिन अब यह अवधारणा बदलने का वक़्त आ गया है. सदानीरा अब अमृतमयी जल से नहीं घरों से निकलने वाले सीवर से प्रवाहमान है. जीवन मूल्यों की बलि चढ़ा कर होने वाले विकास का नतीजा टिहरी बाँध के
बन जाने के बाद तो गंगा की धारा बिजली के तारों में चली गयी. अब गंगा का पानी ज़मीन पर नहीं टिहरी में बनने वाली बिजली में चला गया है.
गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के नाम पर इस देश के नौकरशाहों और राजनेताओं ने अपने बैंक एकाउंट में पैसे की गंगा बहा ली. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा एक्शन प्लान के पहले चरण में लगभग एक हज़ार करोड़ से भी ज्यादा की धनराशि खर्च की गयी. लगभग 250 से अधिक परियोजनाएं पूरी हुयीं. गंगा एक्शन प्लान का पहला चरण अपने तय समय से सालों देर तक चला. अभी चल ही रहा था कि गंगा एक्शन प्लान के दूसरे चरण की योजना बन गयी. अब गंगा एक्शन प्लान का दूसरा चरण चल रहा है. इसके लिए लगभग बाइस हज़ार करोड़ दिए गये हैं, लेकिन गंगा पहले से और अधिक गन्दी हुयीं हैं यह एक अँधा भी बता सकता है.
हिन्दुओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं गंगा और बनारस भी. यहीं का उदाहरण ले लीजिये. बनारस में रोजाना लगभग 25 एमएलडी सीवेज निकलता है. गंगा एक्शन प्लान के पहले चरण में 1000 करोड़ रूपये फूंकने के बाद भी इस शहर में महज 10 एमएलडी सीवेज को ट्रीट करने का इंतज़ाम हो पाया है. यानी 15 एमएलडी सीवेज सरकारी रूप से सीधे गंगा में बहाया जा रहा है. इसके साथ आपको यह भी बता दूं की 10 एमएलडी सीवेज को ट्रीट करने के लिए जो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगे हैं, उनमें से अधिकतर बिजली न रहने पर नहीं चलते हैं. यानी इस दौरान अगर प्लांट की टंकी ओवर फ्लो हुयी तो सीवेज गंगा में बहा दिया जायेगा. यह आंकड़ा महज एक शहर का है. इससे उन सभी शहरों का अनुमान लगा सकते हैं जो गंगा के किनारे बसे हैं. लगे हाथ आपको कैग के दिए एक और आंकड़े के बारे में बता देते हैं. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक आज भी लगभग छब्बीस सौ करोड़ लीटर सीवेज गंगा में बहाया जा रहा है.
राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के सदस्य प्रोफेसर बीडी त्रिपाठी की लैब में हुयी शोध बताती है कि गंगा का पानी अब आचमन के लायक भी नहीं बचा है, फिर स्नान की तो बात भूल जाइये. यह हाल तब है जब एक हज़ार करोड़ रुपये से ज्यादा की धनराशि और 250 से ज्यादा परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं. गंगा एक्शन प्लान का दूसरा चरण चल रहा है और इसके तहत लगभग 450 परियोजनाएं चलनी है या चल रहीं हैं. केंद्र सरकार ने गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण बना कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली. गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर खाने कमाने का नया जुगाड़ बना लिया है. गंगा की सेहत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है. पानी का रंग या तो गहरा हरा हो गया है या काला पड़ गया है. प्रवाह नाम मात्र का भी नहीं है. ऐसे में तो केंद्र सरकार के लिए यही अच्छा होगा कि वह गंगा को राष्ट्रीय नदी की जगह इसे राष्ट्रीय नाला घोषित कर दे.
लेखक आशीष तिवारी बनारस के युवा पत्रकार और ब्लॉगर हैं.

