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सारा जिस्म है छलनी, दर्द परेशां, कहां से उठे

पदमजी: मोहाली में फिर वही क्रिकेट कूटनीति का खेल : अरसे बाद होली बनारस में मनी. क्या आनंद मिला होगा, इसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता. धूलि वंदन की शाम लगा मित्रों का जमघट और उन्हीं में एक ने गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगौर के काव्य संकलन “कथा ओ काहिनी” की एक कविता `होरी खेला’ सुनाई जिसका हिन्दी में अनुवाद इस प्रकार है, ”पठान केसर खां को राजपुताना घराने की एक रानी ने केतुं नगरी से पत्र लिखा, ”युद्ध करते-करते बुझी आस, थक गए हैं. मै देख रही हूँ वसंत बीता जा रहा है. आप अपनी पठानी सेना लेकर आओ. हम आपके साथ राजपूतानी होली खेलेंगे.” केसर खान आया. खूब आवाभगत हुई. राजपूत सेना ने राजपूतानी बन कर शमशेरी होली खेली और केसर खां (मार डाला) थैंक यू मेंशन नाट हो गए.

पदमजी: मोहाली में फिर वही क्रिकेट कूटनीति का खेल : अरसे बाद होली बनारस में मनी. क्या आनंद मिला होगा, इसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता. धूलि वंदन की शाम लगा मित्रों का जमघट और उन्हीं में एक ने गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगौर के काव्य संकलन “कथा ओ काहिनी” की एक कविता `होरी खेला’ सुनाई जिसका हिन्दी में अनुवाद इस प्रकार है, ”पठान केसर खां को राजपुताना घराने की एक रानी ने केतुं नगरी से पत्र लिखा, ”युद्ध करते-करते बुझी आस, थक गए हैं. मै देख रही हूँ वसंत बीता जा रहा है. आप अपनी पठानी सेना लेकर आओ. हम आपके साथ राजपूतानी होली खेलेंगे.” केसर खान आया. खूब आवाभगत हुई. राजपूत सेना ने राजपूतानी बन कर शमशेरी होली खेली और केसर खां (मार डाला) थैंक यू मेंशन नाट हो गए.

होली के दस दिन बाद हमारे प्रधानमंत्री ने बुढ़वा मंगल के अगले दिन यानी 30  मार्च को आधुनिक होली खेलने की तैयारी की है. यानी मोहाली में भारत-पाक विश्व कप सेमीफाइनल मुकाबले के मौके पर मनमोहन सिंह जी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी और प्रधान मंत्री जिलानी को सपरिवार आमंत्रित किया है. बहुतेरों ने इसे बचकाना या अपरिपक्व भावुकता माना. लेकिन हमें तो यह एक शतरंज की चाल जैसा लग रहा है. अब दोनों आका आ जाएं तो आतंकवादी (जिनके बारे में कहा जाता है 13  की संख्या में वे न सिर्फ मुंबई पहुँच चुके हैं बल्कि उनकी टिकट का भी जुगाड़ हो चुका है) आने से कतराएंगे.

यहीं पर एक विपरीत सोच भी है और वो है पाकिस्तान का पिछला रिकार्ड. जहां राष्ट्रपति का विमान अपने ही मुल्क में अपनों द्वारा आसमान में उड़ा दिया जाता है, जहां कई प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति अपने ही लोगों के हाथों मारे गए हों, उनसे वफ़ा की उम्मीद कुछ ज्यादा ही कही जाएगी. बेहतर रहता यदि आईएसआई प्रमुख कयानी को भी न्योता दिया जाता और तब मोहाली के बराती प्रस्थान स्थल से लगायत मुंबई में विदाई समारोह तक ये सभी ख़ास मेहमान एक सूत्र में आमंत्रित रहते और इनके बैठने का प्रबंध मैदान के भिन्न-भिन्न स्थानों पर होता. ताकि हमारी आतंरिक सुरक्षा जबरदस्त रहती. इसी बहाने पाकिस्तानी आकाओं को खुली हवा में सांस लेने का कुछ मौक़ा मिल जाता. क्योंकि अपने मुल्क में तो ये बेचारे खुद के तैयार किये महान मुजाहिदीनों (भस्मासुर बन चुके आतंकवादी) के भय से सुरक्षा के `डीप फ्रिज’  में बंद रहते हैं.

मनमोहन जी ने अपने इस `आमंत्रण खेल’ में और भी कई तीर साधे हैं. टूजी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रकुल खेल, सांसद खरीद-फरोक्त, आदर्श सोसायटी, सीवीसी नियुक्ति जैसे भांति-भांति के घोटाले से परेशान और पसीना-पसीना हो चुके प्रधानमंत्री ने यह दांव खेल कर अपनी तार-तार हो चुकी न सिर्फ राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय छवि को भी फिर से निखारने की चेष्टा की है. लेकिन वह शायद एक कहावत के बारे में नहीं जानते कि- कुत्ते ने अगर मनुष्य के पैर पर काट लिया तो क्या मनुष्य भी पलट कर कुत्ते के पैर पर ही काटेगा..? यह कतई शोभा नहीं देगा.

प्रधान मंत्री बड़प्पन दिखाएँ, अच्छी बात है. पर इस अर्थशास्त्री को शायद इतिहास का ज्ञान नहीं है. क्रिकेट कूटनीति जब-जब की गयी, तब-तब लात खाई. जब-जब सदाशयता दिखाई, मुंह की खाई. उनको यह भी याद नहीं रहा शायद कि अटलजी बस लेकर लाहौर गए तो उसी रात कश्मीर में आतंकवादियों ने सिखों के साथ खून की होली खेली और द्रास-कारगिल में गोली खाई. कहने का तात्पर्य यह कि दोस्ती की कोशिशों के जवाब में हमें लहूलुहान नज़ारे ही मिले.

क्या कीजियेगा, जिनकी जीने की पूंजी ही ‘भारत घृणा’ है, उनके नफ़रत भरे दिल में प्यार का एंटीबायटिक कितने दिनों तक डाला जाय, यह एक लम्बी बहस का विषय है. हम विश्व, विशेषकर नाटो ताकतों को यह दिखाना चाहते हैं कि न तो हम हुस्ने मुबारक हैं और न ही गद्दाफी. हम ठहरे लोकतांत्रिक देश और हमें एक ही भय सताता है कि कहीं अमेरिका और उसके गुर्गे यह न कह बैठें कि इराक़ की जो स्थिति कुवैत में थी, वही भारत की कश्मीर में है. कहीं वे चल न पड़ें एक और जनतंत्र बचाने. पाक के विभिन्न सीमावर्ती शहरों से नाटो सेना की पैट्रियाट मिसाइल वर्षा कहीं भारत पर भी न शुरू हो जाए.

उनके एक आमंत्रण से कई सवाल उठ खड़े हो गए हैं किसी शायर की इन पंक्तियों की तरह, “एक दो का जिक्र क्या, सारा जिस्म है छलनी, दर्द परेशां कहाँ से उठे.” मजेदार बात तो यह कि कोई अन्य राजनेता यदि पाकिस्तान और उसके हुक्मरानों से प्रेम प्रगट करे तो देश में कहर बरप जाता है पर यहां ठहरे प्रधानमंत्री, संवैधानिक रूप से प्रभु सत्ता के केंद्र और सर्वाधिक सम्माननीय शख्स. शायद यही कारण था कि उनके पाक प्रेम से आहत होकर नारायणन ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पद से त्यागपत्र दे दिया था.

हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री एक बात याद रखें कि मुंबई कांड के बाद देश की मानसिकता पूरी तरह से बदल चुकी है और भारतीय मुसलमान पाक परस्त नहीं रह गए हैं. अच्छी क्रिकेट पर हो सकता है किसी को भी ताली मिले, अन्यथा अतीत का तजुर्बा तो यही कहता है कि मुकाबले के दौरान गालियों के ही लड्डू फूटेंगे. मैदान में बैठे आम दर्शक मियांदाद में दाऊद इब्राहीम की रिश्तेदारी देखेंगे और देखेंगे कई अन्य पाकिस्तानी खिलाडियों (पूर्व और वर्तमान) में जेहादी मिजाज भी. मोहाली में कूटनीतिक खेल होगा और बेचारा क्रिकेट कोने में दुबका रहेगा.

लेखक पदमपति शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनकी गिनती देश के जाने-माने हिंदी खेल पत्रकारों में होती है.

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