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कहां गया वो इक्‍कड़ बिक्‍कड़ बम्‍बे बो…!

इक्कड़ बिक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरा सो..पोसम्बा भाई पासेम्बा डाकिये ने क्या किया..ये वो शब्द हैं, जो आजकल गली मोहल्लों में सुनने को नहीं मिलते हैं। इन शब्दों के साथ बच्चों का बचपन निकलता था और बच्चे इस तरह के सैकड़ों शब्दों के साथ अपना बचपन भरपूर जीते थे। आजकल ये शब्द सुनने को नहीं मिलते हैं। हमने विकास के साथ क्या पाया और क्या खोया कि अगर गणना करें तो बच्चों के हिस्से से हमने उनका बचपन छीन लिया है और उनके बचपन को हमने यांत्रिक बचपन बनाकर रख दिया है। याद करो वो दिन जब आप और हमारे जैसे बच्चे सुबह और शाम को अपने मोहल्ले में टोलियॉं बनाकर घूमा करते थे और दुनिया भर की चिंता से मुक्त होकर खुले आसमान में कभी गिल्ली डंडा खेला करते थे तो कभी किसी बाग में लुका छिपी का खेल खेलकर अपने साथियों को ढूंढा करते थे।

इक्कड़ बिक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरा सो..पोसम्बा भाई पासेम्बा डाकिये ने क्या किया..ये वो शब्द हैं, जो आजकल गली मोहल्लों में सुनने को नहीं मिलते हैं। इन शब्दों के साथ बच्चों का बचपन निकलता था और बच्चे इस तरह के सैकड़ों शब्दों के साथ अपना बचपन भरपूर जीते थे। आजकल ये शब्द सुनने को नहीं मिलते हैं। हमने विकास के साथ क्या पाया और क्या खोया कि अगर गणना करें तो बच्चों के हिस्से से हमने उनका बचपन छीन लिया है और उनके बचपन को हमने यांत्रिक बचपन बनाकर रख दिया है। याद करो वो दिन जब आप और हमारे जैसे बच्चे सुबह और शाम को अपने मोहल्ले में टोलियॉं बनाकर घूमा करते थे और दुनिया भर की चिंता से मुक्त होकर खुले आसमान में कभी गिल्ली डंडा खेला करते थे तो कभी किसी बाग में लुका छिपी का खेल खेलकर अपने साथियों को ढूंढा करते थे।

बचपन की वो यादें आज भी हमारे जेहन में ऐसे ताजा है कि उनको याद कर हम आज भी खुद को तरोताजा महसूस करते हैं। एक समय था जब बचपन खेल खेल में निकल जाता था और बचपन का मतलब ही खेल खिलौनों से लगाया जाता था। हर गली मोहल्‍ले में बच्चों की टोलियॉं अलग-अलग खेल खेला करते थे। कोई लुका छिपी खेलता तो कोई पकड़ा-पकड़ी, गिल्ली डंडा का खेल तो बच्चों का सबसे प्रिय खेल हुआ करता था। इसी के साथ लंगड़ी खेलना, लोहे और लकड़ी का खेल खेलना, पेल दूज का खेल, धाड़ धुक्कड़ का खेल, गुड़्डे गुड़िड्यों की शादी करना आदि आदि। बहुत से ऐसे खेल थे, जिनके माध्यम से बच्चे खेल खेल में बड़े हो जाते और समाज की सामाजिकता को सीखते थे।

याद करो वो अपने शहर में बारिस का आना और वो कागज की कश्तियॉं बनाकर पानी में छोड़ना और उस कश्‍ती के पीछे-पीछे जब तक जाना जब तक कि वह कश्‍ती दम न तोड़ दे। याद करो वो तेज आंधियों में कागज से बनी पतंगों को उड़ाना और आनन्द लेना। कितना खुशगवार होता था वह सब। कितना शानदार और यादगार रहा है हमारा बचपन। पर आज के बच्चों के नसीब में यह बचपन नहीं है, उनके पास कम्प्यूटर है, टीवी है, वीडियोगेम है और आधुनिक साजो-सामान के बने यंत्र हैं, खिलौने हैं पर नहीं है तो कश्‍ती, वो पतंग और वो अल्हड़पन और वो बचपना।

वर्तमान परिदृश्‍य पर गौर फरमाए तो हमें पता चलता है कि हमने विकास की इस दौड़ में बच्चों से बचपन छिन लिया है और उनके सिर पर स्कूल के बैग का इतना बोझ डाल दिया है कि आजकल के बच्चों की अल्हड़ता और नाजुकता इन बस्तों के बोझ में दब कर रह गई है। आज किसी भी गली मोहल्ले में बच्चे आपको खेलते नजर नहीं आएंगे। आजकल का बच्चा टीवी के सामने सीरियल देखता है, कार्टून की फिल्म देखता है, टीवी फिल्म देखता है और गेम्स पीरियड में थोपा हुआ गेम खेलकर अपनी दिनचर्या पूरी करता है। क्या यह स्थितियां बच्चों के लिए लाभदायक हैं। इस पर गंभीरता से चिंतन करने की आवश्‍यकता है?

पिछले दौर में गली मोहल्ले में खेलकर बच्चा सामाजिकता सीखता था, आपस में मिलकर रहना, पड़ोसी से प्रेम, भाईचारा और समाज में रहने का तरीका सीखता था। वह खेल-खेल में अपने पूरे मोहल्ले और पड़ोसी को जान जाता और वह बच्चा पूरे मोहल्ले का बच्चा माना जाता था। आज जो सामाजिक स्तर गिरा है और नैतिकता में जो कमी आई है और व्यक्ति ने स्व की कोटर में रहना सीखा है, इसका मूल कारण एक यह भी है कि हमने बच्चों को उनके स्वाभाविक खेलों से दूर कर लिया। हमने उसको एकाकीपन से भरे खेल दिए, जिन्हें खेलकर वह स्वयं एकाकी होता जा जाता है।

उसे पता नहीं कि पड़ोस में कौन सा उसकी हम उम्र का बच्चा रहता है और उसको उससे दोस्ती करनी है। उसे यह तो पता है कि आज किस कार्टून चैनल पर कौन सा सीरियल आएगा और आईपीएल खेलों का कलेण्डर क्या है, लेकिन वह यह नहीं जानता कि उसका मोहल्ला कितना बड़ा है और उसमें कौन-कौन रहते हैं। कम्प्यूटर पर बैठकर दुनिया भर की खबर रखने के चक्कर में वह अपने पड़ोस से अनजान रह जाता है। जिन खेलों के माध्यम से पूरे समाज में उसका प्रवेश होना था, वह द्वार अब उसके पास नहीं रहा है और यही कारण है कि मोहल्ले का होने वाला यह बच्चा अब शर्मा जी, वर्माजी, सक्सेनाजी का बच्चा होकर रह गया है।

खेल जीवन में अनुशासन तो सीखाते ही हैं, साथ ही साथ खेलों के माध्यम से बच्चे के व्यक्तित्व का भी विकास होता है। लेकिन बंद कमरे में वीडियोगेम पर खेले जाने वाले खेलों के माध्यम से आजकल के बच्चों ने अपना बचपन को खो दिया है और वह बच्चा बड़ा होकर अपने ही समाज में अकेला महसूस करता है। आप ईमानदारी से अपने आस-पास के घर परिवार के माहौल पर नजर डाले और अपने आप के बचपन से अपने आज के बच्चे के बचपन की तुलना करें तो शायद जो बात में कहना चाह रहा हूं, वह अपने आप आपके समझ में आ जाएगी।

जरूरत है आज के बच्चे को स्व की कोटर से निकाल कर सामाज के उस पटल पर रखने की, जहॉं समग्र समाज उसे अपना परिवार लगे और वह अपने बचपन से ही वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के साथ बड़ा हो और एक जिम्मेदार नागरिक बने। किसी शायर की कही इन पंक्तियों के साथ मैं अपनी बात को विराम देना चाहूंगा: –

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज की कश्‍ती, वो बारिस का पानी।

लेखक श्‍याम नारायण रंगा लेखन से जुड़े हुए हैं. वे प्रत्‍येक विषय पर अपनी प्रतिक्रिया लिखते रहते हैं.

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