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भ्रष्‍टाचार बनाम सूचना का अधिकार : संर्घष जारी है

शशिजीभ्रष्टाचार का संबंध गरीबी या अमीरी से न होकर हमारी अंतहीन इच्छा, कामना, हवस फिर चाहे वह मान हो धन हो, पद हो, प्रतिष्ठा, नाम हो, के इर्द-गिर्द ही पूरा भ्रष्टाचार घूमता नजर आता है। शालीनता के लहजे में आज यह शिष्टाचार का दर्जा प्राप्त कर चुका है। कुछ इसे सुविधा शुल्क भी कहते हैं। हम इच्छा पहले करते हैं, कर्म बाद में करते है और सारी की सारी ऊर्जा फल प्राप्ति पर लगाते हैं और इच्छा की रणभूमि पर अंतहीन दौड़ में जाने-अनजाने में सम्मिलित हो जाते हैं। सोचते हैं आज धन कमायेंगे कल आराम से जीवन व्यतीत होगा, जो कभी आता नहीं और अंत में केवल निराशा ही हाथ लगती है।

शशिजी

शशिजीभ्रष्टाचार का संबंध गरीबी या अमीरी से न होकर हमारी अंतहीन इच्छा, कामना, हवस फिर चाहे वह मान हो धन हो, पद हो, प्रतिष्ठा, नाम हो, के इर्द-गिर्द ही पूरा भ्रष्टाचार घूमता नजर आता है। शालीनता के लहजे में आज यह शिष्टाचार का दर्जा प्राप्त कर चुका है। कुछ इसे सुविधा शुल्क भी कहते हैं। हम इच्छा पहले करते हैं, कर्म बाद में करते है और सारी की सारी ऊर्जा फल प्राप्ति पर लगाते हैं और इच्छा की रणभूमि पर अंतहीन दौड़ में जाने-अनजाने में सम्मिलित हो जाते हैं। सोचते हैं आज धन कमायेंगे कल आराम से जीवन व्यतीत होगा, जो कभी आता नहीं और अंत में केवल निराशा ही हाथ लगती है।

भ्रष्टाचार में एक अजीब सी कशिश है। यह भी माया भ्रम जाल का ही दूसरा ही रूप है, जिसमें आदमी बिना बंधे रह नहीं सकता, जी नहीं सकता, बिरले ही होंगे जो इस जाल को पहचान पाते हों, काट पाते हों। भ्रष्टाचार की विशेषता तो देखिये इसके बाबत हम लाख तर्क भी जुटा लेते हैं और इस प्रकार किये गये कृत को हम अपने मन में अनुकूल तर्क संगत एवं न्याय संगत बना लेते हैं। और फिर इस भ्रष्टाचार के सघन कार्य में संलग्न हो जाते हैं। कुछ तो नकारात्मक सोच वाले तो छापे पड़ने में भी अपने अहम भाव को ढूंढ लेते हैं। फ्री में जो उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैलती है। बदनामी में भी तो नाम है, छापे डालने वाले एवं पड़ने वाले दोनों ही जानते हैं कि भारतीयों की याददाश्त काफी कमजोर रहती है। कुछ ही समय में सब कुछ शांत जो हो जाता है।

इस संबंध में शासन, नियम, प्रशासन एवं राजनैतिक हल्कों में उनकी अपनी प्रतिबद्धताएं हैं। सबसे बड़ा समाजवाद का दर्शन भ्रष्टाचार में ही होता है। इसमें धर्म, भाषा, जाति व लिंग के आधार पर कोई एवं किसी भी प्रकार का भेद नहीं होता है। मध्‍य प्रदेश के लोकायुक्त जस्टिस पीपी नावलेकर के अनुसार, ‘‘सरकार को भ्रष्ट अफसरों के मामले में अभियोजन की अनुमति शीघ्र देना चाहिये, साथ ही यह व्यवस्था भी होनी चाहिये कि तय समय सीमा में अनुमति नहीं दी जाती है तो स्वतः अनुमति मान ली जाये’’। पूर्व लोकायुक्त रिपु दयाल के अनुसार ‘‘लोकायुक्त संगठन को प्रभावी बनाना है तो इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इसमें शासन का सहयोग आवश्यक है’’।

प्रमुख सचिव अवनि वैश्य भ्रष्टाचार के खिलाफ अभी तो काफी सख्त रूख अख्तयार किये हुये हैं। भ्रष्टाचार के मामले में मंत्रियों, नेताओं को अभी सांप सूंघा है, क्योंकि कुछ मंत्री इस पीड़ा को भोग चुके हैं। छापे के डर ने रातों की नींद उड़ा दी है। प्रदेश मुख्यमंत्री, आईएसएस अफसरों के यहां से बरामद अकूत संपत्ति से स्तब्ध हैं, वहीं अपने मंत्रिमंडल के कुनबे पर कहीं फिर से इसकी आंच न आये इसे लेकर बेहद संजिदा हैं। ‘‘भारतीय प्रशासनिक सेवा के सभी अधिकारियों को अखिल भारतीय सेवा आचरण नियम 1968 के अंतर्गत प्रत्येक वर्ष के अंत में चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा शासन को प्रस्तुत करना चाहिये, फिर भी कई नहीं करते। इसमें कहीं न कहीं कमी एवं जवाबदेही मुख्य सचिव की ही बनती है वे इससे मुक्त नहीं हो सकते’’। नेता, अफसर, ठेकेदार के सख्त गठजोड़ का ही नतीजा भ्रष्टाचार है। जब-जब यह तीनों अपने दायित्वों के प्रति लापरवाह होंगे तब-तब भ्रष्टाचार फलेगा फूलेगा।

आज नेता वह नहीं रहे जो समाज सेवा भाव से पहले आते थे, अब तो कम समय में अधिकाधिक पैसा बनाने, अपने उद्योगों एवं व्यवसायों को बढ़ाने के लिये राजनीति में आते हैं। ऐसा नहीं कि भ्रष्ट अधिकारियों, नेताओं, मंत्रियों की जानकारी नहीं है, बाकायदा लोकायुक्त के पास इन सभी लोगों की सूची हैं, आखिर क्या बात है जब मध्यप्रदेश शासन के मुखिया अवनि वैश्य भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। प्रदेश सरकार के मुखिया शिवराज सिंह भी तैयार हैं। लोकायुक्त भी ऐसे भ्रष्टों के खिलाफ कमर कंसे हुये हैं, इसके बावजूद ये भ्रष्ट जन खुलेआम निर्लज भाव से घूम रहे हैं बल्कि समय-समय पर अपने आपको महिमा मंडित भी करवाते रहते हैं।

अब जब मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा जागरूक जन प्रतिनिधि राकेश चौधरी द्वारा उठाये गये मूल प्रश्नों पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुना कर मध्यप्रदेश के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से दर्ज करा दिया गया है। यह फैसला ऐसे वक्त आया है जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश बनाओ अभियान में जुटे हैं। इस फैसले से नेता, मंत्री, अफसर भ्रष्टाचार को ले जोरदार अंडर करेंट का प्रभाव भी देखा जा रहा है। पहले अधिकारी एवं कर्मचारियों को वर्ष में अर्जित संपत्ति की जानकारी केवल विभाग को ही देना पड़ती थी, अब तो यह जानकारी आमजनों के लिये सभी को वेबसाइट पर डालना अनिवार्य हो गया है। कहीं यह भी रस्म अदायगी बनकर न रह जाये कड़ी सजा़ का प्रावधान भी अब शासन को करना होगा, क्योंकि ‘‘भय बिन होय न प्रीत’’। अब वक्त आ गया है कि प्रमुख सचिव, मुख्यमंत्री, लोकायुक्त एवं ईओडब्लू प्रदेश हित में सख्त कदम उठायें ताकि जनता का इनके प्रति विश्वास कायम रहे एवं अपने आप को सुरक्षित महसूस कर सकें।

लेखिका डा. शशि तिवारी सूचना मंत्र पत्रिका की संपादक हैं.

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