मऊ हो या बनारस, गाजीपुर हो या हाजीपुर, दिल्ली हो या कोलकाता, बिना मुख्तार के एक पत्ता भी हिल नहीं सकता,
क्योंकि समय मुख्तार होता है। लोकसभा का बिगुल बज चुका है। उत्तर प्रदेश के मऊ जिले की एकमात्र लोकसभा सीट घोसी के सभी महारथी अपने-अपने पहचान पत्र के साथ मैदान में उतर चुके हैं। कांग्रेस से सुधा राय को टिकट मिला है। डा. सुधा राय एक पढ़ी लिखी विदुषी महिला हैं। वह स्वर्गीय कल्पनाथ राय की पत्नी हैं।
कल्पनाथ राय ने मऊ के लिए जितना कार्य किया, वह एक मील का पत्थर समझा जाता है। इसीलिए उन्हें विकासदूत की श्रेणी में भी रखा गया है। सपा ने अपनी ओर से जनाब अरशद जमाल को मैदान में उतारा है। अरशद जमाल जी एक पढ़े लिखे योग्य प्रत्याशी हैं। वे गोरखपुर यूनिवर्सिटी से एम.ए. गोल्ड मेडलिस्ट भी हैं। बुनकरों के साथ उनका चोली-दामन का साथ है। वे उनके संग काफी लम्बे अर्से से जुड़े हैं। उनके बीच उनकी पकड़ काफी अच्छी है। मऊ नगर पालिका अध्यक्ष की कुर्सी भी वे सम्भाल चुके हैं। अपने कार्य के दौरान इन्होंने काफी कुछ कार्य मऊ की जनता के बीच किया। इसी तरह से घोसी सीट से ही बसपा के दारा सिंह चौहान हैं जो पूर्व में सपा में रह चुके हैं। वे पढ़े लिखे अच्छे इन्सान हैं, और दलितों के बीच उनकी अच्छी छवि है। दो-दो बार वे एमपी भी रह चुके हैं। जनता के साथ इनका कितना लगाव था और है, मुख्तार सब जानता है।
मुख्तार के सामने किसी की भी नहीं चलती, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो। इसी प्रकार से अतुल कुमार अन्जान जो कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी हैं, वे भी एक जमीनी नेता हैं। लोगों के बीच उनकी अच्छी पैठ है। किसी के साथ भी दो कदम चलना उनकी आदत है। वे सभी की मदद करते हैं। यथा सम्भव उनकी समस्या का समाधान भी करवाने की चेष्टा करते हैं। इसी प्रकार से भाजपा प्रत्याशी राम इकबाल सिंह एक अच्छे नेता के रूप में जाने पहचाने जाते हैं। उनकी लोकप्रियता का अन्दाजा मात्र इसी बात से लगाया जा सकता है कि चुनाव आचार संहिता को धता बताते हुए उनके समर्थकों ने लगभग 100 से भी अधिक गाड़ियों के काफिलों के साथ उनकी उपस्थिति दर्ज करायी। इसके चलते उन पर मुकदमा भी दर्ज हो गया है। मुख्तार से कुछ भी छुपा नही है वह सबको देख रहा है। किसने किस-किस क्षेत्र में कितना कार्य किया है, मऊ के लिए कितनी कुर्बानियां दी हैं, किसके साथ कितना कदम से कदम मिला कर चला है, समय सब जानता है। वह सब देख रहा है कि कौन भाजपा से है, कौन सपा से है, कौन कांग्रेस से है, कौन बसपा से है। सबकी अलग-अलग, अपनी-अपनी पहचान है। सभी योग्य प्रत्याशी हैं। अयोग्य तो कोई भी नहीं है। सभी अपने प्रशंसकों के साथ पूरे क्षेत्र में अपने स्वभाव का डंका पीट रहे हैं। कोई अपनी योग्यता का लोहा मनवा रहा है, तो कोई अपने मुखिया के काफी करीब होने की बात करता है, कोई अपने को जमीनी नेता बताता है, तो कोई अपने को फायर ब्रांड नेता बताता है। कुल मिलाकर एक बात स्पष्ट है कि सारे गुण कभी भी किसी एक मनुष्य में नहीं आ सकते, कभी कोई भी सम्पूर्ण नहीं हो सकता, सम्पूर्णानन्द तो सिर्फ समय के पास ही है, वही सब कुछ देखते हुए बार-बार आनिन्दत होता है, और सबकी दशा पर कहकहे लगा कर हंसता और मुंह चिढ़ाता है। हमारे नेता यह भांप नहीं पाते और पूरे तन-मन से जी जान लगाकर सबको लुभाने का नया -नया स्वांग रचाते हैं।
आश्चर्य तो यह होता है कि मतदाता बेचारा सब-कुछ होते हुए भी कुछ भी नहीं जानता। यहां तक कि उसका 100 प्रतिशत वोट भी नहीं पड़ पाता, वह तो मात्र बस इतना ही जानता है कि मुझे केवल एक वोट देना है। वोट की अहमियत के बारे में अधिकांश को खबर नहीं। खैर ! अगर मतदाता मात्र इतनी सी बात ही जान जाये कि हमारा काम बस वोट देना है, और चाहे कोई भी परिस्थिति हो हम वोट देंगे, तो समझिये मुख्तार का काम पूरा हो गया, बाकी सब वह अपने आप ठीक कर लेगा। वह सबका मालिक है। उसने ना ही भगवान को छोड़ा और ना ही इंसान को।
उसने भारत की राजधानी कभी दिल्ली बनायी तो कभी दौलताबाद। भारत को उसी ने गुलाम बनाया, उसी ने आजादी दिलायी। उसने कभी राम रावण युद्ध कराया तो कभी महाभारत करायी। कभी रावण को मारा तो कभी कंस को। वक्त गवाह है, हर एक पल का हर एक सांस का, सबका हिसाब वह लेता है, परन्तु उसकी उपस्थिति से सभी इंकार करते हैं। उसी के सामने न्याय होता है, तो उसी के सामने अन्याय, वह चुपचाप सब देख्ता है, परन्तु कुछ नहीं बोलता, और समय का पहिया अनवरत चलता रहता है। और आगे भी चलता रहेगा। कॉंग्रेस के अलगू राय शास्त्री जिन्होंने मऊ ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी लालबहादुर शास्त्री जी के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर पूरे देश को स्वतंत्र कराने में एक अनमोल भूमिका निभाई, और घोसी सीट से जीतकर एमपी भी हुए परन्तु वाह रे समय की मुख्तार नबीसी उन महानुभाव को भी साढ़े तीन फिट की मूर्ति में ढाल कर बस स्टैंण्ड पर खड़ा कर दिया ताकि हर आने जाने वाले नागरिकों की नजर पड़े और वह यह सोचने को मजबूर हो जॉंय कि जब वैसे देशभक्त को भुलाया जा सकता है, तो भला किसकी औकात। उस पत्थर के पुतले की हालत खराब है। अपने पूर्वजों की मूर्तियों की भी हिफाजत करने में हम सक्षम नहीं हैं। मुख्तार गवाह है, कि हमारी इन मूर्तियों के शरीरों पर जो धूल गर्दे हैं, वे समय की देन हैं।
आज मुख्तार मऊ में नहीं है, बनारस में भी नहीं है, गाजीपुर में भी नहीं है, हाजीपुर में भी नहीं है, दिल्ली में भी नहीं है, कलकत्ता में भी नहीं है, कोई भी कहीं भी उसे सजीव नहीं दिखा सकता परन्तु, समय साक्षी है कि वह हर जगह अपनी सूक्ष्म उपस्थिति दर्ज कराता रहता है। सृष्टि की शुरुआत में वह था और अन्त में भी रहेगा। पत्ता-पत्ता उसका गवाह है, और जर्रा-जर्रा उसका पता है। वह किसी से भी नहीं डरता। वह सबके मुंह पर कालिख पोतता है, और उसके मुंह पर कोई एक तिल भी नहीं लगा सकता। इसलिए हमारे नेताओं, हमारे बुजुर्गों, तथा नौजवान भाइयों-बहनों एवं माताओं, खबरदार होशियार क्योंकि मुख्तार चुपचाप सब कुछ देख सुन रहा है। उसे कोई नहीं देख सकता। इतना ही नहीं, समय यह भी जानता है कि किसे जीतना है और किसे हारना है क्योंकि सदियों से वह सभी को देखता आया है, उसे किसी ने भी नहीं देखा, वह कल भी था, आज भी है, और कल भी रहेगा।
धन्यवाद समय! शुक्रिया मुख्तार!!
लेखक संपूर्णानंद दुबे यूपी के मऊ जिले के निवासी हैं। उनसे [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है

