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मीडिया मंथन

अखबार और कलम कल संघर्ष था आज पेशा है!

सच है मीडिया जगत मल्टीनेशनल कम्पनियों की तरह अकूत कमाई का जरिया तो नहीं जहां साधारण व्यक्ति मालदार बनकर समाज में ख्याति पा सके, लेकिन इस जगत से जुड़े हर व्यक्ति को नौकरशाह हो या नेता, अमीर हो या गरीब हर कोई मान-सम्मान अवश्य देता है। वजह कमलकार बनकर सच्चाई उजागर करने का बेड़ा जो उठाया है। पर यह गुजरे कल की बात ठहरी। अब तो आलम यह है कि जिस सच्चाई को उजागर करने का संकल्प लिया गया था, उसे पत्रकारिता का चोला ओढ़कर शामिल हुए पेशेवर दलालों ने ‘‘मैनेज’’ शब्द से कुचल कर रख दिया है। नतीजतन आज सरकारी महकमों से लेकर सड़कों तक मीडिया बन्धुओं पर जिस तरह रिश्वत के जहर में सने तीरों से हमले हो रहे हैं ऐसे में खुद को पत्रकार बताना ओखली में सर देने के बराबर है।

सच है मीडिया जगत मल्टीनेशनल कम्पनियों की तरह अकूत कमाई का जरिया तो नहीं जहां साधारण व्यक्ति मालदार बनकर समाज में ख्याति पा सके, लेकिन इस जगत से जुड़े हर व्यक्ति को नौकरशाह हो या नेता, अमीर हो या गरीब हर कोई मान-सम्मान अवश्य देता है। वजह कमलकार बनकर सच्चाई उजागर करने का बेड़ा जो उठाया है। पर यह गुजरे कल की बात ठहरी। अब तो आलम यह है कि जिस सच्चाई को उजागर करने का संकल्प लिया गया था, उसे पत्रकारिता का चोला ओढ़कर शामिल हुए पेशेवर दलालों ने ‘‘मैनेज’’ शब्द से कुचल कर रख दिया है। नतीजतन आज सरकारी महकमों से लेकर सड़कों तक मीडिया बन्धुओं पर जिस तरह रिश्वत के जहर में सने तीरों से हमले हो रहे हैं ऐसे में खुद को पत्रकार बताना ओखली में सर देने के बराबर है।

मीडिया बन्धुओं पर चलने वाले वह तीर कुछ यूं होते हैं कि ‘सौ-दो सौ’ दो और मनमाफिक खबरें छपवाओ। इसका सबब यह है कि कल तक मीडिया तन्त्र ‘‘संघर्ष’’ के नाम से जाना जाता था पर आज बहुतेरे चैनलों व अखबारों के अवसरवादी सौदागरों ने ‘कलम व अखबार’ का सौदा अशिक्षित हाथों में करके इसे ‘‘पेशे’’ का नाम दे दिया है। मीडिया का आलम आज यह हो गया है कि क्या प्रेस परिषद और क्या सूचना मंत्रालय इनके पास भी कुकुरमुत्तों की तरह पनपे पत्रकारों की सूची मुहैया करा पाना मुमकिन नहीं। हालत यह बन चुकी है कि प्रदेश के हर जनपद में स्थापित बस स्टेशनों, रेलवे स्टेशनों पर आने-जाने वाले मुसाफिरों के अलावा इन स्थानों पर यदि किसी का ज्यादा आमदो-रत (आना-जाना) बना होता है तो वह समाचार संकलन करने वाले पत्रकारों का।

बतौर बानगी 24 घंटे में इन पत्रकारों की तादाद जानने के लिए यदि इन दोनों ठिकानों पर 8-8 घंटे का वक्त चाय की चुस्कियां लेकर इस नियत से गुजारा जाए कि यह अनुमानतः यह पता चल सके कि जिले में पत्रकारों की तादाद कितनी है तो इन सड़कों पर फर्राटा भर कर गुजरने वाले दो पहिया व चार पहिया वाहनों की कतारों पर यदि निगाह डाले तो हर दो वाहन के बाद तीसरा वाहन ‘प्रेस का लेबल’ लगा नजर आएगा। इस हिसाब से चार-पांच सौ वाहन सिर्फ पत्रकारों के ही सड़कों पर मिलेंगे जो बेमकसद फर्राटे भरते रहते हैं। इनमें से शायद ही 30-40 ऐसे चेहरे होंगे जो वास्तव में पत्रकारिता के ‘पांच डब्ल्‍यू’ और हिन्दी के ‘वर्णमाला’ का भी बोध रखते होंगे। सिर्फ यही नही आमतौर से देखने को मिल रहा है कि कभी कालेज का मुंह तक न देखने वालों को भी मीडिया जगत रास आने लगा है।

प्रदेश के तकरीबन हर जिलों में सैकड़ों की तादाद में आज ऐसे लोग दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक समाचार पत्रों एवं चैनलों से जुड़कर पत्रकारिता जगत को शर्मसार कर रहें हैं, जिनके पास मैट्रिक का सर्टिफिकेट भी नहीं है। पत्रकार की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि उसे शब्दों का ज्ञान होना लाजमी है। लेकिन फिलवक्त गलियों-कूचों में पाए जाने वाले पत्रकारों की शिक्षा-दीक्षा की हालत यह है कि खबर तो कलम पकड़कर सही ढ़ग से वह अपने नामों को कागजों पर लिख दे इसका भी उन्हें ज्ञान नहीं है। इतना ही नही पत्रकारिता जगत में कुछेक तो ऐसे चेहरे पेश-पेश नजर आ रहे हैं जो बीते कल में या तो मुंशीगीरी किया करते थे या फिर सड़क किनारे औजार लेकर गाड़ी की मरम्मत करते देखे जाते थे। पर आज उनका कद बड़ा हो गया है। इसका मूल कारण उन्होंने औजार को किनारे रख कलम को बतौर पेशा थाम लिया।

नतीजा यह निकला कि शिक्षा की कमी के चलते वह अधिकारियों व पढ़े लिखों में बैठकर बात करने के लायक तो नहीं थे लिहाजा उन्होंने ढर्रा दूसरा अपनाया। सुबह होते ही अधिकारियों के दफ्तर में चाटुकारिता करने पहुंच गये। कभी इस पत्रकार तो कभी उस पत्रकार को निशाने पर लेते हुए उसके ऐब उछालने शुरू कर दिये। घंटों अधिकारियों के दरमियान बैठने का भी उन्हें दो फायदा मिला, पहले तो यह कि जानवरों की तरह अधिकारी उनके आगे भी कुछ टुकड़े खाने-पीने के लिए फेंक देते हैं, दूसरे यह कि इस चाटुकारिता के बलबूते कुछ विज्ञापन और सब्जी वगैरह के खर्च के लिए कुछ रुपए मिल जाते हैं। लेकिन इन पत्रकारों की कार्यशैली की जिम्मेदारी हम केवल उन्हें ही तसलीम नहीं करते बल्कि समाचार पत्रों व चैनलों के मालिकों ने अपने बिजनेस चमकाने के लिए हजारों रुपये सिक्योरिटी मनी और फिर ज्यादा से ज्यादा संस्थान को विज्ञापन मुहैया कराने की शर्त है। दरअसल ऐसे पत्रकारों की छवि से समाज का चौथा स्तम्भ माना जाने वाला मीडिया तंत्र कलंकित हो रहा है, जिस पर पहल करते हुए हम सभी को इस सिलसिले पर विराम लगाना होगा।

लेखक असगर नकवी सुल्‍तानपुर में पत्रकार हैं.

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