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अन्ना की आवाज : खड़े हो गए करोड़ों हाथ

अनीति के नाभिकेंद्र पर जिस बुजुर्ग गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने निशाना लगाया है, उसे यह चुनौती नहीं दी जा सकती कि पहला पत्थर वह मारे जिसने पाप न किया हो- क्योंकि 72 बरस की जिंदगी की चादर अन्ना ने कबीर की तरह इतने जतन से ओढ़ी-बिछाई है कि उसमें कहीं कोई दाग नहीं है। इसीलिए भले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अनसुनी की हो मगर दिल्ली के जंतरमंतर पर आमरण अनशन पर बैठते ही देशभर में हजारे के साथ करोड़ों हाथ उठ खड़े हुए हैं। राष्ट्रपिता गांधी ने ही सिखाया है कि आचरण ही सबसे बड़ी चीज होती है, सो हजारे ने सुबह राजघाट पहुंचकर गांधी समाधि पर फूल चढ़ाए और वहां से संकल्प के साथ जंतरमंतर पहुंचकर जनलोकपाल बिल संसद में लाए जाने और उसे लागू किए जाने की मांग पर आमरण अनशन पर बैठ गए।

अनीति के नाभिकेंद्र पर जिस बुजुर्ग गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने निशाना लगाया है, उसे यह चुनौती नहीं दी जा सकती कि पहला पत्थर वह मारे जिसने पाप न किया हो- क्योंकि 72 बरस की जिंदगी की चादर अन्ना ने कबीर की तरह इतने जतन से ओढ़ी-बिछाई है कि उसमें कहीं कोई दाग नहीं है। इसीलिए भले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अनसुनी की हो मगर दिल्ली के जंतरमंतर पर आमरण अनशन पर बैठते ही देशभर में हजारे के साथ करोड़ों हाथ उठ खड़े हुए हैं। राष्ट्रपिता गांधी ने ही सिखाया है कि आचरण ही सबसे बड़ी चीज होती है, सो हजारे ने सुबह राजघाट पहुंचकर गांधी समाधि पर फूल चढ़ाए और वहां से संकल्प के साथ जंतरमंतर पहुंचकर जनलोकपाल बिल संसद में लाए जाने और उसे लागू किए जाने की मांग पर आमरण अनशन पर बैठ गए।

अपने आचरण के चलते अन्ना के गांधी समाधि पर फूल चढ़ाने का जादू अलग है, जिसने देशवासियों पर अपनी तरह का असर डाला है। वरना सबको पता है कि लोग क्या-क्या करते रहते हैं और साल में दो बार हाथ जोड़कर गांधी समाधि की परिक्रमा कर आते हैं। गांधी के नाम पर ही राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना है, जिसे भ्रष्टाचार की वैतरणी बनाकर देशभर में राज्य सरकारों के कर्ताधर्ता मोक्ष प्राप्त करने में लगे हुए हैं। भ्रष्‍टाचार की धुंध राष्‍ट्रव्यापी है। अब ये खबरें आम हो चुकी है कि केंद्र से लेकर राज्यों तक सरकारी भ्रष्‍टाचार की श्रृंखलाएं आबाद हैं। इस बीच कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका, यहां तक कि चौथा स्तंभ कहे जानेवाले मीडिया में ऊंचे ओहदे पर बैठे लोगों पर उंगलियां उठी हैं और बहुतों के दामन दागदार हुए हैं।

अब तो यह रिवाज चल पड़ा है कि पक्ष-प्रतिपक्ष अपनी सफाई देने में एक-दूसरे से कहते हैं कि आपकी तुलना में हमारे वक्त में कम भ्रष्टाचार है। एक के भ्रष्टाचार का जिक्र होता है तो वह दूसरे के भ्रष्टाचार की याद दिलाने लगता है। चालीस साल से लोकपाल संसद का मोहताज है, मगर राजकाज की धुन में किसी को उसका ख्याल नहीं आया। नागरिक समाज की आवाज का सूत्रधार बनकर अन्ना हजारे ने बस इतनी ही मांग की है कि लोकपाल सरकार से एकदम स्वतंत्र हो। नौकरशाह, राजनेता और जजों पर इनका अधिकार क्षेत्र हो और बगैर किसी एजेंसी की अनुमति के ही कोई जांच शुरू करने का इसे अधिकार हो। सत्ता का निरंकुश इस्तेमाल करने वालों पर अंकुश लगाने और भ्रष्टाचार की नाभि पर प्रहार करने के लिए यह आवश्यक है। इसीलिए आज देश का हर जागरूक नागरिक अन्ना हजारे की आवाज के पीछे खड़ा हो गया है। सरकार को चाहिए कि अन्ना की मांग को स्वीकार कर वह लोकतांत्रिक मांग का सम्मान करे।

लेखक अरविंद चतुर्वेदी लखनऊ से प्रकाशित डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट के कार्यकारी संपादक हैं. यह लेख डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

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