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भ्रष्‍टाचारमुक्‍त भारत के लिए हम भी अन्‍ना के साथ

मिथिलेशलोकतंत्र – जिसमें लोगों की बात हो और सिस्टम के तहत उनको जीने की आजादी हो और इसकी मूलभूत अधिकारों का हनन न हो – इस परिकल्पना के तहत हमारे पास विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका है। इसके अलावा एक और स्तंभ माना जाता है मीडिया। जिसके लिए भारतीय संविधान में एक भी शब्द बयाँ नहीं किया गया या उल्लेखित नहीं किया गया, सिर्फ हम “फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेसन” के तहत आज मीडिया को चौथा स्तम्भ मानते हैं, लेकिन हम पूछना चाहते है कि क्या यह चारों संस्थाएं पारदर्शिता और जवाबदेही के मापदंडों का पालन करते हुए काम करती हैं?

मिथिलेश

मिथिलेशलोकतंत्र – जिसमें लोगों की बात हो और सिस्टम के तहत उनको जीने की आजादी हो और इसकी मूलभूत अधिकारों का हनन न हो – इस परिकल्पना के तहत हमारे पास विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका है। इसके अलावा एक और स्तंभ माना जाता है मीडिया। जिसके लिए भारतीय संविधान में एक भी शब्द बयाँ नहीं किया गया या उल्लेखित नहीं किया गया, सिर्फ हम “फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेसन” के तहत आज मीडिया को चौथा स्तम्भ मानते हैं, लेकिन हम पूछना चाहते है कि क्या यह चारों संस्थाएं पारदर्शिता और जवाबदेही के मापदंडों का पालन करते हुए काम करती हैं?

तो जवाब होगा- शायद नहीं। अगर ऐसा होता तो लोकतंत्र या डेमोक्रेसी सुचारू रूप से काम करती, लेकिन पिछले कुछ सालों में खासकर भ्रष्टाचार के खुलासों ने चारों संस्थाओं की गरिमा को गहरी चोट पहुंचाई है। नेताओं को भ्रष्ट मानकर तो इस देश की जनता बहुत पहले से उदासीन हो चुकी थी और अफसरशाही को हमेशा से राजनीतिज्ञों का बैकहैंड माना जाता था, पर ये उदासीन रवैया ही रहा कि भ्रष्टाचार लोकतंत्र के चारो स्तंभों में फैल गया और मीडिया भी कलंकित हो गयी। 21वीं सदी में 19वीं सदी के कानून चल रहे हैं, लुटेरों के चमड़ी का रंग बदल चुका है और अब लुटेरे पहले से ज्‍यादा खतरनाक हो चुके हैं। भ्रष्टाचार को रोकने के सख्त नियम तो बाद की बात है, भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध होने के बाद, उस भ्रष्टाचार से कमाए धन को वापस वसूल करने तक कोई प्रावधान नहीं है। अजीब सी बात है पर 2 लाख करोड़ की हेराफेरी करके अगर साल, छह महीने सरकारी मेहमान रहकर वापस आ जाएं तो क्या बुरा है?

मैं लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया में काम करता हूँ और यहां भी भ्रष्‍टाचार है। एक छोटे से चैनल और अखबार में काम करने वाले इंसान के पास करोड़ों रुपये, आलीशान बंगला, कीमती गाड़ी है, आखिर कहां से आता है बेशुमार धन? क्या मीडिया में काम करने वाले लोगों की संम्पति का घोषणा जायज नहीं? यहां हमाम में सभी नंगे हैं। यक्ष सवाल यह कि भ्रष्टाचार पर रोक के लिए क्या किया जाए? क्या इस पर रोक लग सकती है?  यक़ीनन.. यही सोचकर तो देश के कुछ बुद्धिजीवियों ने एक जन लोकपाल बिल बनाया है। यह विधेयक सरकार के उस लोकपाल विधेयक को काउंटर करने के लिए बना है जो भ्रष्टाचार से लड़ने की बजाय, भ्रष्टाचार को लीगलाइज कर देने के लिए तैयार किया गया था।

जन लोकपाल बिल एक ऐसे लोकपाल की संस्तुति करता है जो अधिकारों और जिम्मेदारियों से लैस हो। इसके अधिकार क्षेत्र में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों आते हैं। इसको सिर्फ सलाह देने की बजाय कुछ सजा सुनाने के भी अधिकार होंगे। व्हिसिल ब्लोअर्स जो भ्रष्टाचार के केस का खुलासा करते हैं, को सुरक्षा का कोई प्रावधान सरकारी लोकपाल विधेयक में नहीं है। जन लोकपाल बिल व्हिसिल ब्लोअर्स को सुरक्षा दिलाने का प्रावधान भी रखता है। सबसे बड़ा नियम, जो भ्रष्टाचार से लडऩे में सबसे कारगर सिद्ध होगा, वो है धन वापसी का नियम। जितने पैसे का घोटाला होगा उस घोटाले से जुड़े लोग वो पैसा तो वापस करेंगे ही बल्कि उस पर भारी जुर्माना भी थोपा जाएगा। अरविंद केजरीवाल, प्रशान्त भूषण, लिंगदोह, किरण बेदी और कई प्रख्यात समाजसेवियों ने इस बिल को तैयार किया है।

जन लोकपाल बिल को सरकार द्वारा पारित करवाने के लिए देश भर के नागरिकों का एक भ्रष्टाचार के खिलाफ जनयुद्ध का ऐलान करना होगा। इसकी शुरुआत सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट से लेकर दूसरे कई मंचों पर दिखने लगी है। दिलचस्प है कि फेसबुक पर बने पेज ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के जरिए 30 जनवरी 2011 को पहले सिर्फ दिल्ली में एक रैली की योजना बनी थी पर देश और विदेश के कुल 62 शहरों में रैली निकाली गई और ये एक मास मूवमेंट बन गया।अब 5 अप्रैल 2011 से प्रख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे जी ने सरकार को भ्रष्टाचार विरोधी अधिनियम लाने के लिए दबाव डालने हेतु आमरण अनशन पर है, साथ ही इंडिया अगेंस्ट करप्शन के स्वयंसेवी भी पूरे देश में अनशन पर हैं। देश के भविष्य लिए जरूरी है, भ्रष्‍टाचार को खत्म करना, देश के दामन को पाक-साफ रखना।

अन्ना हजारे जी 72 वर्ष के बुजुर्ग हैं और एक मंदिर में रहते हैं। उनके अथक संघर्ष के चलते अब तक महाराष्ट्र के 6 मंत्री और 400 से ज्यादा भ्रष्ट अफसर अपनी करनी का फल पा चुके हैं। अगर एक गांधीवादी हम सबके लिए अपनी जान को दांव पर लगा रहा है तो क्या हम सबका फर्ज नहीं बनता कि उनको अपना समर्थन दें? ये आंदोलन हमारे उस बेहतर भविष्य की गारंटी हैं, जहां वो हिंदुस्तान होगा जो भाई भतीजावाद, वोट बैंक, जाति धर्म, पैसा रिश्वत आदि से बिल्कुल दूर होगा। वे हमारे लिए भूखे प्यासे आमरण अनशन पर है और हम ऑफिस और अपने घर में अन्ना हजारे की मौत का इंतजार कर रहे हैं? इस यथास्थिति बनाने रखने की आदत से हमें निकलना होगा और अन्‍ना हजारे के साथ खड़ा होना होगा, क्‍यों अन्‍ना अपनी लड़ाई नहीं हम सबकी लड़ाई लड़ रहे हैं, हम सबकी।

लेखक मिथिलेश सिन्‍हा टीवी पत्रकार हैं तथा इंडिया न्‍यूज में प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं.

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