आपातकाल के समय बीस महीने जेल में रहे एक संपादक की टिप्पणी काबिलेगौर है. बहुत क्षुब्ध होकर वो कहते हैं ‘जेपी के सम्पूर्ण क्रान्ति के समय की तुलना में आज के हालात के हालात कहीं बुरे हैं, लेकिन जनता में किसी भी तरह का कोई सुगबुगाहट न होना देश के भविष्य प्रति गहरा नैराश्य भरता है.’ लेकिन श्मशानी सन्नाटे के इस ज़माने में अपने ही दीन-दुनिया और क्रिकेट में मस्त निस्तब्ध इस समय में अन्ना साहब के अनशन ने वास्तव में एक बिगुल बजाया है कुम्भ्करणों को जगाने के लिए. लेकिन यहां भी आशा के साथ आशंकायें भी कम नहीं है. एक विशुद्ध गैर-राजनीतिक आंदोलन से नेताओं को दूर रखने की बात तो समझ में आती है लेकिन क्या इससे समस्या का समाधान हो जाएगा?
स्वनामधन्य और निर्विवाद बेबाक अन्ना साहब का वर्तमान अनशन केवल और केवल एक जन लोकपाल बिल को क़ानून का रूप दिलाने को लेकर है. क्या सच में एक इस क़ानून के बनते ही लुटेरों पर लगाम लग जाना संभव होगा? अभी क्या देश में कानूनों का अभाव है या कड़े कानूनों के अभाव के कारण घोटेलाबाजों की पौ बारह है? बिलकुल ऐसा नहीं है. यहां तो केवल बिना लाइसेंस के वाहन चला भर लेने के लिए जितनी सज़ा का प्रावधान है उतनी भी सज़ा शायद ही अरबों का खज़ाना लूटने वालों को कभी मिला हो. तो समाधान केवल सैकड़ों कानूनों में एक और इजाफा भर कर देने से नहीं होने वाला. ज़रूरत है एक सशक्त जनमत के निर्माण की और निश्चित ही उसके राजनीतिक प्रकटीकरण की भी. राजनीति को अलग करके तो हम कहीं नहीं पहुंच सकते क्यूंकि अंततः संसद में 750 लोगों को बैठना ही होगा. उनका चुनाव, राजनीति एवं उसकी प्रणाली के द्वारा ही तो संभव होगा.
इस आंदोलन में राजनीति से किसी भी तरह जुड़े व्यक्ति को वहां पहुंचने पर भगाया एवं लांछित किया जा रहा है. (हालांकि एक-दो ऐसे घटना के बाद अन्ना साहब ने अफ़सोस भी ज़ाहिर किया है) लेकिन क्या कोई यह कहने की स्थिति में है कि केवल राजनीति ही भ्रष्टाचार की एकमात्र कारण है? समाज का कोई वर्ग ऐसा नहीं बचा है कोई भी तो पेशा ऐसा नहीं जिसपर कालिख की मोटी परत नहीं ज़मी हो. लेकिन अगर समाधान संभव है तो कहीं न कहीं वह अंततः वोटों के माध्यम से ही तो होगा.
इतिहास और पुराण इस बात की गवाही देते हैं कि हर तरह के दिशा देने देने वाले नायकों को अंततः राजनीति में स्थापित व्यक्तियों का ही तो सहारा लेना पड़ा है. कभी वनवासी राम ने एक पूरे ही राज्य को गोद लेकर बानरी सेना बनायी फ़िर लंका के राज्य का विकल्प भी पहले खोज कर ही तो युद्ध को प्रस्तुत हुए थे राम. चाणक्य को भी तो अंततः एक चंद्रगुप्त की ही ज़रूरत पड़ी नन्द वंश के सफाए के लिए. इसी तरह जब दक्षिण अफ्रीका के सफल आंदोलन के बाद वापस मोहनदास भारत आये तब भी काफी पहले से अस्तित्व में रही एक पार्टी को अपना बना कर ही तो उन्होंने महात्मा होने तक का सफर तय किया था. जेपी के सम्पूर्ण क्रान्ति में भी सभी गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों के सदस्यों की मदद से ही तो अंततः सत्ता की नाक में दम करने में सफलता प्राप्त हुई थी. तो इन सब सन्दर्भों के आलोक में यह ज़रूरी हो जाता है कि एक सशक्त विकल्प प्रस्तुत कर या वैसा विकल्प प्रस्तुत करने के लिए ही आंदोलन खड़े किये जाय. केवल तमाम राजनीतिक दलों को खदेड़ देने मात्र से काम नहीं चलेगा.
राजनीतिक विकल्पहीनता के अभाव में अच्छे और ईमानदार लक्ष्य को लेकर चला आंदोलन भी किस तरह भटकाव का शिकार हो अंततः खतरनाक हो जाता है इसका सबसे बड़ा उदाहरण माओवाद है. या उल्फा को याद कर लीजिए. मूलतः असम से बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर करने के लिए शुरू हुआ वह अभियान अंततः लोकतन्त्र के लिए ही तो चुनौती के रूप में सामने आया था. हालांकि कहीं से अन्ना साहब के सरोकार पर किसी भी तरह अंगुली नहीं उठाया जा सकता. निस्संदेह उनका समूचा जीवन भी अपने आप में गांधी की तरह सन्देश सरीखा है. लेकिन फ़िर भी यह देखना तो ज़रूरी है ही कि ‘संभावना’ देख कर अवसरवादी और लोकतंत्र विरोधी लोग इससे कोई फ़ायदा न उठा लें.
नेताओं को इस आंदोलन से बाहर रखने की घोषणा के बीच आपको मंच पर बार-बार अग्निवेश जैसे लोग दिख जायेंगे. आप नेट पर उनका प्रोफाइल तलाश लें. कई जगह उन्हें राजनेता के रूप में ही दिखाया गया है. वो हरियाणा से विधायक और वहां के शिक्षा मंत्री भी रह चुके हैं. कुछ साल साल पहले एक राजनीतिक पार्टी के गठन का असफल प्रयास भी कर चुके हैं. अभी-अभी माओवादियों के पक्ष में नारे लगा कर कुख्यात हुए अग्निवेश के बारे में आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उन्हें ‘गबन’ के आरोप में ही मूल आर्य समाज द्वारा निष्काषित किया गया है. तो ऐसे विवादास्पद व्यक्ति के रहते आप किसी आंदोलन के सफलता की कहां तक उम्मीद कर सकते हैं? अभी खबर आ रही है कि अन्ना साहब के समर्थन में बनारस में शुरू हुए आंदोलन का नेतृत्व वहां का एक माफिया कर रहा है. तो इस तरह के लोगों के घुसपैठ के बाद कहां इसके कुछ सकारात्मक परिणति की उम्मीद कर सकते हैं?
जहां तक केन्द्र सरकार का सवाल है तो उसके लिए इससे सुविधाजनक बात तो और कोई हो ही नहीं सकता कि वह जन लोकपाल विधेयक की मांग मान ले. निश्चित ही आंदोलन के परवान चढ़ने के बाद वह इस मांग को उसी तरह से मान लेगी जिस तरह संसद के सैकड़ों घंटे खराब करने के बाद अंततः जेपीसी की मांग मान ली थी. तो ये मांग भी देर सबेर मान ली जायेगी फ़िर चूंकि संसद सदस्यों या सरकार के अलावा और किसी के पास विधेयक पेश करने का अधिकार नहीं है तो इस बिल को संसद में रखने की नयी प्रक्रिया तय करते-करते आराम से भ्रष्टाचार करते हुए यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा कर ही लेगी.
तो ज़ाहिर है केवल एक इस मांग से ही बात नहीं बनाने वाली है. ज़रूरत क़ानून की नहीं बल्कि उसके अमलीकरण हेतु ईमानदार लोगों को चुनने की है. आज की दुनिया में ‘बैलेट’ के अलावा किसी भी अन्य माध्यम से राजनीतिक बदलाव लाने का प्रयास तो भ्रष्टाचार से भी खतरनाक हो सकता है. मौजूदा कानूनों में भी इतनी ताकत तो है ही कि अगर सरकारों में इच्छा शक्ति हो तो घोटालों पर नियंत्रण पाया जा सकता है. इस संबंध में छत्तीसगढ़ के पीडीएस सिस्टम को देखा जा सकता है. देश भर में भ्रष्टाचार के लिए सबसे बदनाम इस सिस्टम को दृढ इच्छा शक्ति और सद्भावना के कारण ही वहां एक आदर्श प्रणाली बना दिया गया है. तो ज्यादा ज़रूरत केवल ईमानदार लोगों को चुनने की है.
बेहतर तो यह होता कि चाहे अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव. ये सब मिलकर एक नए राजनीतिक विकल्प के बारे में विचार करते. केन्द्र सरकार के विरुद्ध एक ऐसे राजनीतिक मोर्चे का गठन करते जिसमें मौजूदा प्रणाली के अंतर्गत आने वाले नेताओं को साथ लेकर ही इस सरकार के विरुद्ध शंखनाद किया जाता. अगर कांग्रेस में भी ईमानदार बच गए किसी नेता में हिम्मत होती तो उसके लिए भी दरवाज़ा खुला रखा जाता. तब इस युग के महान क्रांतिकारी अन्ना हजारे जी का यह आंदोलन साफल्य को प्राप्त होता. अन्यथा विकल्पहीनता की स्थिति लोकतंत्र के लिए हमेशा ही खतरनाक साबित हुई है. निश्चित ही अन्ना जी का इस उम्र में अपने द्वारा निर्मित स्वर्ग सामान ‘रालेगन सिद्धि’ को छोड़कर अस्सी वर्षों की हड्डी में शत-शत यौवन जगा कर मैदान में कूद पढ़ना नमनीय है. लेकिन यह कारवाँ आगे तभी बढ़ सकता है जब भ्रष्टाचार के इस भांड को फोड़ने अकेले चना बन जाने के बदले इस लोकतान्त्रिक प्रणाली से ही उपजे कम बुरे लोगों और दलों को साथ लेकर, उन्हें परिमार्जित कर मां भारती को कलंक मुक्त करने का सफल प्रयास किया जाता. फिलहाल केवल इस सफलता के लिए तो अन्ना साहब को बार-बार नमन किया ही जा सकता है कि आज के खाए-अघाए ज़माने में भी वो लोगों को उद्वेलित करने में सफल रहे हैं. लेकिन बदलाव राजनीतिक तौर पर और स्थापित प्रक्रियाओं के द्वारा ही हो ये ज्यादा ज़रूरी है.
लेखक पंकज झा छत्तीसगढ़ बीजेपी के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.

