: शाहन के शाह : बात ईश्वर दर्शन, मोक्षमार्ग और विरक्ति की हो रही थी। भव्य राजसी बजड़ा कलकल बहती नदी पर धीमी गति से झूम रहा था। दो राजाओं के समान ही भव्य आसन पर बैठा साधु हर प्रश्न का अकाट्य जवाब दे रहा था। दोनों राजा उसके तर्कों के सामने नतमस्तक थे, कि अचानक उस नंगे साधु ने काशी नरेश की गोद में रखी तलवार उठायी और उलट-पुलट कर देखने के बाद उसे नदी की गहरी धारा में फेंक दिया। इतना होते ही भक्ति और वैराग्य पर चल रही चर्चा ने अचानक ही उग्र रूप धारण कर लिया। श्रद्धा से झुका काशी नरेश के सिर का पारा अब सातवें आसमान पर पहुंच गया। साथ बैठे उज्जैन नरेश भी क्रोधित हो उठे कि इस नंग-धडंग भिखारी की यह मजाल। गिरफ्तार करने का हुक्म बस होने ही वाला था कि साधु ने नदी में हाथ डाला और एक साथ दो तलवारें निकाल कर पूछा- तुम्हारी कौन सी है।
दोनों ही एक सी थीं। राजा स्तब्ध। अब साधु ने झिड़का- जो तुम्हारी है, उसे तो तुम पहचान नहीं पा रहे हो। तो जो वस्तु तुम्हारी नहीं है, उसके लिए इतना क्रोध। अभी तो तुम लोग जीवात्मा, परमात्मा और मुक्ति मोक्ष पर गहरी जिज्ञासा प्रकट कर रहे थे। और अब सारा वैराग्य खत्म हो गया। धिक्कार है ऐसे जीवन पर। ले पकड़ अपनी तलवार और सम्भाल अपना अहंकार।
इतना कहते ही नंगा अवधूत बजडे़ से कूद कर गंगा की धारा में गुम हो गया। यह दिगम्बर साधु थे तैलंग स्वामी। वही तैलंग स्वामी जिन्होंने रामकृष्ण परमहंस को देखते ही दोनों हाथ उठा कर उन्हें गले लगा लिया था और रामकृष्ण परमहंस को तैलंग स्वामी में ही साक्षात विश्वनाथ महादेव के दर्शन वहीं सड़क पर ही हो गये। हुआ यह कि रामकृष्ण परमहंस अपने शिष्यों के साथ काशी आये। मन था कि भोलेनाथ के दर्शन और उपासना करेंगे। स्नान करके शिष्यों के साथ विश्वनाथ गली में जैसे ही घुसे, एक महाकाय नंग-धडंक काला-कलूटा आदमी अचानक ही उनके सामने आ गया। कुछ क्षण एकदूसरे को निहारने के बाद दोनों ही एकदूसरे के गले लग गये। शिष्य हैरत में। कुछ देर दोनों ही बेसुध रोते हुए लिपटे रहे। फिर वहीं सड़क पर ही बातचीत हुई। बस वहीं से रामकृष्ण परमहंस वापस लौट लिये। शिष्यों ने पूछा- महाराज, विश्वनाथ जी के दर्शन नहीं करेंगे। परमहंस ने जवाब दिया- वो तो हो गया। खुद विश्वनाथ भगवान ही तो मेरे गले लिपटे थे।
दक्षिण में विशाखापट्टनम के पास एक जिला है विजना। यहीं के एक जमींदार नृसिंह धर के घर बड़ी पत्नी के काफी मनौतियों के बाद सन 1607 की पौष शुक्ल एकादशी को रोहिणी नक्षत्र में एक बेटा हुआ। नाम रखा गया तैलंगधर स्वामी। अंतर्मुखी तैलंगधर मंदिरों में एकांत में ही बैठा रहता था। शिवालयों में तो वह समाधिस्थ हो जाता था। जन्मकुण्डली का हाल तो मातापिता पहले ही जानते थे, लेकिन उसे साकार होते देख अब परेशान भी होने लगे कि यह बच्चा उनके पास टिकेगा नहीं। कुछ ही बरसों बाद माता-पिता की मौत हो गयी और तैलंगधर ने अपना सब कुछ अपनी दूसरी माता के पुत्र का सौंप दिया और खुद देशाटन को निकल गये।
बताते हैं कि पुष्कर में इन्हें दीक्षा मिली, और फिर यह हिमालय और नेपाल सहित पूरा भारत घूम आये। हालांकि इस दौरान किंवदंतियों के अनुसार उन्होंने कई मुर्दों को जिला दिया, हजारों को रोगमुक्त किया, लेकिन ज्यादा ख्याति तब हुई जब नेपाल नरेश के तीर से घायल एक बाघ को उन्होंने बचाया। इतना ही नहीं, नेपाल के राजा को उन्होंने भविष्य में कभी शिकार ना करने की कसम भी दिलायी। लेकिन इसके बाद से ही उन्होंने खुद को प्रयाग और काशी तक ही सीमित कर दिया और अपनी जीवनशैली में योग को सर्वोच्च बना लिया। उनका मानना था कि तन्मयता ऐसी होनी चाहिए जब उपासक और ईश्वर का भेद ही मिट जाए।
योगी यदि षडचक्रभेद क्रिया में पारंगत हो जाए तो निर्वाण-मुक्ति सहज है। लेकिन वाराणसी में तैलंगस्वामी ने कुछ दिन तक तो कौपीन पहनना शुरू कर दिया, मगर बाद में उसे भी उतार कर वे नंगे ही रहने लगे। एक दिन एक अंग्रेज जिलाधीश ने उन्हें नंगा घूमता देख गिरफ्तार करवा लिया। सुनवाई के समय तैलंगस्वामी कठघरे से ही लापता हो गये। लौटे तब जब उनके समर्थकों की भारी भीड़ अदालत के बाहर हंगामा करने पर उतारू थी। लोगों ने जिलाधीश को समझाया अवधूत अलौकिक ताकत के धनी हैं, उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए। जिलाधिकारी यह शर्त तो मान गया मगर एक मजाक कर बैठा। बोला- क्या यह अवधूत मेरा भोजन ग्रहण करेंगे।
फिर हंगामा खड़ा हो गया। अंग्रेज गोमांस खिलाना चाहता था, यह बात तैलंग स्वामी भी समझ गये। जवाब दिया कि मंजूर है, लेकिन पहले तुम्हें मेरा भोजन खाना होगा। अंग्रेज के राजी होते ही भरी अदालत में तैलंगस्वामी ने अपना हाथ पीछे लगाया और अपनी टट्टी हाथ में लेकर जिलाधीश के सामने कर दी। जिलाधीश उबकाई लेते हुए अदालत छोड़ भागा और तैलंगस्वामी वापस गंगातट पर आ गये।
तैलंगस्वामी ने ईश्वर के साकार या निराकार होने पर गजब का सरल उदाहरण दिया। बंगाल के एक संत अन्नदा ठाकुर के सवाल पर तैलंगस्वामी एक पुस्तक उठाकर बोले- इस छोटे से स्थान को घेरे हुए पुस्तक को हम देख पा रहे हैं, इसलिए यह साकार है। लेकिन ईश्वर तो ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, सो वह निराकार है। उसके लिए हमें चक्षुओं को खोलना होगा। वह ज्ञान से नहीं, अंतरबुद्धि से दिखेगा।
तैलंग स्वामी का मानना था कि ईश्वर को अपने भीतर ही तलाशना चाहिए। सारे तीर्थ इसी शरीर में है। गंगा नासापुट में, यमुना मुख में, वैकुण्ठ हृदय में, वाराणसी ललाट में तो हरिद्वार नाभि में है। फिर यहां-वहां क्यों भटका जाए। जिस पुरी में प्रवेश करने पर न संकोच हो और न कुण्ठा, वही तो है वैकुण्ठ। हालांकि प्राण त्यागने की तारीख उन्होंने एक महीना पहले ही तय कर ली थी। हर मनुष्य को पोथी मानने वाले इस मलंग अवधूत ने सन 1887 की पौष शुक्ल एकादशी को 280 साल की उम्र में ईश्वर से भेंट करने निकल पड़ा।
लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के जाने-माने पत्रकार हैं. इन दिनों महुआ न्यूज में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह लेख जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

