संविधान सभा का संकल्प- हम भारत के लोग भारत को समाजवादी गणतांत्रिक राज्य बनाने का संकल्प लेते हैं। मनमोहन सरकार का संकल्प- हम भारत की सरकार के लोग दुनिया के पूंजीवादी दबंग अमेरिका के निर्देश पर भारत को बाजारू गणतंत्र में तब्दील करने का संकल्प लेते हैं। यहां यह दो तथ्य हैं। पहले में तो देश के जन-गण-मन ने देश के नागरिकों को बराबरी के अधिकारों से लैस किया ताकि भारत का जन-गण-मन अपने भावी कर्णधारों के लिए एक बेहतर भारत का तोहफा तैयार कर सके, जहां मानवता अपने पूरे सौंदर्य और समग्रता में विकसित हो सके। जबकि दूसरे तथ्य में देश के आधुनिक कर्णधारों ने देश की आजादी के मायने ही बदल दिये। सारा कुछ मनमर्जी और पूरी बेशर्मी से हुआ।
मकसद यह था कि देश को पूरी तरह वैश्विक बाजार के हवाले करते हुए उस सपने को बुनने में एडी-चोटी का जोर लगा दिया जाए जो अमरीकी नीतियों के नक्शेकदम पर चलते हुए साम्राज्यवादी अमरीकियों के सपनों को भारत में पूरी तरह अमली जामा पहनाया जा सके। इस बात के सबूत तो स्पष्ट और खुले सुबूत तो मेरे पास नहीं हैं, लेकिन प्रथमदृष्टया साक्ष्य जरूर हैं कि भारत के संकल्प पत्र के साथ जितना भी दुराचार, अनाचार और चीरहरण किया जा सकता था, केंद्र पर काबिज सरकारों ने पिछले बीस सालों के दौरान कर दिया।
और अकेले सरकारों को ही क्यों जिम्मेदार ठहराया जाए। सरकार के इशारे पर उन लोगों ने भी बेशर्मी के सारे बांध और सीमाएं तोड़ दीं और उस महान संस्था के संकल्प पत्र को भी कलंकित करने की साजिशें की जिन्हें भारतीय संविधान बनाते समय भारत के लोगों यानी जन-गण-मन ने सर्वसम्मति से आस्था जतायी थी, अपने सपने पिरोये थे। हम यहां बात कर रहे हैं छोटे ही सही, लेकिन देश के महान और फीस वसूली में सर्वोच्च कहे जाने वाले विधिवेत्ताओं के समूह की। फाली एस नारीमन ऐसे ही इस छोटे से समूह के प्रतिनिधि हैं जिनकी फीस अदा कर पाना भारत के सामान्य जन-गण-मन के कडुए सपनों तक में सम्भव नहीं। तो जनाब, फाली एस नारीमन सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और अर्जी लगा दी कि भारत के संविधान में से समाजवाद शब्द हटा दिया जाए। उनका तर्क था कि देश के मौजूदा हालातों में समाजवाद शब्द फिट नहीं होता है।
सर्वोच्च न्यायालय भी तो मानवों का ही समूह है और फाली एस नारीमन एक महान वकील। हालांकि अर्जी खारिज हो गयी। खारिज करने के लिए न्यायाधीशों ने कई नियमों और अधिनियमों का सहारा भी लिया। लेकिन इस अर्जी और उसकी खारिजीकरण ने कई सवाल भी खडे़ कर दिये। यह सवाल संविधान की रक्षा का भार सम्भालने वाले सभी लोगों, संस्थाओं और समूहों पर लाजमी हो जाता है। लेकिन मीडिया ने इसका खुलासा करने की जहमत ही नहीं उठायी। रोजमर्रा की बिकाऊ और चटपटी मसालेदार खबरों को परोस कर अपने नवधनाढ्य बनियों-पूंजीपतियों की थैली भरने से ही उन्हें फुरसत नहीं मिली। मिलती भी कैसे, उसी रकम से ही तो उनकी न्यूसेंस वैल्यू है और घर की दाल-रोटी भी चलती है- ब्रेड और बटर के साथ। तो आइये, एक नजर डाल ली जाए, इस पूरे कर्मकाण्ड पर।
वजह। यह अर्जी महज जन-गण-मन के हित में एक समसामयिक सवाल या बदलाव की बात नहीं थी, बल्कि यह तो जन-गण-मन की मूल आत्मा और उसके असीमित अधिकारों में एक हत्यारा अतिक्रमण था। पूरे प्रकरण पर एक सामान्य सी निगाह से ही इसका नंगा-नाच आसानी से दिख सकता है। तथ्य इस बात का खुलासा करते हैं कि किस तरह एक महान वकील ने यह अर्जी क्यों लगायी। आखिर वे संविधान के संकल्प-पत्र से समाजवाद शब्द क्यों हटाना चाहते थे। संविधान के नाम पर शपथ लेकर वकालत नाम के पेशे में आने वाले फाली एस नारीमन को ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी कि वे संविधान के संकल्प-पत्र में संशोधन की ख्वाहिश पाल बैठे। यानी जिस थाली में वे खा रहे हैं, उसी में वे छेद कर रहे हैं। आखिर क्यों ऐसा किया फाली एस नारीमन ने। जाहिर है कि इसमें उनकी भूमिका केवल माध्यम की ही रही है। और इसका इशारा केवल और केवल सत्ता में काबिज और लगातार जन-गण-मन हितों पर कुठाराघात कर रहे लोगों की शह पर है जो केवल संविधान का माखौल ही उड़ा रहे हैं। किसके इशारे पर- जाहिर है सरकार के।
जी हां, यही सच्चाई है। क्या यह सच्चाई नहीं है कि टू जी एक्पेट्रम मामले में सरकार ने देश के सभी बडे़-महान वकीलों को पहले ही अपने पक्ष में भारी और मोटी रकम देकर खड़ा कर लिया था। यानी सरकार की ही मंशा थी कि और चाहे कुछ भी हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में उसकी भद्द न पिटे। भद्द पिटती तो सरकार को वह कांट्रैक्ट रद्द करना पड़ता जो पौने दो करोड़ लाख रूपयों का हो चुका था। वरना क्या वजह है कि एक ओर तो सरकार दबावों के चलते ए राजा पर कार्रवाई को मान गयी, लेकिन उस कांट्रैक्ट पर चुप्पी साधे रही जो मामले की असल जड़ है। सवाल है कि आखिर वह कांट्रैक्ट रद्द करने में सरकार को दिक्कत क्या है?
अब सरकार की पिछले दो दशक की करतूतों को ही देख लीजिए। वैश्विक अर्थव्यवस्था में देश को आगे ले जाने के लिए केंद्र सरकार ने हर उस सीमा का उल्लंघन किया जो भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों के साथ व्यभिचार की श्रेणी में आता है। शुरू में तो पूंजीपतियों और मीडिया ने भी इसको लेकर सरकार की खूब पीठ थपथपायी, और बाद में जब सरकारी फैसलों पर उंगलियां उठने लगीं तो उसी प्रधानमंत्री को ईमानदारी का तमगा देने का काम भी मीडिया ने सम्भाल लिया। यह काम उस मीडिया ने सम्भाला जो अब तक पेड-न्यूज तक की नंगई तक उतर चुकी थी। उस मीडिया ने यह मुनादी शुरू करायी जो केवल और केवल पैसे कमाने का एक नायाब मानवी-मशीनी तंत्र में तब्दील हो चुकी है। पिछले बीस सालों के दौरान इन सरकारों ने संविधान के संकल्प पत्र में समाजवादी गणतंत्र को बाजारू गणतंत्र में तब्दील कर दिया।
सवाल यह है कि आखिर इन्हें इसकी इजाजत किसने दी कि जन-गण-मन ने जिस संविधान की रचना की, उसमें जघन्य फेरबदल कर दिया जाए, ताकि अपने मंसूबों को अमली जामा पहनाया जा सके। संकल्प पत्र किसी व्यक्ति या किसी संस्था की बपौती नहीं है, बल्कि देश की कोई भी संस्था संविधान के इसी संकल्प पत्र से उत्पन्न और इस तरह उसी से आबद्ध है। ऐसी हालत में ऐसे संकल्प पत्र में फेरबदल का अधिकार केवल जन-गण-मन को ही है। लेकिन इस तथ्य और उसकी अपरिहार्य उपस्थिति को भी ना केवल सरकारों ने खारिज कर दिया, बल्कि उसमें संशोधन के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गये। शर्मनाक बात यह है कि यह सारा कुछ तब हुआ जब किसी भी संवैधानिक पद को सम्भालने के पहले किसी भी व्यक्ति को उसी संकल्प पत्र की शपथ लेनी पड़ती है जिसे जन-गण-मन ने तैयार किया था और जो भारतीय गणराज्य की मूल आत्मा है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। और इस तरह देश को धृतराष्ट्र की सभा में तब्दील कर वहां समाजवाद की मूल भावना का चीरहरण शुरू कर दिया गया।
लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के जाने-माने पत्रकार हैं. इन दिनों महुआ न्यूज में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं.

