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नेताओं की दगाबाजी से भ्रष्‍टाचार हैरान!

चैतन्‍य भट्टचलते-चलते अचानक ही भ्रष्टाचार से मुलाकात हो गई. मैंने देखा उसका गुलाब के फूल सा खिला चेहरा काला और मुरझा सा गया था,  चेहरे पर परेशान और हैरानी के भाव साफ दिखाई दे रहे थे. मुझे लगा कल तक जो भ्रष्टाचार हमेशा चहकता-दहकता छाती ठोंक कर चला करता था एकाएक ही कैसे इतना निरीह सा हो गया. मैने उससे पूछ ही लिया,  ”क्या बात है भाई भ्रष्टाचार तुम काफी परेशान और चिन्तित से लग रहे हो बात क्या है? मैंने तो तुम्हें हमेशा हंसता, मुस्कुराता, उत्साह से भरा हुआ देखा है पर आज.”

चैतन्‍य भट्टचलते-चलते अचानक ही भ्रष्टाचार से मुलाकात हो गई. मैंने देखा उसका गुलाब के फूल सा खिला चेहरा काला और मुरझा सा गया था,  चेहरे पर परेशान और हैरानी के भाव साफ दिखाई दे रहे थे. मुझे लगा कल तक जो भ्रष्टाचार हमेशा चहकता-दहकता छाती ठोंक कर चला करता था एकाएक ही कैसे इतना निरीह सा हो गया. मैने उससे पूछ ही लिया,  ”क्या बात है भाई भ्रष्टाचार तुम काफी परेशान और चिन्तित से लग रहे हो बात क्या है? मैंने तो तुम्हें हमेशा हंसता, मुस्कुराता, उत्साह से भरा हुआ देखा है पर आज.”

” इतने मासूम मत बनो आप, क्या आपको मालूम नहीं है कि एक बूढ़े सामाजिक कार्यकता के कहने पर सरकार मेरे खिलाफ एक जन लोकपाल विधेयक लाने वाली है,  यदि ये बिल पास हो गया तो मेरा तो बोरिया बिस्तर ही इस देश से बंध जायेगा. मुझे तो भरोसा ही नहीं होता कि ये नेता इतने बेवफा हो सकते हैं, जिनके राज में मैं बरसों से फल फूल रहा था. उसके सारे नेता, मंत्री, अफसर मुझे अपने गले से लगाने को बेताब रहा करते थे, आज वे ही मेरे खिलाफ बिल लाने की बात कर रहे हैं.  मैंने क्‍या नहीं दिया इन लोगों को? लखपति, करोड़पति तो छोड़ो अरबपति तक बना दिया इनको,  पर सारा अहसान भूल गये,  ऐसे धोखेबाज.  मैंने जो कुछ भी किया इनके लिये ही तो किया था. मुझे इसमें क्या मिलता था जो कुछ मिलता था इनकी ही जेब में जाता था,  पर आप ही देखो कैसे चार दिन के अनशन से घबरा कर इन लोगों ने मुझे जड़ से ही उखाड़ देने के लिये हामी भर दी.  मैंने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि कि ये लोग इतने अहसानफरामोश हो सकते हैं कि एक ही झटके में बरसों की दोस्ती को यूं ठोकर मार देंगे” भ्रष्‍टाचार ने अपना दुख सुना डाला.

” सच कहूं यार भ्रष्टाचार भाई मुझे तो तुम्हारी बुद्वि पर तरस आता है जिन लोगों के साथ तुम बरसो ये संगामित्ती कर रहे थे,  उन्हें यदि पहचान नहीं पाये तो यह तुम्हारी कमजोरी थी, इंसान तो दस दिन किसी के साथ रहता है तो उसे अच्छी तरह से पहचान लेता है और तुम इन्हें नहीं समझ पाये. अरे प्यारे गिरगिट को तो अपना रंग बदलने में कुछ वक्त लगता है पर ये नेता, ये मंत्री, ये अफसर एक क्षण में रंग बदल लेते हैं. वैसे तो ये जनता पर सवारी कसे रहते हैं पर वही जनता जब इनकी अकल ठिकाने लगाने के लिये तैयार हो जाती है तो ये बकरी की तरह मिमियाने लगते हैं”  मैंने उसे समझाया.

” ठीक कहा आपने मैं सचमुच इन्हें समझ नहीं पाया इसमें मेरा ही दोष है,  लेकिन एक बात पर अब पूरी तरह भरोसा हो गया कि जब बुरा वक्त आता है तो साया भी साथ छोड़ देता है फिर ये तो नेता हैं,  पर भाईसाहब ये भी तो सोचो कि क्या इनका कर्तव्य नहीं बनता मेरे पक्ष में बोलने का, ऐसे आन्दोलन तो देश में होते रहते हैं.  क्या सरकार इतनी कतजोर हो गई है कि दो चार लोगों ने उसे डरा दिया.  मैंने तो सुना था कि सरकार जो चाहे वो कर सकती है”  भ्रष्टाचार ने बुझे स्वर में कहा.

” नही ऐसी बात नही है भ्रष्टाचार जी,  इन बेचारों ने तो भरपूर कोशिश की कि तुम्हारे खिलाफ ऐसा कोई कानून न आने पाये जिससे तुम्हारा तो ठीक इनका नुकसान हो, खूब लोकतंत्र की दुहाई दी कि ऐसे में तो लोकतंत्र ही खत्म हो जायेगा सरकार के बड़े-बड़े प्रवक्ताओं ने टीवी में बहसें भी की,  इस देश में तुम्हारा बना रहना बेहद जरूरी बताया.  ये तक कहा कि तुम नहीं रहोगे तो वे अनाथ हो जायेंगे पर क्या करते बेचारे जब देश का आम आदमी ही जंतर-मंतर में लाखों की तादात में इकट्ठा होने लगा देश के दूसरे हिस्से में तुम्हारे खिलाफ माहौल बनने लगा, लोग मोमबत्तियां लेकर सरकार को रोशनी दिखाने के लिए सड़कों पर निकल पड़े तो वे भी क्या करते. अभी चुनाव पास आने वाले हैं यदि तुम्हारा ज्यादा पक्ष लेते तो सत्ता से हाथ धो बैठते और जब सत्ता ही नहीं रहती तो तुम्हें भला कैसे संरक्षण देते? उनकी भी मजबूरी तो समझो.  तुम्हें तो केवल अपना ही अपना दिखाइ दे रहा है. जरा उन नेताओं-मंत्रियों और सरकार से पूछो कि किस मजबूरी में उन्होंने तुम्हारे खिलाफ आने वाले जनलोकपाल विधेयक के लिये हामी भरी है. किसी भी मंत्री के घर चले जाओ उनके घर में ऐसा मातम सा छाया है जैसे उनका सब कुछ लुट-पिट गया हो.  नेता, अफसर सब जार-जार आंसू रो रहे हैं,  क्योंकि वे भी जानते हैं कि तुम्हारे बिना उनका जीना भी कोई जीना है लल्लू,  पर अभी भी आशा की एक किरण है तुम्हारे लिये, अभी तो बिल का मसौदा तैयार होने में वक्त है फिर उसे संसद में रखा जायेगा.  मेरा पूरा विश्‍वास है कि तुम्हारे ये साथी जी तोड़ कोशिश करेंगे कि तुम्हारे खिलाफ लाया गया ये बिल पास न हो सके.  वे इसमें तरह-तरह की बहस करेंगे और फिर कौन सा एक दल है इस देश में, सैकड़ों छुटभैये दल हैं,  उन्हें आड़ बनाकर ये बिल पास करने में सैकड़ों रोड़े अटकायेंगे क्योंकि तुम्हारी स्थिति उस प्रेमिका जैसी है, जिसे प्रेमी किसी भी कीमत में छोड़ना नहीं चाहता. आशा रखो. अरे आशा से तो आसमान टंगा हुआ है. अपने लोगों पर भरोसा करना सीखो. जिन्दंगी में कई बार ऐसे मौके आते हैं जब आदमी का भरोसा डगमगा जाता है, पर अंत में अपने ही लोग काम आते हैं और फिर तुम्हारे साथ कौन नहीं है.  नेता हैं, मंत्री हैं, अफसर हैं और तो और सरकार भी है तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ने वाला;” मैंने उसे सांत्‍वना देते हुए कहा.

”अच्छा तो अब आप भी अब मेरा मजा ले रहे हो भाई साहब. मैं तो आपको अपना दुखड़ा सुना रहा था और आप मेरे घाव पर नमक छिड़क कर उसे और कुरेद रहे हो”  भ्रष्टाचार ने कहा. ”ठीक कहा तुमने भ्रष्टाचार भाई तुमने इस देश में साठ साल मजे किये हैं, अब हमारा यानी इस देश की जनता का मजा लेने का वक्त आया है तो इसमें तुम्‍हें ऐतराज नहीं होना चाहिये.”  मैं अभी इतना ही कह पाया था कि मैंने देखा भ्रष्टाचार अन्तर्ध्यान हो चुका था.

लेखक चैतन्य भट्ट जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे कई अखबारों में संपादक रहे हैं.

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