: दलित मुद्दे को हथियाने का सार्थक सवर्ण प्रयास : तो दलित नाट्य समारोह सम्पन्न हो गया और इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया कि कई बार मंचित हो चुके नाटक, जो कभी दलित नाटकों के रूप में प्रचारित नहीं किए गए थे, पुनः मंचित किए गए और उत्तर प्रदेश में दलित नाट्य समारोह के प्रथम आयोजक के रूप में ‘अलग दुनिया’ का नाम ‘स्वर्णाक्षरों’ में अंकित हो गया। नाट्य समारोह के तीनों नाटक अपने कथ्य को सम्प्रेषित करे में सफल रहे। छोटी मोटी चूक जो कि सदा होती है, जिन पर नियन्त्रण हो ही नहीं सकता, को छोड़ दिया जाय तो नाटक यदि 10 नहीं तो कम से कम 9 भाषणों के बराबर प्रभाव तो छोड़ ही गए। दूसरी कमी रही नगर के नाट्य कर्मियों का असहयोग, केवल एक ही विचार धारा के लोग ही नज़र आए। यह नाट्य कर्मियों की अतिव्यस्तता या राजनीति के कारण भी हो सकता है।
वर्षों के संघर्ष के बाद दलित अब जाग गए हैं। अब वे सवर्णों की दया या अनुग्रह पर जीने को तैयार नहीं। वे सवर्ण/सवर्ण सत्ता के सहयोग/कृपा को खारिज कर चुके हैं। उनका स्पष्ट आग्रह है कि दलित साहित्य वह है जिसे वे दलित स्वयं रच रहे हैं। आज दलित साहित्यकार अपनी बात धड़ल्ले से कह/कर रहे हैं। मैं इस भावना को नमन करता हूँ जब सदियों से शोषित वर्ग जाग्रत होता है और अपनी पहचान का दावा स्वयं प्रस्तुत करता है। वह सवर्णों को इस प्रकार खारिज कर देता है कि उनका दिया शूद्र/हरिजन/यहाँ तक कि सरकारी तकनीकी नाम अनुसूचित जाति, का भी त्याग कर देता है। अपने लिए अपना नाम, अपनी पहचान का चयन भी अपने आप करता है एवं स्वयं को गर्व व स्वाभिमान के साथ ‘दलित’ नाम से सम्बोधित करता है। वह आरक्षण को दया या दान की भावना से नहीं, अपने अधिकार के रूप में स्वीकार करता है। लम्बे संघर्ष के बाद आज दलित आन्दोलन ने एक उपजाऊ ज़मीन तैयार कर ली है। कुछ भी छींट दीजिए, लाभ तो मिलेगा ही! धन न सही नाम सही, पर मिलेगा जरूर।
दलितों ने सवर्णों को तो खारिज कर दिया मगर सवर्ण उन्हें छोड़ने को राज़ी नहीं। वे इस उर्वरा भूमि से दूर नहीं हटना चाहते। क्या हम यह माने कि अब सवर्णों की निगाह दलितों के मुद्दों पर टिकी हैं? क्या अब वे उनके मुद्दे भी हथियाने जा रहे हैं? सवर्णों द्वारा आयोजित यह ऐसा समारोह था जहाँ दलित विचार धारा के सवर्ण समर्थक थे, शायद इसलिए भी के आजकल यह फैशन भी है और उदारमना में गिनती भी हो जाती है। कुछ वक्ता भी आमन्त्रित थे। प्रथम दिन श्री वीरेन्द्र यादव, द्वितीय दिन श्री सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ व श्री अरुण खोटे व तृतीय दिन श्री कौशल किशोर। धूमिल की उपमा याद आई। अब लोहार क्या जाने लोहे का स्वाद?
सूर्य मोहन जी ने सत्य कहा कि ब्राह्मण सभा हो सकती है, क्षत्रिय सभा हो सकती है, स्त्री रंगमंच हो सकता है तो दलित क्यों नहीं? सही भी है। पर इन उदाहरणों में कार्यकर्त्ता स्वयं ब्राह्मण, क्षत्रिय या स्त्रियाँ होती हैं। यहाँ दलित तो नहीं, उनके सवर्ण पक्षधर ज़रूर हैं। वह भी तब जबकि दलितों का स्पष्ट आग्रह है कि दलित साहित्य वही है जो दलितो द्वारा स्वयं रचा/किया गया हो। माना जा सकता है कि लखनऊ के रंगकर्म में, इस परिभाषा में आ पाने वाले इतने रंगकर्मी नहीं हैं, परन्तु क्या वक्ताओं का भी टोटा है कि केवल एक ही गुट के सवर्णों द्वारा निपटा दिया गया। अन्तिम दिन श्री कौशल किशोर जी ने आलोचनाओं के जवाब में दलित शब्द को विस्तृत आयाम देकर सर्वप्रिय विषय सर्वहारा के साथ समाहित कर दिया। साथ ही निश्चित हो गया कि दलित मुद्दा हथियाने के साथ-साथ दिशा भी बदलने की कोशिश की गई। यह क्या ऐसा आभास नहीं देता कि लड़खड़ा रहा साम्यवाद अब दलित एजेण्डे पर नज़र गड़ाए हुए है।
नाटक ‘महाब्राह्मण’ दलित समस्या पर नहीं वरन् ब्राह्मणवाद पर चोट करता है। इस पर शेष दोनों नाटकों के लेखक श्री राजेश कुमार से व्यक्तिगत बातचीत में मैंने उनसे पूछा कि इस नाटक का स्वर दलित नहीं है। क्या इस नाट्य समारोह का नाम ‘ब्राह्मणवाद विरोधी’ अधिक सही नहीं होता और यह अधिक उचित भी लगता। राजेश जी निस्सन्देह एक विचारवान और सुलझी विचार धारा के व्यक्ति हैं। उन्होंने सकारात्मक प्रतिक्रिया की पर यह भी कहा अब कोई नया शब्द नहीं गढ़ना चाहते। संस्था इस आयोजन पर मीडिया के रुख से भी आहत नज़र आई। हालाँकि वहाँ मुख्यतः महासचिव ही नज़र आते थे। उन्होंने निराशा जताई रंगकर्मियों के बयान पर। आरोप लगे कि रंगमंच का विभाजन हो जाएगा। ऐसा विभाजन तो ख़ैर नहीं होगा क्योंकि अभी रंगमंच ऐसी दुधारू गाय नहीं है, और यदि हो भी गया तो भी इससे कोई खास सामाजिक फर्क़ नहीं पड़ने वाला, ख़ास तौर से उस समाज में जहाँ यह विभाजन एक वास्तविकता है।
श्री जितेन्द्र मित्तल से मैं असहमत हूँ कि जाति के नाम पर थिएटर नहीं हो सकता। हो सकता है बशर्ते करने वाले भी दलित ही हों, जैसा कि उनका आग्रह भी है वह दलित का रचा हो, न कि दलित मुद्दों का लाभ उठाने के लिए सवर्णों द्वारा चली गई चाल हो। दलितों को पीछे छोड़ कर दलित झण्डा उठाने वाले ये लोग इस उर्वरा भूमि का केवल उपभोग करने वाले नहीं साबित होंगे, इसकी क्या गारण्टी है? साथ ही, उनके बयान में राखी सावंत का ज़िक्र भी शोभनीय नहीं है। श्री तरुण राज भी चिन्तित हैं बँटे समाज को लेकर परन्तु वे कोई चिन्ता न करें। राजनीति अपना दायित्व समझती है। वह भरकस प्रयत्न करेगी और जाति को कभी न मिटने देगी।
श्री जुगल किशोर का कयास ठीक है परन्तु आयोजकों की नज़र सरकारी कृपा पर ही नहीं वरन उससे भी कहीं है। दलित चिन्तक होना आज के समय की माँग है। जब सवर्ण शूद्राचार्य हो सकते हैं तो आचार्य से आगे भी अनेक पदवियाँ हैं। एक भी मिल गई तो जीवन धन्य! यह भी ब्राह्मणवाद का ही एक रूप है। एक मज़ाक़ कहा जाता था कि दुनिया का अन्तिम असली अंग्रेज़ भारत से होगा। मैं कहता हूँ कि दुनिया का अन्तिम असली दलित ब्राह्मण होगा और वही दलितों की सारी सुविधाओं का उपभोग करेगा, यही ब्राह्मणवाद की वास्तविकता है। ब्राह्मण सदैव उच्च आसन पर बैठता है और शेष जन ज़मीन पर। यही ब्राह्मणवाद है और यह भारत का अन्तिम सत्य है। ‘जो न समझे वो अनाड़ी है….।’
अन्त में कुछ चुटकुले–
-इस अवसर पर छपी स्मारिका में ‘दलित नाट्य समारोह क्यों’ में लिखा है- ‘जो आन्दोलन दर्शकों से सीधा संवाद करता है वह किसी सत्ता या मठाधीश के भरोसे नहीं रहता।’ इसकी पुष्टि कवर पृष्ठ 2 व 4 पर छपे ‘फुल पेज फोर कलर’ विज्ञापन करते हैं।
-‘…. क्योंकि वर्णविहीन वर्गविहीन समाज की परिकल्पना ही (रेखांकन मेरा) इस रंग आन्दोलन का अन्तिम लक्ष्य है।’ अन्तिम लक्ष्य है -‘परिकल्पना ही’, ठोस कार्य नहीं। जनाब! परिकल्पनाएँ दलित समाज के पास ढेरों हैं। वे आपकी परिकल्पना के मोहताज नहीं। हाँ, आप का अन्तिम लक्ष्य मात्र परिकल्पना है, ये माना जा सकता है।
-‘…. संस्था सुदामा पाठशाला चलाती है।’ मेरा चुटकुला है- समर्थन दलित को और पाठशाला सुदामा? एकलव्य कीजिए साहब!
-चुटकुला शोध- प्राचीनतम दलित साहित्य की कृतियाँ वैदिक युग की हैं। यह मेरा मौलिक शोध है परन्तु इस पर कोई अन्य अधिकार जमाना चाहे तो जमा सकता है। ये कृतियाँ हैं दलित लेखक वाल्मीकि की ‘रामायण’ और वेद व्यास द्वारा सम्पादित वेद व लिखे गए पुराण व महाभारत। जिन्हें सवर्ण सर आँखों चढ़ाए फिरते हैं।
लेखक दिव्य रंजन पाठक लखनऊ के निवासी हैं.

