विभिन्न हिस्सों में मासूमों को जानवरों से भी कम कीमत पर खरीदा-बेचा जाता है। बच्चों को एक चीज बना दिया गया
है। बचपन बचाओ आंदोलन ने पिछले दो वर्षों में ट्रैफिकिंग कर लाए गए करीब पौने दो हजार बच्चों को अलग-अलग उद्योगों की मजदूरी से मुक्त कराया। ये वे बच्चे हैं जो भाग्यशाली हैं, जिन्हें मुक्त करा लिया गया। लेकिन लाखों बच्चों दुनिया भर में विभिन्न तरह के उद्योगों में शोषण के शिकार हैं।
बाल श्रम, बाल सेक्स, बाल भिक्षा आदि ऐसे दर्जनों क्षेत्र हैं जहां बच्चों का शारीरिक और मानसिक शोषण किया जाता है। चाइल्ड पोर्न के प्रति ग्राहकों की बढ़ती कुत्सित ललक को देखते हुए दुनिया भर की पोर्न इंडस्ट्री में बच्चों का जिस तरीके से भयंकर शोषण बढ़ा है, वह न सिर्फ चिंतित करने वाला है बल्कि किसी भी सभ्यता को शर्मशार करने के लिए काफी है। मासूमों के नाजुक अंगों के साथ जिस तरह की छेड़छाड़ की जाती है, जिस तरीके से इन दृश्यों को फिल्माया जाता है, बच्चों का इस्तेमाल कर जिस तरह से पोर्न इंडस्ट्री को बढ़ावा दिया जाता है, वह अक्षम्य अपराध है। पोर्न माफियाओं के अकूत पैसों के दबाव तले जी रही कई विकसित देशों की सरकारें सब जान के भी अनजान बनी रहती हैं और कोई कार्रवाई नहीं करतीं। इसी तरह बच्चों के क्षिक्षा मांगने पर ज्यादा धन मिलने की संभावना के चलते भिक्षा माफियाओं द्वारा इधर-उधर से बच्चों को उठाकर और उनके शरीर के किसी हिस्से को विकलांग बनाकर भिक्षा मांगने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। चौराहों और सड़कों पर भीख मांगते बच्चों को सभी देखते हैं।
सरकार में बैठे लोग, एनजीओ और सभ्य समाज के प्रतिनिधि यह सब देखते हुए भी आंखें फेर लेते हैं। आखिर कब इन बाल सेक्स और बाल भिक्षा के माफियाओं को पकड़कर फांसी पर लटकाया जाएगा ताकि आगे से कोई भी इस तरह की हरकत न करने का प्रयास करे। जाहिर सी बात है- सरकार और पुलिस को खुद के लाभ-हानि से फुरसत नहीं तो वह जनता की फिक्र क्यों करे। वैसे भी भारत का मौजूदा कानून बाल व्यापार पर लगाम लगाने में समर्थ नहीं है। इसके लिए नए कानून की आवश्यकता है। ऐसा कानून जो बाल शोषण के आरोपियों के जुर्म के साबित होने पर उन्हें फांसी से कम सजा न दे।
गैर सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में हर साल 72 लाख बच्चे बाल दासता के शिकार होते हैं। इनमें एक तिहाई बच्चे दक्षिण एशियाई देशों के होते हैं। भारत में बाल व्यापार में ढकेले जा रहे बच्चों की कोई सही संख्या उपलब्ध नहीं है। पर विश्लेषकों का कहना है कि भारत बाल व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। बच्चों को बचाने के नाम पर इस देश के नेता, एनजीओ और समाज सुधारक खुद तो काफी पुरस्कार, नाम, सम्मान और धन हासिल कर लेते हैं लेकिन दासता के शिकार बच्चों के हिस्से वही शोषणा और अत्याचार दर्ज रहता है। भारत के पड़ोसी देशों पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश से बड़ी संख्या में बच्चे भारत लाए जाते हैं और फिर यहां से अरब देशों की ओर भेजे जाते हैं। अरब देशों में ऊंट और घोड़ों पर बच्चों को बिठाकर होने वाले खूनी दौड़ के बारे में सारी दुनिया जानता है।
धनाढ्य शेख अपने मनोरंजन की खातिर हर साल सैकड़ों बच्चों की जान ले लेते हैं लेकिन अंतराराष्ट्रीय मानवाधिकार से जुड़े संगठन इस पर लगाम लगा पाने में असफल साबित हो रहे हैं।
बताया जाता है कि देश के विभिन्न थानों में हर साल सात लाख बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई जाती हैं। इनमें से हर साल करीब 23 हजार बच्चों का कोई अता पता नहीं चल पाता है। इन्हें आमतौर पर मरा मान लिया जाता है। सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली है जहां हर रोज छह बच्चे गायब होने के लिखित आंकड़े सामने आए हैं। इसको लेकर संसद में भी शोर शराबा हुआ और बाल अधिकार आयोग ने दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखा। लेकिन इस शोरगुल के बाद अब सब कुछ फिर से शांत हो गया लगता है। हर रोज जो छह बच्चे गायब हो रहे हैं, वे कहां जा रहे हैं, कौन सा गिरोह इन्हें उठा रहा है, इन बच्चों का किस तरह दुरुपयोग किया जा रहा है, इस बारे में अगर गंभीरता से छानबीन कराई जाए तो भयावह सच्चाइयां सामने आ सकती हैं। बताया जाता है कि देश के कई बड़े सफेदपोश बच्चों की तस्करी में शामिल हैं।
कहा तो यहां तक जाता है कि आजकल बच्चों की बहुत बड़ी संख्या का इस्तेमाल उनके शरीर के अंगों को निकालने के लिए किया जाता है। दुनिया के बाजार में किडनी समेत शरीर के कई अंगों की महंगी होती कीमत को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक गिरोह बच्चों को गायब कर उनके अंगों का व्यापार करता है। मीडिया में बच्चों के अपहरण पर ज्यादा हल्ला होता है लेकिन जो बच्चे चुपचाप गायब हो जा रहे हैं, उन पर कोई बात नहीं करता। वर्ष 2006-07 के आंकड़ों के मुताबिक इस एक वर्ष में जहां दो सौ से आठ सौ के बीच बच्चे फिरौती के लिए अपहृत किए गए तो वहीं इन्हीं दिनों में 52 से 54 हजार बच्चे चुपचाप गायब हो गए।
माया नगरी मुम्बई में बीते साल सबसे ज्यादा 16993 बच्चे गायब हुए। यह ताजा आंकड़ा है। इन गायब बच्चों में से तीन हजार का कोई अता-पता नहीं चला। क्या ये गायब बच्चे तरक्की के मिसाल हैं? समाज विज्ञानियों का कहना है कि बच्चों का ज्यादातर इस्तेमाल सस्ते श्रम के रूप में किया जाता है। बच्चा कम पैसे में और बिना प्रतिरोध किए काम करता है। बच्चे के साथ आक्रामक होकर नुकसान करने की आशंका कम होती है। यही चीज औरतों पर भी लागू होती है। इसलिए दुनिया के ज्यादातर देशों के उद्यमी श्रम के लिए बच्चों और औरतों को ज्यादा महत्व देते हैं। घरेलू नौकरों के रूप में इन्हीं वजहों से बच्चों और औरतों को प्राथमिकता दी जाती है।
विकास का ये जो कंठित ढांचा है वह मानवीय मूल्यों को न सिर्फ तार-तार कर रहा है बल्कि समाज को उस रास्ते पर ले जा रहा है जहां के आगे सिर्फ और सिर्फ अंधेरा है, वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं। जरूरत है बच्चों को बचाने की। इन्हें प्यार करने की। बच्चों के साथ खराब सलूक करने वालों को दंडित करने की। लेकिन यह सब करे कौन? इसके लिए एक बार फिर आम जन को ही खड़ा होना होगा और सरकारों पर दबाव बनाना होगा।
लेखक दीपक कुमार सिंह पत्रकार हैं और इन दिनों दिल्ली में एक वेब पोर्टल से जुड़े हुए हैं।

