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इंसेफलाइटिस से लगातार संघर्ष कर रहे हैं डा. आरएन सिंह

पूर्वांचल के लिए खुशखबरी है। हर वर्ष मौत बनकर कहर बरपाने वाली जापानी इंसेफलाइटिस की रोकथाम के लिए केन्द्र एंव प्रदेश की सरकारें 33 वर्षों बाद एकमत होकर खड़ी हुई हैं और तो और इस वर्ष यह बीमारी कहर बनकर टूटे इससे पहले ही शासन -प्रशासन की तरफ से बचाव के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। गांवों में साफ-सफाई के लिए जहां ग्राम प्रधानों को जबाबदेह और जिम्मेदार बनाया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ मंडलायुक्त ने इस बारे में खुद निगरानी शुरू कर दी है । इन सब के बावजूद पिछले पांच वर्षों से इंसेफलाइटिस उन्मूलन के लिए अभियान चला रहे डा. आरएन सिंह ने इन प्रयासों को नाकाफी बताया और राष्‍ट्रव्यापी बन चुकी इस बीमारी के समूलनाश के लिए इसे बारहवीं पंचवर्षीय योजना में शामिल करने की मांग उठाकर गंभीर बहस छेड़ दिया है। इंसेफलाइटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कैम्पेनर डा.आरएन सिंह ने बातचीत में उल्टे सवाल किया कि जिस बीमारी ने पिछले 33 वर्षों में पूर्वांचल में पचास हजार मासूमों की जान ली हो और उससे कई गुना बच्चों को विकलांग बना दिया हो तथा देश के 21 प्रदेशों में इसका प्रकोप हो क्या इसे अगली पंचवर्षीय योजना का हिस्सा नहीं होना चाहिए? भारत के भविष्य मासूमों की मौत से बड़ा कोई और पहलू है नीति निर्धारकों के लिए?

पूर्वांचल के लिए खुशखबरी है। हर वर्ष मौत बनकर कहर बरपाने वाली जापानी इंसेफलाइटिस की रोकथाम के लिए केन्द्र एंव प्रदेश की सरकारें 33 वर्षों बाद एकमत होकर खड़ी हुई हैं और तो और इस वर्ष यह बीमारी कहर बनकर टूटे इससे पहले ही शासन -प्रशासन की तरफ से बचाव के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। गांवों में साफ-सफाई के लिए जहां ग्राम प्रधानों को जबाबदेह और जिम्मेदार बनाया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ मंडलायुक्त ने इस बारे में खुद निगरानी शुरू कर दी है । इन सब के बावजूद पिछले पांच वर्षों से इंसेफलाइटिस उन्मूलन के लिए अभियान चला रहे डा. आरएन सिंह ने इन प्रयासों को नाकाफी बताया और राष्‍ट्रव्यापी बन चुकी इस बीमारी के समूलनाश के लिए इसे बारहवीं पंचवर्षीय योजना में शामिल करने की मांग उठाकर गंभीर बहस छेड़ दिया है। इंसेफलाइटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कैम्पेनर डा.आरएन सिंह ने बातचीत में उल्टे सवाल किया कि जिस बीमारी ने पिछले 33 वर्षों में पूर्वांचल में पचास हजार मासूमों की जान ली हो और उससे कई गुना बच्चों को विकलांग बना दिया हो तथा देश के 21 प्रदेशों में इसका प्रकोप हो क्या इसे अगली पंचवर्षीय योजना का हिस्सा नहीं होना चाहिए? भारत के भविष्य मासूमों की मौत से बड़ा कोई और पहलू है नीति निर्धारकों के लिए?

इस बारे में शीघ्र ही वह पूर्वांचल के सांसदों और विधायकों का संयुक्त सम्मेलन कराएंगे और उसमें इस मुद्दे को विचार के लिए रखा जाएगा और सर्वानुमति बनाकर सरकार पर दबाव बनाया जाएगा। यह पूछने पर क्या पूर्वांचल के सभी सांसद और विधायक इसके लिए एक मंच पर आने को तैयार हैं तो उनका कहना था कि यह किसी दल विशेष का मुद्दा अथवा किसी एक समुदाय से जुड़ी परेशानी नहीं है, बल्कि इससे सभी समुदाय और धर्मों के लोगबाग परेशान है। एंसेफलाइटिस ने अब तक किसी का बेटा तो किसी मां की गोद सूनी कर दी है, तो किसी बच्चे को जीवनभर के लिए विकलांग बना दिया है। सम्मेलन में कौन आएगा कौन नहीं यह महत्वपूर्ण नहीं है, मकसद है तो सिर्फ इनके मार्फत लोकसभा और राज्य सभा तक मासूमों के जीवन को बचाने की आवाज बुलंद करना तथा स्वाथ्य की गारंटी करने की। उनका कहना था इंसेफलाइटिस के मुद्दे पर नीप लागू करने की मांग का दर्जनभर से अधिक पक्ष विपक्ष के सांसदों ने समर्थन किया। सरकार को पत्र लिखा और लोकसभा में आवाज भी बुलंद की है, पर सरकार पता नहीं क्यों नीप के सभी बिंदुओं पर सहमति जताने के बाद भी उसे पूरी तरह लागू करने से कतरा रही है।

डा.सिंह ने बातचीत में कांग्रेस के युवा सांसद और भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी के बुंदेलखंड के मसले पर उनके दरियादिली की सराहना की और उनसे पूछा है कि क्या पूर्वांचल उत्तर प्रदेश का हिस्सा नहीं है? अगर वह पूर्वांचल को यूपी का हिस्सा मानते हैं तो फिर उसके साथ पक्षपात क्यों? वह पूर्वांचल की एंसेफलाइटिस की इस समस्या से पूरी तरह वाकिफ हैं इस समस्या को उनने करीब से देखा भी है, पर इसके बाद भी अब इस मुद्दे पर पूर्वांचल को विशेष पैकेज क्यों नहीं दिया गया? उनने कहा कि केंन्द्र सरकार पूर्वांचल को एंसेफलाइटिस से बचाने के लिए वित्तीय सहायता और राष्‍ट्रीय कार्यक्रम नीप दे। उन्‍होंने कहा कि सरकार को आईना दिखाने के लिए ही वे जनवरी 2009 को कुशीनगर के सर्वाधिक प्रभावित गांव होलिया को एडाप्ट कर वहां आमजन के सहयोग से नेशनल इंसेफलाइटिस इरेडिकेशन प्रोग्राम ‘नीप’  के सभी बिंदुओं को लागू किया था। साल भर में वहां उन लोगों ने वह कर दिखाया जो सरकार नहीं कर पा रही थी। यह जनता की सत्ता पर जीत है। उनका कहना है कि अगर एक होलिया में यह हो सकता है तो पूरे पूर्वांचल में क्यों नहीं? उनके पास धन और संसाधनों का अभाव है, वरना वह तो पूरे पूर्वांचल में नीप को लागू कर एंसेफलाइटिस पर पूरी तरह अंकुश लगाकर दिखा देते।

डा. सिंह का कहना है कि बीआरडी मेडिकल कालेज में केवल एक छत के नीचे के आंकड़े पूर्वांचल में एंसेफलाइटिस की भयावहता को दर्शाते है। मेडिकल कालेज में वर्ष 2010 में एंसेफलाइटिस से पीड़ित 3200 बच्चे भर्ती हुए जबकि 540 की मृत्यु हो गई। इसी तरह 2009 में 2400 बच्चे भर्ती किए गए और उनमें से 550 की मृत्यु हो गई। वर्ष 2008 में 2900 बच्चे भर्ती किए गए और उनमें से 453 बच्चों की मौत हो गई, वर्ष 2007 में 2729 बच्चे भर्ती किए गए और उनमें से 547 बच्चों की मृत्यु हो गई,वर्ष 2006 में 2029 बच्चे भर्ती किए गए और उनमें से 434 बच्चों की मृत्यु हो गई। वर्ष 2005 में 3900 बच्चे भर्ती किए गए और उनमें से 1150 बच्चों की मृत्यु हो गई। इस बीमारी का दूसरा जो दुखद पहलू है वह जो बच्चे बच भी गए वह किसी न किसी प्रकार की विकलांगता के शिकार हो गए हैं।

गोरखपुर से एसके सिंह की रिपोर्ट.

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