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जुगाड संस्कृति बनाम लड़ना-भिड़ना

डा. नूतन ठाकुरकई बार मुख्य मुद्दा पीछे रह जाता है और उससे ज्यादा महत्वपूर्ण लड़ाई रह जाती है. कई बार यह लड़ाई हक की होती है और वह हक सिर्फ उस व्यक्ति का हक नहीं हो कर समाज के लिए व्यापक रूप में एक दिशा देने में सहायक हो सकता है. ऐसी स्थितियों में हार और जीत का भी मतलब कई बार खत्म हो जाता है और सिर्फ उस पूरी प्रक्रिया से वास्ता बच जाता है. मैं ऐसे सभी मामलों को बहुत महत्वपूर्ण मानती हूँ जिसमे आदमी लड़ाई लड़ता है, क्योंकि मैं अपने आस-पास देख रही हूँ कि हम लोगों में लड़ने की आदत छूटती जा रही है. यह स्थिति चाहे समाज में हो या राजनीति में, हर जगह सुविधापरस्ती का माहौल अधिक दिख पड़ता है. यानी किसी तरह अपना काम हो जाए, बाकी दुनिया भाड़ में जाए. जिसे आम तौर पर ‘चलता है’ की भारतीय प्रवृत्ति भी कह सकते हैं.

डा. नूतन ठाकुर

डा. नूतन ठाकुरकई बार मुख्य मुद्दा पीछे रह जाता है और उससे ज्यादा महत्वपूर्ण लड़ाई रह जाती है. कई बार यह लड़ाई हक की होती है और वह हक सिर्फ उस व्यक्ति का हक नहीं हो कर समाज के लिए व्यापक रूप में एक दिशा देने में सहायक हो सकता है. ऐसी स्थितियों में हार और जीत का भी मतलब कई बार खत्म हो जाता है और सिर्फ उस पूरी प्रक्रिया से वास्ता बच जाता है. मैं ऐसे सभी मामलों को बहुत महत्वपूर्ण मानती हूँ जिसमे आदमी लड़ाई लड़ता है, क्योंकि मैं अपने आस-पास देख रही हूँ कि हम लोगों में लड़ने की आदत छूटती जा रही है. यह स्थिति चाहे समाज में हो या राजनीति में, हर जगह सुविधापरस्ती का माहौल अधिक दिख पड़ता है. यानी किसी तरह अपना काम हो जाए, बाकी दुनिया भाड़ में जाए. जिसे आम तौर पर ‘चलता है’ की भारतीय प्रवृत्ति भी कह सकते हैं.

इसी से जुड़ा एक अन्य शब्द है- जुगाड़. हम लोग इस जुगाड़ के पीछे इस हद तक पड़े रहते हैं कि इस चक्कर में सही और गलत को तिलांजलि दे कर बस किसी तरह से अपना काम करवा लेने में लगे रहते हैं. मैं इससे अपने आप को अलग नहीं बता रही बल्कि मैं भी इस मामले में बिलकुल औरों की तरह हूँ, जिसे किसी भी तरह से अपना गैस का चूल्हा चाहिए, किसी तरह से अपना टेलीफोन, कैसे भी रेलवे का रिजर्वेशन और तमाम सुविधाएँ और जरूरतें. शायद यही कारण है कि हम सब लोग एक अज्ञात सत्ता के चक्कर में रात-दिन लगे रहते हैं और किसी प्रकार से भी सत्ता के निकट रहना चाहते हैं. ऐसे में यदि कोई आदमी इस जुगाड़ वाले रास्ते को छोड़ कर सत्यपरक रास्ते पर थोड़ी देर को भी चलता है तो ना सिर्फ उसे तमाम दिक्कतें आती हैं बल्कि उसकी हंसी भी उडाई जाती है. फिर भी मेरा मानना है कि यदि ऐसा समय आ जाएगा जब हम सभी जुगाड़ को छोड़ कर सीधे रास्ते पर चलने लगेंगे तो हमारा वास्तव में भला होगा.

एक उदाहरण के तौर पर मेरे पति अमिताभजी से जुड़ा उनके अध्ययन अवकाश का मामला है. मैं नहीं कह रही कि मेरे पति अच्छे हैं या बुरे, पर इतना जरूर जानती हूँ कि यदि अपने अध्ययन अवकाश के मामले में उन्होंने जुगाड़ का रस्ता अपनाया होता तो ना जाने कब उनका काम हो गया होता. यह नहीं होता कि उन्हें एक के बाद एक सात मुकदमे हाई कोर्ट और कैट में दायर करने पड़ते. मैं जानती हूँ कि ना जाने कितने ही सत्ता के दलालों और प्रभावशाली व्यक्तियों ने उन्हें कहा कि चलिए आपका यह काम करा देते हैं, पर पैसे की दिक्कत सह कर भी उन्होंने यह जिद ठान ली कि अध्ययन अवकाश यदि लेंगे तो न्यायपूर्ण तरीके से लेंगे, किसी के एहसान पर नहीं लेंगे.

नतीजा यह कि मुकदमे पर मुकदमा. यदि आज हमें यह पैसा मिल जाए तो वह बारह-तेरह लाख के करीब होगा पर अभी ऐसा होता नहीं दिखता. अभी तो केवल मुकदमों का मंज़र है. आज ही उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ खंडपीठ में कुंवर फ़तेह बहादुर, प्रमुख सचिव (गृह) तथा करमवीर सिंह (पुलिस महानिदेशक) के विरुद्ध एक अवमानना याचिका दायर किया है. यह अवमानना याचिका उनके इस दो साल के अध्ययन अवकाश से सम्बंधित है. इस मामले में तीन मुकदमों के बाद उन्हें असाधारण अवकाश मिला और फिर इस सम्बन्ध में मूल याचिका संख्या 238/ 2010 में कैट, लखनऊ ने 7 जुलाई 2010 को उत्तर प्रदेश द्वारा मेरे पति के अध्ययन अवकाश को ख़ारिज करने के कारणों को गलत बताते हुए राज्य सरकार को यह आदेश दिए थे कि वह अध्ययन अवकाश के विषय में नियमानुसार नए सिरे से निर्णय ले.

जब राज्य सरकार दिए गए समयावधि में निर्णय लेने में विफल रही तो मेरे पति ने कैट, लखनऊ में अवमानना याचिका संख्या 57/2010 बनाम जी के पिल्लई, केन्द्रीय गृह सचिव, कुंवर फ़तेह बहादुर तथा करमवीर सिंह दायर किया. जब इस मामले में तीनों अधिकारियों के विरुद्ध नोटिस जारी हो गयी तो राज्य सरकार ने इससे बचने के लिए उच्च न्यायालय में कैट के आदेश को चुनौती देते हुए एक याचिका संख्या 268/ 2011 दायर कर दिया. उच्च न्यायालय ने 09 मार्च 2011 को आदेश दिया कि इस बारे में कैट का किया हुआ निर्णय न्यायसंगत प्रतीत होता है और उचित तथ्यों पर आधारित है. अतः उच्च न्यायालय ने कहा कि इस मामले में उसके स्तर पर किसी व्यवधान की जरूरत नहीं है. उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को आदेशित किया कि वह दो महीने के अंदर कैट, लखनऊ ने आदेशों के उपक्रम में अध्ययन अवकाश के बारे में निर्णय कर ले. उच्च न्यायालय का यह आदेश दिनांक 11 मार्च को राज्य सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया गया और अब तक इस पर निर्णय नहीं हुआ है. निर्धारित दो महीने की अवधि बीत जाने पर अब फ़तेह बहादुर और करमवीर सिंह के विरुद्ध अवमानना याचिका दायर किया गया है.

इस मामले में यह सातवाँ कोर्ट केस है. अब मेरे पति अपने दो साल के असाधारण अवकाश के बाद वापस नौकरी में आ भी चुके हैं पर प्रकरण अभी तक चल ही रहा है, ना जाने कब तक चलेगा. मैं इस प्रकरण में अपने पति की तारीफ़ करने की जगह इसे एक नजीर के तौर पर रखती हूँ कि हमें कभी ना कभी सोचना होगा कि यह जुगाड़ और मौकापरस्ती की संस्कृति हमें कहाँ ले जा रही है. यदि नियमों में एकरूपता और उसका निष्पक्ष पालन नहीं होगा तो इसी तरह से अन्याय होते रहेंगे. साथ ही हम लोगों को भी कभी ना कभी अपने हक को तिलांजलि देते हुए ऐसे मौकों पर अड़ना भी होगा, क्योंकि काम-निकालो परंपरा निश्चित रूप से हम लोगों के लिए घातक हो रही है. यह जो मैंने ऊपर कहा है उसका पालन करना बहुत मुश्किल है, पर इतना जरूर है कि हम जब भी ऐसी संस्कृति का विकास कर सकेंगे और इन बातों को अपने जीवन में उतार सकेंगे, हम लोगों के लिए ही बेहतर होगा.

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

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