हिन्दुस्तान की सियासत ने फिर करवट ली है, लेकिन इसके लिए इस चुनावी जंग में जीतने वाले सिर्फ बधाई के पात्र नहीं है, पर इसके लिए वे जिम्मेदार हैं, जो भले ही चुनाव न लड़ रहे हों, लेकिन जीतने वालों को इन महानुभावों को दिल खोलकर धन्यवाद देना चाहिए। पश्चिम बंगाल में बुद्वदेव भट्टाचार्य क्या इस प्रकार मुंह की खाते अगर प्रकाश करात कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्ससिस्ट) के महासचिव नहीं होते। प्रकाश कारत में ही यह साहस था कि वह लोकसभा के स्पीकर सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकाल सके। इससे यह साफ हो गया कि प्रकाश कारत भले ही वृंदा करात के पति हों, किंतु उनमें प्रबल इच्छाशक्ति है। अगर वह फुटबाल के खिलाड़ी होते तो अपनी टीम पर भी गोले दागते। इसलिए हे ममतामयी, ममता बनर्जी! अपनी जीत पर आप खुशी से फूली न समाएं, आपकी चुनावी सफलता के पीछे बहादुर एवं सिद्वांतवादी प्रकाश करात का हाथ है। वैसे भी कांग्रेस का पंजा भी अब आपकी गिरफ्त में है।
ममता जी आपने प्रणव मुखर्जी के सुपुत्र को मंत्री बनाकर बूढ़े बाप का दिल जीत लिया है। प्रणव दा और नारायण दत्त तिवारी भारतीय राजनीति के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी होकर भी प्रधानमंत्री की कुर्सी न पा सके। ये दोनों नेता इतने बुद्विमान हैं कि उनकी आलोचना मेरे जैसे छोटे कलमनवीस द्वारा उचित नहीं है। नारायणदत्त जी को लालबत्ती ले डूबी। अच्छे भले लोक लेखा समिति के अध्यक्ष थे। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बन बैठे। बहन मायावती ने ठीक ही कहा कि उत्तराखण्ड तो उत्तर प्रदेश की एक कमिश्नरी के बराबर है। फिर भी दिल नहीं भरा तो दक्षिण में हैदराबाद जाकर राज्यपाल बन गये। इतिहास से बखूबी परिचित होकर भी वह भूल गए कि मुगलिया सल्तनत निजाम भी कालान्तर में स्वतंत्र शासक बन बैठे। इसलिए शक एवं शुबहा गलत नहीं था। परंतु हमारे तिवारी जी को पैदली मात दे दी गई। सेक्स स्कैंडल से घेरकर उन्हें भारतीय राजनीति की युद्धभूमि से बाहर कर दिया गया।
प्रणव दा के बारे में क्या कहा जाय। आज भारतीय शासन व्यवस्था के सर्वश्रेष्ठ प्रशासक होने के बावजूद उनका दिल सदैव कमजोर रहा। सन 80 के दशक में उनको मार्क्सवादियों के पंजे से बाहर निकालने की एक कोशिश की गई थी। उन दिनों लखनऊ निवासी गोपाल मिश्र कांग्रेस पत्रिका के सम्पादक थे, उन्होंने प्रणव दा से आग्रह किया कि लखनऊ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ें। उनको यह भी याद दिलाया गया कि एक बंगाली सज्जन लखनऊ से लोकसभा के लिए चुने जा चुके हैं। किन्तु उन्हें मार्क्सवादियों के ‘‘गुपचुप’’ समर्थन पर ज्यादा भरोसा था। इस तरह उनसे प्रधानमंत्री पद सदैव के लिए दूर हो गया।
खैर, अब करीब-करीब चुक गए राजनैतिक कारतूसों की चर्चा में वक्त क्यों गंवाया जाए। प्रणव दा का बेटा ममता की छांव में अब पलेगा, इसी तरह नारायण दत्त के करीबी माने जाने वाले सांसद… ऐरन को भी मंत्री पद मिल जाता तो उन्हें भी कुछ संतोष मिलता। यह तो मम्मी जी पर निर्भर करता है, काश, वह तिवारी जी को भी चाय पर बुलातीं। फिलहाल यह निमंत्रण सिर्फ जयललिता के लिए है। जयललिता की वापसी का श्रेय हारे हुए करूणानिधि को जाता है। अगर उन्होंने अपने बच्चों खासतौर पर प्रिय स्टालिन और अलधगिरि को धृतराष्ट्र की भांति अंधा समर्थन नहीं दिया होता तो जयललिता चुनाव जीततीं? इस चुनाव में यह भी साफ हो गया कि वोटर बेहद नमकहराम है, कलर टीवी तो करूणानिधि से लिया और वोट जयललिता को। मुझे तो वोटरों पर बेहद गुस्सा आ रहा है। उसको रिझाने के लिए बेचारे राजा ने हजारों करोड़ डकारे, कलर टीवी खरीदे और भी तमाम तोहफे और बदले में पराजय। वोटरों के इस गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार की निन्दा उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद यादव पहले भी कर चुके हैं।
पर उनकी क्या बात की जाये जिन्होंने मम्मी के प्रति ‘‘अंधनिष्ठा’’ की शपथ ले ली है। और अपने को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। लेकिन इनकी हैसियत मम्मी के साथ चाय पीने की नहीं रही है।भारतीय राजनीति में इस मम्मीयुग की तारीफ जितनी की जाय, कम है। यूपीए भले ही पूर्ण बहुमत में न हो, सरकार का कार्यकाल पूरा होगा। बस मम्मी कभी-कभी चाय पर बुलाती रहें।
लेखक अनूप श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार एवं स्वतंत्र भारत लखनऊ के पूर्व संपादक हैं.

