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कई-कई लालबहादुर थे पर रामगुनी को जिला न सके

: सीतापुर में रामगुनी की मौत पर क्यों बरपा है हंगामा : पिपली लाइव में नत्था ने मरने की घौषणा की थी तो शासन से लेकर प्रशासन ही नहीं मीडिया का ऐसा जमावड़ा लगा था कि गांव में मेले जैसा दृश्य दिखने लगा था। मगर सीतापुर जनपद के थाना पिसांवा के बबुर्दीपुर गांव में नत्था नहीं रामगुनी की मौत पर बरपा है हंगामा। यह हंगामा  सिस्टम पर है, यह हंगामा गरीब की मौत पर रोटी सेंकने के लिए है या फिर यह हंगामा एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में है। पिपली लाइव के नत्था को तो लालबहादुर (हैण्डपम्प का ऊपरी हिस्सा) सिर्फ मौत की घोषणा के  बाद मिल गया था मगर रामगुनी के पास एक नहीं कई-कई लालबहादुर थे। मगर लालबहादुर (सरकारी योजना) भी उसे जीने का रास्ता नहीं दिखा सकी।

: सीतापुर में रामगुनी की मौत पर क्यों बरपा है हंगामा : पिपली लाइव में नत्था ने मरने की घौषणा की थी तो शासन से लेकर प्रशासन ही नहीं मीडिया का ऐसा जमावड़ा लगा था कि गांव में मेले जैसा दृश्य दिखने लगा था। मगर सीतापुर जनपद के थाना पिसांवा के बबुर्दीपुर गांव में नत्था नहीं रामगुनी की मौत पर बरपा है हंगामा। यह हंगामा  सिस्टम पर है, यह हंगामा गरीब की मौत पर रोटी सेंकने के लिए है या फिर यह हंगामा एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में है। पिपली लाइव के नत्था को तो लालबहादुर (हैण्डपम्प का ऊपरी हिस्सा) सिर्फ मौत की घोषणा के  बाद मिल गया था मगर रामगुनी के पास एक नहीं कई-कई लालबहादुर थे। मगर लालबहादुर (सरकारी योजना) भी उसे जीने का रास्ता नहीं दिखा सकी।

पिसांवा ब्लाक का गांव बबुर्दीपुर। रोजना आती गाड़ियां ग्रामीणों के लिए कौतुहल का विषय बन रही हैं। कभी अधिकारी तो कभी राजनीतिक दल के नेता तो कभी गरीबों के हितों का ठीकरा अपने सर पर लेने वाले स्वयंसेवी संस्था के लोग। एक के बाद एक जांचों की दौर जारी है। फलां संस्था की गांव में हनक है तो फिर उसे नीचा दिखाने के लिए अन्य संस्थाओं ने रामगुनी की मौत को भूख से मौत करार देने की मानो सौगंध खा ली है। कल तक कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले रामगुनी की मौत पर बंटे नजर आ रहे हैं। गांव में कोई धरना चलने का फर्जी-सा दावा कर रहा है तो कोई गांव में कोटेदार की गर्दन फंसाने के लिए राशन न बांटे जाने का ढिंढोरा पीट रहा है। यही नहीं अब तो मनरेगा रूपी ब्रह्मास्त्र तो संस्थाओं के पास किसी भी गांव में मिल ही जाता है।

सुप्रीम कोर्ट की राइट टू फूड कमेटी व अनुसूचित जाति राष्ट्रीय आयोग की जांच में भूख से मौत की पुष्टि न मिलने पर अधिकारियों ने राहत की सांस ली। मगर गांव में रोजना आने वाली जांच नासूर बनकर चुभ रहा है। चुभे भी क्यो न.. चोर की दाढ़ी में तिनका जो रहता है। माना इस मुद्दे पर किस्मत ने साथ दिया मगर मामला बढ़ा तो न जाने कई रामगुनी सामने आ जाएंगी। कई रामगुनी तो ऐसी हैं जिन्हें न तो पेंशन मिल रही है और अन्त्योदय तो छोड़िए किसी प्रकार का राशन कार्ड तक नहीं है। ऐसी रामगुनी या रामकली की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। हो हल्ले में जितना खर्च किया जा रहा है उसमें कोई एक रामगुनी के रहने ही नहीं, खाने का भी बंदोबस्त हो सकता है। मगर कौन कहे इन गरीबों के अलंबरदारों से…।

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद से एक पत्रकार द्वारा भेजा गया विचार

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