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मंदी और मीडिया : कब तक तोड़े जाएंगे सपने?

साल 2008 की दूसरी तिमाही से चली विश्व आर्थिक मंदी का दौर थमने का नाम नही ले रहा है. मंदी की सुरसा अभी [caption id="attachment_2174" align="alignright"]मंदीमंदी[/caption]कितनो घरों के चूल्हों की आग ठंडी कर देगी, यह कोई नहीं जानता। देश और दुनिया के बड़े बड़े कोरपोरेट हाउस को अपनी साख बचाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने को मजबूर होना पड़ रहा है. अगर हम मंदी के कारण प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की बात करें तो हालात बद से बदतर हो चुकें हैं.  बीते कुछ सालों में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में समाचार पत्रों और चैनलों की बाढ़ सी आ गई है. मंदी से पहले पैसे और रुतबे की चाहत ने कई ऐसे गैर-पेशेवर जाने-माने लोगों ने प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया उद्योग में दस्तक दी व न्यूज चैनलों को खड़ा कर दिया.

मंदी

साल 2008 की दूसरी तिमाही से चली विश्व आर्थिक मंदी का दौर थमने का नाम नही ले रहा है. मंदी की सुरसा अभी मंदीकितनो घरों के चूल्हों की आग ठंडी कर देगी, यह कोई नहीं जानता। देश और दुनिया के बड़े बड़े कोरपोरेट हाउस को अपनी साख बचाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने को मजबूर होना पड़ रहा है. अगर हम मंदी के कारण प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की बात करें तो हालात बद से बदतर हो चुकें हैं.  बीते कुछ सालों में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में समाचार पत्रों और चैनलों की बाढ़ सी आ गई है. मंदी से पहले पैसे और रुतबे की चाहत ने कई ऐसे गैर-पेशेवर जाने-माने लोगों ने प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया उद्योग में दस्तक दी व न्यूज चैनलों को खड़ा कर दिया. युवा पीढ़ी भी प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में अपने भविष्य को पत्रकार और कैमरामैन के रूप में सवारने की राह पर चल पड़ी. उनको सफलता भी मिली. लेकिन सफलता क्षण भंगुर थी. ऐसा लगा मानो गहरी नींद में एक सपना देखा हो. मंदी और गैर-पेशेवर जाने-माने लोगों की चाबुक ने उनकी आत्मा पर ऐसे घाव दिए कि सारे सपने धूमिल हो गए.

एक जमाना था जब पत्रकार की लेखनी का अपना वजूद होता था. समय के साथ साथ लेखनी पर जरुरतों का अंकुश लगने लगा. समाज को दुनिया का अक्श दिखाने वाला पत्रकार उसमें अपना ही वजूद ढूंढने लगा. लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की आज बात करें तो लगता है जिन कांधों पर लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ टिका है शायद वो अपनी राह भटक गया है और एक ऐसे दोराहे पर खड़ा हो गया है कि जहां उसे राह नहीं दिख रही. तय नहीं कर पा रहा किस राह पर चलें ताकि मंजिल मिल जाए. किसी शायर ने ठीक ही कहा है कि- मंजिल इतनी दूर थी कि रास्ते में शाम हो गई. शाम के बाद का अंधेरा इतना घनघोर था कि हाथ को हाथ दिखाई नहीं पड़ रहा था. अचानक याद आया कि आज अमावस की रात है. ठगा सा उसी दोराहे के मोड़ पर सुबह की पहली किरण का इंतजार करने लगा.

वर्ष 2007-2008 में देश और दुनिया की मजबूत अर्थव्यवस्था ने देश के धन्नसेठों की तिजोरियों में गाहे-बगाहे इतना धन भर दिया कि उन्होंने विदेशों में पॉव पसारने व प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया उद्योग में हाथ आजमाने की नूरा कुश्ती करने के लिए जमीन तैयार करनी शुरू दी. आगे बढने की चाह में नामवर पत्रकारों ने अपनी जमी-जमाई नौकरी को लात मार दी. सोने पर सुहागा तो तब हुआ जब उन नामचीन पत्रकारों को अपना आदर्श मानने वाले छोटे पत्रकारों ने भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चलना शुरू कर दिया और अपने भविष्य की बागडोर उचे कद वाले नामचीन पत्रकारों के हाथ सौप दी.

गैर-पेशेवर रईस घरानों ने प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया उद्योग में पांव पसार कर ना जाने कितने अनुभवी पत्रकारों को जमीन दी लेकिन इसके साथ ही ऐसा भी हुआ कि पत्रकारों को नौकरी पर रखने वालों को ये अहसास होने लगा कि मानों उन्होंने श्रम नहीं खरीदा, जेहन और जमीर भी खरीद लिया. यहीं आकर सारी व्यवस्था गड़बड़ा उठी. धन्नासेठों और उनके नितांत मूर्ख पुत्रों के नाम सम्पादक के रूप में छपने शुरू हो गए. पंजाबी की कहावत यहां पूरी तरह चरितार्थ होती है- जिदे घर दाने ओदे कमले वी सयाने. मतलब, जिस घर में पैसा होता है उस घर के पागल भी समझदार हो जाते हैं. आदर्शों और सिद्धांतों की होली जलने की शुरुआत ठीक यहीं से हुई. लेकिन चंद ज्यादा सुविधाओं की खातिर हम इस होली का विरोध करने की बजाए खड़े होकर हाथ तापने लगे.

याद आती है एक कहावत. अंत से बुरी होती है अति. जैसे-जैसे मंदी की काली छाया ने अपना रंग दिखाना शुरू किया, वैसे-वैसे ही धन्नासेठों की तिजोरियों से मां लक्ष्मी रूठ कर जाने लगीं. गैर-पेशेवर धन्नासेठों और नामचीन पत्रकारों के बहकावे में आकर छोटे पत्रकारों ने अपने सुनहरे भविष्य के सपने संजोए थे, वो ना जाने कहां गुम हो गए. छोटे पत्रकार आज शहर की उन सड़कों और गली कूचों में आवारा घूम रहे हैं जहां कभी उन्हें लोग अपने पास बिठाने में गर्व महसूस करते थे. कोई नहीं पूछता कि उसके सीने में क्या दर्द छुपा है. ठीक कहा था मां-बाबू जी ने, बेटा अब तुम बडे़ हो गए हो, अपना अच्छा या बुरा समझ कर ही कोई कदम आगे बढाना. याद रखना, दो कदम आगे जाने के बाद कहीं अतीत तुम्हें मुह चिढ़ा कर ना देखे लेकिन सच्चाई यह भी है कि नसीब से ज्यादा और वक्त से पहले ना कभी मिला है और ना ही कभी मिलेगा.

यह भी सच्चाई है कि जबसे देश आजाद हुआ है, कॉरपोरेट घरानों ने इस देश की अर्थव्यवस्था को सम्भाला है. नए-नए उद्योगों को स्थापित कर रोजगार के नए अवसरों से बेरोजगारों को काम दिया है लेकिन हालिया कुछ समय से कॉरपोरेट घरानों की नासमझी और अनुभवहीनता ने नौजवानों के भविष्य को अंधे कुएं में धकेल दिया है. मंदी का रोना रोकर कॉरपोरेट घरानों में कर्मचारियों की छंटनी करने और सेलरियों में कटौती करके अपने मुनाफे को बरकरार रखने की कवायद जारी है.

हमारे बिखराव ने ही हमें इस मोड़ ला कर खड़ा कर दिया है. हम क्यों नहीं एक होकर अपनी आवाज को बुलंद कर अपने हक की कर पा रहे हैं? कब तक गैर-पेशेवर धन्नासेठ और नामचीन लोग अपने रुतबे-पैसे की हवस की खातिर हमारे भविष्य-सपनों का बलात्कार करते रहेगें? वक्त आ गया है कि हम एकजुट होकर, अपनी लेखनी और आवाज को पैना कर इन शोषकों की सच्चाई समाज को दिखाएं ताकि आने वाली पीढ़ी के साथ खिलवाड़ ना हो।

दोस्तो, ये मेरे दिल का दर्द है जो एक फांस बन कर ना जाने कब से सीने में चुभ रहा है।


लेखक अनिल महाजन इलेक्ट्रानिक मीडिया में बतौर सीनियर रिपोर्टर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

 

 

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