अयोध्या प्रवास और वहां से लौटने के बाद यशवंत जी आपने जो कुछ लिखा उसे पता नहीं कितनों ने पढ़ा, नहीं पढ़ा पर मैंने पढ़ा (पढ़ने के लिए क्लिक करें- अयोध्याकांड : पत्रकारिता दिवस यात्रा वाया मच्छर से लिंग तक) और यकीन जानें शिद्दत से पढ़ा। यशवंत जी, आपका दर्द है कि आप 10 फीसद करप्ट हैं। मैं बेहद उद्वेलित हुआ। यह लगभग वैसा ही है कि दोनों सलामत आंखों वाला बंदा अपनी एक आंख में इसलिए गरम सलाखें घुसेड़ ले क्योंकि सारे लोग अंधे हैं। सच में, मैं मर्माहत हूं। मुझे पता है कि यशवंत जी करप्ट नहीं हैं। पर, मैं कौन होता हूं सर्टिफिकेट देने वाला।
इसके बावजूद मैं मानता हूं कि यशवंत शराबी हो सकता है, कबाबी भी हो सकता है (जैसा कि वह कई बार लिख चुके हैं) पर यशवंत सिंह भ्रष्ट नहीं हो सकता। कोई तर्क नहीं कि क्यों। पर, कुछ चीजें तर्कों के आधार पर साबित नहीं किये जा सकते। मनोविज्ञान कहता है कि बड़बड़ करने वाला दिल का साफ होता है। ज्यादा बोलने का अभिप्राय ही यही है कि वह बोल रहा है, बिना सोचे-समझे। वह भेद नहीं कर पाता कि कौन अपना है, कौन पराया। इसलिए, जब यशवंत असंख्य बार यह बोल चुके हों कि वह छक कर दारू पीते हैं, खूब मांस खाते हैं तो इस किस्म को बंदे को यह क्योंकर कहना पड़ा कि लह 10 परसेंट करप्ट हैं। बेशक, यह उन्होंने बाकी भ्रष्टों की संतुष्टि के लिए कहा हो पर वह भ्रष्ट नहीं हैं। यह सच है कि पत्रकारिता की दुनिया के अधिकतर लोग यही मानते हैं कि आपने जोरदार माल बटोर रखा है पर मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता। बेशक आप बेहद चर्चित हुए पर उस अनुपात में आपको परेशानियां ज्यादा मिली, रोटी का साधन कम। ऊपर की बात करने का तो कोई मतलब ही नहीं।
सन 99 में विजय विनीत, राजीव सिंह और यशवंत आए थे जालंधर। अमर उजाला लांच कराने। मैं पत्रिका से वहां गया था। यशवंत बड़ा प्यारा लगता था। गोरापन तो इस शख्स में अभी भी है पर 99 में वह और गोरा और बेहद स्मार्ट लगता था। मुझसे उम्र में छोटा था। दुबला-पतला शरीर पर तेजी बेहद। हाजिर जवाब। विजय विनीत जी का मजा लेने वाला यशवंत। उस वक्त विनीत जी 35 प्लस के होंगे और यशवंत होंगे यही कोई 24-25 के। मैं अंदाज से कह रहा हूं। पर, इन दोनों की केमेस्ट्री गजब की थी। दरअसल, काका (रामेश्वर पांडे) ने इन्हें इसलिए बुलाया था कि अखबार की लांचिंग में मदद करेंगे। पर, ये आकर बन गए गुरू। विजय विनीत कंप्यूटर के उस्ताद बन गए और लगे सबका टेस्ट लेने।
विनीत जी मेरा भी टेस्ट ले रहे थे। मैं ठहरा आत्म स्वाभिमानी आदमी। मैंने कहा-आप जो चाहें, कंपोज करवा लें पर गुरू बनने की कोशिश न करें। विनीत जी ने कहा कि बास का आर्डर है, टेस्ट तो देना ही पड़ेगा। मैं खुन्नस में था। तभी यशवंत आये। कहा-अरे भाई, चार लाइन कंपोज कर दो, कहानी खत्म। इसे मुद्दा बनाने की दरकार नहीं है। मैं भी तो जालंधर नहीं आना चाहता था। आया कि नहीं। नौकरी है यार, करना पड़ता है। मन तो जला-भुना था ही। मैंने जोर-जोर से कंपोज करना शुरू किया। ये दोनों वहीं बैठे थे। मेरे जोर-जोर से कंपोज करने का असर यह हुआ कि की-बोर्ड टूट गया। इधर की-बोर्ड टूटा, उधर मेरा गुस्सा और बढ़ गया।
की-बोर्ड पर मां-बहनों की गालियों की बौछार करते हुए मैंने की-बोर्ड पर जोरदार मुक्का मारा और की-बोर्ड के अनेक टुकड़े हो गए। उसके बाद कुर्सी पर लात मार कर मैं बाहर निकल गया। इस घटना की चर्चा अनेक दिनों तक दफ्तर में होती रही। राजीव सिंह समझाते रहे कि इस तरह से काम कैसे कर सकोगे। विनीत जी अलग नाराज थे। उन्हें इष्टदेव पांडेय (अब इष्टदेव सांकृत्यायन हो चुके हैं और जागरण सखी देखते हैं) ने कह दिया था कि आनंद ने गाली की-बोर्ड को नहीं, आपको और यशवंत जी को दी थी। मजेदार बात यह हुयी कि यशवंत कभी मेरे पास नहीं आए और न ही कोई बात इस संबंध में की। बाद में मालूम चला कि उन्होंने (होटल या गेस्ट हाउस, जहां वे ठहरे थे) विनीत जी को समझाया था कि हर किसी का टेस्ट लेना ठीक नहीं और यह बात काका को उन्होंने कही भी। यह यशवंत से मेरी पहली मुलाकात थी। इसलिए इस प्रसंग का यहां जिक्र करना जरूरी था।
छह माह पहले मैं उनसे दिल्ली में मिला। फोन पर तो अक्सर चर्चा होती ही थी। मैं नौकरी के सिलसिले में निशिकांत ठाकुर से मिलने आया था। निशिकांत जी को मेरा कैलीबर मालूम था पर जालंधर में मनोज तिवारी जी द्वारा उनके ज्येष्ठ साले की दम भर पिटाई के मामले में वह मुझे भी अभियुक्त मानते थे। सच क्या है, यह उनका साला, मनोज तिवारी और उस वक्त की जागरण की टीम जानती है। सच यह था कि अगर मैंने मनोज तिवारी जी को नहीं पकड़ा होता तो एकाध विकेट गिर चुका होता। किसी का भी। तो, कहने का लब्बोलुआब यह कि निशिकांत जी मुझे नौकरी देना चाहते थे पर फ्लैशबैक में जाने के बाद उनका फैसला बदल जाता था। यह बात मैंने यशवंत जी को बताई थी। उन्होंने कहा-किसी छोटे अखबार में काम करेंगे आप। मैंने कहा कहीं कर लेंगे। उन्होंने मेरे सामने ही भोपाल के एक अखबार के समूह संपादक को फोन कर लगभग आदेशात्मक स्वर में कहा कि आपको इन्हें (मुझे) नौकरी देनी है। फिर मुझे नंबर दिया गया।
मैंने बातचीत की पर वो जो पैसा आफर कर रहे थे और जो फीड बैक मेरे बारे में उन्हें दिया गया था, उससे वे आशंकित थे। इस देश के प्रबुद्ध संपादकों को आम तौर पर मेरे बारे में यह फीडबैक है कि आनंद सिंह काम तो पांच आदमी का करता है पर है मूडी। टेढ़ियाने वाले को गरिया देगा और जरूरत पड़ने पर मार-धाड़ करने में भी पीछे नहीं हटता। यह फीडबैक कौन देता है, मैं 20 वर्षों में समझ नहीं पाया। लोकमत समाचार से लेकर हिंदुस्तान तक मैंने चींटी तक नहीं मारी, फिर भी बदनामी। हां, खबर का धंधा करने वाले संवाददाताओं को उनके घर में घुस कर उनकी बीवी-बच्चों के सामने जम कर गरियाया हूं, इसमें कोई दो राय नहीं। मैं क्या करूं। मैं गलत बर्दाश्त नहीं कर पाता। मुझे कमजोर संपादक पसंद नहीं, कमजोर संपादक मुझे पसंद नहीं करते।
तो, बात चल रही थी यशवंत जी के भ्रष्ट होने की। मैं नहीं मानता कि वो भ्रष्ट हैं। वह खबर और विज्ञापन छापने के साथ-साथ आपकी ब्रांडिंग के पैसे लेते हैं तो क्या बुराई है। आपकी ब्रांडिंग से आपका फायदा हो, अगला बेबसी में जीये, यह तो कोई बात नहीं हुयी। यशवंत भाई, मैं आपसे बेहद अदब और होश में, सोच-समझ कर कहना चाहता हूं कि मैं दशमलव एक फीसद भी अपने धंधे के प्रति भ्रष्ट नहीं हूं।
20 साल मैंने पत्रकारिता को जीया है और नागपुर से लेकर गुवाहाटी तक, रांची से लेकर दिल्ली तक, भोपाल से लेकर रायपुर तक और गोरखपुर से लेकर अंडमान निकोबार तक अगर एक माई का लाल कह दें कि आनंद सिंह ने खबरों को लेकर प्रत्यक्ष और परोक्ष तरीके से एक धेले का भी नगद या किसी अन्य रूप में फायदा लिया हो तो पत्रकारिता छोड़ दूं। मैं आपके बारे में भी इसी किस्म की राय रखता हूं। मेरे मातहत मुझसे कहा करते हैं कि सर, आपके साथ काम करने में मजा नहीं है। न तो आप खुद कमाते हैं, न कमाने देते हैं। नाम नहीं लूंगा, रायपुर में एक सज्जन ने संपादक से मेरी इस बात के लिए बाकायदा शिकायत की और कहा कि सर न तो इन्होंने मुझे गिफ्ट लेने दिया और न ही आपके हिस्से का गिफ्ट आपके कमरे में रखवाने दिया। वह तो मित्र संपादक थे, हंस कर बात टाल गए पर उस सज्जन को मलाल जरूर रहा।
भाई, मेरा मानना है कि करप्ट होना बेहद आसान है। अगर आप अधिकांश नए बच्चों (पत्रकारिता में मैं इन्हें खर-पतवार की संज्ञा देता हूं जो न तो पढ़ते-लिखते हैं और न ही खबर के पीछे भागते हैं) को देखें तो वे प्रेस कांफ्रेंस में गिफ्ट लेने के लिए हद कर देते हैं। गिफ्ट मिला नहीं कि चंपत। कांफ्रेंस में क्या कहा गया, खबर क्या बनी इससे उन्हें कोई मतलब नहीं। यह मैं हिंदी पत्रकारों की बातें कर रहा हूं क्योंकि मैंने इस परिस्थिति को हाल के दिनों में बेहद करीब से झेला है। हां, सारे करप्ट नहीं होते पर 90 फीसद इसी मर्ज के होते हैं। तो, इनके भ्रष्ट होने की संभावनाएं इसलिए ज्यादा हैं क्योंकि इनका लीडर उन्हें इसी किस्म से ट्रेंड करता है। इनका भ्रष्ट होना बेहद आसान है। अब हम लोग चाह कर भी भ्रष्ट नहीं हो सकते क्योंकि छद्म अलौकिक संस्कार आज भी हमें भ्रष्ट होने से रोकते हैं।
हम लोगों की ट्रेनिंग उस माहौल में हुई, जहां हमारे बारे में हमसे ज्यादा हमारा इंचार्ज जानता था। आज के इंचार्जों से पूछें कि फलां संवाददाता का डेट आफ बर्थ कब का है तो उन्हें पता नहीं होगा। मतलब, एजेंडा कुछ और है और उसी एजेंडे को ध्यान में रख कर चीजें तय की जाती हैं। मुझे यह मान लेना चाहिए कि इस सोसायटी में (पत्रकारों की) अधिसंख्य पत्रकार मोरललेस (कोई अच्छा हिंदी शब्द नहीं सूझ रहा, आप खुद तय कर लें) हो चुके हैं। इसलिए वे सर्वाधिक पीड़ित, करप्ट और दलाल टाइप के हो चले हैं। मुझे नहीं लगता कि पीड़ित, करप्ट और दलाल टाइप को अलग से समझाने की जरूरत है। उस लिहाज से, अगर मैं खुद को भीड़ का हिस्सा मानता हूं तो मैं भी दशमलव एक फीसद भ्रष्ट हूं और सुनिए, आपके उधार के शब्द के साथ य़ह कहना चाहता हूं कि अगर मैंने खुद को दशमलव एक फीसदी करप्ट नहीं कहा तो लौंडे-लफाड़ी मुझे गर्त में डाल देंगे। आखिर जीना तो इन्हीं के साथ है। क्या कहते हैं आप?
लेखक आनंद सिंह दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों नए लांच होने वाले अखबार हम वतन में बतौर प्रिंसिपल करेस्पांडेंट कार्यरत हैं.

