Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

साहित्य जगत

कांग्रेस का मुख पत्र बनती जा रही हैं एनसीईआरटी की पुस्‍तकें!

विद्या मृतमश्नुते. इस्वस्य उपनिषद् से लिया गया यह श्लोक, नेशनल काउन्सिल औफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग, जिसे हम एनसीईआरटी के नाम से ज्यादा जानते हैं, का ध्येय-वाक्य है. यह सूत्र न केवल ज्ञानवर्धन के महत्व को दर्शाता है, बल्कि हमें आश्वस्त भी करता है कि एनसीईआरटी की पुस्तकें इस कार्य में हमारी सहायता करेंगी. हमारे देश में एनसीईआरटी को ज्ञान का भण्डार माना जाता है. आईआईटी-जेईई, एआईईईई, क्लैट, सी-सैट (सिविल सेवा) आदि अन्य कई प्रतियोगिताओं में प्रवेश पाने के लिए एनसीईआरटी पुस्तकें एक नीव प्रदान करती हैं. अविभावक इसे तथ्यों का निष्पक्ष प्रदर्शन मानते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ छात्र इसमें दी गयी हर बात को बिना कोई सवाल किये कंठस्थ कर जाते हैं.

विद्या मृतमश्नुते. इस्वस्य उपनिषद् से लिया गया यह श्लोक, नेशनल काउन्सिल औफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग, जिसे हम एनसीईआरटी के नाम से ज्यादा जानते हैं, का ध्येय-वाक्य है. यह सूत्र न केवल ज्ञानवर्धन के महत्व को दर्शाता है, बल्कि हमें आश्वस्त भी करता है कि एनसीईआरटी की पुस्तकें इस कार्य में हमारी सहायता करेंगी. हमारे देश में एनसीईआरटी को ज्ञान का भण्डार माना जाता है. आईआईटी-जेईई, एआईईईई, क्लैट, सी-सैट (सिविल सेवा) आदि अन्य कई प्रतियोगिताओं में प्रवेश पाने के लिए एनसीईआरटी पुस्तकें एक नीव प्रदान करती हैं. अविभावक इसे तथ्यों का निष्पक्ष प्रदर्शन मानते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ छात्र इसमें दी गयी हर बात को बिना कोई सवाल किये कंठस्थ कर जाते हैं.

मैं कक्षा बारह की छात्रा हूँ. हाल ही में मैं एनसीईआरटी की राजनीति शास्त्र की पुस्तक ‘पोलिटिक्स इन इंडिया सिंस इट्स इन्देपेंडेंस’ पढ़ रही थी. एक ऐसे व्यक्ति के लिए, जो इस बात से अनभिज्ञ था की गणतंत्र घोषित होने के बाद भारत में राजनीति ने किस प्रकार से विकास किया,  मैंने इस पुस्तक से बहुत कुछ सीखा. पर साथ ही साथ, कुछ जगहों पर मुझे ऐसा लगा कि तथ्यों को छुपाया जा रहा है. हो सकता है की यह सिर्फ मेरा वहम हो, या फिर परिस्थितिओं के बारे में जानने कि मेरी अत्यधिक इच्छा मुझे ऐसा सोचने पर मजबूर कर रही हो. वैसे भी, किसी एक पुस्तक में हर घटनाक्रम की जानकारी दे पाना मुमकिन नहीं है. कई बातों को संक्षेप में करना आवश्यक हो जाता है. इन सब बातों के बावजूद मेरा मानना है कि पुस्तक को पढ़ने के बाद पाठक के मस्तिष्क में सभी घटनाओं का सही चित्रण हो जाना चाहिए. पाठक को ऐसा महसूस नहीं होना चाहिए कि संक्षेपित करने के नाम पर उससे सच्चाई छिपाई जा रही है.

एनसीईआरटी पुस्तकों को ले कर पहले भी विवाद हो चुके हैं. मोरारजी देसाई की सरकार के समय आर.एस. शर्मा की 1997 ‘एन्सीएंट इंडिया’ को केंद्रीय माधामिक शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम से हटा दिया गया था. 1978-79 में रोमिला थापर द्वारा लिखित ‘मीडिवल इंडिया’ पुस्तक की मुस्लिम विचारों के प्रति झुकाव होने तथा हिन्दू विरासत के प्रति उदासीन होने के लिए कड़ी आलोचना हुई थी. 2002 में भाजपा द्वारा संचालित एनडीए सरकार पर समाज शास्त्र की पुस्तकों का ‘भगवाकरण’ करने का आरोप लगा था. 2004 में सत्ता में आने वाले यूपीए गठन ने इन पुस्तकों को भगवाकरण से मुक्त करने तथा इन्हें पुनः धर्मनिरपेक्ष बनाने का प्रण लिया.

1975-77 में लगी इमरजेंसी का उदहारण ले लें. इसे स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे अंधकारमय काल माना जाता है. इस अवधि में आम आदमी को जीवन और आजादी का अधिकार नहीं था, पुलिस पशुता का व्यवहार कर रही थी, लोगों को अवैध रूप हिरासत में लेकर नजरबन्द कर दिया जा रहा था, सुन्दरता क्रमादेश के तहत अनगिनत झुग्गी-झोपड़ियों को उजाड़ कर इन में रहने वाले लाखों लोगों को बेघर कर दिया जा रहा था. सार्वजनिक तथा निजी मीडिया संस्थाओं का सरकार द्वारा अपना प्रचार करने में प्रयोग किया गया, संविधान में गैर-कानूनी बदलाव किये गए. उच्चतम न्यायालय के केशवानंद भारती निर्णय (1973) के बावजूद भारत सरकार ने लोगों को उनके मौलिक अधिकार देने से मना कर दिया. जस्टिस एह.आर. खन्ना द्वारा यह पूछे जाने पर कि इमरजेंसी में क्या पुलिस नागरिको पर गोली चला सकती है, अट्टोर्नी गेनेराल निरेन डे ने उत्तर दिया कि ‘यद्यपि यह कहते हुए उनकी अंतरात्मा को ठेस पहुँच रही है, परन्तु पुलिस ऐसा कर सकती है, और लोगों के पास इसका कोई उपाय नहीं है.’ इमरजेंसी की ऐसी दहशत के बाद भी एनसीईआरटी पुस्तक में इस विषय पर केवल सतही जानकारी दी गयी है और ऐसा दर्शाया गया है कि यह कोई बड़ी बात नहीं थी, केवल राजनैतिक तथा संवैधानिक संकट था. उस समय भारत की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी एवं उनके पुत्र श्री संजय गाँधी की भूमिका को भी पूर्णतया:  नजरंदाज कर दिया गया है.

दूसरा विषय है ‘ऑपेरशन ब्लू स्टार’  और 1984 के सिख विरोधी दंगे. ब्लू स्टार के समय भारतीय सेना ने कथित रूप से कई पुरुष, महिलाओं और बच्चों को केवल इस बिनाह पर मार दिया कि स्वर्ण मंदिर तथा कुछ अन्य गुरुद्वाराओं में आतंकवादी छुपे हुए थे और ये लोग भी उनमे से एक हो सकते थे. इससे आक्रोशित होकर 31 अक्टूबर 1984 को श्रीमती इंदिरा गाँधी की उनके ही दो सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी. इस घटना से प्रभावित होकर देशभर में सिख विरोधी दंगे चालू हो गए. माना जाता है कि अक्टूबर 31 की रात तथा नवम्बर 1 की सुबह कांग्रेस पार्टी के नेता स्थानीय समर्थकों से मिले और उन में पैसे व हथियार बांटे.

कांग्रेस पार्टी के सांसद श्री सज्जन कुमार पर ‘लोगों को सिखों को मारने तथा उनके घर लूटने और जलने के लिए भड़काने’ का आरोप लगा. कई नेताओं ने दुकानों व अन्य सार्वजनिक जगहों पर बैठक बुला कर सिखों को मारने की कसम दिलाई. भीड़ द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला केरोसीन कथित रूप से कांग्रेस नेताओं द्वारा प्रदान किया गया था. भारी संख्या में लोगों का मानना है की कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने आक्रमणकारियों को मतदाता सूची, विद्यालय पंजीकरण फॉर्म, राशन सूची दीं, जिनकी सहायता से सिख घरों को ढूँढने का असंभव कार्य बेहद आसान हो गया. आक्रमणकारियों में से ज्यादात्यर निरक्षर थे, तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने तथाकथित रूप से सूचियाँ पढ़ने में भी उनकी मदद की. सशस्त्र भीड़ ने दिल्ली व आस पास के इलाकों में बसों और ट्रेनों को रोक कर उन में सफर कर रहे सिख यात्रियों को केरोसीन डाल कर ज़िंदा जला दिया. श्री राजीव गाँधी ने इस हत्याकांड को श्रीमती गाँधी की हत्या का वाजिब दुष्परिणाम बताते हुए कहा कि ‘जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तब धरती तो हिलती ही है’. श्री गाँधी पर भी दंगे भडकाने का आरोप लगा, लेकिन बाद में नानावती कमीशन ने उन्हें दोषमुक्त पाया. एनसीईआरटी पुस्तक में लोंगोवाल संधि और सिख दंगों पर एक अंतरे के अलावा इन घटनाक्रमों का कोई उल्लेख नहीं है. ऐसा लगता है मानो इस हत्याकांड का इतिहास में कोई महत्त्व ही न रहा हो.

अपितु इन सभी बातों को पुस्तक में लिखने की खास जरूरत नहीं है, परन्तु इनका संक्षिप्त रूप पाठ में दिया जाना चाहिए. किसी राजनैतिक संगठन कि भूमिका को ऐसे ही नजरंदाज नहीं किया जा सकता. एक पाठक के रूप में मुझे ऐसा लगा कि पुस्तक कांग्रेस कार्यकाल में हुई गलतियों पर पर्दा डालना चाह रही है. वाक्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि कश्मीर में जनमत संग्रह का वादा कर के मुकर जाना, या इमरजेंसी लागू करना (अपने स्वार्थ के लिए), सभी देश के विकास के लिए किये गये हों. इसके विपरीत मानवाधिकार आयोग का सन्दर्भ देते हुए, पुस्तक में गोधरा कांड के लिए गुजरात में शासन कर रही बीजेपी सरकार को दोषी ठहराया गया है. इस हिसाब से केंद्र सरकार के बहुमत दल की को भी सामने लाना चाहिए. एनसीईआरटी की सत्यता और निरपेक्षता में हमारे विश्वास को देखते हुए, पुस्तक में घटनाओं का सही चित्रण होना चाहिए. अन्यथा, आने वाले समय में एनसीईआरटी पुस्तकें अपना मानक खो कर, सत्ता-दल के प्रचार का एक जरिया भर रह जायेंगी.

लेखिका तनया ठाकुर एसएनवीपी, मेरठ में कक्षा बारह की छात्रा हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...