योगी से बने सत्याग्रही स्वामी रामदेव के सत्याग्रह ने उस इतिहास को दोहरा दिया जब बापू ने स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजी सरकार के खिलाफ अपना सत्याग्रह शुरू किया था। समय के साथ परिस्थितिया बदली साथ ही बदल गई सत्याग्रह का वह स्वरूप। यह सत्याग्रह ना अंग्रेजो के खिलाफ है और ना ही स्वतंत्रता के लिए। यह तो स्वतंत्रता के साथ मिली लोकतंत्र के लिए सत्याग्रह है। जिसे पाना हर भारतीय का संवैधानिक अधिकार है। परंतु जिस तरह से वर्तमान सरकार ने सत्याग्रहियों के उपर लाठियां चलाईं व अनुचित कार्रवाई की उससे स्पष्ट हो गया है कि सरकार ने लोकतांत्रिक मांगों के आगे घुटना टेक दिया है। साथ ही लोकतंत्र का गला घोटने का काम भी किया है। उसने काले धन को प्रत्यक्ष ना करने की प्रमाणिकता को जाहिर किया।
अगर सत्ताधारी लोगों के नजरिये से यह सत्याग्रह आंदोलन गलत है तो शायद भारतीय संविधान के अनुछेद 19 को बदलने की जरूरत है। जिसमें यह वर्णित है कि हमे अपनी अभिव्यक्ति करने का अधिकार है और यह हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। आवाम के उठे सत्याग्रही आवाज को दबाने से पहले सत्ता के लोगों को संविधान बदलने की जरूरत है। क्योंकि जिस तरह से महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गो पर हाथ उठाया गया। यह भारतीय सांस्कृति एवं उनकी धार्मिक भावनाओं का दोहन करना है, जिसकी अनुमति संवैधानिक तौर पर कहीं वर्णित नहीं है। इस घटना की आलोचना करने के लिए शायद किसी आलोचक के पास शब्द कोश कम पड़े।
यदि स्वामी रामदेव की बात सरकार मानने को पहले ही तैयार थी तो इस लिखित प्रमाण को सत्याग्रह शुरू होने से पहले लोकतंत्र के पटल पर क्यों नहीं रखा गया। अगर स्वामी रामदेव अपने अनुयायियों के साथ पूर्ण दोषी है और लोकतांत्रिक हनन के दोषी है। तो सरकार को इससे कम अंक देना लोकतंत्र में पक्षपात करना होगा। बहरहाल जो भी हो लोकतंत्र में सांस लेना और फिर लोकतंत्र का हनन करना यह इतिहास के पन्नों में एक काला दिवस होगा। इस तरीके से काले धन को ना लाना या इसके खिलाफ कोई कदम ना उठाना ”चोर की दाढ़ी में तिनके” का होना माना जाएगा। इस कालेधन को पाना हर भारतीय का अधिकार है। क्योंकि यह राष्ट्रीय संपत्ति है।
लेखक अमित मिश्रा दैनिक गांव-गिरांव के दिल्ली में ब्यूरोचीफ हैं.

